(कहानी घर घर की कहानी हर घर क) Ek DUJE KE SAHARE

       कहानी घर घर की, कहानी हर घर की

                       सारांश

           यह कहानी सिर्फ़ आपके और मेरे घर की, या सिर्फ़ आपकी या मेरी नहीं, लेकिन यह कहानी शायद हर घर की है। 

लेखन प्रक्रिया 

जैसे-जैसे मैं लोगों से मिलती गई और उनकी बातें सुनती गई, मुझे एहसास हुआ कि हर किसी के पास एक कहानी है जो दिल को छू जाती है। किसी की बातें मुझे प्रेरित करती हैं, तो किसी की कहानी मुझे जीवन के महत्वपूर्ण सबक सिखाती है, इसीलिए मैंने इस किताब में छोटी छोटी कहानी का रूप देकर, हर एक के घर की कहानी लिखने का प्रयास किया है, कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ सच्ची, कुछ झूठी, कुछ देखी, कुछ अनदेखी, कभी प्यार तो कभी तकरार। ऐसी ही प्यारी सी कहानियाँ लेकर मैं आप सब के पास आ रही हूँ, उम्मीद है, आप सब को मेरी यह कहानियाँ पसंद आएगी, क्योंकि इन में से ही कई कहानियाँ पढ़ने पर कई लोगों को लगे, की हाँ, सच में एसा तो हमारे घर में भी होता है, एसा तो हमारे साथ भी हुआ है क्योंकि इन कहानियों में से कई कहानियाँ सत्य घटना पर आधारित है और शायद इन कहानियों में से ही कई लोगों को उनके सवाल के जवाब भी मिल जाए।

मैंने जैसे जैसे लोगों की बातों को कहानियों के रूप में लिखना शुरू किया वैसे वैसे इस प्रक्रिया में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। लोगों के अनुभवों से मुझे यह समझने का अवसर मिला कि जीवन में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उनकी कहानियों ने मुझे सिखाया कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमें क्या मूल्यवान मानना चाहिए और किन चीजों से बचना चाहिए।

लोगों की बातें सुनकर मुझे यह एहसास हुआ कि जीवन में अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक होता है। उनकी कहानियों ने मुझे जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद की और मुझे एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित किया।

अब, मैं लोगों की कहानियों को लिखने और उन्हें दूसरों के साथ बांटने के लिए प्रेरित होती हूं, ताकि वे भी इन कहानियों से सीख सकें और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

पाठकों की प्रतिक्रिया 

इस किताब में मैंने जो कहानियां लिखी है, उन में से मेरी कुछ कहानियों को विजेता घोषित किया गया है, और कुछ कहानियों ने लोगों के दिलों को छू लिया है। कुछ कहानियाँ पढ़कर कई लोगों की आँखें भी भर आई हैं। यह देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मेरी इन छोटी-छोटी कहानियों ने सबका मन जीत लिया।

लोगों की प्रतिक्रियाओं से मुझे यह एहसास हो रहा है कि मेरी कहानियों ने लोगों के जीवन को छू लिया है, और उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर किया है। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है, और मुझे आगे भी लिखने के लिए प्रेरित कर रही है।

मैं अपने पाठकों की आभारी हूं, जिन्होंने मेरी कहानियों को पढ़ा और सराहा। मैं आगे भी अपनी कहानियों के माध्यम से लोगों के जीवन को छूने और उन्हें प्रेरित करने की कोशिश करती रहूंगी।

        तो दोस्तों, आप लोग सच में सोच रहे होंगे कि अगर ज़िंदगी सच में ऐसी ही हो, ज़िंदगी में कोई मुश्किल ही न हो, ज़िंदगी खुशियों से भरी हो, तो कितना अच्छा रहेगा, मगर दोस्तों ऐसा सच में नहीं होता। ज़िंदगी है, तो परेशानियां भी होगी ही, जैसे दुःख के बाद सुख और सुख के बाद दुःख, यही तो ज़िंदगी का नियम है, इसलिए मेरी इन कहानियों में से कई कहानियाँ ज़िंदगी की सीख दिखला जाती है, ज़िंदगी से लड़ना सिखा जाती है।

Bela...


               1 )    घर की अवस्था

           वैसे देखा जाए तो दोस्तों, एक हाउस वाइफ, हर घर की शोभा होती है, अगर वह अपना हर काम प्यार से करे तो, घर इतना सुंदर और सुव्यवस्थित नज़र आने लगता है, कि जैसे उसकी किसी के साथ कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। 

         मगर अगर वही हाउस वाइफ अपने ही घर के काम करते वक़्त में ऐसे भाव रखें कि, घर के इतने सारे काम मैं ही क्यों करु ? उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा और देखती हूँ, एक दिन मैं काम ना करु तो क्या होता है ? तो घर धीरे धीरे बिखरने लगता है। 
          इसीलिए एक हाउस वाइफ के विचारों पर ही घर की अवस्था निर्भर करती है।

                2)      एकदूजे के सहारे

           एक दिन मैं हॉस्टल में मेरे दादाजी और दादीजी को याद कर अपनी सहेली प्रिया को उनके बारे में बता रही थी, कि " मेरे दादाजी और दादीजी दुनिया में सबसे प्यारे और सबसे अनोखे दादाजी और दादीजी है, उनकी love story बड़ी दिलचस्प है और वो दोनों भी। 

             मेरे दादाजी और दादी एक दूसरे से जितना लड़ते है, उस से कई ज़्यादा एक दूसरे से प्यार भी करते है, मेरे दादाजी को अब उनकी उम्र के हिसाब से थोड़ा ऊँचा सुनने की आदत है, इसलिए दादी को हर बात उनसे ज़ोर से कहनी पड़ती है। कभी दादाजी रूठते है, तो कभी दादी। उनके बिच नोकझोंक चलती ही रहती है, फिर भी शाम को दोनों साथ बैठकर ही खाना खाते और बरामदे में बैठ कर बातें किया करते।  

         मैं उनसे पूछती, कि " रोज़ रोज़ आप क्या बातें करते रहते है, तब वो बताते, कि पहले हम दोनों को बातें करने का वक़्त ही नहीं मिलता था, इसलिए जो बातें हम हमारी जवानी में नहीं कर पाए, वो सब बातें अब कर लिया करते है और साथ-साथ कुछ पुरानी याद को भी ताज़ा कर लिया करते है, और तो क्या ! जब तू हमारी उम्र की होगी, तब तू भी यही करेगी, देख लेना । " और हम सब हँस पड़ते। 

          दादाजी को गुस्सा ज़रा जल्दी आ जाता है। कभी कभी दादाजी छोटी-छोटी बात पर बुरा भी मान जाया करते और दादीजी उनको मना लिया करती और कभी-कभी दादीजी को उनकी किसी बात का बुरा लग जाता तो, दादीजी दादाजी से बात ही नहीं करती, फिर दादाजी दादीजी को मनाते है, दोनों साथ में चाय-नास्ता करते, बाद में साथ मिलकर घर में कान्हाजी की सेवा पूजा करते और शाम को साथ में हमारे नज़दीकी नाना-नानी पार्क में चलने के लिए जाते, घर आकर खाना खा कर दोनों साथ में रेडियो पर पुराने गाने सुनते- सुनते बातें करते और एकदूसरे का हाथ पकड़कर सो जाते। "

        फ़िर एक दिन दादीजी ने मुझ से कहा, कि मेरी दवाई ख़त्म हो गइ है, आज तुम कॉलेज से आते वक़्त मेरे लिए दवाई लेती आना। मगर तुम्हारे दादाजी को इस बात का पता चलना नहीं चाहिए, कि मेरी दवाइयांँ ख़त्म हो गइ है, वरना वे ख़ामखा ही परेशान हो जाएँगे और हांँ, साथ में थोड़े से पकोड़े भी लेती आना, बहुत मन कर रहा है खाने का। 

        मैंने कहा जी ज़रूर दादी, कहते हुए मैं कमरें से बाहर जा ही रही थी, की सामने से दादाजी अपनी लकड़ी के सहारे चलते हुए दादीजी की दवाई और पकोड़े लेकर आते है और कहते है, कि " ये लो तुम्हारी दवाइयांँ, इसे वक़्त पर ले लेना, वरना रात को घुटनों का दर्द तुमको होगा और नींद मेरी चली जाएगी और साथ में ये गरम पकोड़े भी लाया हूँ, बहुत दिनों से मेरा भी मन था खाने का।"  दो पल के लिए तो ये देख मेरी आंँखें खुली की खुली ही रह गई। 

         मैंने दादीजी से कहा, कि " ये लीजिए, आपने इधर कहा और उधर दादाजी ने सुन लिया। आपकी दवाई और पकोड़े दोनों हाज़िर है और साथ में हमारे प्यारे दादाजी भी।" 

         मैं ख़ुशी से दोनों के गले लग गई। कभी-कभी  उनका ऐसा प्यार देख मेरी भी आँखें भर आती है।   

       एक दिन दादाजी मंदिर जाते वक़्त अपना चश्मा और लकड़ी ऊपर कमरे में ही भूल आऐ थे, तो उन्होंने मुझ से कहा, कि ज़रा ऊपर से मेरा चश्मा और लकड़ी लेकर आओ, वार्ना तेरी दादी को ही ऊपर जाकर लाना पड़ेगा,  वैसे भी उसके घुटनों में दर्द रहता है। 

       मैंने कहा, जी दादाजी अभी लेकर आती हूँ, तभी सामने से दादीजी, दादाजी का चश्मा और लकड़ी लेकर आती है और कहती है, कि " ये लीजिए आपका चश्मा और लकड़ी, जिसे आप ऊपर ही भूल आए थे और मुझे पता है, लकड़ी के बिना आप ठीक से चल नहीं पाते और चश्मे के बिना आप कान्हाजी के दर्शन कैसे करते भला ? आप भी है, ना... आज कल बहुत भुलक्कड़ होते जा रहे हो। "

    दादाजी मन ही मन बोले, बस तेरे प्यार में !

        और मैंने दादाजी से कहा, कि " आप ने कहा और आपका चश्मा और लकड़ी हाज़िर है।"

    मेरा दिल ये देख बार-बार यही कहता है, कि " आप दोनों का प्यार और साथ उम्र भर ऐसे ही बना रहे। आप दोंनो ही एकदूजे का सहारा हो और हंमेशा रहेंगे, आप दोनों जैसे एकदूजे के लिए ही बने हुए है, आप दोनों को किसी और के सहारे की जरुरत ही नहीं। "


          दादाजी दादीजी के बिना नाहीं कभी चाय-नाश्ता करते और नाहीं कभी कहीं जाते। जहाँ भी जाना हो दोनों साथ में ही जाते। 

   कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है, कि " जैसे दादाजी और दादी दोनों की दुनिया में बस वो दोनों ही है और कोई नहीं, ऐसे वो दोनों एकदूसरे का ख़्याल रखते और एकदूसरे से प्यार करते है।"  

         एक दिन मेरी दादीजी बहुत बीमार हो गई, तब दादाजी ने एक पल का भी आराम नहीं किया, दिन रात दादीजी के करीब बैठ के उनकी सेवा करते रहे, कभी दादीजी के सिर पर हाथ फेरते, तो कभी दादीजी को दवाई पिलाते, तो कभी दादीजी को बिस्तर से खड़े होने में मदद करते, उनको वक़्त पर चाय, नाश्ता, खाना खिला देते, आधी रात को उठकर दादीजी को चुपके से देखा करते कि वो ठीक तो है ना, कहीं उसे किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं। तब दादी चुपके से ये सब देखा करती और दादाजी को चिढ़ाते हुए धीरे से कहती, कि " मैं ठीक हूँ, अभी मैं आपको छोड़ के जानेवाली नहीं, मेरी इतनी फिक्र मत किया किजीए और आराम से सो जाइए।" 

         ये सुन दादाजी चिढ़ जाते और कहते, कि  " ऐसी बात नहीं, मैं तो सिर्फ़ देख रहा था, कि तुम्हें बुखार कम हुआ की नहीं और मैं भला तुम्हें ऐसे कैसे जाने दूँगा, तुम्हारे पास अभी मुझ को बहुत सेवा करवानी है और लड़ना भी है, अगर तुम चली गई तो मैं किस के साथ झगड़ा करूँगा ? किस के रूठ ने पर उसे मनाया करूँगा ? किस के बालो में गजरा लगाऊँगा ? किस के साथ बातें करूँगा ? " 

    कहते-कहते दादाजी की आँखों में सच में आँसू आने लगे, ये देख दादीजी की आंँखें भी भर आई।        उन दोनों को देख मुझे ऐसा लगता है, कि " असलियत में अब दोनों को एकदूसरे से दूर होने का डर है, कि अगर एक जल्दी चला गया तो दूसरे का क्या होगा ? " इसलिए दोनों एकदूसरे की ज़्यादा परवाह करते है, कल का तो पता नहीं मगर आज जब साथ है, तो क्यों ना एकदूसरे का सहारा बने रहे जिससे की साथ ना रह पाने का ग़म ना हो और ज़िंदगी यूहीं एकदूजे के सहारे चलती रहे। " 

       मेरी बात सुनते-सुनते प्रिया की आँखें भी भर आती है। प्रिया ने मुझ से कहा, कि " अब के vacation में अपने दादाजी-दादीजी से मिलवाने मुझे ज़रूर ले जाना, मुझे भी उनसे बातें करनी है। " 

           तो दोस्तों, ऐसे दादाजी-दादीकी की तरह सोच के हम भी अपनी ज़िंदगी में एकदूसरे का इतना ख़्याल रखे और एकदूसरे को इतना प्यार दे, कि उसी यादों के सहारे हमारी बाकि की ज़िंदगी भी आराम से बित जाए और ज़िंदगी में कुछ खोने का या ज़िंदगी में किसी का साथ ना रहा ऐसी फरियाद भी ना रहे। क्यूंँकि भगवान् के पास जाने की किस की बारी पहली आ जाए, ये आज तक किसी को नहीं पता, उसका बुलावा आए तो सब कुछ छोड़ के एक दिन तो सब को जाना ही है।              

सत्य घटना पर आधारित 

                 3)   माँ का दूसरा रूप 

          मेरी कहानी की राधिका का के तीन बच्चें थे, उसमें दो बेटे और एक छोटी बेटी थी, राधिका अपने तीनों बच्चों पर जैसे जान न्योछावर करती थी, कभी कभी राधिका का पति रितेश, राधिका को चिढ़ाते हुए मज़ाक में कहता, कि " कभी कबार मेरी तरफ़ भी ध्यान दिया करो, मैं भी तो तुम्हारा बच्चा ही तो हूँ। " 
      राधिका भी हंस कर कह देती, " मेरे और मेरे बच्चों के बीच आप नाही आओ, तो ही ठीक रहेगा।" और बेचारे रितेश टिफिन लेकर मुँह फुलाकर ऑफिस चले जाते। 
       सुबह से राधिका अपने सोनू, मोनू और स्वीटी इन तीनों बच्चों के बीच ही उलझी रहती, अपने बच्चों के अलावा उसे और कुछ दिखता ही नहीं, बच्चों का खाना, पीना, सब को टाइम पर जगाना,  टिफिन बनाना, सब को तैयार कर के स्कूल, ट्यूशन, ड्राइंग क्लास, कराटे क्लास, डांस क्लास भेजना, स्कूल मीटिंग, पीटीए मीटिंग, पेरेंट्स मीटिंग, हर मीटिंग में टाइम पर पहुँचना, बच्चों को स्कूल की हर एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करने के लिए मोटिवेट करना, सब के प्रोजेक्ट तैयार करने में उनकी मदद करना, कितना कुछ राधिका अपने बच्चों के लिए करती आई है, अपने लिए तो जैसे उसके पास वक्त ही नहीं रहता, यह तो बस एक माँ का प्यार ही है, जो हर हाल में वह अपने बच्चों के लिए करती आई है, मगर वक्त बदलते देर नहीं लगती।
         राधिका की छोटी बेटी अभी तो सिर्फ़ ११  साल की ही थी, इन दिनों राधिका की तबियत कुछ ठीक नहीं रहती थी, पहले तो राधिका ने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, मगर बाद में तकलीफ़ और बढ़ने लगी, तब राधिका के पति ने डॉक्टर के कहने पर राधिका का ब्लड रिपोर्ट करवाया, उस में राधिका को कैंसर आया, राधिका को तब सब से पहले अपने नहीं बल्कि अपने बच्चों के बारे में ख़्याल आया, कि मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा ? उन्हें वक्त पर कौन स्कूल भेजेगा ? वक्त पर कौन खाना खिलाएगा, रितेश को तो बच्चों के बारे में ज़्यादा कुछ पता ही नहीं, उन्हें तो अपने काम से फुर्सत ही कहा ? और माँ से बेहतर अच्छा ख़्याल और कौन रख सकता है ? राधिका को अजीब अजीब ख़्याल आने लगे।         
       आख़िर राधिका ने अपना मन बना ही लिया, कि कैंसर हो या कोई भी बीमारी हो, मुझे अपने बच्चों के लिए ठीक होना ही है, उसने अपने पति रितेश से कह दिया, कि " मेरा इलाज शुरू करवा दे, अगर पैसे कम पड़े तो मेरे सोने के गहने बेच दे लेकिन अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास मेरा इलाज करवाए और चाहे कुछ भी हो जाए मैं हिम्मत नहीं हारूंगी, मुझे मेरे बच्चों के लिए ठीक होना ही है।" 
          राधिका की ऐसी बात सुनकर रितेश को भी हिम्मत मिली, रितेश ने राधिका का इलाज अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास करवाया, kimo थेरपी की ज़रूरत पड़ी, तो वह भी करवाया, kimo थेरपी की वजह से उसे अपने लंबे बाल भी गवाने मंजूर थे। राधिका ने सोचा, कि बाल तो फिर से आ जाएंगे। उस वक्त राधिका ने बच्चों की देखरेख के लिए अपनी माँ को गाँव से बुला लिया और एक कामवाली बाई भी पूरे दिन के लिए घर पर रख ली, ऑपरेशन से पहले घर में सब सामान मंगवा के रख लिया ताकि माँ, बच्चें और रितेश को कोई तकलीफ़ ना हो, आख़िर राधिका जीत गई, रितेश ने पैसों का भी इंतजाम कर लिया, राधिका के गहने बेचने की भी ज़रूरत न पड़ी, माँ के प्यार के आगे भगवान को भी झुकना पड़ा, अब वह मौत के मुँह से बाहर है, भले ही उसे ठीक होने में काफी वक्त लग गया, मगर वह हिम्मत नहीं हारी, अब वह पहले की ही तरह बच्चों के साथ खेलती है, उनको स्कूल भेजती है, उनको होमवर्क करवाती है, साथ में गलती करने पर डांट फटकार भी लेती है, मगर बच्चों के साथ वह आज बहुत खुश है और अपने मंदिर में भगवान के आगे रोज़ एक दिया जलाकर, नई ज़िंदगी देने के लिए भगवान का शुक्रियादा करती है। 
       तो दोस्तों, यह बस एक माँ का प्यार, विश्वास और ताकत ही है, जो वह अपने बच्चों की ख़ातिर मौत के साथ भी लड़ जाती है, ज़िंदगी की हर तकलीफ़, हर दर्द भी हँसते हुए सह जाती है, बस यहीं एक माँ का दूसरा रूप भी है।


                      4)  अन्याय 
           अन्याय आखिर कब तक सहेंगे ?

         ( एक दिन ऑफिस से आते ही, सतीश ने अपनी पत्नी सुधा को गुस्से में ही बड़े ज़ोर से आवाज़ लगाई। ) " सुधा, कहाँ हो तुम जल्दी से बाहर आओ। "
        ( सुधा सतीश की आवाज़ सुनते ही रसोई का सारा काम छोड़ डरती हुई भागी-भागी रसोई से बाहर आती है। )
    सुधा ने कहा, " क्या हुआ ? सब ठीक तो है, आपने इतनी ज़ोर से आवाज़ क्यों लगाई ? मैं तो डर ही गई। " 
      सतीश ने कहा, " तुम हर हाल में खुश कैसे रह सकती हो ? कभी तो अपने और अपनी बेटियों के बारे में सोचा करो। तुम्हें क्या लगता है ? अगर तुम मुझे नहीं बताओगी, तो क्या मुझे कुछ पता नहीं चलेगा ? क्या मैं इस घर में सिर्फ खाना खाने ही आता हूँ ? "
     सुधा की समझ में कुछ नहीं आया, सुधा ने आराम से सतीश से पूछा, " क्या बात है ? आप क्या कहना चाहते है ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। "
      सतीश ने कहा, " जब से हमारी शादी हुई है, तब से में देख रहा हूँ, तुमने दिन रात मेरे परिवार का अपने से भी ज़्यादा ख्याल रखा है, तुमने दिन रात मेरी माँ के ताने सुनने के बाद भी उनकी हर तरह से सेवा की है, यहाँ तक की उनके अंत समय में तुमने उनकी एक नर्स की तरह सेवा की है, उनका गिला बिस्तर तक बिना किसी हिचक के साफ किया है, इतना तो बिना किसी शिकायत के कोई नहीं करता। तुम आखिर किस मिट्टी की बनी हो, इतना सब कुछ कैसे कर लेती हो ? ये तो ठीक है मगर माँ के जाने के बाद वसीयत में माँ ने तुम को उनके गहने में से सिर्फ उनके कंगन ही दिए, बाकि सब माँ ने अपनी बेटियों को दे दिया, ये जानते हुए भी की हमारी दो बेटियांँ है और अब उनकी शादी की उम्र भी हो चुकी है, तो उनके लिए भी कुछ सोचना पड़ेगा। ये सब तुम को पहले से पता था, फिर भी तुमने मुझे कुछ भी नहीं बताया और नाही कोई शिकायत की, तुम ऐसा कैसे कर सकती हो ? अगर तुमने मुझे यह बात पहले बताई होती, तो मैं कुछ सोचता ना ! मेरी पूरी कमाई घर खर्च और दो बहनों के नखरें उठाने में खर्च हो जाती है, लेकिन अब बस अब बहुत हुआ, आज तो दीदी ने सारी हदे पार कर दी।
      माँ के गहने लेने के बाद अब उन दोनों को अपने घर में भी हिस्सा चाहिए, कहते है, "बाबूजी का कोई ठिकाना नहीं, वो देंगे या नहीं, इसलिए बाबूजी के रहते ही हमें घर में अपना-अपना हिस्सा देदे, ताकि बाद में कोई परेशानी ना हो, आप के घर हम पहले की तरह आते रहेंगे, प्यार बना रहेगा।"
          सतीश ने चिढ़ते हुए कहा, कि " प्यार माय फुट ! ये भी क्या बात हुई उनको पता ही है, हमारे हालात। आज तक में चुप रहा, तुम पर और हमारी बेटी पर होते हुए अन्याय को में सब देखता रहा, सोच के कि आगे जाके सब ठिक हो जाएगा, मगर इन दोनों की मांँगे तो बढ़ती ही जा रही है।  मैं समझता था, कि एक ना एक दिन तुम ज़रूर आवाज़ उठाओगी, अपने हक़ के लिए, मगर नहीं... तुमने आज तक यह किया नहीं, सो तुमसे ना हो पाएगा। अब जो भी कुछ करना है, वह मैं ही करूँगा। अब यह अन्याय ना मैं सहूँगा और ना तुम्हें सहने दूँगा। "

        सुधा ने बड़े धीरे से बात को सँभालने की कोशिश की, और कहा, कि " पहले तो आप ज़रा शांत हो जाइए, माँ की आख़री इच्छा थी, तो उसे कैसे पूरी ना करती, चाहे भले किसी ने मेरी सेवा देखी न हो, मगर भगवान् तो सब देख रहा है, ना ! आज तक उसी ने सब संँभाला है, तो आगे भी वही सब संँभाल लेगा। इन्ही चक्कर में दीदी के साथ अगर हमारा रिश्ता टूट गया, तो लोग क्या कहेंगे ? ऊपर से आप अपनी बहन को तो जानते ही है, हमारे बारे में और भी बुरी बात सब से करेंगे, कि " हम ने उनको कुछ दिया नहीं। " हमारी बेटी के नसीब में जो लिखा होगा वही होगा, मेरे मायके के बहुत से गहने मेरे पास है, उनका मैं क्या करूंगी, कब काम आएंगे वह सब गहने ? वैसे भी आपको तो पता ही है, कि मुझे इन सब चीज़ों से कोई लगाव नहीं है, तो अगर ज़रूरत पड़ी तो उन्हीं गहने से हम नया बनवाकर  अपनी बेटी को कन्यादान में दे देंगे। " 
          मगर इस बार सुधीर नहीं माना, सुधीर ने कहा, " मुझे लोगों की कोई परवाह नहीं, जिसे जो बात करनी है, करने दो, तुमने अभी-अभी कहा ना, कि तुम्हारा भगवान् सब देखता है, तो तुम्हारे भगवान् ने ये भी देखा ही होगा, कि आज तक हमने अपनी नाकारी बहनों के लिए क्या कुछ नहीं किया ? और मैं भुला नहीं, कि जब माँ का बिस्तर गिला होता था, तब दोनों में से एक भी मिलने नहीं आई थी, एक को बुखार था और दूसरी के घर में गेस्ट आए हुए थे, मैं इन दोनों के बहाने अच्छे से समझता हूँ, अगर वे इधर आएंँगे तो माँ का गिला बिस्तर साफ़ करना होगा, यही सोच दोनों ने बहाना बनाया। मैं अच्छे से सब जानता हूँ और अब में माँ के गहनों में से जो उनका हक़ होगा, वही दूंँगा और इस घर में उनका कोई हक़ नहीं होगा। उनका जो हिस्सा होगा, वही इनको मिलेगा, बाबूजी से भी मैंने बात कर ली है, वह भी मान गए है, तो अब तुम्हें उन दोनों नाकारी बहनों पर दया दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं। क्या बहन ऐसी होती है ? इस से अच्छा तो भगवान ने मुझे बहन दी ही नहीं होती। अब हम अपनी ज़िंदगी अच्छे से जिएँगे, किसी के डर की वजह से नहीं। क्योंकि मुझे पता है, वे दोनों यहाँ आकर तुम को भी बहुत खरी-खोटी सुनाती थी, तब भी तुम चुप रही, मगर अब और नहीं। बस मैंने बोल दिया सो बोल दिया, यह मेरा आखिरी फ़ैसला है। "
         कहते हुए सतीश वहांँ से चला जाता है। और सुधा सतीश को बाहर जाता हुआ देख, अपने बीते हुए साल सुधा की आँखो के सामने से जैसे गुज़रने लगे, कि कैसे इन लोगों ने उनको सताया था।  
       " शादी के इतने साल बाद भी हर त्यौहार पर सतीश की दोनों बहनें हर बार मायके चली आती थी और वह भी अपने शैतान बच्चौ के साथ। लेकिन सुधा कभी त्यौहार पर अपने घर नही जा सकती कयोंकि यहाँ पर पहले से ही ननंद आ जाती थी और सासु जी के पैरो में ददॅ की वजह से वह कुछ काम न कर पाती और ननंद तो आराम के लिए ही आई होती है, सो उनसे तो उम्मीद ही छोड दी थी हमने। मेरे पति सुबह से ओफिस चले जाते, सास-ससुर, ननंद और उनके बेटे सब साथ में घूमने जाते, मुवी देखते, बाहर तो खाना खाते मगर घर आकर भी अच्छे से खाते और वह भी पकवान चाहिए सबको,  फीका खाना तो किसी के गले उतरता नहीं। किसी को रस-मलाई चाहिए तो किसी को गाजर का हलवा, किसी को पिज़्ज़ा चाहिए तो किसी को पंजाबी खाना, सब की पसंद का खाना बनता मगर मेरी बेटियों के पसंद का खाना नहीं बनता। उसकी कोई परवाह नहीं, क्योंकि मेरी ननंद के तो दो बेटे थे और मझे दो बेटी, तो उनको तो पलकों पर रखते थे। हर त्यौहार पर उन सब के लिए तोहफ़े आ ही जाते और दो बहने भी मुँह उठाकर मांँग ही लेती, तब मेरी बेटी को "आज कल पैसो की कमी है, " कहकर मना लिया जाता। सुधा की आँखों के आगे वह सब घूमने लगा, उसका दिल भर आया। आज उसके दिल में भी बहुत कुछ था, लेकिन उसने अपने चेहरे पर यह बात कभी नहीं आने दी, मगर आज जब उसके पति ने उसके लिए आवाज़ उठाई तब उसके दिल को अच्छा लगा, ख़ुशी से ही सही सुधा की आँखें आँसू से भर आई। सुधा ने आज भी सिर्फ यही सोचा, कि " आज उसके पति उसके साथ थे, बस उसे अब और कुछ नहीं चाहिए। " 
        तो दोस्तों, अन्याय सहने की भी एक हद होती है, जहाँ तक सहेंगे, उतना वह लोग दबाते ही जाएँगे। लोगों के बारे में ना सोचकर अपने खुद के बारे में और अपने अपनों के बारे में भी सोचना चाहिए। अन्याय होते हुए देखना और अन्याय सहना दोनों गलत बात है,  " छोटा मुँह बड़ी बात " लेकिन उसकी सजा पितामह भीष्म को भी मिली थी, द्रोपदी पर होते हुए अन्याय को वह देखते रहे, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठा न सके, वह द्रोपदी का वस्त्रहरण रोक सकते थे, मगर वह भी चुप रहे और शायद इसी वजह से महाभारत जैसा महायुद्ध होकर ही रहा। 

             5)    ज़िम्मेदारी और प्यार

        हर लड़की की तरह मेरी कहानी की नताशा का भी एक सपना होता था, जैसे उसे कोई बहुत प्यार करे, उसकी तारीफ़ करे, उसके लिए मर मिटने की बातें करे, आसमान से चाँद और तारें ला ना पाए, तो भी कोई बात नहीं, कभी कभी उसे खुश करने के लिए ऐसी बातें किया करे, उसे सरप्राइज़ दे, उसे गिफ्ट दे, उसका पति उसे बहुत प्यार करे, उसके लिए दीवानगी की हर हदें पार कर जाए, जैसा फ़िल्मों में होता है, जैसे शाहरुख खान की दीवानगी और जैसे अनुपमा का अनुज। मगर जिंदगी कोई फिल्म नहीं हैं, यह एक सच्चाई है, जिसको साथ रखकर हमें जीना पड़ता हैं।
           एक दिन नताशा की कॉलेज की सहेली सुषमा जिसकी शादी बैंगलोर में हुई थी और यहाँ मुंबई वह अपनी फैमिली को मिलने के लिए कुछ दिन आई थी, तो आज सुषमा वक्त निकालकर नताशा से भी मिलने उसके घर आती है, वैसे सुषमा एक अच्छी psychologist भी है, इसलिए वह सब की बात अच्छे से समझ जाती है और सब को अच्छे से समझा भी देती है।
        नताशा वैसे सुषमा से कुछ भी नहीं छुपाती थी, मगर आज नताशा की बातें सुनकर सुषमा को लगा, कि कुछ तो ऐसा है, जो अपने अंदर नताशा ने दबाए रखा है, वह कुछ तो छुपा रही है, इसलिए सुषमा के बहुत पूछने पर फ़िर बातों बातों में नताशा ने अपने मन की उलझन के बारे में सुषमा को बताया, कि " नवीन हर वक्त अपने काम में ही उलझा रहता है, लेकिन मैं चाहती थी, कि मेरा पति मुझे प्यार से भी ज़्यादा प्यार करे, लेकिन यहाँ तो सब उल्टा ही हो रहा है, नवीन का ध्यान मुझ से ज्यादा अपने काम पर ही लगा रहता है, नवीन को तो ज़िंदगी में बहुत आगे बढ़ना है, नवीन को मैं क्या करती हूँ, क्या पहनती हूँ, मेरी तरफ़ उसका तो जैसे कभी ध्यान ही नहीं जाता, लेकिन हा, अगर कभी मैं बीमार हो जाऊं या मुझे कोई भी तकलीफ हो तो वह मुझे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाते है और खुद मेरी दवाई का खयाल रखते है और मेरा  भी बहुत ही अच्छे से ख़्याल रखते है। वैसे तो मुझे किसी भी चीज़ की तकलीफ नहीं पहुँचने देते, मैं अपनी ज़िंदगी जैसे चाहे जी सकती, कहीं पर आने जाने की भी रोक टोक नहीं, कभी कभी मुझ को लगता कि नवीन मुझे बहुत प्यार करते है और कभी लगता कि नवीन का मेरी तरफ ध्यान ही नहीं, इन सब बातों की वजह से मैं अपने पति को अच्छे से समझ ही नहीं पा रही, मेरी तो समझ मैं कुछ नहीं आ रहा, नवीन मुझ से प्यार करते भी हैं या नहीं, मैं खुश हूँ भी या नहीं ? 
         तब नताशा को समझाते हुए सुषमा ने कहा, कि " तुम जैसा सोच रही हो, वैसा बिलकुल भी नहीं, नवीन भी तुमसे उतना ही प्यार करते होंगे, जितना की तुम नवीन से करती हो, मगर वो कह नहीं पाते होंगे, मैंने एकसर देखा है, कि एक पति पर बहुत सारी ज़िम्मेदारियां होती है, हर पत्नी को खासकर अपने पति से उस वक्त प्यार की आशा मत रखनी चाहिए, जब वह अपनी ज़िंदगी से लड़ रहा हो, जब वह अपनी ज़िंदगी के बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा हो, या तो वह बहुत परेशानी में हो, या तो वह अंदर से बिलकुल टूट चुका हो, कभी कभी तुम्हारे लिए बहुत सारा प्यार होते हुए भी वह जता नही पाते, क्योंकि यह भी हो सकता हैं, कि वह अपने घर में सब को खुश देखना चाहता हो, सब की ज़रूरत पूरी करने में कभी कभी वह अपने आप को भी भूल जाता हो, अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए वह टूट चुका होता है, उस से यह कभी भी शिकायत भी मत करना कि उसके लिए तुम्हारा प्यार पहले जैसा नहीं रहा, बल्कि यह सोचना की उसके हालात भी तो पहले जैसे नहीं रहे, सब कुछ पहले जैसा हो जाए, इसीलिए तो वह अपने हालात से आज भी लड़ रहा हैं, नहीं तो मर नही गया होता वह अब तक हार मान कर, कभी कभी आप जिस इंसान से प्यार करते हो, वह इंसान भी आप से उतना ही प्यार करता हैं, लेकिन यह ज़िंदगी हैं मेरे दोस्त, यह कोई tv सीरियल या मूवी नहीं चल रही, जिसमें हीरो और हीरोइन को प्यार के अलावा और कुछ दिखता नहीं, असल ज़िंदगी में प्यार के अलावा बहुत सारी ज़िम्मेदारियां हीरो और हीरोइन को निभानी पड़ती है और अगर वह दोनों हर ज़िम्मेदारियों को आसानी से निभा पाए, तो पिक्चर हिट हो जाती है और अगर निभा नहीं पाते, तो रोज़ के झगड़े और आख़िर में कई लोग जुड़ा भी हो जाते है, उस वक्त अपने पति में अपने लिए प्यार तलाश ने की बजाय, अपने पति से प्यार बनाए रखे, उन्हें प्यार दे, उन्हें ज़िंदगी में आगे बढ़ने का हौंसला दे, हिम्मत दे और तुम यह तभी कर पाओगे, जब तुम्हें अपने प्यार पर यकीन होगा। " 
        तब नताशा अपने बीते दिनों को याद करते हुए सुषमा को कहती हैं, कि " शादी के कुछ साल बाद ही नवीन के पापा गुज़र गए थे और नवीन घर में उनका सब से बड़ा बेटा था, अब घर की हर ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई थी, घर का खर्चा, हमारे दो बेटों की पढ़ाई का खर्चा, माँ की दवाई, उनके घुटनों के ऑपरेशन का खर्चा, बीच बीच में मेरा बीमार होना, नवीन ने हम सब का कितना खयाल रखा हैं, यह तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं, नवीन की दोनों बहनों की पढ़ाई भी चल रही थी, पढ़ाई के बाद नवीन ने ही अपनी दो बहनों की शादी करवाई, उनको अच्छे से बिदा किया, बड़ा भाई होने का हर फर्ज़ अच्छे से निभाया, दोनों बहनों को पापा के ना होने का एहसास तक नही होने दिया, यहाँ तक कि आज तक वह मेरे साथ साथ अपनी बहनों का भी अच्छे से खयाल रखते आए हैं, हर तीज त्यौहार पर सब के लिए उपहार लेकर ही आते, बहन के घर भी किसी भी त्यौहार पर मिठाई न भेजी हो, ऐसा तो हो ही नही सकता, बीच में कोरोना की वजह से ऑफिस के साथ साथ सब काम छूट गया था, उसके बाद उन्होंने, अपने बलबूते पर नया बिज़नेस शुरु किया, कभी भी आराम से बैठे ही नहीं, आज यहाँ तो कल वहाँ, भागते ही रहते, इतना सब कुछ करने के बाद उन्होंने मुझ से कभी कोई शिकायत नहीं की, मैं जो भी बोलु चुपचाप सुन लेते फिर मुस्कुराकर चले जाते, मैं जब चीड़ सी जाती, तब उनको कितना भला बुरा सुनाया करती, तब भी वह चुप रहते, मेरी हर बात को हँसी में ताल देते, मैं भी कितनी पागल हूँ, जिस इंसान पर इतनी सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ हो, वह भला प्यार के बारे में कैसे और कब सोचे ? हमें ही उनको समझना पड़ेगा और अपने आपको समझाना पड़ेगा, कि यह कोई मूवी या सीरियल नहीं, असल ज़िंदगी हैं। "
            कहते हुए नताशा हँसने लगी, नताशा ने अपनी दोस्त सुषमा का बहुत बहुत शुक्रिया किया, उसे यह सब बातें समझाने के लिए, अब नताशा को अपने नवीन पर और भी ज़्यादा प्यार आने लगा, नताशा नवीन का ख़्याल और भी अच्छे से रखने लगी।
           तो दोस्तों, कभी कभी ज़िंदगी में हमें अपनों का प्यार पाने के लिए उसे अच्छे से समझने की भी जरूरत रहती हैं और यह भी याद रखना, कि हर किसी के लिए ज़िम्मेदारी और प्यार दोनों को एक साथ निभाना कभी कभी मुश्किल हो जाता हैं।

               6)    गलती किसकी ? 

        वैसे तो हमने देखा है, कि स्टार प्लस चैनल पर आ रही सीरियल " अनुपमा "  के तीन बच्चें है और साथ में एक माँ होने का हर फर्ज़ अनुपमा ने बहुत ही अच्छे से निभाया, अनुपमा ने अपने हर बच्चों को अच्छे ही संस्कार दिए, कभी भी किसी भी माँ के लिए कोई ज़्यादा प्यारा या कोई कम प्यारा नहीं होता, वह अपने सब बच्चों को एक जैसा प्यार, संस्कार और सीख देती है। मगर कितना भी समझाने पर अगर बच्चा गलत रास्ते पर ही चले, तो तब उसमें माँ की कोई गलती नही होती और इस दुनिया की यह रीत चली आई है, कि बच्चा अगर कोई गलत काम करे तो गलत माँ को ही ठहराया जाता हैं, कि " माँ की ही गलती है, माँ ने कुछ ध्यान नहीं दिया, माँ ने कुछ सिखाया नहीं, माँ ने कुछ कहा नहीं और शायद यह सिर्फ़ अनुपमा का सवाल नहीं, यह हर घर की, हर माँ का सवाल हैं।"
        तो दोस्तों, बस मेरा यही सवाल है, कि ऐसा क्यों ? गलती बच्चें करे, चाहे वह बड़े हो या छोटे, गलती माँ के सिर पर ही डाल दी जाती है, कभी कोई ऐसा कहते हुए तो नहीं सुना कि, गलती पापा की है, उसने बच्चे का ख्याल नही रखा, कुछ सिखाया नहीं, तो फ़िर बच्चें अगर गलत राह पर चले तो गलती किसकी हुई ? 

       

              7)   छोटा मुँह बड़ी बात

          सुनीता की कामवाली बाई का नाम कल्पना था, कल्पना सुनीता के घर 12 साल से काम करती थी, इसलिए सुनीता कल्पना को घर की हर बात कहती, सुनीता की सास वैसे तो अच्छी ही थी, मगर ना जाने क्यों, उसका उसकी बहू के साथ जमता नहीं, बार बार झगड़ा होता रहता, अपनी सास के साथ झगड़ा होने पर सुनीता बैग में अपना सामान भर बार बार अपने मायके चली जाती, फिर सुनीता का पति सुमेध उसे समझाकर घर ले आता, यह सब बातें कल्पना को भी पता थी, कल्पना बड़ी समझदार औरत थी, उम्र और तजुर्बे में भले ही वह सुनीता से छोटी, मगर बात वह बड़ी कर जाती, कल्पना भी सुनीता को बार बार समझाया करती, कि चाहे कुछ भी हो, ऐसे घर छोड़कर ना जाया करे, तब सुनीता उसकी बात सुन लेती।
        लेकिन एक दिन क्या हुआ, कि सुनीता का अपनी सास के साथ झगड़ा इतना बढ़ गया, कि इस बार तो वह स्टेशन चली गई और ट्रेन की पटरी को देखकर सुनीता सोचने लगी, कि " आज तो इसी ट्रेन के नीचे आकर मर जाऊ, रोज़ रोज़ के झगड़ों से तो शांति मिल जाएगी। " सोचते हुए सुनीता आती जाती ट्रेन को देखती रहती। तभी अचानक सुनीता की कामवाली बाई कल्पना वहाँ से गुज़र रही थी, कल्पना ने स्टेशन पर बैठ कर रोती हुई, अपनी मालकिन सुनीता को देखा, वह उसके पास गई और पूछा, कि ," क्या हुआ मालकिन, आप इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हो ? "  
      तब सुनीता ने बताया, कि " अब तो मुझे जीने का भी मन नहीं करता, मम्मी जी के लिए कितना भी मैं कर लूँ, उनको कम ही पड़ता है, अब तो मैं यह थान के निकली हूँ, कि घर जाना ही नहीं है, मन करता है, अभी जो ट्रेन आए उसके नीचे आकर मर जाऊं, तब जाकर मम्मी जी को शांति मिलेगी।"
        कल्पना ने सुनीता को समझाते हुए कहा, कि " मालकिन ऐसा नहीं करते, आप तो समझो चले जाएंगे, लेकिन आपके पीछे आपके दोनों बच्चों का क्या होगा ? उनका कौन खयाल रखेगा ? माना की आपकी सास को इस से कोई फ़र्क नही पड़ेगा, लेकिन आपके पति और आपके बच्चें इस दुनिया में अकेले पड़ जाएंगे, उसके बारे में कभी सोचा हैं, मम्मी जी की बातों को दिल पर मत लगाया करो, ऐसा सिर्फ़ आपके घर में नहीं होता, ऐसा तो कई घर में होता होगा, मगर इसका मतलब यह थोड़े ना है, कि आप ज़िंदगी ही छोड़ दो, आप अपनी सास के साथ है ना, पंगा ही मत लो, अगर वह कुछ बोले आप चुप रहो और अपने काम में लगे रहो या तो एक कमरें में बैठ जाओ, वह अपने आप चुप हो जाएंगे, मैं भी ऐसा ही करती हूँ, फिर मेरी सास खुद ब खुद चुप हो जाती है और अभी आपकी सास 70 साल के तो हो ही गए होंगे, अभी उनको कितना जीना है, आप उनके साथ अच्छा ही व्यवहार करो, वह भी आपके साथ अच्छे से ही रहेंगे।"
       कल्पना की बातों से सुनीता के मन को फिर से तसल्ली मिली, सुनीता घर जाने के लिए तैयार हो गई, कल्पना खुद सुनीता मालकिन को घर तक छोड़ आती है। दूसरे दिन जब कल्पना काम पर आती है, तो सुनीता मालकिन को थोड़ा खुश देखकर कहा, कि " छोटा मुँह बड़ी बात " मालकिन, कल रात को अगर मैंने कुछ गलत कहा हो, तो माफ कर देना। "
         इस बात को एक साल बीत गया, कल्पना के घर आते ही सुनीता ने उस से कहा, कि " उस दिन तुमने अगर मुझे समझा बुझा कर घर वापस नहीं लेकर आई होती, तो आज मेरे पति और मेरे बच्चों का क्या होता ? रही बात मम्मी जी की तो अब उनसे तो में निपट ही लेटी हूँ, वह कुछ कहे तो मैं सिर्फ़ सुन लेती हूँ, वह खुद चुप हो जाते है, ऐसे करते अब वह भी मुझ पर पहला जितना चिल्लाते नहीं है, ज़िंदगी थोड़ी आसान सी हो गई है। कभी कभी कभी ख़्याल आता है कि अगर उस वक्त मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी होती तो आज मेरे बच्चों का क्या होता ? मेरे बिना उनकी ज़िंदगी क्या होती ? उनका अच्छे  से कौन ख़्याल रखता ? मुझे नहीं समझ आता, तुम्हारा धन्यवाद मैं कैसे करू ? "  
            कल्पना ने कहा, " ऐसा मत कहो, आप अपने परिवार के साथ खुश हो और खुश रहो, मुझे और कुछ नही चाहिए। "
           तो दोस्तों, इस कहानी से इतना ही कहना चाहूंगी, कि " कभी कभी हम से छोटे भी हम से बड़ी बात कर जाते हैं। " 

सत्य घटना पर आधारित 

                   8)  मान सम्मान 
       हनुमान जन्मोत्सव के दिन पूजा और परेश मंदिर जाने के लिए तैयार हो रहे थे, आरती के लिए सुबह जल्दी घर से निकलना था, इसलिए पूजा ने सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम निपटाया, खाना बनाया, बच्चों के कॉलेज का समय दोपहर का था, इसलिए उनको जाने में अभी देर थी और परेश को हर बार की तरह घर से निकलने की जल्दी लगी रहती, पूजा तैयार हो ही गई थी, तभी ज़रा सी देर होने पर परेश ने दरवाज़े पर जाकर पूजा को बड़ी ज़ोर से आवाज़ लगाई, " पूजा चलो "। परेश इतनी ज़ोर से चिल्लाए की एक पल के लिए तो पूजा डर ही गई, फिर भी वह परेश की एक आवाज सुनकर जैसी भी थी, वैसी कमरें से बाहर चली आई, पूजा को भी उस वक्त बहुत बुरा लगा, उसने पूरे रास्ते परेश से बात नहीं की, मगर इस बात का ज़रा सा भी एहसास शायद परेश को नहीं हुआ, की पूजा चुप है। फिर शाम होते होते पहले की तरह सब ठीक हो गया, पूजा हस्ते हुए परेश से बात करने लगी, मगर उसके दिल पर तो चौट लग ही गई थी, कि " उसने घर का पूरा काम निपटाया, तो उस में थोड़ी देर लग ही जाति है ना, उसमें इतना जोर से क्यों चिल्लाना ? दूसरी बार अगर ऐसा हुआ तो, वह तैयार होते हुए भी उनके साथ नहीं जाएगी, परेश से नाराज़ हो जाएगी। " मगर पूजा ऐसा करने का सिर्फ सोच सकती है, लेकिन शायद वह ऐसा कभी नहीं करेगी, क्योंकि उस में परेश से लड़ने की ताक़त ही नहीं और वह ज़्यादा दिनों तक परेश से बोले बिना भी रह नही सकती। 
          पूजा के दोनों बच्चों ने भी यह देखा, कि उनके पापा बड़े ज़ोर से और थोड़े गुस्से से उनकी मम्मी पर चिल्लाए। वह भी उस वक्त तो चुप रह गए और यह सिर्फ़ आज की बात नहीं थी, बच्चों ने ऐसा कई बार देखा और सुना था। परेश के ऐसे बर्ताव करने पर बच्चों के मन में अपने पापा के लिए प्यार और respect कम हो जाता, बच्चें जो अब बड़े होते जा रहे थे, वह सब कुछ देखते रहते और सोचते, कि " मम्मी रोज़ पूरे घर का और सब का कितना ख़्याल रखती, पूरा दिन कितना काम करती है, फिर भी पापा मम्मी पर ऐसे कैसे चिल्लाते है ? " फिर कभी परेश कहते, कि " बच्चें तेरी सभी बातें सुनते है, मुझ से पहले वह तुमको सारी बातें बतलाते है, मेरी तो कभी कुछ सुनते ही नहीं।" 
      तो दोस्तों, अब आप ही बताओ, अगर आप खुद ही अपनी पत्नी को मान और सम्मान नहीं देंगे, तो बच्चें कैसे आपको मान और सम्मान देंगे ? जिस के साथ बच्चें पुरा दिन रहते है, जिसके ही साथ वह अपना ज़्यादा समय बिताते है, उनकी आँखों में वह आँसु कैसे देख सकते है ? शायद इसी वजह से बच्चें अपने पापा से ज़्यादा अपनी माँ को प्यार करते है और घर में पापा इस बात से चिढ़ते है, कि घर में बच्चें उस से ज़्यादा अपनी मम्मी को प्यार करते है।


             9) भरोसा ( १०० शब्दों की कहानी )

         अमेरिका से पियूष अपनी माँ को वृद्धाश्रम में से वापिस अमेरिका ले जाने आया था, बेटे की बात पर भरोसा कर वह जाने के लिए तैयार हो गई, तभी पियूष ने अपनी बैग में से कुछ प्रॉपर्टी के पेपर्स निकाले और बातों बातों में माँ से पेपर्स पर दस्तख़त करवा लिए। सुबह माँ अमेरिका जाने के लिए तैयार हुई तो पियूष का कोई अतापता ही नहीं था। माँ समझ गई, पियूष उसे नहीं, बल्कि उसके पैसे लेने ही आया था, यह सोच पियूष की माँ की आँखें भर आई। " माँ का भरोसा एक बार फ़िर से उसके बेटे ने तोड़ दिया। "

 

                    10 )  पसंद नापसंद 

          आज राजेश और रानी की शादी की 25 वी सालगिरह थी, वह दोनों ने बाहर जाने का प्लान बनाया था, दोनों बाहर जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तभी रानी ने आज अपनी पसंद का अच्छा सा रेड फ्रॉक पहना। राजेश ने देखा तो तुरंत ही रानी से कहा, कि " ये क्या पहना ? साड़ी पहनो ना, तुम साड़ी में बहुत अच्छी लगती हो।" और इस तरफ़ रानी को साड़ी पहनना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था, वह साड़ी में एक घुटन सा महसूस करती और अपने आप को uncomfortable भी महसूस करती, मगर फिर भी राजेश की खुशी के लिए वह कभी कभी साड़ी पहन लिया करती। मगर आज तो रानी को साड़ी पहनने का बिलकुल मन नहीं था, इसलिए उसने भी राजेश से कहा, कि " आप भी आज कुर्ते की जगह जीन्स और टी शर्ट पहन लो, आप उसमें काफ़ी young और handsome लगते हो।"
        तभी राजेश ने कहा, कि " तुम तो जानती ही हो कि मुझे जीन्स और टी शर्ट में बड़ी घुटन महसूस होती हैं, वह तो ठीक हैं, कभी कभी पहन लिया करता हूँ, मगर आज नहीं। 
      तभी रानी ने मौके का फ़ायदा उठाकर कहा, कि " बस उसी तरह जिस तरह मुझे साड़ी में अच्छा नहीं लगता, फिर भी मैं आपकी खुशी के लिए पहनती हूँ ना, तो आज आप भी मेरी खुशी के लिए जीन्स और टी शर्ट ही पहनो, जो मैं आज आपके लिए नए लेकर आई हूँ।" 
        रानी ने बड़े प्यार से यह बात कहीं, इसलिए रानी का मन रखने के लिए राजेश ने जीन्स और टी शर्ट पहन लिए, फिर रानी ने कहा, कि " तो चलो आज हम मेरी पसंद का खाना भी खाएंगे, जैसे आपको पनीर की सब्जी, रोटी और बिरयानी पसंद हैं, वैसे ही मुझे चाट पूरी और चाईनीज खाना है क्योंकि आपकी पनीर की सब्जी, रोटी खाकर में बोर हो गई हूँ।" आज खुलकर पहली बार रानी ने अपने मन की बात कह दी थी, इसलिए यह सुनकर पहले तो राजेश ने थोड़ा मुँह बनाया, लेकिन फिर उसने बात मान ली। राजेश और रानी ने आज पहली बार शादी की सालगिरह रानी की पसंद से मनाई।
          घर आकर राजेश ने रात को बिस्तर पर लेटते हुए रानी से कहा, कि " इतने साल से तुम मेरा मन रखने के लिए, मुझे खुश करने के लिए, अपने मन को मारकर मेरे मुताबिक ज़िंदगी जीती आई हो, मुझे अच्छा लगे इसलिए मेरी खुशी के लिए साड़ी पहन लेती हो, जो की वह तुम्हें uncomfortable फील करवाता है, मेरी पसंद की पनीर की सब्जी हस्ते हुए हर बार खा लिया करती हो, मगर आज मुझे एहसास हुआ कि " जैसे मेरी पसंद नापसंद होती है, वैसे ही तुम्हारी भी पसंद नापसंद होती है, इसलिए अब से तुम्हें जो भी पहनना हो, तुम वहीं पहनना, तुम्हें जो भी खाना हो, तुम वहीं खाना, क्योंकि आज पहली बार मुझे लगा, कि अपने तरीके से अगर हम कपड़े ना पहने, अपनी पसंद का खाना ना खाए, अपनी पसंद से ज़िंदगी ना जी पाए, तो कैसा लगता हैं।" 
        राजेश की बात सुनकर रानी ने खुश होकर राजेश को गले लगा लिया और अपनी बात और उसे समझने के लिए उसका शुक्रियादा किया।
          तो दोस्तों, कभी कभी हमें सिर्फ़ अपनी पसंद नापसंद अपने जीवन साथी पर नहीं थोपनी चाहिए, उनकी भी अपनी पसंद ना पसंद होती है, उनकी भी अपनी ज़िंदगी होती है, उनको भी अपने तरीके से ज़िंदगी जीने का हक़ है और वह हक़ हम सभी को एक दूसरे को देना चाहिए और जहाँ तक मुझे पता है, यह अलग बात है, कि कई बार ऐसा भी होता है, कि हम अपने मन की ही बात अपने जीवन साथी से बरसों तक नहीं कह पाते, जो हमें पहले ही खुलकर बता देनी चाहिए।

                       11)   एक फ़ैसला

           यशोदा अपने पति, सास, ससुर और अपने बेटे माधव के साथ रहती थी, बस यही यशोदा का छोटा सा परिवार था। यशोदा बचपन से ही कृष्ण को बहुत मानती थी और एक छोटे से लडडू गोपाल भी उसके पास थे, तो यशोदा रोज़ उस लडडू गोपाल की सेवा किया करती, इसलिए उसने अपने बेटे का नाम भी कृष्ण के नाम से ही रखा, " माधव "। माधव के जन्म से ही यशोदा को ऐसा लगने लगा था, कि जैसे सच में कान्हा जी ही बेटे के रूप में मेरे घर आए है और इस वजह से भी यशोदा अपने माधव से बहुत प्यार करती, अपने लाडले बेटे में जैसे उसकी जान बसी हुई थी, कान्हा जी की सेवा पूजा के बाद पूरा दिन यशोदा अपने सास, ससुर, अपने पति की सेवा करती और अपने बच्चें की देखभाल में कहाँ समय बीत जाता, यह यशोदा को पता ही नहीं चलता। कान्हा जी की कृपा से यशोदा की ज़िंदगी हँसी खुशी चल रही थी।
         लेकिन एक दिन वक्त ने करवट बदली, उसके पति को हार्ट अटैक आया और 52 साल की उम्र में वह चल बसे, माधव की शादी हो गई थी, वह जॉब करता था, यशोदा के पति के जाने के बाद पैसे की तकलीफ और ज़्यादा बढ़ने लगी, उसके सास, ससुर भी उम्र के हिसाब से बीमार रहने लगे, कुछ साल बाद वह दोनों भी गुज़र गए, अब घर में यशोदा उसका बेटा माधव, माधव की पत्नी और उसकी एक छोटी सी बेटी रश्मि थे, फिर भी घर का खर्चा चलाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था, यशोदा घर का सारा काम निपटाकर कृष्ण भक्ति में लग जाती, रोज़ कृष्ण के मंदिर जाती, मंदिर में पूजारी जी को मंदिर के कामों में भी हाथ बताती, उसे कान्हा जी की सेवा करनी बहुत अच्छी लगती, कान्हा जी की सेवा के वक्त वह सब कुछ जैसे भूल जाती, बस वो और उसके कान्हा जी। कुछ महीनों बाद बहु और बेटे ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया, नाहीं यशोदा को माधव अपने खर्चे के लिए पैसे देता और नाहीं कभी सीधे मुँह अपनी माँ से बातें करता, हर बात पर टोकते रहते, माँ यह मत करो और यह मत करो। यशोदा रोज़ के ताने सुनकर परेशान हो गई थी, दूसरों की तो छोड़ो, जब अपना ही बेटा ऐसा करे तो क्या करे, वह अपना मन कृष्ण भक्ति में लगाने लगी, अब उसको वहीं अच्छा लगता, वह अपने मन की सारी बातें अपने कृष्ण को कहती। कृष्ण मंदिर जाकर वहाँ कृष्ण की सेवा में अपना मन लगा लेती।
         एक दिन माधव ने अपनी माँ से कह दिया, कि " अगर आपको मंदिर में कृष्ण की सेवा ही करनी हैं, तो आप घर आते ही क्यों हो, वहाँ अपने कृष्ण के साथ मंदिर में ही रहो, वहीं आपका खाना और रहना का इंतजाम भी देख ही लेंगे।" बेटे की यह बात मालती के दिल को छू गई। अब उसका मन अपने बेटे से उठ गया था, सब माया को भी अब उसने छोड़ दी, यशोदा ने उसी रात घर छोड़ने का फ़ैसला कर लिया। यशोदा ने रात को ही अपना सामान बांध लिया, सुबह होते ही यशोदा अपना नित्य कार्य कर के अपने कान्हा जी को अपने साथ लेकर चुपके से चली गई, उस वक्त उसे पता नहीं था, कि आगे उसके साथ क्या होनेवाला है और उसे कहाँ जाना है, यशोदा ने सिर्फ़ अपने कान्हा जी से कहा, कि वह अब उसे जहाँ ले जाएंगे और जहाँ रखेंगे, वैसे ही मैं ख़ुशी ख़ुशी रह लूंगी। बस अपने कान्हा जी का नाम लेते हुए मंदिर की ओर उसके कदम चल पड़े, आज सामान के साथ यशोदा को देखकर मंदिर के पंडित जी भी समझ गए, कि आख़िर यशोदा ने अपना घर छोड़ ही दिया।                 
       पंडित जी ने कहा, " अच्छा किया यशोदा, जो तुम सामान लेकर ही यहाँ आ गई, अब यह मंदिर और कान्हा जी की सेवा आज से तुम को ही करनी है, इन दिनों मेरी भी कुछ तबियत ठीक नहीं रहती, आखिर इस उम्र में मुझ से इतना काम होता भी नहीं, अब तुम आ गई हो, तो में चैन की नींद ले सकता हूँ, मुझे हर पल यही चिंता सताए हुए थी, कि मेरे बाद इस मंदिर का क्या होगा, मंदिर की सेवा पूजा कौन करेगा ? लेकिन अब तुम आ गई हो, तो मुझे कोई चिंता नहीं, वह खोली में अपना सामान रख लो, आज से तुम यही रहोगी, मेरी बेटी तो नहीं है, इसलिए कान्हा जी ने तुम्हें मेरी बेटी बनाकर भेजा है। पंडित जी की बात सुनकर मालती की आँखों से आँसु बहने लगे, यशोदा ने पंडित जी के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया और अपना सामान खोली में रखने चली गई। 
         उसके बाद यशोदा ने मन लगाकर मंदिर में कान्हा जी की सेवा करनी शुरू कर दी, अब यशोदा ने मंदिर में हर सोमवार, गुरुवार को और अग्यारस को कृष्ण के भजन का कार्यक्रम भी रखा, मंदिर में समयसर आरती, भोग सब होने लगा, मंदिर में अब हर त्योहार घर की तरह ही मनाने लगे, लोग भी पहले से ज्यादा आने लगे, कुछ ही महीनों के बाद छोटा सा मंदिर अब " मुरलीधारी कान्हा जी का मंदिर" के नाम से जाना जाने लगा। 
          एक दिन कान्हा जी के सामने बैठकर यशोदा कान्हा जी से पूछ रही थी, कि " पता नहीं कान्हा जी, मेरे किस जन्म का पाप आज मेरे सामने मेरा बेटा बनकर आया है और मुझे इतना दुःख दे रहा है, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था, कि मेरा माधव मुझ से ऐसा बर्ताव करेगा और मुझे घर से जाने के लिए भी कह देगा, इतने सालों के प्यार का यही ईनाम मिला मुझे, मगर कोई बात नहीं, कर्म की गति न्यारी है, शायद मैंने ही किसी जन्म में अपने बेटे का दिल दुखाया होगा, उसको दर्द पहुँचाया होगा, बस इसी बात का बदला आज वह मुझसे ले रहा है, और तो क्या ? कान्हा जी, अब आप ही बताइए, कि मेरे घर छोड़ने का फ़ैसला बिलकुल सही था ना ? क्योंकि अगर मैंने घर नही छोड़ा होता, तो मुझे रोज़ रोज़ अपने बेटे और बहू के ताने सुनने पड़ते और मन ही मन दुःखी रहती और मैं आपकी सेवा भी इतनी नहीं कर पाती, अच्छा हुआ कान्हा जी, जो आपने मेरा हाथ थाम लिया और मैं आपकी शरण में आ गई, अब यह जीवन आपको समर्पण हैं। "
          तो दोस्तों, ज़िंदगी में एक बात तो पक्की है, की अगर आप दिल से कृष्ण का नाम लो, उसकी भक्ति करो, तो आपके मुश्किल समय में वह आपका हाथ पकड़ने ज़रूर आएगा और आपको सही रास्ता भी वहीं दिखाएगा, इसलिए ज़िंदगी में चाहे कुछ भी हो जाए, कितनी भी परेशानी का सामना क्यों न करना पड़े, मगर उस वक्त भी एक कृष्ण पर भरोसा ज़रूर रखना क्योंकि उस से बड़ा दिलवाला और उसके जैसे साथ निभानेवाला इस दुनिया में और कोई नहीं। 

            
                   12 )   मेरी अम्मा 
          केरला के क़रीब कोची स्टेशन के एक प्लेटफार्म पर एक बुढ़िया औरत सिकुड़कर पड़ी हुई थी, उसकी लाठी उसकी बगल में पड़ी हुई नज़र आ रही थी, अक्सर उस प्लेटफार्म पर ट्रेन के आने से लोगों की भगदड़ मची रहती है, कई लोग तो ज़ल्दबाज़ी में उस बुढ़िया औरत के ऊपर से चढ़कर गुज़र जाते, तो कई लोग सँभल कर भी जाते, कई लोगों का पाव भी उस बुढ़िया के अंग पर लग जाता, लेकिन उस बुढ़िया को तो कुछ भी समझ नहीं, बिखरे हुए से बाल, फटे पुराने से कपड़े, उस बुढ़िया को देखने से तो लगता, कि जैसे कई दिनों से नहाई भी नहीं होगी, बेजान सी एक ही जगह पर बस यूंही पड़ी रहती, वह सिर्फ़ ढूंढ़ला ढूंढला सा देख पाती, उसे पल भर देखने से लगता, कि " वह ज़िंदा भी है या मर गई है, कौन जाने ?" ऐसी उस बुढ़िया की हालत थी। ट्रेन के जाने के बाद, थोड़ा सा भीड़ धक्का कम होने के बाद, एक पेपर की दुकान पर काम कर रहा एक लड़का, जो कब से उस बुढ़िया को देख रहा था, उस लड़के को उस बुढ़िया की हालत पर तरस आ गया और उस लड़के ने बुढ़िया को हल्के हाथ से खींच कर अपनी दूकान की ओर ले आया और एक बेंच पर बैठाते हुए बुढ़िया से कहता है, कि " अम्मा, यहाँ पर तुम आराम से बैठो।" 
         अम्मा शब्द सुनते ही बुढ़िया कुछ पल उस लड़के को बहुत ध्यान से देखती रही, थोड़ी देर बाद वह बुढ़िया फिर से आंखें मिंच कर वहींं पर सो गई। दोपहर में जब खाने का वक्त हुआ, तब वह लड़का जिसका नाम किशोर था, वह अम्मा के लिए खाना अपने साथ लेकर आया और उस बुढ़िया औरत से पूछा, " अम्मा, कुछ खाना खाओगे क्या ? "  इस बात पर बुढ़िया ने लड़के को गले लगा लिया और दूसरे ही पल स्टीवन कर के जोर से चिल्लाई और मलयाली भाषा में चिल्लाने लगी,  चिल्लाते चिल्लाते फिर से वह औरत थक कर आंख बंद कर के जैसे सो गई।
            किशोर अब सोचने लगा, कि बात क्या हो सकती है ? इतना तो उसे समझ में आ गया था, कि बुढ़िया केरल की ही होगी और स्टीवन नामक लड़के को वह ढूंढ रही है। किशोर ने सोचा की ऐसा क्या किया जाए, जिस से इस बुढ़िया का थोड़ा बहुत दुःख कम हो जाए, सोचते हुए किशोर उस बुढ़िया को अपने साथ अपनी चाली में ले गया, फिर उसने उस बुढ़िया को जलपान करवाया और किशोर ने उस बुढ़िया की दिल से इतनी सेवा की, कि एक दो दिन में वह बुढ़िया में जैसे ताकत आ गई हो और अब वह अच्छे से देख भी सकती थी।
        बुढ़िया ने किशोर से कहा, कि " तू तो मेरा स्टीवन है ही नहीं, तो फिर तू है कौन ? " किशोर ने फिर अपना नाम कहा और टूटी फूटी इंग्लिश में केहने लगा, कि " आपको समझ में आ रहा है ना अम्माजी " और उसने अपना सिर झुकाकर अम्माजी से आशीर्वाद लिया। फिर अम्मा ने अंग्रेजी शब्दों में कहा, कि " वह केरला से है और उसकी बातों से लगा, की वह काफी एजुकेटेड भी है और बात करते करते वह बुढ़िया औरत अपनी ज़िंदगी के १८ साल पीछे चली गई और कहने लगी, कि " स्टीवन जब ७ साल का था, तब उसके पिताजी ऑटोरिक्सो चलाते थे और एक दिन अचानक से उनका एक्सीडेंट हो गया और स्टीवन ने अपने पिताजी को हमेशा के लिए खो दिया और मैंने मेरे पति को भी खो दिया, लेकिन उस बुरे वक्त में भी मैंने हिम्मत नहीं हारी, क्योंकि मुझे अपने स्टीवन के लिए जीना था, उसके पिताजी के जाने के बाद में ही स्टीवन की हिम्मत बनी, स्टीवन को पढ़ाया, लिखाया, educate किया, उसे ज़िंदगी में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। लेकिन वो कहते है ना, कि " ज़िंदगी में हर दिन खुशी का नहीं होता।" वैसा ही कुछ हमारी ज़िंदगी में भी हुआ, स्टीवन ने एक दिन अपने दोस्तों के साथ बीच पर जाने की जिद्द की, मैंने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, बहुत रोका, मगर स्टीवन उस वक्त नहीं रुका, केरला के कॉलम बीच पर अक्सर एक्सीडेंट होते रहते थे, इसी वजह से मैं उसे अपने दोस्तों के साथ जाने को मना कर रही थी, तभी स्टीवन और उसके दोस्तों के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, इतफ़ाक की बात तो यह है, कि स्टीवन के सभी दोस्तों की बॉडी मिल गई मगर स्टीवन का कुछ पता नहीं चला, उसके बाद से मैं अपने स्टीवन को इधर से उधर, दरबदर भटक कर ढूंढ रही हूँ, क्योंकिं कोई चाहे जो भी कहे मुझे ऐसा लगता है, कि मेरा बेटा स्टीवन आज भी ज़िंदा है और एक ना एक दिन वह मुझे ज़रूर मिल जाएगा।"
         एक चर्च के father, जहाँ मैं अक्सर जाया करती थी, उस Father ने भी मुझे समझाने की बहुत कोशिश कि, फिर एक सुबह मैंने वकील को बुलाया और अपना घर और सब कुछ चर्च को देकर, वहाँ से भी चल निकली, मैंने अपना घर भी छोड़ दिया और मुझे कुछ भी पता ही नहीं की मुझे कहाँ जाना है और कहाँ नहीं ? मैं अपने बेटे को कहाँ और कैसे ढूंढू ? बस तब से मैं अपने स्टीवन को ढूंढने के लिए इधर से उधर भटकती रहती हूँ, क्योंकि मेरा दिल कहता है, कि एक ना एक दिन मेरा बेटा मुझे ज़रूर मिल ही जाएगा। " 
      उसके बाद मेरी अम्मा ने किशोर को देखते हुए कहा, कि " तू भी मेरा स्टीवन जैसा ही है, मगर फ़िर भी मेरी अम्मा कहते कहते रो पड़ी, कि मेरा स्टीवन मुझे ढूंढ के दो। "
              असलियत में स्टीवन के साथ क्या हुआ था ? और उसके दोस्तों के साथ क्या हुआ था ? यह कोई नही जान पाया। लेकिन एक दिन समंदर किनारे एक लड़का बेहोश पड़ा हुआ था, वहाँ पर रहते मछुआरे ने उसे देखा और उसका इलाज करवाया, एक दो दिन में उस लड़के को होश आ गया, जब उस लड़के से पूछा गया, कि वह कहाँ से है ? और उसका नाम क्या है ? तब उसने बताया कि, "वह केरला से है, उसका नाम स्टीवन है और उसे अपनी माँ के पास वापस जाना है, अब स्टीवन वापस केरला आकर अपनी माँ को ढूंढ रहा है, स्टीवन अपने घर जाता है, लेकिन घर पर ताला लगा हुआ था, पड़ोसी को पूछा, तो उनको भी अम्मा के बारे में कुछ पता नहीं, उन्होंने सिर्फ़ इतना ही कहा, कि तुम्हारे जाने के बाद से तुम्हारी अम्मा तुझे ढूंढ रही थी, उसे इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा था, कि तू मर गया है, उसका भरोसा सच साबित हुआ, देख उसका स्टीवन आ भी गया, तेरे जाने के बाद अम्मा कुछ दिन उस चर्च मैं ही ज्यादा वक्त गुजारती थी, उसके बाद अचानक से वह कहाँ चली गई, कुछ पता नहीं। यह सुनते ही स्टीवन अपनी अम्मा को ढूंढते हुए चर्च के Father के पास जाता है, वहाँ उसे पता चलाता है, कि " उसकी माँ ने अपना घर चर्च को दे दिया और अपने स्टीवन को पागलों की तरह ढूंढ रही होगी। " 
        यह सुनते ही स्टीवन की आंखों में आंसू आ गए, स्टीवन को वह दिन याद आ गया, जब उसकी माँ ने उसे दोस्तों के साथ बीच पर जाने को मना किया था, कि शायद उस दिन मैंने अपनी अम्मा की बात मान ली होती तो, आज उसकी अम्मा उसके साथ होती और उसके दोस्त भी शायद ज़िंदा होते, मगर होनी को कौन टाल सकता है ? 
        अब स्टीवन की ज़िंदगी का एक ही मक़सद था, कुछ भी कर के अपनी मेरी अम्मा को ढूंढना। स्टीवन ने अपनी अम्मा को ढूंढने के लिए दिन रात एक कर दिए, हर गली, हर चौराहे पर वह गया, आते जाते सब लोगों को अपनी अम्मा की तसबीर दिखाकर पूछता रहता, कि " आपने मेरी अम्मा को कहीं पर देखा है ?" मगर हर रोज़ वह निराश हो जाता और फिर रात को थक हार कर घर वापस चला आता, चर्च के father ने स्टीवन की परेशानी समझते हुए उसे अपना घर वापस दे दिया और यह दिलासा दिया, कि उसकी अम्मा एक न एक दीन उसे ज़रूर मील जाएगी।
         उस तरफ किशोर मेरी अम्मा को अपने साथ अपने घर लेकर गया और मेरी अम्मा का अपनी माँ की तरह अच्छे से ख़्याल रखने लगा, वह अपने घर में अकेला ही था, इसलिए अब किशोर मेरी अम्मा को ही अपनी माँ समझने लगा। एक दिन किशोर को अपनी पड़ोस में रहते दोस्त की शादी में जाना था, मगर वह अकेला जाना नही चाहता था, इसलिए उसने मेरी अम्मा को अपने साथ शादी में आने के लिए कहा, लेकिन पहले तो मेरी अम्मा ने बहुत मना किया, कि " उसे कहीं भी जाने का मन नहीं है, वैसे तुम बच्चों के बीच में मैं बुढ़िया क्या करूंगी, तू आराम से अपने दोस्त की शादी में जा और जल्दी लौट आना। " मगर किशोर ने अम्मा की एक न सुनी, किशोर जिद्द कर के अम्मा को अपने साथ शादी में लेकर ही गया।
          और उस तरफ स्टीवन के जो नए दोस्त थे, उनको भी कहीं शादी में जाना था, उन्होंने भी स्टीवन की एक बात न सुनी और जिद्द कर के स्टीवन को अपने साथ शादी में लेकर ही गए। 
         इतफ़ाक से यह जगह वही थी, जहाँ पर किशोर भी अपनी मेरी अम्मा को साथ लेकर आया था, मगर दोनों को पता नहीं था, कि आज वह दोनों मिलने वाले है। स्टीवन की आंखें अब भी उस भीड़ में भी अपनी मेरी अम्मा को ही ढूंढ रही थी और उस तरफ मेरी अम्मा भी हर जवान लड़के में अपने खोए हुए बेटे को ढूंढ रही थी।
          अम्मा एक कोने में कुर्सी पर बैठकर हर आते जाते को गौर से देखती रहती, शादी ख़तम होते ही किशोर अम्मा के पास आता है और उसे खाने के लिए चलने को कहता है, मेरी अम्मा ने खाने को मना करते हुए कहने लगी, कि उसे भूख नहीं है और उसकी तबियत भी कुछ ठीक नहीं लग रही, तू जल्दी से खाना खा ले, फिर हम वापस घर चलते है, ना जाने क्यों मुझे बड़ी थकान सी मेहसूस हो रही है, "  कहते कहते ही मेरी अम्मा की सास अचानक से फूलने लगी और वहीं कुर्सी पर बैठे बैठे ही अम्मा की आंखें बंद होने लगी, वह कुर्सी पर से गिरने ही वाली थी, कि किशोर ने उसे सँभाल लिया, अपने दोस्तों को मदद के लिए बुलाया, थोड़ी देर में वहां सब लोग इकट्ठा हो गए, भीड़ जमा होने लगी, यह जानने के लिए की क्या हुआ होगा ? स्टीवन भी इतफाक़ से उस वक्त वहीं पर था, इसलिए लोगों की भीड़ देखकर वह भी उस भीड़ की ओर जाता है, लोगों के बताने से उसको पता चलता है, कि " एक किशोर नाम के लड़के की माँ ज़रा बेहोश हो गई, डॉक्टर भी वहीं पर थे, तो वह उस बुढ़िया को देख रहे थे, " यह सुनकर स्टीवन को अपनी अम्मा फिर से याद आने लगी, और मन ही मन उसने pray किया, कि " वह जो भी औरत हो उसे जल्दी से ठीक कर दो। एक बेटा और माँ के अलग होने का दर्द क्या होता है, यह मैं अच्छे से जानता हूँ। "
            डॉक्टर ने सब से कहा, कि " अम्मा को सास लेने में दिक्कत हो रही है, यहाँ से भिड़ कम करो और हवा आने दो, अम्मा का सिर्फ ब्लड प्रेशर हाई हो गया हैं और कुछ नहीं, थोड़ी देर में वह ठीक हो जाएगी। " डॉक्टर की बात सुनकर सारे जमा हुए लोग धीरे धीरे वहाँ से हटने लगा, स्टीवन भी वहाँ से जा ही रहा था, कि उसको एक बार ख्याल आया, कि वह औरत कौन हैं, एक बार देख तो लू, सोचते हुए स्टीवन उस औरत की ओर जाता हैं, अब भी किशोर अम्मा का हाथ पकड़े उसे सहला रहा था, वह अम्मा के चेहरे की और झुका हुआ था, इसलिए स्टीवन अम्मा का चेहरा ठीक से देख नहीं पाया और बिना चेहरा देखे ही स्टीवन घूम कर वापस जाने लगा, तभी अम्मा बेहोशी की हालत में स्टीवन स्टीवन कर के चिल्लाने लगी, आवाज सुनते ही स्टीवन वहीं पर रुक गया और पीछे मुड़ कर उस औरत की तरफ़ आगे बढ़ता हैं, जो अब भी स्टीवन कर के चिल्ला रही थी, स्टीवन ने अब बिना सोचे वहाँ पर बैठे किशोर को धीरे से धक्का दे दिया और सामने अपनी माँ को देखकर स्टीवन की आंखें भर आई, अम्मा और स्टीवन की खुशी का ठिकाना ही ना रहा, माँ और बेटे को साथ में देखकर किशोर की आंखें भी भर आई, किशोर ने मन ही मन भगवान से माँ और बेटे को मिलाने के लिए धन्यवाद किया। 
        अम्मा ने इशारे से किशोर को अपने पास बुलाकर कहा, कि " अच्छा हुआ, की आज तू मुझे जिद्द कर के यहाँ लेकर आया, वरना मेरा बेटा स्टीवन मुझे आज भी नही मिलता और आज से मेरे एक नहीं दो बेटे हैं, किशोर और स्टीवन। अब मुझे अपने बेटों से कोई अलग नहीं कर सकता।" 
      और अम्मा ने स्टीवन को किशोर के बारे में सब कुछ बतलाया, कि जब तुम नही थे, तब किशोर ने मेरा बहुत ख्याल रखा था और उसी की वजह से आज मैं तुम से फिर से मिल पाई हूँ।            किशोर भी अम्मा और स्टीवन के गले लग गया। स्टीवन ने कहा, कि " हा माँ, मेरे दोस्त भी अगर मुझे जिद्द कर के यहाँ नहीं लेकर आए होते, तो आज भी मैं आप से नहीं मिल पाता, आज से हम सब साथ में रहेंगे और मैं अब तुझे छोड़कर कहीं नही जाऊंगा, तेरा हर कहा मानुगा।" 
         फिर मेरी अम्मा, स्टीवन और किशोर तीनों साथ में खुशी खुशी रहने लगे।
        तो दोस्तों, बस ऐसे ही एक माँ का भरोसा जीत गया और उसका बेटा उसे वापिस मिल गया।
         दोस्तों मैंने इस कहानी का दूसरा अंत भी लिखा है, और यह दोनों में से आपको कौन सा अंत अच्छा लगा यह मुझे ज़रूर बताएगा।
       मेरी अम्मा कहानी का दूसरा भाग
       
          यह सुनते ही स्टीवन की आँखों में आँसू आ गए, स्टीवन को वह दिन याद आ गया, जब उसकी माँ ने उसे दोस्तों के साथ बीच पर जाने को मना किया था, कि शायद उस दिन मैंने अपनी माँ की बात मान ली होती तो, आज उसकी माँ उसके साथ होती और उसके दोस्त भी शायद ज़िंदा होते, मगर होनी को कौन टाल सकता हैं ? अब स्टीवन के जीवन का भी एक ही मक़सद था, अपनी माँ को ढूँढना। स्टीवन ने तै कर दिया, कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपनी माँ को ढूँढ के ही रहेगा। स्टीवन भी अपनी माँ के लिए दरबदर भटकने लगा, इस शहर से उस शहर, इस स्टेशन से उस स्टेशन। स्टीवन दिन ब दिन कमज़ोर होने लगा, उसे नाहीं कुछ खाने पीने का होश था और नाही किसी और बात का, देखते ही देखते एक महीना और गुज़र गया। 
            एक दिन स्टीवन अपनी माँ को ढूँढते ढूँढते उस स्टेशन पर पहुँच गया, जहाँ उसकी माँ को आखरी बार किशोर ने संभाला था, इतफ़ाक़ से स्टीवन थका हारा, किशोर की दुकान पर जाकर वहाँ बेंच पर बैठकर रोने लगा, किशोर की नज़र स्टीवन पर पड़ी, पहले तो किशोर कुछ देर तक स्टीवन को देखता रहा, फिर उसके पास जाकर पूछा, कि " साहेब, आपको क्या चाहिए।" स्टीवन अब भी अपनी माँ की याद में खोया हुआ था, उसने सिर्फ इतना ही कहा, कि मेरी अम्मा को ढूँढ के दो।" यह सुनते ही किशीर की आँखें भर आई, एक पल के लिए किशोर को ऐसा ही लगा, कि यह बुढ़िया औरत का बेटा स्टीवन तो नहीं ? " किशोर ने एक पल का भी विलंब किए बिना उसे उसका नाम पूछा और वह कहाँ से आया हैं, वह पूछा। स्टीवन ने सब कुछ सच सच बता दिया, कि वह अपनी मेरी अम्मा को ढूँढ रहा हैं। तब किशोर ने स्टीवन को गले लगाकर कहा, कि" सच में आज एक माँ का विश्वास और बेटे का प्यार जीत गया। " स्टीवन की समझ में कुछ नहीं आया, की किशोर क्या कहना चाहता था, उसके पुछने पर किशोर ने उसकी माँ के बारे में सब बताया, तब स्टीवन की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, स्टीवन ने आखिर में इतना ही कहा, कि " अब मेरी अम्मा कहा हैं ? " 
           किशोर ने कहा, कि " अब तक मैंने अम्मा को समझा बुझाकर मेरे घर पर रोक रखा था, मगर वह रोज़ एक ही रत लगाए रखी थी, कि मेरे बेटे को मुझे ढूँढना हैं, मैं यहाँ ऐसे नहीं रह सकती, भगवान से लड़ना पड़े तो मैं लड़ लूँगी, मगर मेरे बेटे को मैं ढूँढ कर ही रहूंगी और वह बिना मुझे बताए कुछ दिन पहले रात को चुपके से घर से चली गई, सुबह मैंने उनको हमारे अगल बगल बहुत ढूंढ़ा, लेकिन वह मुझे कहीं नहीं मिली। "                  स्टीवन ने कहा, कि " आपकी बहुत बहुत महेरबानी की आपने मेरी अम्मा को इतने दिनों तक संभाला, आपका यह कर्ज मैं कभी नहीं भूलूंगा, अब तो मुझे पक्का यकीन हो ही गया हैं, कि अब मेरी अम्मा मेरे बहुत करीब हैं और वह मुझे मिल ही जाएगी, अब मुझे सिर्फ उसको ढूँढना हैं और मैं अपनी मेरी अम्मा को ढूँढ कर ही रहुंगा। "  कहते हुए किशोर को एक बार अपने गले लगाकर उसका धन्यवाद करते हुए स्टीवन फिर से अपनी अम्मा को ढूंढने निकल पड़ता हैं। 
          चलते चलते बस कुछ ५ किलोमीटर की दूरी पर दूर एक मंदिर नज़र आता हैं, स्टीवन को जैसे लगा कि उसकी माँ उसके बहुत करीब हैं,  स्टीवन भागते हुए मंदिर की तरफ़ जाता हैं, मगर जैसे जैसे वह मंदिर की ओर जाता हैं, वैसे वैसे उसे मंदिर के बाहर भीड़ जमा हुई दिखाई देती हैं, यह देखकर स्टीवन और घबरा जाता हैं, उसके दिल की धड़कन तेज होती जा रही हैं। भीड़ के करीब जाकर उसको लोगों की बातों से पता चलता हैं, कि कोई बुढ़िया औरत वहाँ मर गई हैं और उसका कोई नहीं हैं, यह सुनते ही स्टीवन की आँखों में आँसू आने लगे। वह उस बुढ़िया औरत को देखने के लिए भीड़ में अपनी जगह बनाकर अंदर घुस जाता हैं। बुढ़िया औरत के शरीर पर फटी पुरानी साड़ी, कमज़ोर शरीर, रूखा सुखा चेहरा, जैसे कई दिनों से नहाए नहीं और नाही कुछ खाया हो, बिखरे हुए बाल, जिस से अब भी  चेहरा ढका हुआ सा था, स्टीवन के दिल की धड़कन और तेज होने लगी, स्टीवन ने अपने कापते हाथों से उस बुढ़िया औरत के चेहरे से उसके बाल को हटाकर उसके चेहरे को देखने लगा, वह औरत उसकी अम्मा ही थी, स्टीवन अपनी अम्मा को देखकर ज़ोर ज़ोर से चीख कर चिल्लाने और रोने लगा, थोड़ी देर बाद मंदिर के पुजारी जी आए और कहने लगे, " कैसा नालायक बेटा हैं तू, तेरी अम्मा ने कितने दिनों से खाना पीना भी छोड़ दिया था, यहाँ इसी मंदिर की चौखट पर अपना सिर पटक कर भगवान से अपने बेटे को मांगती रही और तू अब आया हैं, भगवान ऐसा नालायक बेटा किसी को ना दे, जो अपनी अम्मा को यूँ दरबदर भटकने को छोड़ देता हैं।" 
           कहते हुए पुजारी जी वापस मंदिर के अंदर जाने लगे और यह बात स्टीवन के दिल को छू गई, उसे सच में लगने लगा, कि उसी की वजह से उसकी अम्मा की यह हालत हुई हैं और उसी की वजह से उसकी जान भी गई हैं, स्टीवन ने भी वहीं रोते रोते अपनी अम्मा की गोदी में अपना सिर रख दिया और उसने अपने प्राण त्याग दिए, वहां पर खड़े सब लोग देखते ही रह गए। क्योंकि स्टीवन और उसकी अम्मा के बीच के रिश्तें को कोई नहीं जानता था, सब स्टीवन को ही दोषी ठहरा रहे थे। मगर अब क्या सच और क्या झूठ ? आखिर बेटे ने अपनी अम्मा को ढूंढ ही लिया।
         कुछ ही पल में माँ और बेटा कहीं दूर आसमान में बादलों के बीच जाकर एक दूसरे को प्यार से देख रहे थे, एक दूसरे को गले लगाकर रो रहे थे, स्टीवन अपनी माँ से एक ही बात कहे जा रहा हैं, कि " मैं आपका नालायक बेटा नहीं हूँ, मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, मैं अब आपका कहाँ कभी नहीं तालूंगा और आपके साथ ही रहूंगा, मुझे माफ कर दो अम्मा और सिर्फ़ इस जन्म मैं ही नहीं हर जन्म में आप ही मेरी अम्मा बनकर आना। "
        माँ अपने बेटे को गले लगाकर रोते हुए कहती हैं, " दुनिया चाहे जो भी कहे, लेकिन मैं ही जानती हूँ, कि मेरा बेटा कितना अच्छा हैं, अब हर जन्म तू ही मेरा बेटा बनकर आना, आख़िर तूने अपनी अम्मा को ढूंढ ही लिया। "
         कहते कहते माँ और बेटा आसमान में बादलों के बीच में छुप जाते हैं।
         तो दोस्तों, अगर सच्चा प्यार हो और अगर सच्चे मन से किसी को ढूंढने की कोशिश करो, तो वह अवश्य मिल ही जाता है, स्टीवन को अपनी माँ को ढूंढने में देर हुई, मगर माँ के अंतिम दर्शन उसने किए और एक दूसरे से अगले जन्म मिलने का वादा भी तो किया, तो यह कोई मिलन से कम भी नहीं।

                   13 )  एक तूफ़ान

          रीटा और रवि अपने बेटे अभय और बेटी रूपा के साथ बहुत ही खुशनुमा जिंदगी गुज़ार रहे थे, उनको अपनी ज़िंदगी से जैसे कोई शिकायत ही नहीं थी, कान्हा जी की कृपा से सब कुछ ठीक चल रहा था, भले ही घर थोड़ा छोटा था, रवि की महीने की कमाई इतनी थी, कि उससे बस सब का गुजारा चल जाता था, फिर भी सब बहुत खुश थे, सारे त्यौहार सब साथ मिलके मनाते थे। मगर पता नहीं, रीता के परिवार को ना जाने किस की नज़र लग गई, कि एक ही दिन में उनका हस्ता खेलता परिवार एक दम से जैसे चुप हो गया, अभय का कार एक्सीडेंट हो गया और उसने वहीं पर अपना दम तोड दिया, अचानक से एक तूफ़ान आया और जैसे अपने साथ सब कुछ लेकर चला गया। रीता के घर की सारी खुशियां भी उस तूफ़ान के साथ चली गई। अभय के जाने के बाद घर में जैसे एक सन्नाटा सा छा गया था, अपने ही घर में रवि, रीता और उसकी बेटी रूपा एक दूसरे से जैसे मुँह छिपाते थे, एक दूसरे को हिम्मत देने की भी किसी में हिम्मत नहीं थी, कुछ वक्त के बाद रूपा की शादी हो गई, अब घर में रवि और रीता रह गए, रवि तो रोज़ ऑफिस चला जाता था, ऐसे वक्त में घर खाने को दौड़ता था, रवि को अपने बच्चों से कुछ ज्यादा ही लगाव था, मगर उसने अपना दर्द अपने दिल के अंदर दबा रखा, पूछने पर भी कुछ कहते नहीं, अब रीता की उम्र 47 साल की और रवि 50 साल के हो चुके थे, अब इस उम्र में दूसरे बच्चे को लेकर अपनी ज़िंदगी में लाना, यह रीता को बहुत मुश्किल लग रहा था, मगर रवि ज़िद्द पर अड़े रहे, रवि की खुशी के लिए रीता ने IVF भी करवाया, मगर उस से कोई फायदा ना हुआ, डॉक्टर ने कहा, कि उम्र के बढ़ जाने से शायद अब बच्चा होना मुश्किल है, इसलिए रीता ने तो यह बात स्वीकार कर ली, कि अब ज़िंदगी यूंही एक दूसरे के सहारे ही गुजारनी है, मगर रवि का मन नहीं माना, रवि को अंदर ही अंदर अकेलापन खाए जा रहा था, या कहूं तो अभय के चले जाने का दर्द उसे खाए जा रहा था, इसलिए शायद रवि का बर्ताव दिन ब दिन बदलने लगा, बात बात पर रीता पर गुस्सा करता, बात बात पर उसे भला बुरा भी सुनाया करता, अपने ऑफिस का गुस्सा भी कभी कभी रीता पर ही निकालता, रीता रवि को समझने की, उसकी परेशानी समझने की कोशिश करती रहती, इसलिए चुप रहती, मगर कब तक वह सहती रहती, कभी कभी गुस्से में आकर रीता भी रवि को सुना देती, फिर रवि के ऑफिस जाने के बाद अकेले में रोया करती, बेटा सिर्फ रवि ने ही नहीं, उसने भी तो खोया था। मगर यह बात रवि कैसे समझे ? और तो और रवि को रीता के बिना चलता भी नहीं, वह रीता को नाही उसके मायके जाने देता और नाही किसी दोस्त के घर जाने देता, नाही उसे बाहर जाकर नौकरी करने की इजाज़त और नाही वह अपने मन का कुछ कर सकती, क्योंकि रवि को वह जब ऑफिस से घर आए तो उसे रीता उसके सामने ही चाहिए। कभी कभी रवि रीता की बहुत ज़्यादा परवाह करता, तो कभी उस से सीधे मुँह बात भी नहीं करता, कभी कभी रवि रात को रीता को गले लगाकर सो जाता, तो कभी मुँह पलटकर सो जाता, जैसे की उसके बगल में कोई है ही नहीं, जैसे की वह अकेला ही सो रहा हो। कभी रवि अपनी पत्नी रीता के लिए दवाई लाता तो कभी सब्जी, तो कभी अपने आप को एक कमरे में बंद कर देता और कहता, कि " कोई उसे परेशान न करे, वह नॉवेल पढ़ रहा है। " ऐसा लगता जैसे रवि के मन में एक बहुत बड़ा तूफान चल रहा हो, जैसे उस तूफान में वह खुद डूब रहा है और अपने साथ साथ अपनी पत्नी रीता को भी खींचे जा रहा है, शायद रवि को अब रीता के खोने का भी डर लग रहा है, उसने अपने बेटे को तो खो दिया, जो उसे अपनी जान से भी प्यारा था, मगर अब वह रीता को नहीं खोना चाहता, रवि कुछ भी कहता नहीं, लेकिन उसके बर्ताव से सब पता चलता है। कभी कभी रीता अपने पति रवि को हर तरफ़ से समझाने की कोशिश करती, मगर सब नाकाम। एक तरफ रीता को भी अब अकेलापन खाए जा रहा था और दूसरी तरफ़ रवि का अजीब बर्ताव, जो कभी कभी उसकी समझ के बाहर ही था। 
           तो दोस्तों, यह प्यार है या एकदूसरे को खोने का डर ? अब इस उम्र के पड़ाव में जब एक दूसरे के साथ की, एक दूसरे को समझने की ज़्यादा ज़रूरत होती है, तभी सब सूझबूझ जैसे की खो बैठे है, अब यह ज़िंदगी एक बोझ लगने लगी है, बस जिए जा रहे है, रीता अपने आपको तो जैसे तैसे संभाल रही है, मगर आख़िर कब तक ऐसा चलता रहेगा ? उसके अंदर भी तो एक तूफान चल रहा है, वह एक ना एक दिन जरूर फटेगा और  सब कुछ तबाह कर देगा। तो इस हालत में रीता को अब क्या करना चाहिए, क्या आप बता सकते है ? 

                  14)   पहला प्यार

          बात उन दिनों की है, जब निधि १८ साल की उम्र की हुआ करती थी, निधि के घर के सामने वाले घर में अभी कुछ दिन पहले ही दो लड़के rent पे रहने आए थे। दोनों दिखने में हैंडसम और खानदानी घर के लगते थे, दोनों  मुंबई इंजिनयरिंग की पढाई के लिए आए थे। उन में से एक लड़के का नाम निशित और दूसरे का नाम समीर था। निशित पढाई करने अपनी खिड़की के पास ही रोज़ बैठता था और निधि के कमरें की खिड़की के सामने ही उसकी खिड़की थी, तो कभी-कभी निधि उसे देखा करती थी। ये बात निशित ने कुछ दिनों बाद महसूस की, कि निधि उसे यूँ चुप के से रोज़ देखा करती। 

      एक दिन निशित अपनी खिड़की पर पूरा दिन नहीं दिखा, तब निधि का जी मचलने लगा, उसे रोज़ देखने की अब उसकी आदत जो हो गई थी। उस दिन निधि के मम्मी-पापा और भैया तीनों शादी में गए हुए थे, निधि की एग्जाम शुरू होने वाली थी, तो निधि ने जाने से इंकार कर दिया, कि उसे आज रात पढ़ना है। तो ये मौका अच्छा है मिलने का, ये सोच निधि सीधे उसके घर चली गई। 

     निधि ने निशित के घर का बेल बजाया। पहले तो समीर ने दरवाज़ा खोला, निधि ने घर के अंदर इधर-उधर झाकने की कोशिश की, मगर कहीं भी निशित दिखाई नहीं दिया। तब निधि से रहा नहीं गया, निधि ने समीर से सीधे ही पूछ लिया, कि " तुम्हारा दोस्त कहाँ है ? आज कहीं वो दिख नहीं रहा ? " समीरने कहा, " वह अंदर ही है, उसकी तबियत कुछ ठीक नहीं है, इसलिए वह सो रहा है, डॉक्टरने उसे आराम करने को कहा है। "निधि ने कहा,  " ओह्ह, तो ये बात है, क्या मैं उस से एकबार मिल सकती हूँ ? " समीर ने कहा, " हाँ, हाँ क्यों नहीं ? आइऐ ना। " कहते हुए समीर निधि को निशित के कमरें  में ले गए, निशित सच में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, निशित को बुखार था और ठण्ड के मारे उसका बदन काँप भी रहा था। निधि ने समीर से कहा, " इसे तो बहुत तेज़ बुखार है। " समीर ने कहा, " हाँ,  दवाई तो पिलाई है, मगर बुखार कम नहीं हो रहा। " 

    निधि ने समीर के पास एक बाउल मैं ठन्डे बर्फ का पानी और रुमाल माँगा, निधि कुछ देर तक निशित के सिर पर ठन्डे पानी की पट्टी लगाती रही, इस से उसका बुखार कम हो गया, निशित के पास कोई कम्बल भी नहीं था, तो अपने घर से कम्बल लाकर निधि ने उसे ओढ़ाया, ताकि उसे ज़्यादा ठण्ड न लगे और वह आराम से सो सके, बिना किसी बात का सोच-विचार किए निधि पूरी रात उसकी सेवा करती रही, तब जाके सुबह को उसका बुखार कम हुआ और उसे थोड़ा अच्छा लगा, निशित ने निधि का शुक्रिया भी किया, फ़िर निधि अपने घर जाने लगी, तभी सामने से  निधि के मम्मी-पापा की कार भी आई, निधि के मम्मी-पापा ने निधि को निशित के घर से इतनी सुबह-सुबह बाहर निकलते हुए देख लिया, तो पापा का गुस्सा आसमान पर था, उन्होंने निधि से बिना कुछ बात किए, उसे गलत समझकर कुछ दिन उसके कमरे में बंद कर दिया, मगर पापा को कहाँ पता था, कि वह दोनों आमने-सामने खिड़की में से एक-दूजे को देखा करते है। निशित ने इशारे से खिड़की में से फ़िर से निधि को कल रात के लिए THANK YOU कहा। निधि उसे मन ही मन चाहने लगी थी, मगर कभी बता ना सकी। बस खिड़की में से कभी-कभी एक दूजे से बातें कर लेते और मुस्कुराया करते। निधि का उसके साथ एक दिल का रिश्ता बन गया था। निधि के पापा उसूलों के बहुत पक्के थे, उन्होंने  निधि की शादी कहीं ओर तय कर दी। इस बात को कुछ महीने गुज़र गए। 

          एक दिन किसी कॉफ़ी शॉप में निधि बैठ के अपनी दोस्त के इंतज़ार में थी, वही इत्फ़ाक से निशित भी आया हुआ था, दोनों ने एकदूसरे को देखा, पहले तो दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। कुछ देर बाद निशित ने निधि से पूछा, "  तुम कैसी हो ? यहाँ  कैसे ? " निधि ने कहाँ, " मैं अपनी दोस्त के इंतज़ार में हूँ, वह आज मुझ से यहाँ मिलने आनेवाली है, मगर पता नहीं, अब तक आई क्यों नहीं ? ओह्ह, same here, मेरा भी एक दोस्त मुझ से मिलने आनेवाला है, अब तक आया नहीं। अच्छा, तो हम दोनों ही बात कर लेते है। निधि ने कहा, " हाँ, ज़रूर ! क्यों नहीं ? " 

    निशित ने कहा, " अच्छा चलो बताओ, तुम्हारे पति,  तुम्हारे घरवाले सब कैसे है ? तुम ख़ुश तो हो ना ? "

    निधि निशित की बात सुनकर चौंकी। निधि ने कहा, " शादी और मेरी ? "

    निशित ने कहा, " हां, उस रोज़ तुम्हारी शादी थी ना ?" निधि ने कहा,  " हांँ,  बारात भी आई थी, मगर उसी रोज़ बारात आने से पहले मैं घर छोड़कर वहाँ से भाग गई थी, क्योंकि मेरे पापा ने पैसो की ख़ातिर मेरी शादी मुझ से १० साल बड़े लड़के से तय की थी, जिसका एक छोटा बच्चा भी था, मगर ये बात मुझे मंज़ूर नहीं थी। इसलिए मैंने घर छोड़ दिया। मेरी सहेलीने मुझे अपने घर चंडीगढ़ में कुछ महीने के लिए आसरा दिया। फ़िर मैंने जॉब शुरू कर दी और खुद का घर ले लिया, मगर तुम ?

      निशित ने कहा, बस मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, मेरी शादी पापा ने ज़बरदस्ती करवा दी, मगर सुहाग रात में लड़की ने कहा, कि मैं किसी और को चाहती हूँ, उससे मैं बहुत प्यार करती हूँ और उसी से शादी भी करना चाहती थी। तब मैंने अपनी पत्नी शीला के बॉय फ्रेंड के बारे में पता किया, वह लड़का सच में बहुत अच्छा था, शीला से प्यार भी बहुत करता था, इसलिए मैंने शीला को उसके बॉय फ्रेंड सुनील से मिला दिया, दोनों की शादी करवा दी और जॉब के लिए यहाँ आ गया, वैसे भी मैं उस से प्रेम नहीं करता था, तो ऐसे रिश्तों के साथ जीने से तो बेहतर अकेले रहना मुझे ठीक लगा। क्योंकि मैंने जब से तुमको देखा, मैनें सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम से ही प्यार किया, फ़र्क सिर्फ़ इतना है, कि ये बात कभी मैं अपनी ज़ुबान पे ला ना सका। मुझे लगा तुम्हारे पापा ने तुम्हारी शादी कहीं ओर तय कर दी, तो तुम्हारी डोली उठने से पहले ही मैं वहांँ से चला गया, मैं तुझे किसी ओर की होते हुए नहीं देख सकता था और उस वक़्त मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी, कि मैं तुम्हारे पापा से अपने प्यार के बारे में बात कर सकूँ। उस वक़्त मेरे मन की बात मन में ही रह गई, मगर मैंने अपनी ज़िंदगी में पहला प्यार तो तुम से ही किया था । मैंने तो तुम्हारी शादी के बाद तुम से मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, मगर आज तुम्हारा सच जानने के बाद, आज मैं तुम से कहना चाहता हूँ, कि मैं आज भी तुम से उतना ही प्यार करता हूँ, जितना पहले करता था, क्या तुम मेरे साथ अपनी बाकि की ज़िंदगी बिताना चाहोगी ? " 

          निधि तो उस वक़्त ख़ुशी के मारे आसमान में उड़ने लगी, मैंने भी तुम से कभी मिलने की उम्मीद छोड़ ही दी थी, मगर जहाँ दिल का रिश्ता इतना गहरा हो, तब दो दिल चाहे जितने भी दूर हो, मगर एक ना एक दिन तो मिल ही जाते है। ये दिलों का रिश्ता ही ऐसा है। इसी तरह तक़दीर ने निधि और निशित को मिला दिया। 

     मगर उसी वक़्त निधि की सहेली यानी मैं और रितेश का दोस्त यानी समीर, हम दोनों तालियाँ बजाते हुए उनके सामने आए क्योंकि हम दोनों ने मिल के निधि और निशित को मिलाने का ये प्लान किया था, क्योंकि हम दोनों ये बात जानते थे, कि निधि और निशित एक दूसरे से बहुत प्यार करते है। 

         उसके बाद निधि और निशित दोनों ने शादी भी कर ली, अब दोनों साथ में ही रहते है, जॉब भी दोनों साथ में करते है, उनका एक बच्चा भी है और वह दोनों आज बहुत खुश भी है।  

        तो दोस्तों, आपके नसीब में पहला प्यार लिखा हो और रिश्ता अगर दिल से दिल का हो तो बिछड़े प्रेमी एक ना एक दिन, किसी ना किसी तरह, किसी ना किसी रास्ते मिल ही जाते है। 

                                            

                        

                 15)  एक फ़ैसला अपने लिए

             शीला का पति सुरेश कोरॉना में चल बसा, सुरेश के जाने के बाद शीला की ज़िंदगी में जैसे अंधेरा सा छा गया था। उसका एक बेटा और बहू थी, जिसकी अभी दो साल पहले ही शादी हुई थी । बेटा और बहू दोनों जॉब करते थे, तो सुबह टिफिन लेकर चले जाते, शाम को आते, दोनों खाना खाकर बाहर walk करने चले जाते, या तो कभी कभी अपने दोस्तों के साथ घूमने चले जाते, शीला का बेटा अपनी मम्मी को भी साथ आने को कहता, मगर शीला समझदार थी, वह अपने बेटे और बहू की ज़िंदगी के बीच नहीं आना चाहती थी, उनकी अब उम्र है, घूमने फिरने की, इसलिए वह कोई बहाना बनाकर घर पर ही रुक जाती, शीला के बेटे का एक छोटा सा बेटा भी था, तो उसको संभालने में उसका वक्त बीत जाता, मगर आखिर कब तक ऐसा चलता रहता। उसको कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, अकेलापन उसे खाए जाता था, बाहर से शीला सब के साथ हंसकर बातें करती मगर अंदर से वह टूट चुकी थी, ऐसे ही जैसे तैसे कर के दो साल तो गुज़र गए।
          सतीश के जाने के बाद शीला रोज मंदिर जाती, उसकी मुलाकात राजेश नाम के लड़के से हुई, जो तकरीबन उसी की उम्र का था और उसके साथ भी वहीं हुआ था, जो शीला के साथ हुआ था, राजेश की पत्नी भी कोरोना में चल बसी थी और वह बिलकुल अकेला हो गया था, अपना अकेलापन दूर करने के लिए दोनों कृष्ण के मंदिर में आते और सारी फ़रियाद वहीं करते, तब धीरे धीरे दोनों में बातें शुरू होने लगी, एक दूसरे का साथ दोनों को अच्छा लगने लगा, सोचा कि कृष्णा के मंदिर में हम दोनों मिले है और उनकी भी यहीं मर्ज़ी होगी, ऐसा सोचते हुए, अपना अपना अकेलापन दूर करने के लिए दोनों ने शादी करने का फ़ैसला कर लिया। मगर दोनों के बच्चों को अब यह रिश्ता मंजूर नहीं था, कहते थे, " इस उम्र में शादी करेंगे, तो लोग क्या कहेंगे ? " इसलिए पहले तो राजेश और शीला ने एकदुसरे से अलग होने का सोच लिया, दोनों ने मंदिर जाना भी बंद कर दिया, मगर फिर भी दोनों को अकेलापन खाए जा रहा था।
            एक दिन फोन पर बात कर के शीला और राजेश दोनों ने अपने अपने घर में एक चिठ्ठी लिखी, जिस में लिखा कि " हम दोनों शादी कर रहे हैं और आपको परेशानी ना हो, इसलिए हम यह शहर ही छोड़कर कहीं दूर चले जाएंगे, कोई पूछे तो आप बता देना, कि हम लंबी यात्रा पर चले गए हैं और अब वहीं हरिद्वार में ही रेहने का इरादा कर लिया है, अगर आप सब को ठीक लगे तो, कभी कभी फोन कर के हम आप से बातें भी कर लिया करेंगे, आप सब अपनी ज़िंदगी में खुश रहो, हमें और कुछ नहीं चाहिए, हम अपना देख लेंगे। " ऐसा कहते हुए शीला और राजेश ने भागकर शादी कर ली और शहर से कहीं दूर चले गए और अपनी एक नई दुनिया बसा ली, जिस में अब सिर्फ वह दोनों ही थे। शीला को सिलाई का काम आता था, तो फ्री टाइम में उसने मशीन लेकर वह काम शुरू कर दिया और राजेश कॉलेज में टीचर था, तो उसने यहाँ भी एक अच्छे से कॉलेज में जॉब शुरू कर दी, रात को दोनों साथ में खाना खाते और घूमने जाते और कभी खाना बनाने का मन ना हो तो बाहर ही चाट पूरी का मजा ले लेते और फ़िर बातें करते करते उन दोनों का वक्त कहाँ बीत जाता पता ही नही चलता, घर आकर पुराने गाने सुनते सुनते दोनों सो जाते। अभी दोनों की इतनी उम्र भी तो नहीं थी, शीला तकरीबन 44 की थी और राजेश तकरीबन 46 के थे, अब इतनी छोटी उम्र में साथी तो चाहिए ही ना ! एकदूसरे का अकेलापन दूर करने के लिए दोनों ने एकदुसरे का हाथ थामने का फ़ैसला कर लिया।
    एक दिन शीला ने अपनी बीती हुई ज़िंदगी याद करते हुए कहा, कि " हमारा घर छोड़ना और शादी करने का फैसला बिलकुल सही था, अगर हम ऐसा नहीं करते तो आज हम अपने बच्चों के टुकड़ों पर ज़िंदगी जीते रेहते, उनके एहसान तले दबे रहते, अपने मन की कभी कुछ कर ही नहीं सकते, अपने तरीके से ज़िंदगी जी नही सकते। "            राजेश ने कहा, " तुम सही कह रही हो, लोगों का क्या है, उनका तो काम ही बातें करना हैं, जिंदगी तो अकेले हमें जीनी पड़ती और हम अपनी नहीं बल्कि उनकी दी गई ज़िंदगी जीते, पहले हमने अपने अपने बच्चों को बड़ा किया, अब उनके बच्चे संभालने में ज़िंदगी गुज़ार देते, ऐसा नहीं की हम अपने बच्चों को और अपने अपने पति पत्नी को भूल गए, उनका साथ, उनका प्यार भूल गए, मगर ज़िंदगी में कभी कभी कुछ फ़ैसले हमें अपने लिए भी लेने पड़ते हैं, कब तक हम यूहीं अपने बच्चों के बारे में सोचते रहेंगे ? उनकी भी अपनी ज़िंदगी हैं, अपने बीवी बच्चें है, उनके साथ वह खुश रहे, अब बोझ क्यों बन कर रहे ? हमारा साथ रहने का फ़ैसला एकदम सही था। 
        माना कि यह फ़ैसला लेना और इस उम्र में अपने बच्चों से रिश्ता तोड़कर नई ज़िंदगी शुरू करना इतना आसान भी नहीं, मगर कभी कभी दूसरों के बारे में नहीं बल्कि हमारे अपने बारे में सोचना भी जरूरी हो जाता है। और तो और यह भी नसीब की बात हैं, कि इस उम्र में कोई अच्छा  साथ निभाने वाला मिलना भी मुश्किल ही हैं, जिस पर हम आँखें बंद कर भरोसा कर सके, हम तो यहीं कहेंगे, कि ज़िंदगी में सब को एक साथी मिल जाए, जो उसे समझे, उसके प्यार को समझे, जिस के साथ ज़िंदगी आराम से बीत जाए। "
        तो दोस्तों, शीला और राजेश ने अपने अपने बच्चों के खिलाफ़ जाकर शादी कर के नई जिंदगी शुरू करने का फ़ैसला लिया, वह सही था या गलत ? 

सत्य घटना पर आधारित 

                   16 )   दर्द      
         ये कैसा दर्द दिया पिया तूने मोहे ?

      मनोज ज़ोर से आवाज़ लगाता है, " माया, चलो भी अब, तुम्हें तैयार होने में कितनी देर लगती है ? शादी में मेरे सारे दोस्त पहुँच गए है और उन सब का फ़ोन आ रहा है, कि " तुम कब आओगें ? मेरे दोस्त की बारात भी वहांँ से निकल गई है और हम अब तक घर में ही है। "
      माया ने ऊपर के कमरें से आवाज़ लगाकर कहा, कि " हांँ, बस ५ मिनिट। मुन्नी को दूध पीला दिया और दवाई भी पीला दी है, आज उसे थोड़ा बुखार लग रहा है और छोटे को होमवर्क भी करा दिया है, उन की स्कूल यूनिफार्म भी मैंने प्रेस कर दी है, मुन्नी अभी बस अब सो ही जाएगी, उसे अच्छे से सुलाकर ही हम जाएंगे, वार्ना मुझे अपने पास ना पाकर वह बहुत रोएगी, उसके बाद हम निकलते है, आप को तो पता ही है, कि मेरे बिना उसे नींद नहीं आती, मैं बस मुन्नी को सुलाकर अभी आई, तब तक तुम नीचे  t.v देखो। "
         माया की बात सुनकर मनोज बड़बड़ाता है, " इसका तो हर वक़्त यही बहाना रहता है, कहीं भी जाना हो तो मुन्नी को ये और मुन्ना का ये। मेरे बारे में तो कभी सोचती ही नहीं। वहांँ शादी में मेरे सब दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे है और शादी में सब मज़ा कर रहे होंगे। चलो आज माया को अपने मुन्ना और मुन्नी को सँभालने दो, मैं अकेला ही शादी में चला जाता हूँ, वार्ना माया के इंतज़ार में वहाँ मेरा दोस्त घोड़ी पर चढ़कर शादी भी कर लेगा और मैं यहीं का यहीं रह जाऊंँगा। सब माया के बारे में पूछेंगे, तो सब को बता दूंँगा, कि मुन्नी और माया की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए माया शादी में नहीं आ पाएगी, वैसे भी वहांँ माया किसी से कुछ खास बात तो करती नहीं, बस चुप चाप खड़े रहकर सब को देखती रहती है। " ऐसा सोचते हुए मनोज अकेले ही शादी में चला जाता है। 
        इस तरफ कुछ देर बाद माया अपनी मुन्नी को सुलाकर शादी में जाने के लिए अच्छे से तैयार होकर नीचे आती है, नीचे ड्राइंग रूम में t.v तो चल रहा था, मगर मनोज वहांँ नहीं थे, माया ने मनोज को आवाज़ लगाई, इधर-उधर, रसोई में, वाश-रूम में हर जगह देखा, मगर मनोज कहीं नहीं दिखे, फ़िर माया ने मनोज को कॉल किया, ये जानने के लिए, कि वो कहाँ है ? माया के तीन-चार कॉल का मनोज ने कोई जवाब नहीं दिया। जब मनोज ने फ़ोन नहीं उठाया, तो माया मनोज के लिए परेशांन होने लगी। माया मन ही मन सोचने लगी, कि " क्या बात होगी, मनोज यूँ अचानक से कहीं बिना बताए चले गए ? चाहे मनोज जैसे भी हो, उसने आज तक ऐसा तो कभी नहीं किया, मनोज आवाज़ लगाकर मुझे कह कर ही जाते, मगर आज ऐसे कैसे ? उन्हें कुछ हुआ तो नहीं ? मनोज ठीक तो होंगे ना ? " माया मनोज के बारे में सोचकर ऐसे ही जटपटाने लगी। 
        बस कुछ ही देर मनोज के ना दिखने से और उनका फ़ोन ना लगने से माया के मन में अजीब-अजीब ख्याल आने लगे। उस तरफ़ मनोज अकेले ही अपने दोस्त की शादी में चला गया और उसने दोस्तों से ये कहाँ की माया और मुन्नी दोनों की तबियत आज कुछ ठीक नहीं, इसलिए माया शादी में ना आ पाई और शादी में दोस्तों के साथ मस्ती करने लगा और अच्छे से शादी वाला मज़ेदार खाना भी खाया। 
        इस तरफ़ माया मनोज को लगातार फ़ोन लगा रही थी, तब मनोज ने माया को मैसेज किया, कि " मैं यहाँ अपने दोस्त की शादी में आ गया हूँ, अब बार-बार फ़ोन कर के मुझे परेशान मत करो, तुमने तैयार होने में बहुत देर कर दी, अब तुम मुन्नी के साथ ही सो जाओ, मैं रात को देर से आऊँगा। "
     मनोज का मैसेज पढ़ते ही माया की जान में जान आई, कि चलो मनोज ठीक तो है ! लेकिन दूसरे ही पल माया के दिल में ये ख्याल आया, कि " ऐसी भी क्या जल्दी जाने की, मैं अपने बच्चों की वजह से ही तो लेट हुई थी, क्या मनोज मेरा इतना भी इंतज़ार ना कर पाए ? क्या मुन्ना और मुन्नी सिर्फ और सिर्फ मेरे बच्चे है ? बच्चों की ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरी ही ज़िम्मेदारी है ? क्या बच्चों की ओर उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं ? शादी से पहले तो कितनी बातें बनाते थे ! तू जिस गली ना हो, उस गली से हम गुज़रेंगे भी नहीं ? और भी ना जाने क्या क्या ? अब क्या हुआ ? "
      सोचते हुए माया ऊपर अपने कमरें में जाकर अपने आप को आईने में देर तक, बस एक तक तकती ही रह गई। तभी माया के मोबाइल में फिर से मैसेज आया, उसने नोटिफिकेशन में देखा, तो मनोज ने अपने दोस्त के साथ की फोटो इंस्टाग्राम पे पोस्ट की थी, जिस में वह अपने दोस्तों के साथ बहुत ही खुश नज़र आ रहा था और इस तरफ माया का दिल दर्द से रो रहा था, क्योंकि ये आज की बात नहीं, मनोज को अब दर्द देने की आदत सी हो गई थी और माया की दर्द सहने की हिम्मत दिन-ब-दिन टूटती जा रही थी। आज माया की आँखों में अब नींद कहाँ ? माया पूरी रात अपने दोनों बच्चों को देखते हुए, मनोज का इंतज़ार करती रही, कि " आज तो मैं मनोज से पूछ के ही रहूंँगी, कि " बच्चों की तरफ उसकी कोई ज़िम्मदेरी है भी या नहीं ? वह मुझे यहाँ यूँ अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते है ? " वैसे आज तक माया ने मनोज से नाहीं कोई सवाल किया और नाहीं कभी मनोज के साथ ऊँची आवाज़ में बात की। चाहे मनोज जितना भी गुस्सा हो या चिल्लाए। माया अपने अंदर कई सवालों की पोटली बनाए जा रही थी। इन्हीं सब कसमकस के बीच कब सुबह हो गई, माया को पता ही नहीं चला और 
        सुबह होते-होते माया के मोबाइल में मनोज का फ़िर से एक और मैसेज आया, जिस में लिखा था, कि " माया, मैं तुम से ठक गया हूँ, अब मुझे तुमसे डिवोर्स चाहिए।  "
    ऐसा मैसेज पढ़ते ही, माया के पैरो तले से ज़मीन ही खिसक गई। वह सोचने लगी " इतनी सी देरी के लिए इतनी बड़ी सज़ा ? या मैं इतनी बुरी हूँ ? या मैं सूंदर नहीं हूँ ? या मैंने अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई ? बच्चों से प्यार करना और उनकी देखरेख करना, उनको पढ़ाना-लिखाना, उनकी हर छोटे से छोटी ज़रूरत का ख्याल रखना, क्या ये मेरी गलती है ? या फिर आज तक मैं चुप रही और मैंने मनोज से अपने हक़ के लिए कभी कुछ नहीं माँगा, ना कहा, या ये मेरी गलती है ? डिवोर्स ? मुझ से ? आखिर क्यों ? " 
       डिवोर्स की बात ने माया को सब से बड़ा दर्द पहुंँचाया था। माया अपने बिस्तर से खड़ी होकर आईने के सामने खड़ी रहती है, अब तक माया ने अपने कपड़े भी नहीं बदले थे, जो उसने शादी में जाने के लिए पहने हुए थे। माया की आँखो के सामने उसका गुज़रा हुआ पल आने लगता है, कुछ साल पहले 
      जैसे, कि " माया के पापा माया को समझा रहे थे, कि " बेटा, पहले अपनी पढाई पूरी कर दो, बाद में आराम से शादी के बारे में सोचेंगे, तेरे लिए तेरी मनपसंद के लड़कों की मैं लाइन लगा दूंँगा। हाँ, मगर मनोज मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा। "
        मगर उस वक़्त मायाने अपने पापा की बात को नज़रअंदाज़ किया और मायाने मनोज के साथ भाग के चुपके से शादी कर ली। माया के पापा ने ऐसा सोचा भी नहीं था, कि उसकी बेटी ऐसा करेगी। इस तरफ़ पहले-पहले तो सब ठीक रहा, मगर बाद में मनोज और माया दोनों पर ज़िम्मेदारी बढ़ने लगी। माया घर के कामो में और बच्चे सँभालने में व्यस्त रहने लगी और मनोज को फ़िर से अपना दिल बहलाने के लिए लड़की की ज़रूरत पड़ने लगी, मनोज देर रात तक अपनी गर्ल फ्रेंड से फ़ोन पर बातें करता, माया दरवाज़े के पीछे छुप के सब सुन लिया करती, मगर मनोज से कभी इस बार में सवाल न कर पाई, बात और बढ़ने लगी, अब तो वह रात को घर से चला जाता और सुबह आता, या तो कभी-कभी सुबह जल्दी निकल जाता और रात को देर से आता। मनोज का माया पर जैसे ध्यान ही नहीं, कि " माया घर में क्या कर रही है और कैसी होगी ? " माया बार-बार मनोज को फ़ोन किया करती मगर तब भी मनोज माया के १० कॉल में से एक कॉल का ही जवाब देता और इस बीच अगर कभी बच्चें कोई गलती करे तो भी मनोज माया को ही सुनाता, " आखिर आज तक तूने बच्चों को सिखाया ही क्या है ? पूरा दिन तुम आखिर घर में करती ही क्या हो ? मुफ़त की रोटियांँ ही तो तोड़ती हो और तो और तुम्हारे लाड-प्यार में दोनों बच्चें बिगड़ गए है, देखो, कैसे सब के सामने शैतानी करते रहते है और अब तो मेरे सामने मुँह पर जवाब भी देना सिख गए है, ये सब तुमने ही तो सिखाया है ना, दोनों को ?" माया ग़म में डूबी रह जाती, कि क्या सच में इस में भी मेरी ही गलती है ? मैंने बच्चों को कुछ नहीं सिखाया ? और माया हर बार की तरह चुप रह जाती, माया का शरीर दो पल के लिए ठंडा पड़ जाता और उसके हाथ पैर भी कांपने लगते, उसके पास मनोज के सवाल का उस वक़्त कोई जवाब नहीं होता था। "
            माया की पढाई भी इस प्यार के चक्कर में अधूरी रह गई। माया पहले से ही बहुत शांत स्वाभाव की थी, उसने किसी से झगड़ा करना या किसी से ऊँची आवाज़ में बात करना सीखा ही नहीं था, छोटी-छोटी बात पर मनोज गुस्सा हो जाता, तब भी माया चुप रह जाती। ऐसी और भी कई बातें जो माया के दिल को दर्द पहुँचाती रही। 
           लेकिन आज तो माया का दिल एक दम से टूट ही गया, उसके इतनी कोशिश के बावजूद भी मनोज उस से दूर ही रहता। माया के अंदर  जैसे युद्ध चल रहा था, इतने सालो में उसने मनोज के लिए क्या कुछ नहीं किया ? एक के बाद एक सब याद आने लगा, जो दर्द माया ने इतने साल सहा। 
           मैंने तो सोचा था,
"तेरे साथ चलते-चलते ज़िंदगी की राह आसान हो जाएगी। " मैंने तो तुम से बिना किसी शर्त बेपनाह प्यार किया, मगर " ये कैसा दर्द दिया पिया तूने मोहे। " अभी तो माया का दर्द कम भी नहीं हुआ था, कि मनोज ने आज तो बदतमीज़ी की सारी हदे पार कर दी। आज तो मनोज अपने साथ एक लड़की को घर लेकर आया और माया और बच्चों के सामने ही उसी के बिस्तर पर बैठ जाता है, माया उसी वक़्त अपने दोनों बच्चों को लेकर अपना सामान लिए घर छोड़कर अपने पापा के घर चली जाती है। 
       माया ने अपने पापा के घर का दरवाज़ा खटखटाया। माया के पापा ने दरवाज़ा खोला, सामने दो बच्चों और सामन के साथ अपनी बेटी की ऐसी हालत देखकर माया के पापा ने अंदाज़ा लगा लिया, कि माया सच में तकलीफ में है, इसलिए उन्होंने माया को घर के अंदर आने दिया।         माया ने अपने पापा के पैर पकड़ लिए और कहाँ, " पापा, मुझे माफ़ कर दो, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है, आप सच ही कहते थे, कि मनोज अच्छा लड़का नहीं है, लेकिन मैं उस वक़्त उसके प्यार में अंधी हो गई थी, जो आप के लाख समझाने पर भी मैं नहीं मानी, मैंने आपका बहुत दिल दुखाया है। मुझे प्लीज माफ़ कर दीजिए, पापा। 
     माया के पापा ने अपनी बेटी माया को गले से लगा लिया और कहा, " पहले तो तुम रोना बंद करो, तुम्हें पता है, ना कि मैं तुम्हारी आँखों में आंँसू नहीं देख सकता, इसी बात पर कई बार मेरा तुम्हारी माँ से भी झगड़ा हो जाता था। और रही माफ़ करने की बात, तो माफ़ तो मैंने तुम्हें कब का कर दिया था, मगर तुम उसके बाद कभी आई ही नहीं और नाहीं हमें मिलने की तुमने कभी कोशिश की। तो हमने सोचा, तुम मनोज के साथ खुश होगी। मगर इतने साल बाद आज अचानक क्या हुआ ? "
        माया ने कहा, " क्या कुछ नहीं हुआ ? आप को मैं अपनी तकलीफ़ नहीं बताना चाहती थी और कहती भी तो क्या मुँह लेकर, मैंने आपकी मर्ज़ी के खिलाफ जो शादी की थी। तो मैंने सोचा, कि जो भी करना है, अब बस मुझे ही करना है, इसलिए मैंने मनोज को समझाने और सुधारने की अपनी और से बहुत कोशिश की, मग़र अब बस, अब पानी सर से ऊपर पहुँच गया है, अब उसकी बदतमीज़ी मैं और नहीं सेह सकती। इसलिए आप के पास चली आई और जाती भी तो कहाँ ? आप दोनों के अलावा मेरा इस दुनिया में है ही कौन ? बस कुछ ही दिन पापा, उसके बाद में अपने और अपने बच्चों के लिए रहने का इंतेज़ाम कर ही लूँगी। "
      माया के पापा ने कहा, " ऐसा क्यों कहती हो ? ये अब भी तुम्हारा अपना ही तो घर है। बहुत अच्छा किया बेटी, जो तू यहाँ चली आई। आखिर हम तुम्हारे माँ-बाप है और माँ-बाप अपने बच्चों का साथ कभी नहीं छोड़ते, माँ-बाप का दिल बहुत बड़ा होता है, वह किसी भी हाल में अपने बच्चों को माफ़ कर ही देते है। अब तुम्हें फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं, तुम अब से हमारे साथ ही रहोगी और रही बात तुम्हारे और मनोज के रिश्तें की तो जहाँ तक मैं तुम्हें जानता हूँ, वहांँ तक तुम ऐसी कोई गलती कर ही नहीं सकती, जिस से की मनोज गुस्सा हो, गलती ज़रूर उसी नालायक़ की ही होगी।  
       माया के पापा ने माया को अपनी पढाई पूरी करने को कहा, डिस्टन्स लर्निंग से माया ने अपनी पढाई पूरी कर ली। उसे अब अच्छी जॉब भी मिल गई, माया की माँ बच्चों का ख्याल रख लेती। उस दरमियाँ माया के पापा ने मनोज को माया को डिवोर्स देने की नोटिस भेज दी, मगर वह डिवोर्स देने के लिए इतनी जल्दी नहीं माना, क्योंकी दो बच्चों के साथ डिवोर्स देने में माया के पापा ने उससे बच्चों की पढाई के पैसे और माया का खर्चा उठाने को कहा, तब मनोज डर गया और माया को फ़ोन कर के परेशान करने लगा, माया से अपनी गलती की माफ़ी भी माँगने लगा, मगर माया के पापा को पता था, कि ये सब वह पैसे बचाने के लिए कर रहा है, इसलिए इस बार माया के पापा ने माया को समझा दिया, कि मनोज सुधरने वालों में से नहीं है, उसे सुधरना होता तो वह कब का सुधर गया होता, अब तुम ही सोच लो, कि अब तुम्हें क्या करना है, फ़िर से उसी के साथ रहना है, या अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीना है ? " आज भी जैसा तुम चाहोगी, वैसा ही होगा। 
       इस बार अब माया को अपने पापा की बात सच लगी, इसलिए वह अपने फैसले पे कायम रही। देर से ही सही लेकिन आख़िर मनोज को डिवोर्स पेपर्स पर दस्तख़त करने ही पड़े, वह भी माया की सारी शर्त मानते हुए। 
        वैसे तो माया पहले से ही बहुत सुंदर, सुशील और संस्कारी लड़की थी, इसलिए आज भी उस के लिए अच्छे रिश्तें आते रहे, लेकिन अब माया का भरोसा प्यार से उठ चूका था, इसलिए उसने अपनी बाकि की ज़िंदगी अपने बच्चों की परवरिश करने में और अपने माँ-पापा की सेवा में गुज़ारना पसंद किया।  
    अब मनोज माया की ज़िंदगी से पूरी तरह चला गया था, मगर फ़िर भी अकेले में माया को अक्सर अपना बिता हुआ पल ना चाहने पर भी आँखों के सामने आ ही जाता और कुछ आँसू आँखों से पानी की तरह बह जाते। वो कहते है ना, कि " हर एक की ज़िंदगी में कुछ बातें ऐसी होती है, जिसे वह भूलना चाहे तो भी भुला नहीं पाते। "
           तो दोस्तों, ये सिर्फ एक माया की कहानी नहीं है, आज भी दुनिया में कई ऐसी औरतें है, जो शायद ऐसे दर्द से हर रोज़ गुज़रती है। हर दर्द सेहती ही, चुप रहती है, अपने घर वालों की हांँ में हाँ मिलाती रहती है, चाहने पर भी कुछ कह नहीं पाती। अपना अपमान उसे पल-पल याद आता रहता है, मगर फ़िर भी बच्चों और परिवार वाले और माँ-बाप की वजह से वह चुप रह जाती है। हर ग़म हर दर्द सेह जाती है। मगर आखिर कब तक ? 
 
सत्य घटना पर आधारित 

          
    
                    17 ) ससुराल में दरज्जा 
      
        शीला की पढाई के बाद उसने अपने मम्मी-पापा की मर्ज़ी से उनके पसंद के लड़के के साथ शादी कर ली, शीला के मम्मी-पापा ने भी शीला के लिए बहुत ही अच्छा घर और लड़का देखा था और तो और पैसो की भी कोई कमी नहीं थी, समाज में शीला के ससुराल वालों का नाम और रूड़बा भी बहुत अच्छा था। 
         शीला के ससुराल में उसके सास, ससुर, बड़े भाई-भाभी, छोटी नन्द, जो अभी कॉलेज में पढ़ती थी, वह सब साथ में रहते थे, शीला के पति सुशांत और उसके बड़े भाई एक ही कंपनी में काम करते थे, इसलिए वह दोनों  साथ में ही टिफ़िन लेकर ऑफिस चले जाते और छोटी नन्द भी अपना टिफ़िन लेकर कॉलेज चली जाती, घर में शीला, उसकी जेठानी और उसकी सास, ससुर रह जाते, घर का सारा काम मिल-जुलकर कर लेते, उसके साथ-साथ शीला को लिखने का और नॉवेल पढ़ने का भी बहुत शौक था। शीला को जब भी वक़्त मिलता तो नॉवेल पढ़ लेती या अपनी डायरी और पेन लेकर कुछ लिखने बैठ जाती। यह बात उसके पति सुशांत को भी पता थी, मगर इस बात से सुशांत को कोई तकलीफ नहीं थी, कभी-कभी वह अपने शायरी, कविता या कहानी अपने पति सुशांत को भी सुनाया करती। सुशांत को भी उसकी कविता और कहानी अच्छी लगती, वह उसकी तारीफ़ करता। शीला ने एक किताब लिखी थी, जो सुशांत को भी नहीं पता था, लेकिन एक दिन अपनी अलमारी से फाइल ढूंँढते वक़्त सुशांत के हाथों में शीला की वह डायरी आ गई, सुशांत ने डायरी के पहले दो पन्ने उसी वक़्त पढ़ लिए, जो बहुत ही दिलचस्प लगे, इसलिए सुशांत ने वह डायरी अपने पास रख ली और वह उसे ऑफिस ले गया, जैसे ही सुशांत को थोड़ा सा वक़्त मिलता, वह शीला की डायरी पढ़ने लगता, ऐसे कर के कुछ ही दिनों में उसने वह डायरी पढ़ ली और सच में वह एक बहुत अच्छी प्रेम कहानी थी। जिस में जैसे शीला के दिल की हर एक बात हो, ऐसा सुशांत को डायरी पढ़ के लगा, तब सुशांत के मन में ख्याल आया, कि क्यों ना इस डायरी को ही किताब का नाम दिया जाए और ये प्रेम कहानी सब को सुनाई जाए, इसलिए अपने मम्मी-पापा और भैया-भाभी से बात कर के उनकी इजाज़त लेकर, बिना शीला को इस डायरी के बारे में कुछ बताए चुपके से सुशांत ने वह डायरी को एक अच्छे से पब्लिकेशन में देकर उस शीला की लिखी प्रेम कहानी को किताब का रूप दे दिया। 
          फ़िर कुछ दिनों बाद शीला की सालगिरह पर सुशांत ने उसी की लिखी हुई डायरी, किताब के रूप में उसे देते हुए कहा, कि अब तुम्हारे पास एक साल और है, अपनी नई किताब लिखने का, हम सब को तुम्हारी यह प्रेम कहानी बहुत पसंद आई है, तो अब दूसरी किताब लिखना भी शुरू कर दो। 
     यह बात सुनते ही शीला के तो होश ही उड़ गए, क्योंकि उस किताब के बारे में उसने कभी किसी को नहीं बताया था, उसे यह किताब सुशांत के हाथों कैसे लगी यह भी नहीं पता था, तभी घर के बाकि लोग भी तालियांँ बजाते हुए शीला को मुबारक बाद देने लगे, उसने सोचा भी नहीं था, कि ससुराल में उसके लिखने की कला को इतना मान-सम्मान दिया जाएगा, क्योंकि मायके में तो जब भी वह लिखने बैठती तो वह लोग कहते, कि तुम्हारी शायरी और किताब ससुराल में कोई नहीं पढ़ेगा, बल्कि चपाती गोल बनी या नहीं, सब्जी स्वादिष्ट बनी या नहीं, ससुराल में यही सब देखा जाएगा। 
         यह सब याद आते ही शीला की आँखों से ख़ुशी के आँसू बहने लगे, क्योंकि शीला एक बहुत सिंपल सी लड़की थी, जैसा उसने आज तक ससुराल के बारे में सुना या देखा था, उस से बिलकुल उल्टा उसका ससुराल और उस घर के लोग थे। यहाँ जो जो देखा, सुना था, उस से उल्टा ही हो रहा था, शीला के ससुराल वाले शीला की बहुत तारीफ करते और जहाँ भी जाते सब के पूछने पर बड़े गर्व से कहते, कि हमारी शीला हाउस वाइफ के साथ-साथ एक बहुत अच्छी लेखिका भी है और ये कविता और कहानी बहुत ही अच्छी लिख लेती है।     
      तो दोस्तों, हर बार ससुराल वाले गलत ही हो, ये भी सही नहीं, कई घर में आज कल बहु को बेटी का दरज्जा दिया जाता है, मगर यह बात भी सच है, कि बहु को भी ससुराल में सब को मान-सम्मान देना चाहिए, तभी वह उनके दिल में अपनी जगह बना सकती है, क्योंकि ताली एक हाथ से नहीं बजती, वैसे ही अगर ससुराल में आपको मान-सम्मान चाहिए तो पहले सब को मान-सम्मान देना भी सीखना होगा। 

             18 )  रोशनी की उम्मीद 

           रीता आज हस्ते-हस्ते रोने लगी, बात करते-करते उसका गला भर आया। मैं समझ गई, कि वह आज फ़िर से टूट के बिखर गई है, मगर हर बार की तरह वह बताएगी कुछ भी नहीं। इसलिए मैंने आज उससे कह दिया, कि " देखो रीता तुम जब बहुत हस्ती हो ना, तब मुझे पता चल जाता है, कि तुम अंदर से बहुत परेशान और दुःखी हो। मुझे पता है, कि तुम यह किसी को बताना नही चाहती, लेकिन तुम्हें मुझे कुछ भी बताने कि जरूरत ही नही है, तुम्हारी ये झूठी हँसी और तुम्हारी आँखें मुझे तुम्हारे दिल का हाल सुना जाती है और वैसे भी मैं तुम्हारे घर सिर्फ़ एक दिन के लिए ही आई हुँ और मुझे तुम्हारे पति रवि और तुम्हारी सासुमा का रवैया अच्छे से पता चल गया है, चाहे तुम जितना भी छिपा लो, मगर आँखें सच्चाई बयांँ कर ही देती है क्योंकि मैं तुम्हें अच्छे से जानती हूंँ, तुमने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं, हमेशां अपने अपनों के बारे में ही सोचती रहती हो।"
         ऐसा सुनते ही रीता मेरे गले लगकर रोने लगी और कहने लगी, " क्या करू, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा, रवि सब के सामने बात-बात पर मेरा अपमान किया करते है, सुबह से लेकर शाम तक घर का सारा काम करने के बावजूद भी घर आकर यही कहते है, कि "पूरा दिन तुम घर में करती क्या हो, कुछ काम तो होता नहीं, बस बैठी रहती हो और फोन पर दोस्तों के साथ गप्पे लगाया करती हो। " उनको कहीं भी जाना हो तो मुझे उनके साथ जाना ही पड़ता है, मगर मैं अपनी सहेली के साथ कहीं नहीं जा सकती, नाहीं कोई किटी पार्टी, नाहीं कोई क्लब में जाना, अगर कभी मैं दोस्तों के साथ बाहर चली भी गई, तब मुँह पर कुछ नहीं कहते, लेकिन बाद में मौका मिलते ही ऐसी जली कटी सुनाते है, कि सुनकर लगता है, कि इस से अच्छा तो मैं कहीं नहीं जाती, घर पर ही रहती तो अच्छा होता और तो और रात को तो उनको साथ में सोना चाहिए ही, चाहे मेरी मर्जी हो या ना हो, मेरा बदन दर्द करे या फिर सिर दर्द करे, उनको उस से क्या ? उनके बगैर तो उनको चलता ही नही और सासुमा दिन भर झूले पर बैठकर ऑर्डर करती रहती है, खुद तो कुछ काम होता नहीं और मुझ में गलतियाँ निकालती रहती है, जब देखो तब सुनाती रहती है, कि " तुम्हारी माँ ने तुम्हें कुछ भी सिखाया नहीं ।" अब तुम ही बतलाओ अब इस में मेरी माँं की क्या गलती ? "
       मैंने रीता से कहा, कि " अगर तुम से यह सब सहन नहीं होता तो तुम आवाज उठाओ, क्यों इतना दर्द सहती रहती हो ? अपने मायके में माँ को बताया या नहीं ? "
      रीता ने कहा, " अरे नहीं, अब इस उम्र में उनको क्या परेशान करना, मेरा तो सब से लाडला मेरा बेटा था। मैं उस से सारी बातें किया करती थी, वह था, तो वह मेरी साइड लेता था, रवि और सासुमा के ताने से वहीं मुझे हर बार बचाता था, मेरे लिए तो वह कभी-कभी अपने पापा से भी लड़ पड़ता था, फ़िर मैं ही उसको चुप रहने को कहती थी, वह था तो जैसे एक हिम्मत बनी रहती थी, मगर उसकी मौत के बाद मैं एकदम से टूट गई हूँ, एक दम अकेली पड़ गई हूँ, सोचती हूँ, कि " उस दिन मैंने मेरे एक लौटे बेटे को कार में जाने ही क्यों दिया, अगर वह नहीं गया होता, तो उसका कार एक्सीडेंट नहीं हुआ होता और वह आज मेरे साथ होता, अब तो मुझे भी बस उसके पास जाने का इंतजार है, रोज़ मैं उसकी फोटो देखकर उसको यही कहती रहती हूँ, कि जाना ही था, तो तू अकेला क्यों चला गया, मुझे साथ लेकर क्यों नही गया ? लेकिन वह कोई जवाब नहीं देता, बस मुझे तस्वीर में से देखा करता है। "
        मैंने रीता से कहा, " तो फ़िर कब तक ऐसा चलता रहेगा, तुम्हें भी खुश रहना का अधिकार है, तुम्हें भी तो अपने मन की करने का अधिकार है, तुम्हें भी तो दोस्तों के साथ बाहर जाने का अधिकार है, इतनी सारी पाबंदियां क्यों ? तुम्हारी जगह मैं होती, तो मैं तो यह सब सह नहीं पाती और तो और रात को ऐसे पति को तो मैं अपने पास भी ना आने दूँ, तुम उनके बारे में इतना सोचती हो, कि " बेटा जाने के बाद उनको भी इस बात का बहुत दुःख है और उसी वजह से वह चिढ़ से गए है, लेकिन तुमने भी तो अपना बेटा खोया है, उसका कुछ नही ? उसके जाने के बाद दूसरे बच्चे के लिए भी तुम दोनों ने बहुत कोशिश की, IVF भी करवाया, फ़िर भी उम्र के हिसाब से नहीं हुआ, तो उसमें तुम्हारी क्या गलती ? और इन सब चक्कर में तुम्हारे शरीर और मन पर कितना असर हुआ, उसका भी उनको अंदाज़ा तक नहीं। " HEADS OF YOU " ऐसी परिस्थिति में सिर्फ़ तुम ही उसे बर्दाश्त कर सकती हो, ओर कोई नहीं। मैं बहुत सालों बाद तुमसे मिलने आई, तुम्हारे साथ फोन पर कभी कबार बात होती रहती थी, तब भी तुमने मुझ से ठीक से बात नहीं की, तभी तुम्हारी आवाज़ से मुझे पता चल गया था, कि ज़रूर कुछ बड़ी बात होगी, इसीलिए बहाना बनाकर सारे काम छोड़कर मैं यहांँ तुमसे मिलने आई हूंँ, मगर आज यहांँ आकर सब कुछ जानने और देखने के बाद मैंने यह सोच लिया है, कि आज से तुम यहांँ नही रहोगी, मेरे साथ चलोगी, मेरे घर नहीं तो मेरे पड़ोस में एक फ्लैट खाली है, वहांँ रहोगी, खुद की मर्जी से जीओगी, अपने लिए कुछ करोगी, जो पसंद है वह काम करोगी, आज तक जो भी नही किया, वह सब तुम अब करोगी, अपने पैरों पर खड़ी रहोगी, रवि और अपने घर वालों को अकेला छोड़ दो, उनको अपनी मर्जी से जीने दो, तभी उनको आटे डाल का भाव पता चलेगा, तुम्हें किसी को कोई सफाई देने की ज़रूरत नहीं, तुम मेरे साथ चल रही हो, मैं सारा इंतजाम कर लूँगी, तुम्हें अब यहांँ रहने की कोई ज़रूरत नहीं हैं। "
      रीता ने मुझे गले लगाकर कहा, " तुमने मेरे बारे में इतना सोचा, वहीं मेरे लिए बहुत है, अब इस उम्र में घर और पति को छोड़ना भी तो सही नहीं है, मेरी मांँ यह सुनकर जीते जी मर जाएगी और पापा का सिर शर्म के मारे झुक जाएगा, मैं उनको इस उम्र में और तकलीफ़ देना नहीं चाहती, वैसे भी मेरे बेटे के जाने के बाद मांँ को मेरी फ़िक्र लगी रहती है, रोज़ फोन कर के मेरा हाल पूछती है, मगर मैं हंसकर बात टाल देती हूँ, अब मैंने सब मेरे कान्हा जी पर छोड़ दिया है, वह जैसा मुझ को रखेंगे, वैसे ही मैं रहुंँगी, दिन भर उनका ही नाम लिया करती हूंँ, जो भी कहना हो, अपने कान्हा जी को ही कहती हूंँ, इसलिए तुम मेरी फ़िक्र मत करो, मैं अपने आप को संँभाल लूंगी। "
           रीटा की बात सुनकर मेरा अब वहाँ ज़्यादा देर रुकने का मन नहीं किया, इसलिए मैने रिटा से कहा, कि " जैसा तुम्हें ठीक लगे, लेकिन जब भी तुम्हें मेरी ज़रूरत हो, बिना किसी हिचकिचाहट से मुझे बुला लेना, मैं पहले भी तुम्हारे साथ थी, साथ हूँ और तुम्हारे साथ ही रहूंगी। 
        घर जाते-जाते सारे रास्ते में मैं आज यही सोचती रही, कि आख़िर औरत अपने बारे में सोचना कब शुरू करेगी ? मेरा घर, मेरा बेटा, मेरा पति, मेरे सास ससुर, मेरी मां, मेरे पापा, मगर इन सब में वह खुद है कहांँ ? कहीं भी नहीं, औरत खो गई है अंधेरों में कहीं, या तो उसने खुद अपने आप को बंद कर दिया है इन्हीं अंधेरों में जहाँ से रोशनी आने की उम्मीद लगाए बैठी हुई है, कि काश किसी रोज़ तो घरवालों को उनकी कद्र होगी और रोशनी की किरण खिड़की में से सीधे उसके कमरे में ही आ जाएगी, लेकिन उनकी यह उम्मीद शायद ही किसी की सच होती है और उन्हींं अंधेरों  में औरत एक दिन कहीं खो जाती है।

सत्य घटना पर आधारित 
           
                   19 )   एहसास 

           डॉली ने अपनी कॉलेज से मुझे फ़ोन किया, मैं सामने से कुछ कह पाऊं, उस से पहले ही डॉली ने बात करना शुरू कर दिया," हेलो, पापा ! कल आपको मेरे कॉलेज के कन्वोकेशन सेरेमनी में आना ही है, चाहे कुछ भी हो जाए। "

          मैंने कहा, कि " मैं समझता हूँ बेटा, कि तुम्हारे लिए ये सेरेमनी कितना ज़रूरी और आवाश्यक है। मगर बेटा, तुम मुझे भी समझने की कोशिश करो, मेरी कल एक बहुत ही ज़रूरी मीटिंग है, जो मैं कैंसल नहीं कर सकता, वार्ना मेरा बहुत नुकसान हो जाएगा, please बेटा, मेरी बात समझने की कोशिश करो। "

         डॉली ने कहा, कि " मैं इन सब में कुछ नहीं जानती, आपको आना है, तो आना ही है, वार्ना मैं आप से कभी भी बात नहीं करुँगी, आप चाहे कितना भी मनाओ, मैं नहीं मानने वाली। "

       कहते हुए डॉली ने रूठते हुए फ़ोन ऱख़ दिया। इस तरफ़ मेरे लिए यह मीटिंग करना बहुत ही ज़रूरी था, विदेश से कुछ क्लायंट सिर्फ़ एक दिन के लिए ही और सिर्फ़ इस डील के लिए ही आनेवाले है और वे लोग वहांँ से निकल भी गए है, अब मैं उन्हें कैसे रोकूँ या मना करूँ, कि " कल मेरी बेटी के कॉलेज में कन्वोकेशन सेरेमनी के लिए जाना है। " मैंने अपने चश्मे अपनी आँखों से उतारे और अपनी कुर्सी पर सिर रख आँख बंद कर कुछ सोचने लगा।

       दूसरे दिन सुबह फिर से डॉली ने मुझे याद कराते हुए कहा, कि " आप को याद है ना पापा, कि आज शाम ठिक ५ बजे आपको हमारी कॉलेज आना है, मैं अपने दोस्तों के साथ जल्दी कॉलेज जाने वाली हूँ, आप बाद में आ जाना, मैं आपका इंतज़ार करुँगी।" 

      कहते हुए डॉली ने फोन रख दिया। मैं फिर से नाश्ता करते-करते सोच में पड़ गया, कि आज शाम को मैं क्या करूँ, डॉली के कॉलेज चला जाऊँ या मीटिंग में ? 

       आख़िर वो पल आ ही गया। कॉलेज का पूरा हॉल स्टूडेंटस और पेरेंट्स से भरा हुआ था, सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। डॉली बार-बार अपनी बगल वाली कुर्सी, जो उसने अपने पापा के लिए जगह रखी हुई थी उस कुर्सी को और दरवाज़े की तरफ़ देखे जा रही थी, ये जानने के लिए, कि उसके पापा कब आएँगे ? एक के बाद एक सब बच्चों को स्टेज पर बुलाया जा रहा था, सब को काला कोट, काली टोपी और हाथ में एक सर्टिफिकेट दिया जा रहा था, सब तालियाँ बजा रहे थे, डॉली के दिल की धड़कन और तेज़ होने लगी, जब उसका नाम पुकारा गया, "डॉली अग्रवाल"। तब डॉली ने फिर से एक बार दरवाज़े की और देखा, उसकी आँखें अब भी उसके पापा को ढूँढ रही थी, वो चाहती थी, कि उसे स्टेज पर काळा कोट और काली टोपी के साथ उसके पापा उसे देखे। जैसे उसके हर दोस्त के पेरेंट्स उनको देख रहे थे। तभी दूसरी बार डॉली का नाम पुकारा गया, तब डॉली मायूस होकर स्टेज की ओर आगे बढ़ने लगी, उसने सोच लिया, कि " छोड़ो, आज उसके पापा नहीं आनेवाले। "

     मगर जैसे ही टीचर डॉली के हाथों में उसका सर्टिफिकेट देने जा रहे थे, तभी दर्शकों में पीछे से तालियों की आवाज़ सुनाई देने लगी, सब ने मूड कर पीछे की तरफ़ देखा, तो डॉली के पापा तालियांँ बजाते हुए अपनी बेटी डॉली की तरफ़ गर्व से देखते हुए आगे आ रहे थे। डॉली की ख़ुशी का तो ठिकाना ही ना रहा, डॉली ने तो अपने पापा के आने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। डॉली भागति हुई स्टेज से उतरकर अपने पापा की तरफ़ जाती है और अपने पापा को गले लगाकर कहती है, " थैंक यू, थैंक यू, थैंक यू, सो मच पापा, की आप आज आ गए, आपको पता नहीं, कि मैं आज कितनी खुश हूँ । " 

        मैंने कहा, "मैं भी आज बहुत ही खुश हूँ । अब स्टेज पर जाओ भी और अपनी ट्रॉफी लेकर आओ।"

     डॉली उछलते-कूदते फिर से स्टेज पर जाती है, टीचर्स उसे सर्टिफिकेट देते है, काला कोट और कैप पहनाते है और उसके फर्स्ट प्राइज के लिए उसे ट्रॉफी भी देते है, उस पल मेरे हाथ न तो तालियांँ बजाते हुए रुके और नाहीं मेरी आँखों से ख़ुशी के आंँसू बहते रुके। चेहरे पर ख़ुशी और आँखों में आंँसू ये कैसा अनोखा संगम है, तालियाँ बजाते हुए मैं खुद उस पल ये समझ नहीं पा रहा था।

      सोचते-सोचते मैं कुछ पल के लिए अपने ही बचपन में चला गया, जब मैंने पहली बार स्टेज पर गाना गाया था, जब मैंने स्टेज पर गिटार बजाया था, जब मैंने स्पोर्ट्स डे के दिन स्कूल मैं ट्रॉफी जीती थी, जब मैंने राइटिंग कॉम्पिटशन में ट्रॉफी जीती थी, जब मैंने साइकिल रेसिंग में, जब मैंने फुटबॉल में, जब मैंने पढाई में, जब मैंने अपनी कॉलेज के आखरी एग्जाम में टॉप किया था और मुझे ट्रॉफी मिलने वाली थी, तब-तब मेरी नज़र भी यूँही दरवाज़े पर अपने मम्मी-पापा को ढूँढ रही थी, सब मुझे बधाइयाँ देते थे, मगर में तब अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करता था। क्योंकि उस वक़्त मेरे मम्मी-पापा मेरी ख़ुशी में कभी सामिल नहीं हो सके, उनके लिए उनकी मीटिंग्स और उनका बिज़नेस ज़रूरी था, मेरे दादू जो घर में फ्री ही रहते थे, तो उनको भेज दिया करते और रात को घर आकर मेरे हाथ में नया खिलौना देकर, मुझे बहुत-बहुत बधाई देकर मुझे खुश कर दिया करते, मगर उनको क्या पता, कि मुझे उस वक़्त उस खिलौने की नहीं, मगर उनकी ज़रूरत थी, मेरे सारे दोस्त के पेरेंट्स आते थे, सिर्फ़ मेरे पापा और मम्मी ही नहीं आते थे, फिर रात को मैं अपने दादू के गले लगकर रो कर सो जाया करता, और सुबह जब उठता, तो कभी-कभी मम्मी और पापा शहर से बाहर किसी मीटिंग्स के लिए जा रहे होते थे, मैं दौड़कर खिड़की की तरफ़ भागता और उनको आवाज़ लगाता, " मम्मी-पापा, मम्मी-पापा, रुको, मुझे आप से कुछ कहना है, कुछ सुनना है, कुछ सुनाना है, कुछ देखना है, कुछ दिखाना है। " मगर मेरी आवाज़ उन तक नहीं पहुँच पाती और वे लोग मुझ से कई दूर चले जाते।  मैं अपने दादू के पास जाकर मुँह फुलाकर बैठ जाता, दादू समझ जाते, इसलिए मुझे बातों में लगा लेते और हँसा दिया करते। " 

       तभी कॉलेज के हॉल में अचानक से गिटार बजने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। मैं होश में आता हूँ, स्टेज पर देखता हूँ, तो मेरी बेटी, डॉली जो, मुझे अपनी जान से भी प्यारी है, वह हाथ में गिटार लिए बजा रही है और उसका दोस्त उसी की धुन पर गाना गा रहा है, डॉली की नज़र बार-बार मुझ पर आकर रुक जाती, मैं अपनी आँखों के आंँसू छुपा दिया करता और अपने हाथ उठाकर अपना थंब दिखाकर उसे चीयर-उप करने की कोशिश करता। आज मैं बहुत खुश हूँ, कि जो मेरी बेटी बचपन से मेरे साथ हर छोटी-बड़ी बात पे सवाल उठाती और आर्गुमेंट करती रहती, वह आज खुद एक वकील बन गई है। मेरी छोटी सी गुड़िया अब सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के साथ सच्चाई के लिए आवाज़ उठाएगी, हर औरत की तकलीफ़ को समझेगी, हर किसी को इन्साफ़ दिलाएगी, मेरी छोटी सी गुड़िया, आज बड़ी हो गई। 

     डॉली स्टेज से उतरकर फिर से मेरे गले लग जाती है, कॉलेज के कमरें में तालियों की आवाज़ अब भी सुनाई देती है। डॉली ने कहा, " पापा अगर आज आप के साथ माँ होती, तो मुझे ऐसे ट्रॉफी लेते देखकर वो भी कितना खुश होती ना ? "

         मैंने कहा, " हांँ, बेटी, तुम्हारी माँ, होती तो शायद आज तुम वकील के काले कोट में नहीं बल्कि शादी के जोड़े में होती। " 

      मेरी बात सुनकर डॉली मुस्कुराकर बड़ी ज़ोरों से हँसने लगी, " क्या पापा, आप भी, मैं तो सोच रही थी, कि अपने लिए अब मैं नई मम्मी ढूँढना शुरू कर दूँ। " 

          हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। 

    तो दोस्तों, मैं देवेन्द्र अग्रवाल अपने मम्मी-पापा का एकलौता बेटा या कहूंँ तो उनकी ज़मीन, ज़ायदाद और बिज़नेस का एक लौटा वारिस हूँ, जो आज भी अपने पापा का बिज़नेस सँभाल रहा हूँ, जो आज का बहुत बड़ा बिज़नेस मेन है और जो बचपन से अपने पापा और मम्मी के साथ सिर्फ़ वक़्त गुज़ारना चाहता था, मुझे उनका सब कुछ मिला मगर वक़्त ही ना मिला। इसलिए आज कल मैंने अपने जीवन में अपने आप पे ही एक किताब लिखनी शुरू की है, यह मेरे ही जीवन का एहसास, यह मेरी ही किताब का, मेरे ही जीवन का एक छोटा सा सच था, जो मैं आप सब के साथ बाँटना चाहता हूँ।    

       दुनिया की सारी ख़ुशी एक तरफ़ और बेटी की खुशी एक तरफ़। मेरी नज़र से देखो तो, अपने बच्चों को स्टेज पर ट्रॉफी लेते देखना और उसे कामियाब होते हुए देखना, यह एक पिता के लिए बड़े गर्व की बात है।

       हाँ दोस्तों, उस ख़ुशी के आगे और कुछ भी नहीं, इस पल के आगे और कुछ भी नहीं, मीटिंग्स फिर कभी हो सकती है, पैसा फिर कभी कमाया जा सकता है, शॉपिंग फिर कभी हो सकती है, दोस्तों के साथ गप्पे फिर कभी लगाए जा सकते है, लेकिन यह पल फिर नहीं आएगा, यह एहसास फ़िर नहीं होगा। इसलिए दोस्तों, अपने बच्चों की ख़ुशी में शरीफ रहकर भी आप जता सकते हो, कि आप के लिए उन से ज़रूरी और कोई काम या और कोई बात हो ही नहीं सकती। 


                      20 )  ज़िंदगी 

          आज मैंने गाजर का हलवा बनाया था, तो सोचा हेमा आंटी को जाकर दे आती हूँ, वह हमारे पड़ोस में ही रहती है और उनसे मेरा रिश्ता एक माँ-बेटी के रिश्ते जैसा ही है। इसी बहाने उनसे मिल भी लूँगी, दो दिन से ऑफिस के काम की वजह से उनसे मिल ही नहीं पाई। मैं उनके घर की डोर बेल बजाने ही वाली थी, कि अंदर से किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैं मन ही मन बड़बड़ाई, " ये देखो, आंटीजी फिर से रोने लगी पता नहीं, आज फ़िर से अकेले में बैठे हुए उन्हें क्या याद आ गया होगा ? " लेकिन सोचते-सोचते मैंने बेल बजा ही दिया, बेल बजते ही अंदर से रोने की आवाज़ बंद हो गई। तब मैंने दूसरी बार बेल बजाया, तब जाकर आंटीजी ने दरवाज़ा खोला। 

        मैंने आंटीजी से कहा,  "आंटीजी आप क्या कर रही हो ? मैं कब से डोर बेल बजा रही हूँ, मैंने आज गाजर  का हलवा बनाया है, वही देने आई हूँ, सोचा इसी बहाने आप से बातें भी हो जाएँगी ज़रा चख़ के तो बताइए कैसा बना है गाजर का हलवा ? " ( आंटी जी को गाजर के हलवे का डिब्बा देते हुए ) 

         लेकिन हेमा आंटी तो मेरी बात सुनकर फिर से फूट-फूट कर रोने लगी। उनको हँसाने के लिए मैंने हेमा आंटी से फ़िर से कहा, " क्या हुआ आंटी जी ? क्या आपको गाजर का हलवा पसंद नहीं ? आपको कुछ और चाहिए था ? मुझे क्या  पता ? अच्छा चलो, ठीक है, इसे कचरे के डिब्बे में फेंक देती हूँ । 

        मेरी बात सुनते ही हेमा आंटी ने मेरे हाथ से डिब्बा छीन लिया और कहा, " अरी पगली किस ने कहा तुझसे, कि मुझे गाजर का हलवा पसंद नहीं है ? " कहते हुए आंटी जी रोते-रोते हँसने लगे और डिब्बे में से हलवा खाने लगे और हलवा खाते-खाते कहने लगे, कि बहुत अच्छा बना है हलवा और दूसरे ही पल हँसते हँसते फ़िर से रोने लगे। उनको रोते हुए देख, मेरी भी आँखें भर आई और मैंने उनको गले लगा लिया। कुछ पल के लिए मैं उनका दर्द महसूस करने की कोशिश करती रही, मगर जिसका दर्द हो वही जाने। 

      आंटी जी का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए मैंने उनसे कहा, क्या हुआ आंटी जी ? आज फ़िर से क्यों अकेले में रो रहे थे ? आपको कुछ चाहिए था ? या आप से किसी ने कुछ कहा क्या ? मगर कुछ देर तक आंटी जी बस रोती ही रही, बहुत समझाने के बाद उन्होंने कहा, कि बेटी, " अब तुम से क्या छुपाना ? तुम्हारे अंकल के जाने के बाद मैं तो जैसे बिल्कुल अकेली पड़ गई हूँ। वो थे तो उनके लिए चाय बनाना, खाना बनाना, कपड़े धोना, मंदिर जाना, बाहर घूमने जाना, इधर-उधर की बातें करना, कभी रुठना-तो कभी मनाना, कभी लड़ना-कभी झगड़ना, कभी खरी-खोटी भी सुनाना, ये सब करते थे और अच्छा भी लगता था। वो थे तो पूरे घर में कितनी रौनक थी, अब एक सन्नाटा सा छा गया है, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मेरी बेटी नैना की शादी यहाँ से दूर बंगलोर शहर में हुई है और वह जाइंट फेमली में रहती है। फ़ोन पर रोज़ बातें तो हो जाती है, मैं चाहकर भी उसके साथ नहीं रह सकती और वो चाहकर भी मेरे पास नहीं आ सकती। तुम्हारे अंकल के बिना पूरा दिन मेरा कैसा भारी सा जाता है, तुम्हें पता नहीं, मैं घर संभालती थी तो वो बाहर का सारा काम, मतलब की बैंक का काम, उनका ऑफिस, बिल भरना, lic का पेमेंट, म्यूच्यूअल फण्ड का पेमेंट, पैसों का सारा हिसाब किताब और भी बहुत कुछ वही सँभालते थे, मुझे उन्होंने कभी कुछ भी नहीं बताया, मुझे जब भी जितने भी पैसों की ज़रूरत होती, बिना कोई सवाल किए मेरे हाथ में रख देते थे। बैंक में जाती हूँ, तो कहते हैं कि आप ऑनलाइन भी सब कुछ कर सकती है अब इस ऑनलाइन के ज़माने में मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा, कि कैसे करूँ सब ? आंटी जी कहते-कहते बस सिर्फ़ रोए जा रही थी।  

           मैं समझ सकती थी, कि हेमा आंटी ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी और ऊपर से इस ऑनलाइन के ज़माने में एक अकेली औरत के लिए यह सब कुछ कितना मुश्किल हो जाता है इसलिए मैंने उनको दिलासा देने की कोशिश करते हुए कहा, कि ओफ्फो आंटी ! बस इतनी सी बात और इतनी सी बात के लिए आप इतना रो रही हो, मुझसे कह दिया होता, क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ ? क्या अंकल जी मुझे अपनी बेटी से कम समझते थे ? 

          मेरी बात सुनकर आंटी जी ने कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम्हारा अपना भी तो घर है, पति है, ऊपर से तुम ऑफिस भी तो जाती हो, कितनी सारी ज़िम्मेदारी है तुम्हारे ऊपर तो और ऊपर से मैं तुम्हारी ओर तक़लीफ़ बढ़ाना नहीं चाहती।

        मैंने कहा, तक़लीफ़, उस में क्या तक़लीफ़ ? मैं तो यह सब चुटकी बजाते कर लेती हूँ। तभी उनकी आँखें, मेरी ओर शर्म से फ़िर झुक जाती है, मैं तुरंत ही उनकी परेशानी समझ गई और कहा, कि " मेरे कहने का मतलब यह है, कि अगर मैं यह सब आसानी से कर लेती हूँ, तो आप भी तो यह सब कुछ कर ही लेंगे ना, उस में कौन सी बड़ी बात है, मैं आपको सब कुछ सिखा दूँगी। "

        तब आंटी जी ने कहा, कि " मगर बेटी मुझे तो अंग्रेजी आती भी नहीं है। " 

        मैंने कहा, " तो क्या हुआ ? आप नहीं जानते मोबाइल में आप हिंदी में सब लिख-पढ़ सकते हो। "

  आंटी जी ने कहा, " क्या सच में ऐसा होता है ? "

       मैंने कहा , " क्यों नहीं ? आज कल सब कुछ घर बैठे ही हो जाता है, आपको किसी चीज़ के लिए बाहर जाने की ज़रूरत नहीं। "

      आंटी जी ने कहा कि " मगर मुझे फ़िर भी बहुत डर लग रहा है, गलती से अगर कुछ गड़बड़ कर दी, मैंने तो ? "

      मैंने कहा, " तब भी कुछ नहीं होगा, अगर कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो मैं देख लूँगी। अब आपको सब कुछ सिखाने की ज़िम्मेदारी मेरी। "

        आंटी जी ने कहा, " मगर बेटी, तुम अब भी समझ नहीं रही हो, मेरे लिए यह सब बहुत मुश्किल है। "

         मैंने कहा, "  मैं सब समझ रही हूँ, आप क्या कहना चाहती हैं लेकिन आप कोशिश तो कर ही सकती है ना ? अगर नहीं आया, तब भी कोई बात नहीं, हम कुछ और सोचेंगे, मगर आप शुरू तो करो। "

      आंटी जी ने कहा, "  मगर बेटी... "

       मैंने कहा, " अगर मगर कुछ नहीं, देखिए आंटी जी, मैं आपको समझाती हूँ, जैसे कि मेरे लिए ऑफिस का काम करना, या ऑनलाइन मोबाइल पर सब कुछ करना जितना आसान है, उतना ही आसान आप के लिए खाना बनाना है, है ना ? मुझे भी शादी से पहले कहाँ खाना बनाना आता था। धीरे-धीरे सब सीख लिया। फ़िर भी अब भी मुझ से आप के जितना अच्छा खाना बनाना और आप को जितनी dishes बनानी आती है, मुझे नहीं आती। आप जैसा घर सँभालती आई है, वह सब मेरे लिए आज भी मुश्किल ही है, मगर जैसे-तैसे कर ही लेती हूँ, इसी बजह से कई बार मेरे और रितेश के बीच में झगड़ा भी हो जाता है, but its ok, हो जाता है। दूसरे दिन हम दोनों एकदूसरे को सॉरी भी बोल देते है। तो आप भी तो ये सब सीख ही सकती है, ना ? ज़्यादा नहीं तो थोड़ा बहुत समझ में तो आएगा। इस से आपको बार-बार किसी और पर निर्भर भी नहीं रहना पडेगा, अगर आप अपना सब कुछ जब खुद सँभालने लगेंगे, तब आप को भी बहुत अच्छा लगेगा, देख लेना। अब रोना बंद कीजिए और बताइए हलवा कैसा बना है ? वैसे सच बताना। "

        आंटी ने कहा, " हलवा सच में अच्छा बना है, मगर इस में थोड़ी शक्कर ज़्यादा हो गई है और अगर इस में तुम मावे के साथ थोड़ी मलाई भी डालती तो इसका स्वाद और भी अच्छा आता, लेकिन यह भी चलेगा। "

   कहते हुए आंटी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। 

        मैंने कहा, " देखा ना, आंटी, आप खाने के बारे में कितना अच्छे से जानती हो, आपको हलवा चखते ही पता चल गया, कि हलवे में मैंने मलाई नहीं डाली। तो वैसे ही आप भी सब कुछ सीख जाओगी। मुझे तो शायद इतना वक़्त ना मिले मगर मेरी एक पहचान में रूपा आंटी है, जो आप ही की तरह हाउस वाइफ है, मगर उसे यह सब कुछ उसके पति ने ही सिखाया है, तो मैं उनसे कह दूँगी, वो दोपहर को या जब भी उनको वक़्त मिले यहाँ आकर आप को सब सिखा देंगे।  इसी बहाने आपका वक़्त भी थोड़ा कट जाएगा और आप की एक नई दोस्त भी बन जाएगी। वैसे भी वह रूपा आंटी भी बहुत अच्छी है और वह बातें तो मुझ से भी ज़्यादा अच्छी करती है। " 

        मेरे कहे मुताबिक रूपाने आंटी जी से कुछ ही दिनों में दोस्ती कर ली और आंटी जी को ऑनलाइन सब कुछ मोबाइल में सिखा भी दिया, माना कि उनको यह सब सिखाने और समझाने में बहुत ज़्यादा वक़्त लग गया और उनसे कई बार ग़लतियाँ भी हो जाती हैं मगर सीखना भी तो ज़रूरी है। अंकल जी के पेंशन से उनका घर चल जाता है और अंकल जी ने म्यूच्यूअल फण्ड में भी आंटी के नाम बहुत पैसे जमा कर रखे हैं, घर भी आंटी जी के नाम ही है, तो अब आंटी जी पूरा दिन घर में न रहकर घर का काम ख़तम कर मंदिर जाती है, योगा और मैडिटेशन क्लास ज्वाइन कर लिया है, ऑनलाइन सब पेमेंट भी कर लेती हैं । अकेले हैं, मगर खुश रहते हैं, सब की मदद करते है। 

       यह तो अच्छा हुआ, कि धीरे-धीरे हेमा आंटी ने वक़्त रहते सब कुछ सीख लिया, मगर इस दुनिया में और भी कई ऐसी औरतें होंगी जिन्हें इन सब के बारे में कुछ पता नहीं और वह इस बात को लेकर शर्मिंदगी महसूस करती होगी और यह सब कुछ नहीं आने की वजह से उनको अपनी ज़िंदगी में कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता होगा। मैं ये अच्छे से समझ सकती हूँ, कि यह सब एक औरत के लिए बहुत ही मुश्किल है, मगर वक़्त रहते सब कुछ सीख लेना ही समझदारी है। क्योंकि किसी के चले जाने से हमारी ज़िंदगी तो रूकती नहीं, हमें तो अपनी आगे की ज़िंदगी उन्हीं बीती हुई यादों के सहारे गुज़ारनी ही पड़ती है। चाहे हम चाहे या ना चाहे।          तो दोस्तों, इस कहानी से मैं बस सिर्फ़ यही कहना चाहती हूँ, कि इस बदलते ज़माने में या कहूँ तो मोबाइल और ऑनलाइन के ज़माने में हर एक को यह सब सीख लेना बहुत ज़रूरी है, पता नहीं क्या कब हो जाए ? पता नहीं कौन, कब अपना रंग बदल दे ? इसलिए किसी और के लिए नहीं तो अपने लिए वक़्त रहते सब कुछ सीख ही लेना चाहिए। 

       


                  
                     21 )  नौक झौंक

        मेरे दादा और दादी, इन के जैसा इस दुनिया में ना कोई है और ना कोई होगा। वैसे देखा जाए तो दोनों सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ एक दूसरे से झगड़ते ही रहते है, उन दोनों के बीच मीठी नौक ज़ौंक चलती ही रहती है, सुबह से मेरा चश्मा कहा है, मेरी दवाई कहा है, पूजा की थाली में आज फूल नहीं तो कल दिया नही है, चाय में शक्कर कम क्यों है, घुटनों में दर्द है, चला नही जा रहा फिर भी मंदिर तो जाना ही है, शाम को दोस्तों से मिलना तो है ही। सुबह हुई नहीं और दादा और दादी की नाैक झौंक शुरू। मैं अपनी किताब में मुँह छुपाकर दोनों की नौक़ झौंक देख सुन लिया करती और मन ही मन मुस्कुराया करती। एक तरफ मेरे मम्मी और पापा को ऑफिस जाने की जल्दी होती है, तो वह भी चिल्लाया करते, मम्मी और पापा दोनों बहुत टेंशन में रेहते, उन दोनों के बीच नौक झौंक नहीं बल्कि झगड़ा होता रहता फिर दादा जी आवाज लगाकर दोनों को चूप करा देते, फिर दोनों मुँह फुलाकर ऑफिस चले जाते।
           लेकिन आज सुबह से घर का माहौल कुछ ओर ही है, नाहीं कोई नौक झौंक नाहीं कोई आवाज़। सुबह से आज दादी लाल साड़ी पहने, लाल चूड़ी, गले में बड़ा मंगलसूत्र, माथे पे लाल बिंदी, हाथों में मेंहदी, बालों में वेणी, सज धज के दादी तैयार होकर मंदिर जा रही थी, दादा जी भी अपने नए कुर्ते में जच रहे थे, मुझ से रहा नहीं गया, आख़िर मैंने पूछ ही लिया, " क्या बात है दादीजी, आज आप इतने तैयार क्यों हुए हो, आज कुछ है क्या ? " दादी थोड़ा मुस्कुराई, पीछे से दादाजी ने मेरी बात सुन ली और कहा कि, " हा बेटा, आज तो बहुत बड़ा दिन है, आज तेरी दादी ने कड़वा चौथ का व्रत जो रखा है, मेरी लंबी उम्र के लिए, पता नहीं और कितना जीना पड़ेगा तेरी दादी के साथ ? कुछ दिनों से वैसे भी इसकी तबियत कुछ ठीक नहीं है, इसलिए मैंने कहांँ इस बार व्रत मत रखो, लेकिन यहाँ पर मेरी सुनता कौन है ? इतने सालों से जो कर रहे है, वह करना ही है, फिर चाहे जो भी हो जाए। " कहते हुए दादाजी दादी को देखने लगे ।
     उस तरफ़ दादी जी ने कहा, "आपको तो मैं कुछ भी करु, पसंद ही नहीं, हर बात में रोकना और टोकना, आपकी आदत ही है।"
       दादाजी ने कहा, " हा, और हर बार अपने मन की ही करना, तुम्हारी भी तो आदत हो गई है। "
      मुझे दोनों की बात सुनकर मन ही मन हसी आ रही थी । मैंने बात को संँभालते हुए कहा, " चलो कोई बात नहीं,अब व्रत रख ही लिया है, तो हँसी खुशी करते है, आज कोई नौक झौंक नही। " दादा और दादी भी मेरी बात सुनकर हस पड़े, वैसे तो दोनों को एक दूसरे के बिना बिलकुल नहीं चलता, दोनों में इतना प्यार है, लेकिन कभी भी जताएंँगे नही।
       देखते ही देखते रात हो गई, पूजा की सारी तैयारी दादी ने कर ली थी, चांँद को देखा और फिर चरनी में से दादा जी को, मुस्कुराते हुए देखा, फिर दादाजी ने दादी को पानी पिलाया और दादी ने दादा जी को। दादी ने कहा, " चलो अब साथ मिलके खाना खा लेते है, सब आपकी पसंद का खाना बनाया है, मेरे साथ सुबह से आपने भी तो कुछ नही खाया है, फ़िर  दोनों ने पहला निवाला एक दूसरे को खिलाया फिर मुस्कुराते हुए खाना खाया, ऐसा प्यार था मेरे दादा और दादी का। 
      आज कई सालों बाद मैं अपने मोबाइल में उनकी वीडियो देख रही थी, जो मैंने कड़वा चौथ के दिन दादा और दादी की बनाई थी। देखकर ऐसा लगा, कि जैसे आज भी दादा-दादी और उनका प्यार और प्यार भरी नौक झौंक मेरे पास, मेरे साथ ही है, अब तो वह दोनों नहीं रहे मगर उनके जैसा प्यार मैंने आज तक कहीं देखा या सुना नहीं। दिल कहता है, वह दोनों जहाँ भी हो साथ हो, खुश हो।

                 22 )   तेरी माँ

      ज़िंदगी में कई रिश्तें ऐसे होते हैं, जिनके अचानक से यूँही दूर चले जाने के बाद भी, जैसे हम हर पल उन्हीं के साथ रहते हैं और फ़िर ज़िंदगी जीने के लिए उनकी प्यार भरी यादें ही हमारे पास रह जाती हैं और बस अब उन्हीं यादों के सहारे जिंदगी गुज़ार देनी पड़ती हैं।
      ( रमा का २१ साल का बेटा, जो अचानक से एक कार एक्सीडेंट में गुजर जाता है, उसको गुज़रे हुए आज 5 साल बीत गए, मगर उस लड़के की माँ को आज भी उसके आने का इंतजार है, ज़िंदगी तो चल रही है, मगर उसकी माँ का वक्त आज भी वहीं थम सा गया है। उस माँ की आँखों में जैसे आज भी फरियाद है।)
       अगर तू आज भी मेरे पास होता, मेरे साथ होता, तो ज़िंदगी कुछ और ही होती, मगर खैर, तू नहीं तेरी यादें ही सही, इस बार तेरी माँ ने तुझे आज़ाद किया हर बंधन से, इस जन्म नहीं तो अगले जन्म, ये सवाल मेरा रहेगा, " आखिर तू मुझे छोड़कर गया ही क्यों ? "
          तेरी माँ के लिए एक बार आजा, जिसकी आँखें आज भी तुझे ही ढूँढ रही, अपने घर के दरवाजे पर, जैसे तू अभी घर आएगा और अपनी माँ को आवाज़ लगाएगा, " माँ मुझे बहुत भूख लगी है, खाने में क्या बनाया है ? " क्योंकि घर में जब भी कुछ अच्छा बनता था, तब सब से पहले वह तू ही चख कर बतलाता था, " माँ, क्या गज़ब खाना बनाती हो आप, आप के हाथों में तो जादू है जादू। " फ़िर तेरे कपड़े इधर उधर बिखरे पड़े होते हैं, उसे समेटते जाना और बड़बड़ाना, " अपनी चीज़ें कब तू संभाल कर रखना सीखेगा, घर पर आते ही सारा घर उलट सुलट कर देता है, फ़िर आवाज लगाता रहता है, माँ मेरा चश्मा कहां है, मेरे जूते कहाँ है, मेरा हेडफोन कहाँ है ? " अब तो वह आवाज़ लगाने वाला भी कोई नहीं, तेरी ही आवाज मेरे कानों में जैसे गूंजती रहती हैं। प्यार से जब तू अपनी माँ को गले लगाता है, अपनी माँ को परेशान करता है, अपनी माँ के लिए पापा से भी लड़ जाता है, अपनी बहन को चिढ़ाता रहता है, कहते हुए कि " माँ तुझ से ज़्यादा मुझ से प्यार करती है, तुझे तो एक दिन अपने ससुराल भेज देगी, मगर मैं तो माँ के पास और माँ के साथ ही रहूँगा, तुझे तो एक दिन जाना ही है, फ़िर तू क्यों चला गया मुझे छोड़कर? " 
     होली, दिवाली, गणपति या नवरात्रि सब त्योहार हम आज भी मनाते हैं और हाँ हर त्योहार में घर का सारा सामान लाना, सारा काम तू ही तो संभालता था, अब वह सब भी मुझ अकेली को ही करना पड़ता है, तुम्हारे पापा तो पहले से ही कम बातें करते थे, अब तो तेरे जाने के बाद और भी ज़्यादा कम बोलते है, जब भी वक्त मिले कोई नॉवेल पढ़ने बैठ जाते है और ऊपर से कह देते है, " जब मैं नॉवेल पढ़ने बैठु, मुझे डिस्टर्ब मत किया करो। " और तो और कहीं पर जाना हो, तो क्या पहनू और क्या नहीं ? वह भी तू ही तो बतलाता था। तेरे पापा की समझ में कुछ आता नहीं और वह कुछ बतलाते भी नहीं, ऐसे में अब तू ही बता, किस से पूछूं और किस से में अपने मन की बात कहूँ ? तेरी बहन ने जैसे तैसे अपने आप को संभाले रखा है, अब तो वह ही मेरी हिम्मत बनकर मुझे संभाल लेती है,  मेरी हर तरफ़ बस तू ही तू था, मेरी जिंदगी भर की पूंजी भी तू ही था, मेरे जीने का सहारा भी तू ही था,          
       " मेरी जिंदगी के दो किरण, तू और तेरी बहन, जैसे एक मेरा दिल और एक धड़कन, जिस के लिए था जीना, मगर लगता है अब तो जैसे दिल से धड़कन जुड़ा हो गई है, बस जीने के लिए जी रहे हैं। कभी आँखों में सजाए थे ढ़ेर सारे सपने मगर अब तो इन पलकों में तेरे बिना नींद ही कहाँ ?  तब रात को अकेले में तेरी तस्वीर से लड़ लेती हूँ। इसलिए तेरे बगैर सब त्योहार फीके से लगते हैं, रंगों से भरी हमारी ज़िंदगी तेरे जाने के बाद बेरंग सी हो गई है, सब कुछ है जिंदगी में बस एक तू ही नहीं, ऐसा क्यों ? दुनिया का हर ग़म में सह जाऊँ, मगर बस एक यही मेरी बर्दास्त के बाहर है, कुछ भी छीन ले भगवान, तेरी माँ कोई शिकायत नहीं करती, सब चुपचाप सह जाती, मगर, खैर की भगवान के आगे किस की चलती है ? तेरा मेरा साथ इस जन्म में इतना ही होगा, मगर अब भी जो आधी बात या मुलाकात रह गई, वह हम पूरी करेंगे जरूर, इस जन्म नहीं तो कोई और जन्म, मुझे पक्का यकीन है,  हम मिलेंगे जरूर, कहीं किसी रोज़, कहीं किसी डगर, राह चलते। इस बार मुझे तुम्हारी गोदी में सिर रख कर सोना है, एक बार गले लगाना है, तुझ से शिकायत करनी है, कि आख़िर " एक बार भी तूने हमारे बारे में नहीं सोचा बेटा, कि तेरे जाने के बाद हमारा क्या होगा ? बिन तेरे हम कैसे जिंदगी जिएँगे ? तेरे लिए मैं भगवान से भी इस बार लड़ जाती, मगर तूने तो मेरे आने का इंतजार भी नहीं किया और मुझ से बिना मिले, बिना बातें किए चला गया और तू तो कहता था, हर पल मेरे साथ रहेगा, तो अब क्या हुआ ? "
       माना कि बरसात के मौसम में छाते के बिना घर से निकलेंगे तो भीगना तो पड़ेगा ही, मगर मेरा मन तो तेरी यादों की बारिश में हर पल भीगा रहता है, उसका क्या ? 
           फिर भी तेरी माँ दिल से आज भी तेरे लिए यही प्रार्थना करती है, " तू जहाँ भी रहे खुश रहे। " 
      तेरी माँ जो आज भी तेरे इंतजार में आरती की थाली लिए, आँखों में ढेर सारे सपने सजाए, घर के दरवाज़े पर खड़ी है, कि शायद आज तू आ जाए। इसलिए लोग मुझे कई बार पगली भी कह देते है ! मगर इस पगली माँ को तेरे लिए पगली कहलाना भी मंजूर है, अगर तू एक बार आ जाए।

मौलिक
तेरी माँ 

                23 ) अरमान ज़िंदगी के

          आज मेरी शादी की पांचवी सालगिरह है, सब लोग मुझे शादी की सालगिरह की बधाइयां दे रहे है मेरे वॉट्स अप, फेसबुक, इंस्टा पर भी सभी दोस्त और रिश्तेदारवालों के मैसेज आ रहे है, बस मैं इसी मैसेज और लोगों की बधाई सुनकर खुश हो जाया करती, लेकिन आख़िर पता नहीं कब तक ऐसा चलता रहेगा, कब तक अपने मन को मैं बस यूहीं मनाती रहूंगी, आखि़र कब तक ? तभी मेरे पति कमरें में आते है, एक नज़र उन्होंने मुझे सिर्फ़ देखा, या अनदेखा किया और अलमारी में से अपनी फाइल लेकर ऑफिस के लिए जाने लगे, मैं बस उन्हें जाता देखती रह गई, जाते वक्त उन्होंने सिर्फ़ इतना ही कहा, कि " मैं ऑफिस जा रहा हूँ, रात को देर से आऊंगा, मेरा खाने के समय इंतजार मत करना, मैं बाहर खाकर आऊँगा। "
           बस इतना सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन ही सरक गई। क्योंकि देर से आने का मतलब आज वह फ़िर से अपने दोस्तों के साथ शराब पीकर आऐंगे, अपने बीते हुए कल और अपने दर्द को भुलाने के लिए, मगर यह सिर्फ़ मैं ही जानती हूँ, कि चाहे वह अपने बीते हुए कल को भुलाने की कितनी भी कोशिश कर ले, मगर यह कभी नहीं होगा, कि वह अपनी पहली पत्नी को भुला पाए, जो शादी के एक साल बाद ही कैंसर की वजह से भगवान के पास चली गई और यहीं पत्नी किसी ज़माने में उनकी प्रेमिका भी हुआ करती थी।
          आप सोच रहे होंगे, कि तो फ़िर इस प्रेम कहानी में, मैं यहां क्या कर रही हूँ ? गरीब घर की सुंदर, सुशील और संस्कारी लड़की, जो अपने पिता का बोझ कम करने के लिए शादी के लिए राज़ी तो हो गई मगर शादी की सुहाग रात की रात ही मुझे मेरे पति ने के कह दिया, कि " तुम्हें मेरे घर में किसी चीज़ की कोई कमी नही होंगी, तुम्हें हर वह हक मिलेगा जिसकी तुम हकदार हो, मगर यह शादी मैंने सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी माँ की खुशी के लिए ही की है, उसको तुम इस बात का एहसास कभी मत होने देना की हम दोनों के बीच पति पत्नी जैसा कोई रिश्ता नहीं है, बस उसको तुम खुश रखने की कोशिश करना, मैं अपनी पत्नी धारा से बहुत प्यार करता था और करता रहूंगा, इसलिए मैं तुम्हें अपनी पत्नी का दरज्जा शायद ही कभी दे पाऊं, बस मैं जो हूँ, जैसा भी हूँ, तुम्हारे सामने हूँ, मैं तुमसे सच नही छुपाऊंगा। "
        बस इतना सुनते ही मेरे अपनी ज़िंदगी के सारे अरमान चकनाचूर हो गए, मेरी ज़िंदगी के सारे सपने काँच के टूटे हुए शीशे की तरह टूट के बिखर गए, बस तब से एक बेटी का फर्ज़ निभा रही हूँ, जिसकी और भी दो बहनें है, जिसकी अब शादी हो जाएगी, जिस शादी का सारा ख़र्चा मेरे पति उठा लेंगे। मेरे माँ और बाबा का सारा खर्चा भी मेरे पति ही उठाते है, बिना कहे, बिना मांगे ज़रूरत का हर सामान मेरे घर पहुँच जाता है। बस यही सोचकर खुश हो जाती हूँ, कि कोई बात नहीं, मेरी वजह से मेरी बहन और माँ-बाबा तो खुश है।
        अपनी शादी और अपने पति को लेकर एक लड़की के कितने अरमान होते है, ये तो हर कोई जानता ही है, मगर मेरे अरमान पूरे नही हुए तो क्या हुआ, मेरी बहन तो आज खुश है। इस से आगे मुझे और कुछ नहीं चाहिए, यही सोचकर मैं खुश रहती हूँ और हां, घर में अब माँ को उनके पोते का अब इंतजार है, तो मैंने और मेरे पति ने एक अनाथ बच्चे को गोद ले लिया, माँ को हम ने समझा बुझाकर इस बात के लिए भी मना लिया, मगर माँ तो आख़िर माँ ही है, उसके आगे कहा कुछ छुप सकता है, उसे इस बात का अंदाजा भी लग गया, कि हमारे बीच पति पत्नी का कोई रिश्ता नहीं, फिर भी उम्मीद लगाए हुए है, कि किसी दिन यह रिश्ता भी बन ही जाएगा। मैं भी इसी उम्मीद लगाए उस दिन के इंतज़ार में बैठी हुई हूँ, कि " एक ना एक दिन उनको भी मुझ ग़रीब पर प्यार आ ही जाएगा, औरों की तरह हम भी किसी रोज़ झिल के किनारे बैठ कर एक दूजे का हाथ पकड़कर प्यार भरी बातें करेंगे और किसी रोज़ मेरे भी दिल के सारे अरमान सच हो जाएंगे, कहीं किसी रोज़, किसी किनारे। " 

मौलिक कहानी 

                   24 ) वादा राखी का 

          डॉली का घर आज सुबह से सजाया जा रहा था, जैसे दिवाली में घर सजाते है। डॉली के माँ-पापा और डॉली की भाभी, सब लोग आज बहुत ही खुश थे। डॉली ने अपनी माँ को चिढ़ाते हुए कहा, " वाह, मम्मी क्या बात है, आज रसोई से सुबह से ही बहुत ही अच्छी-अच्छी खुशबु आ रही है। वाह ! रस-मलाई, फ्रूट-सलाड, कचोरियाँ, समोसे, पनीर की सब्जी, छोले-भटूरे, पराठा, पापड़, अचार, पूरी, साथ में पुरण पूरी भी... आज से दो दिन पहले जब मैंने बोला था, कि मुझे समोसे खाने का बड़ा मन कर रहा है, तब तो आपने कहा, कि आज मैं बहुत थक गई हूँ, फ़िर कभी बना लुंँगी और देखो, आज भैया के आने की ख़ुशी में इतने सारे पकवान... बहुत अच्छे... 

        माँ ने इतराते हुए कहा, " मेरा लाडला बेटा, दो साल बाद घर आ रहा है, तो उसके आने की ख़ुशी क्या तुझे नहीं है ? " 

         डॉली ने कहा, " मैं तो मज़ाक कर रही थी, माँ। " तभी डॉली की भाभी अपने कमरे से तैयार होकर बाहर आती है, उसे देखकर डॉली उसे भी चिढ़ाने लगी, " अरे वाह, भाभी आज तो आप क़यामत ढा रही है, भैया कहीं आपको देखते ही बेहोश ना हो जाए ? " 

       भाभी शरमाते हुए कहती है, " चल हट पगली, क्यों मुझे हर बार छेड़ती रहती है। " डॉली ने मन ही मन गौर किया, कि आज सच में भाभी के चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। डॉली के पापा सुबह जल्दी ही मंदिर जाके आते है और साथ में घर का ज़रूरी सामान भी लेकर आते है। डॉली भी वैसे आज बहुत खुश थी, क्योंकि आज दो साल बाद उसका बड़ा भाई घर वापस जो आ रहा है, तो सब की ख़ुशी दो गुनी तो होगी ना। वह भी राखी के दिन। 

      उस तरफ़ डॉली का बड़ा भाई विजय अपने देश के लिए लड़ रहा था, वहांँ युद्ध में उस वक़्त गोलियांँ दोनों तरफ़ से आमने-सामने लगातार चल रही थी, विजय अपनी जान की परवाह किए बिना वहांँ से बच्चों और औरतों को किसी सुरक्षित जगह पर भी ले जा रहा था, ताकि उन्हें कहीं दुश्मन की गोलियांँ ना लग जाए। 

       दूसरी तरफ़ विजय ने किसी भी तरह आज राखी के दिन घर आने का वादा अपनी बहन, पत्नी और माँ-पापा से किया था। इसलिए घर में सब विजय के विजय होकर लौटने के इंतज़ार में ही थे। डॉली के पापा सुबह से महा मृत्युंजय का जाप कर रहे थे, सब के मन में एक अजीब सी ख़ुशी और डर भी था। इसलिए डॉली सब को खुश रखने की कोशिश में थी और उसे भरोसा था अपने भाई पर और उनके किए वादे पर, कि आज वह ज़रूर आएँगे। डॉली भाभी को बार-बार चिढ़ा रही थी, मम्मी को सत्ता रही थी, मगर अंदर ही अंदर डॉली का खुद का मन भी रो रहा था और अपने भाई को पुकार रहा था, कि " आज तो चाहे कुछ भी हो जाए, आप को आना ही है और अपना वादा निभाना ही है। "

       देखते ही देखते सुबह से शाम और शाम से रात हुई, मगर विजय भैया की आने की कोई खबर नहीं थी। ( ये उस वक़त की बात है, जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे।)  रात के तक़रीबन १० बजने वाले थे, घर में किसी ने सुबह से ठीक से खाना भी नहीं खाया था, सब की नज़रें दरवाज़े पर थी, कि कब विजय घर आ जाए। 

       कुछ देर के इंतज़ार के बाद घर के दरवाज़े की घंटी बजती है। डॉली भाग के जाती है और दरवाज़ा खोलती है, दरवाज़ा खोलते ही देखा, तो तीन फौजी अपनी वर्दी में दरवाज़े के बाहर खड़े थे। मगर उनके साथ विजय भैया ही नहीं थे। डॉली आगे पीछे नज़र करते हुए सिर्फ़ अपने भैया को ही ढूँढ रही थी। उन तीन फौजी को देख़ घर में सब के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। तभी उन में से एक फौजी ने भैया की बैग आगे करते हुए कहा, कि ये विजय की बैग और... इतना सुनते ही, उसी वक़्त पीछे खड़ी विजय की माँ वही रखीं कुर्सी पर जैसे गिर के अपना दिल थाम बैठ जाती है, विजय की पत्नी जिस खम्भे के पास खड़ी थी, उसी खमभें को उसने अपने दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया, विजय के पापा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर आँसू के साथ भगवान् से एक बार और प्रार्थना की, विजय की बहन तो वही पर खड़ी-खड़ी अपनी आँखें बंद कर चकराके गिरने ही वाली थी, कि तभी उन तीनों फौजी के पीछे से विजय ने बाहर निकल कर ज़ोर से आवाज़ लगाई, सरप्राइज.... ! और विजय ने खुद ही अपनी बहन को गिरते हुए सँभाल लिया। विजय को अपनी आँखों के सामने देख सब की आंँखें ख़ुशी से भर आई। डॉली तो विजय से छोटी बच्ची की तरह रोके, लिपट कर, नाराज़ होकर, झगड़ पड़ी और कहने लगी, " ऐसा भी कोई मज़ाक करता है भला, मेरी तो जान ही निकल गई थी, जाओ अब मैं आप को राखी नहीं बाँधूँगी। " डॉली अपना मुँह फुलाकर पलटकर खड़ी रह गई।

       विजय ने अपनी बहन डॉली से मज़ाक करते हुए कहा, कि  "अच्चा, तो मैं फ़िर से यहाँ से चला। " तभी विजय की माँ ने आके ज़ोर से विजय के कान खींचे और कहा, अब तक तेरी शैतानी  करने की आदत नहीं गई, क्यों ? " 

        विजय अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर उसके गले लग जाता है और अपनी माँ को मनाते हुए कहता है, " अब, माफ़ कर दे माँ, मैं तो बस यूँहीं ! मज़ाक कर रहा था। " तभी विजय की पत्नी भी रोते हुए आगे आकर विजय से लिपट जाती है । विजय के पापा भगवान् से शुक्रियादा कर रहे थे और उनके मंदिर में विजय के लौट ने की ख़ुशी में फ़िर से दिया करने लगे। विजय ने अपने पापा के पास जाकर उनके पैर छूकर  उनका आशीर्वाद लिया और उनके गले लग गया।पापा ने विजय को ढ़ेर सारा आशीर्वाद दिया और कहा, बस सुबह से तेरे ही आने का इंतज़ार था। विजय ने अपनी बहन की ओर प्यार भरी नज़र से देखते हुए कहा, " कैसे ना आता भला ? आज के दिन मैंने बहन से जो राखी का वादा किया था, वह भी तो निभाना था। "

     डॉली ने हँस्ते हुए विजय और उनके साथ आए तीनों फौजी दोस्तों को भी उनकी सलामती के लिए राखी बाँधी और मुँह मीठा कराया। भाई ने अपनी बहन को उसकी रक्षा करने का वचन दिया। उसके बाद हँसी मज़ाक करते हुए सब ने साथ मिलकर खाना खाया। इतना सारा अपनी पसंद का खाना देखकर विजय बहुत खुश हो गया, उसकी आँखें भी ख़ुशी से भर आती है और आज उसने सच में दबा के खाना खाया और सब ने रात भर बैठ के बहुत सी बातें की, विजय बिच-बिच में आज युद्ध में क्या-क्या हुआ ये सब भी कहता गया, तब सब के दिल की धड़कन दो पल के लिए फिर से रुक जाती है।         

          तो दोस्तों, आज के दिन मैं सिर्फ अपने भाई के लिए नहीं बल्कि हर बहन के भाई के लिए और हर उस देश के जवान के लिए प्रार्थना करती हूँ, जो अपना सब कुछ छोड़ के देश की सेवा में जिन्होंने अपना सब कुछ समर्पण किया है, कि वे जहाँ भी रहे स्वस्थ और तंदुरस्त रहे, उनको कभी किसी की बुरी नज़र ना लगे वे देश के हर युद्ध में जीत के आए और वे दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करे....  

                             


                                                     

               25 )  भाई  बहन

               मुझे आज भी याद है, 

बचपन में मुझे झूले में झुलाना, रातो को अगर मुझे नींद ना आए तो गाना गा के मुझे सुलाना, मेरी चोटी खींच के मेरे पीछे पीछे भागना, मुझे बिल्ली कहकर  बार - बार चिढ़ाते रहना, कभी मैं रोऊँ, तो मुझे हँसाना, कभी मैं रुठु तो मुझे मनाना, मुझे माँ की डांट और पापा की मार से बचाने के लिए खुद पापा से मार खाना, ये कहकर की " गलती दीदी की नहीं हमारी है "  मेरे लिए tution में  teacher से भी लड़ जाना, चुपके से मेरा homework  भी कर देना,  मुझे cycle चलाना सिखाना, अगर मैं गिर जाऊ तो मुझे संभालना, मेरी हर गलती पापा से छुपाना, मेरी हर गलती पर मुझे माफ़ कर देना और " ज़िंदगी में सही और गलत का फ़र्क मुझे समझाना"

       मेरे जन्मदिन पर हर साल कुछ ना कुछ surprise मेरे लिए ज़रूर रहता ही है, भाभी को पसंद हो या नापसंद मेरी favourite  केक और पानीपुरी मुझे मिल ही जाती है, मेरे जन्मदिन पर party ना हो ऐसा कभी नहीं हो सकता। 

       मेरे shoe  की लैस भी बांँध देना, मेरी हर बात को गौर से सुनना, मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं मानना, मुझे पढ़ाना, लिखाना, exam में रातो को मेरे संग जागना, अगर मुझे exam में  कुछ ना आए तो फिर से मुझे वह lesson सिखाना, मेरे लिए अपने दोस्तों से भी भीड़ जाना, मम्मी और पापा से छूप -छूप के  मुझे आइस-क्रीम खिलाना, मेरी बीमारी में मुझे समजा - बुजा के दवाई पीला देना, मुझे college में पढ़ने भेजनें  के लिए पापा को मनाना, पापा को किसी भी तरह पटा कर मेरी college जाने की permission पापा से दिलाना, मेरी शादी के लिए लड़का भी खुद पसंद करने जाना, मेरे लिए भाभी के साथ में नौकझौंक में पड़ जाना, लेकिन हर बार साथ मेरा ही देना ।

        मेरी शादी में मेरे जाने के बाद चुपके से अकेले में रोना, मेरी शादी के बाद भी मेरी हर मुसीबत में मेरे साथ खड़े रहना, भला कैसे मैं भूल सकती हूँ, ऐसा प्यार और ऐसा  मेरा बचपन ? काश कोई मुझे लौटा दे फिर से मेरा बचपन ! 

की मुझे फिर से मेरे भैया झुला झुलाए, गाना गाके मुझे सुलाए, मेरे पीछे पीछे भागे, मुझे चिढ़ाए, मुझे पढाए, मेरे लिए मम्मी, पापा, दोस्त, टीचर सब से भीड़ जाए, काश ! की मुझे कोई लौटा दे मेरा बचपन। 

        बस इस से आगे अब मुझे और क्या चाहिए ? मुझे ज़िंदगी में अच्छा बनने का पाठ  सिखाया, नहीं सिखाया तो बस किसी से झूठ बोलना, किसी से लड़ना, झगड़ना, और बिना मतलब किसी से अपना हक़ मांँगना। 

        राखी तो सिर्फ एक बहाना है, दिल से रोज़ मांँगती हूँ आप दोनों के लिए दुआ, आप दोनों  जहाँ भी रहे, रहे हर पल सलामत, आप दोनों दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करे, आप पर कभी मुसीबतों का साया भी ना आ पाए, 

" मेरी दुवाओ में,

 असर इतना रहे, की 

  मेरे भाई का आँगन,

 हमेंशा ख़ुशियों से भरा रहे। " 

Dedicated to my beloved brothers, 

Rakesh ajmeri 

Hiren ajmeri 

सत्य घटना पर आधारित                                

                 26 )   बेचारे भैया 

         राखी के एक महीने पहले से ही इंतजार लगा रहता है, भाई के फोन का और आज वह दिन आ ही गया, भाई ने फोन पर कहा, कि राखी के लिए तुम को बच्चों को और हमारे प्यारे जमाई बाबू को भी इसबार साथ में लेकर ही आना और वैसे भी बहुत दिन हो गए हैं जमाई बाबू से मिले हुए, इसी बहाने उन से मिलना भी हो जाएगा, मैं आज ही ट्रेन की टिकट सब की बुक करा देता हूँ। मैंने खुशी से मुस्कुराते हुए हाँ कहा और मन ही मन खुश होती रही, कि कई महीनों बाद मायके जाने को मिलेगा। बड़े दिनों बाद भैया और भाभी से भी मिलना होगा।
        भैया ने हम सभी की टिकट्स भी बुक करवा दी, लेकिन मेरे पति को उन दिनों ऑफिस में ज़रूरी काम आ गया, इसलिए वह नहीं आ सके । मेरे पति ने कहा, कि " मेरा इस बार आना मुमकिन नहीं लगता, तो तुम और बच्चे चले जाओ, वैसे भी राखी के त्यौहार में तुम दोनों भाई-बहन के बीच आकर मैं क्या करूँगा । " मैंने तो हमारे जाने की तैयारी कर ली लेकिन जाने के अगले दिन ही पता चला कि किसी वजह से सूरत जाने वाली सभी ट्रेन नवसारी तक ही जाएगी और हमें जाना था मुंबई से सूरत।
     जैसे ही मेरे भैया को ये बात पता चली, उन्होंने तुरंत ही मुझे फोन कर के कहा, कि " तुम फिक्र मत करना, तुम बच्चों सहित नवसारी स्टेशन उतर जाना, मैं वक्त पर तुम सब को लेने नवसारी स्टेशन आ जाऊँगा । " यह सुनकर हमारी तो जैसे टेंशन ही दूर हो गई ।
        भैया स्टेशन लेने आ गए, नवसारी से सूरत का सफ़र भी बड़ा मजेदार रहा, हमारी तो जैसे छोटी सी ट्रिप ही हो गई। आते वक्त रास्ते में मेरे बच्चों को भूख लगी थी, ( मेरा बड़ा बेटा ८ साल का और बेटी ६ साल की ही है । ) तो भैया ने बीच रास्ते गाड़ी रोक सब को फाफड़ा, खमन और जलेबी का मज़ेदार नाश्ता कराया, गाड़ी में गाना सुनते-सुनते कब घर आ गया, पता ही नहीं चला। दूसरे दिन राखी बंधी, भैया ने गिफ्ट में मुझे सुंदर साड़ी और भाभी ने ज्वेलरी दी। फ़िर भाभी ने ढेर सारे पकवान बनाए थे, मन खुश हो गया। शाम को बच्चों ने अपने मामा से ज़िद्द की, कि "आज मामा मूवी देखने जाना है।" तो शाम को भैया- भाभी उनके बच्चे हम सब साथ में "oh my god २" मूवी देखने गए, इंटरवल में बच्चे पॉपकॉर्न, समोसे और पेप्सी के बिना तो मानते नहीं तो वह भी खिलाया, रात को बाहर होटल में ही डिनर किया । मेरे पति को भैया बीच-बीच में फोन कर के बता देते कि " आप भी आते तो मजा आ जाता। " फिर दूसरे दिन बच्चों की ज़िद्द की वजह से फिर से गार्डन में घूमने गए, वहाँ भी बच्चों ने अपने मामा को बड़ा परेशान किया, बलून, कुल्फी, पानीपुरी, भेल पूरी, फालूदा और भी ना जाने क्या क्या मजे से खिलाया। "बेचारे मेरे भैया "। हँसते- हँसते हमारे सारे नखरे उठाए। चेहरे पर उफ्फ तक नहीं आया।                                आखिर में वापस घर लौटते वक्त बच्चों को भी कपड़े, चॉकलेट्स और गिफ्ट दिए। बच्चे तो इतने खुश कि मत पूछो। बाद में उन्होंने हमें फिर से सूरत से नवसारी स्टेशन तक छोड़ा, उस वक्त भी ट्रेन में बीच रास्ते में बच्चों के खाने के लिए, बिस्किट्स, वेफर्स, सैंडविच और भी बहुत सी चीजें दी और हम वापस जाने लगे, उस वक्त ऐसा लगा, जैसे आए थे खाली हाथ, मगर साथ में ढ़ेर सारी यादें और खुशियों की अलमारी लेके जा रहे हो। तब हमारा हाथ पकड़ के भैया ने कहा, कि  " तुम खुश तो हो ना ? मम्मी पापा नहीं रहे तो क्या हुआ, हम तो हैं ना, जब भी तुम्हारा मन मिलने का हो, तब बिना किसी हिचकिचाहट बस एक फोन कर देना, तेरा ये भैया हाजिर होगा और अपने आप को कभी भी अकेला मत समझना। मुझ से जितना हो सकेगा, उतनी मदद मैं तुम्हारी जरूर करूँगा । " उनकी बातें सुनते ही मेरी आँखें भर आई। मैंने भैया से कहा, कि आपने बस इतना कह दिया, मेरे लिए उतना ही काफी है। मेरी भगवान से बस यही प्रार्थना है, कि "आप दिन दुगनी और रात चौगनी तरक्की करे, स्वस्थ और खुश रहे, दुख का बादल आपके और आपके परिवार पर कभी नहीं आए। "
      भाभी ने भी गले लगाते हुए कहा, " हाँ दीदी, आपका जब भी मन करे आ जाया कीजिए , आप से मिलकर मुझे भी अच्छा लगता है, मम्मी जी के जाने के बाद मैं भी एकदम अकेली सी हो गई हूँ । 
     इतने अच्छे भैया-भाभी पाकर मेरा तो जैसे जन्म ही सफल हो गया, भला आज कल के ज़माने में माँ- पापा के चले जाने के बाद कौन इतना अपनी बहन के लिए करता है। मुंबई जाते वक्त पूरे रास्ते में मैं सिर्फ और सिर्फ उनके अच्छे भविष्य के लिए ही प्रार्थना करती रही, दूसरी तरफ़ अपने बच्चों को देखते हुए हँसी आ रही थी, कि " दो-तीन दिन में मेरे बच्चों ने बेचारे मेरे भैया को कितना परेशान कर दिया, कभी ये तो कभी वो।" 😄😃

 
मौलिक कहानी
सत्य घटना पर आधारित 
बेचारे भैया 

                   27 )   वे सब से अच्छें

          शीला के पति अक्सर काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते है, कभी-कभी तो शीला के पति को काम के लिए शहर से दूर भी जाना पड़ता है और शीला को अब इसकी आदत सी हो गई थी। वैसे भी इतने साल साथ रहने के बाद शीला को पता चल गया है, कि उसके पति को काम का नशा है, उसे मेहनत करना अच्छा लगता है और जिंदगी में कुछ कर के दिखाना है, जब तक वह अपनी मंजिल हासिल नहीं कर पाएँगे , तब तक वह चैन से नहीं बैठेंगे, इसलिए शीला अपने पति के काम के बीच नहीं आती। वह जितना हो सके अपनी दुनिया में अपने बच्चों के साथ खुश रहने की कोशिश करती है, अपने सास ससुर की सेवा करती है और वैसे भी वह नाही इतनी पढ़ी लिखी या समझदार है, कि वह घर और बच्चे संभालते हुए साथ में कोई अच्छी सी नौकरी भी करे। 
      एक दिन शीला की सहेली उससे मिलने उसके घर आई, बातों बातों में शीला की बात सुनकर शीला की दोस्त रमा ने कहा, कि " देखो शीला, अपने पति को इतनी छूट देना भी सही नहीं है, माना कि वह काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं लेकिन बाहर अगर किसी लड़की के साथ उनका कोई चक्कर हो गया, तो तुझे कैसे पता चलेगा ? आज कल प्यार और रिश्ता बदलते देर नहीं लगती, पता नहीं कब कौन धोखा दे ? मेरी बात मान तू भी ज़रा सँभल कर रह, अपने पति की तरफ़ भी ज़रा ध्यान दे, घर पर वह आए तो थोड़ा तू भी सज संवर लिया कर, अपने हुस्न के जाल में उसको फँसा कर रख, फिर देख तेरा पति बाहर जाना भूल जाएगा।"
      रमा की बात सुनकर शीला ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी, उसकी हँसी रुक ही नहीं रही थी।
    रमा को बड़ा ताजूब हुआ कि इतनी सीरियस बात सुनकर शीला ज़ोर-ज़ोर से हँसने क्यों लगी ? कहीं ये पागल तो नहीं हो गई ? रमा ने शीला को चुप कराते हुए पूछा कि तू हँस क्यों रही है ? मैंने कुछ गलत कहा क्या ? "
     शीला ने रमा से कहा, सतीश ( शीला का पति ) ऐसा कभी कुछ भी नहीं कर सकता, क्योंकि उसे अपनी ज़िंदगी में अपने काम से ही सब से ज़्यादा प्यार है, शायद मुझ से भी ज़्यादा और रही बात किसी लड़की की उसकी ज़िंदगी में आने की, तो वह मेरे साथ ही जैसे तैसे रात को साथ में सोने के लिए के लिए राज़ी होते हैं तो किसी और के साथ क्या करेंगे ? उसके सिर पर काम का ऐसा भूत सवार है, कि उसके आगे वह दिन और रात भी नहीं देखते। हम दोनों का रिश्ता बाकी लोगों से ज़रा हटके है, हम एक दूसरे को वह जो है, जैसा भी है उसी हाल में उसे प्यार करते हैं, हमारे लिए ये जरूरी नहीं, कि मैं उनके लिए सज-धज के उसका मन बहलाऊँ , उसको अपनी साड़ी के पल्लू से बाँध के रखूँ, नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि मेरा ये मानना है, कि चाहे आप कुछ भी कर लो, किसी के शरीर को आप जरबरदस्ती बाँध के रख सकते हो, मगर उसके मन को आप नही बाँध सकते, वह इंसान आप के साथ जरूर होगा, लेकिन उसका मन तो कहीं और ही होगा। तो अगर आप के पति का मन ही आप के पास नहीं होगा तो शरीर को बांध कर रखने से क्या फायदा ? हम ने तो प्यार उसके मन से किया है, जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें चाहता है, भले ही वह कुछ कहते नहीं मगर मैंने अपने मन की आँखों से उस प्यार को देखा है, महसूस किया है, और मेरा तो ये भी कहना है, कि जैसे तू बता रही है, कि अपने पति को खुश रखने के लिए और उसे अपना बनाए रखने के लिए सजना सँवरना, नैन मटका जरूरी है, तो क्या कोई पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कभी ऐसा कुछ करता है क्या ? मैंने तो ऐसा कभी नहीं देखा या सुना। तो फिर हम ही क्यों ? 
          मेरे लिए वह अपने आप को नहीं बदल सकते तो उनके लिए मेरा भी अपने आप को बदलना उतना ही मुश्किल है। अगर प्यार करना है, तो हम जैसे हैं जिस हाल में उसी रूप में प्यार करे, वही सच्चा प्यार, वक्त रहते प्यार और उसके साथ रिश्ता बदल जाए, तो उस रिश्ते को फिर आप जितना भी बाँध ने की कोशिश करो, वह रिश्तों की डोर कच्ची ही रहती है, और उसके टूटने का डर हर वक्त लगा रहता है, जैसा शायद तुमने अपने रिश्ते में महसूस किया होगा, तभी तू मुझे बता रही है। तो उस में भी कोई गलत बात नहीं तू अपनी जगह सही है और मैं अपनी जगह, बस हमारे प्यार करने का तरीका ज़रा हटके है। मैंने सतीश को उसकी ज़िंदगी उसके तरीके से जीने का हक उसे दिया है, तो उसने भी मेरी ज़िंदगी मेरे मुताबिक जीने का हक मुझे दिया है। प्यार सिर्फ़ दो जिस्मों का ही नहीं बल्कि दो दिलों का भी बंधन है। 
     शीला की बात सुनकर रमा ने कहा, कि " तू और तेरे उसूल और तेरी सोच, आज भी ऐसी ही है, जैसी तू पहले थी, तेरे साथ बातों में कोई नहीं जीत सकता, तुझे तेरा प्यार मुबारक, तू बस खुश रह मुझे और कुछ नहीं चाहिए। " कहते हुए रमा शीला के गले लग जाती है। तभी शीला की आँखों से दर्द के दो आँसू बह जाते हैं जो कई बार वह अपने अंदर छुपा के रखती थी, शीला मन ही मन सोचने लगी, " वैसे तो वह सब से अच्छे, सब से प्यारे हैं, मगर बस उनके ज़िंदगी जीने के उसूल उन से भी पक्के, मतलब वह जो बोले, जो सोचे वह होना ही चाहिए, वरना वह सब से रूठ जाते हैं और ऐसे रूठ जाते हैं कि उस वक्त उनको देखकर कुछ देर के लिए ऐसा लगता है, कि जैसे उन्हें हमारी अपनी ज़िंदगी में कोई जरूरत ही नहीं, नाही सामने देखना, नाहीं कोई बात करना, नाहीं किसी बात का सीधे मुँह जवाब देना और दोस्तों के साथ तो फोन पर मज़े से बातें करना, जैसे घर में कुछ हुआ ही न हो, उस वक्त इस दिल को बहुत ही बुरा लगता है, क्योंकि हम से तो उस हाल में रहा नहीं जाता और दूसरी तरफ़ वह आराम से घूमते फिरते और अपनी मस्ती में रहते और यहाँ उन से बातें किए बिना हमारा पल पल ज़िंदगी गुजारना मुश्किल हो रहा होता है, क्योंकि चाहे वे जैसे भी हो, हम ने उनसे प्यार बहुत किया है और हम उसी वजह से सब कुछ सह जाते, बस उनकी नाराज़गी नहीं सह पाते, अंदर ही अंदर जैसे हम टूटते जाते हैं । अब यह बात हम कैसे अपनी सहेली को बताए, कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हम किसी से भी कहना नहीं चाहते, क्योंकि अगर बता भी दे, तब भी दूसरे हम को सलाह देने लग जाते, मगर साथ तो हमें ही रहना है, तो मुझे ही पता होगा ना, कि उनको कैसे मनाया जा सकता है। बस चुप रह जाते है और कर भी क्या सकते है ? झगड़ा करना हमें आता नहीं, अकेले रह नहीं पाएँगे, अब तो चाहे जो भी हो ज़िंदगी उनके नाम कर दी है, वह जो है, जैसे भी है, वह बहुत अच्छे है, हमारा खयाल भी बहुत रखते हैं और हम से प्यार भी बहुत करते हैं, बस उनके ज़िंदगी जीने के उसूल जरा सब से हटके हैं, मगर अब हमें उन ही उसूलों पर चलने की आदत सी हो गई है, इसलिए अब उनसे हमें कोई शिकवा, शिकायत नहीं होती। " ऐसा सोच के शीला जैसे अपने आप को ही मनाने की कोशिश कर रही थी।
      रमा ने फिर भी शीला से कहा, " फिर भी कभी भी तुझे मुझ से बात करनी हो, या मेरी मदद की ज़रूरत लगे, तब पक्का मुझे बताना, मैं तेरे हर फ़ैसले में तेरे साथ हूं, अपने आप को कभी अकेला मत समझना। " कहते हुए रमा वहाँ से अपने घर चली जाती है।
     तो दोस्तों, आप जो हो जैसे भी हो, उसी रूप में आप एक दूसरे को पसंद करें, आप अपने आप में सही हो और हम आप को उसी रूप में प्यार करते थे, करते हैं और करते रहेंगे, बिना किसी शर्त, बिना किसी उम्मीद के, मेरी नज़र में बस यही तो प्यार है।

सत्य घटना पर आधारित 

                 28)  एक अधूरा सपना

          आज सुबह अभी तो प्रिया की आँखें ही खुली थी, कि उसने क्या देखा, उसका पति परिमल चाय और कॉफी की ट्रे लेकर सामने खड़े थे और  मुस्कुराकर उन्होंने कहा, " very good morning Priya darling, यह बंदा आज आपकी खिदमद में हाज़िर है, आज आपके लिए एक बहुत बड़ा सरप्राईज प्लान किया है मैंने, आज हमारी शादी की 25वी सालगिरह जो है, इसलिए जल्दी से यह आपकी काफी पिलो, आपके लिए यह नया ड्रेस और तैयार हो जाओ, हम दोनों आज कहीं जा रहे हैं।" सुबह सुबह परिमल एक ही बार में इतना कुछ कह गए। प्रिया तो परिमल का यह दूसरा रूप देखकर कुछ देर के लिए तो सोच में ही पड़ गई।
       प्रिया ने कहा, " पहले यह तो बताइए, कहाँ ?  फिर अभी तो मुझे सोनू और मोनू का लंच भी बनाना है, वह लोग क्या खाएँगे ? मैं पहले उनके लिए जल्दी से कुछ बना लेती हूँ, बाद में हम बाहर जाएंगे। " 
         परिमल ने कहा, " उन दोनों की तुम फिक्र मत करो, मैने दोनों का टिफिन भी रेडी कर दीया है, और उनको दोनों कुछ पैसे भी दे दिए है, तो वह लोग रास्ते में जो भी मन करे वह खा लेंगे। "
        प्रिया को तो अपने आप पर यकीन ही नहीं हो रहा था, कि यह सब परिमल कर रहा है, इतने सालों में जो कभी नहीं हुआ, वह आज कैसे ? उनका ऑफिस, उनका काम, उनके उसूल, आज यह सब परिमल से कैसे दूर हुए, प्रिया को तो कुछ भी समझ नही आ रहा था। रोज़ घर में मुंह फुलाके बैठने वाला इंसान आज मुस्कुरा रहा है !
         फिर प्रिया ने सोचा, " चलो छोड़ो, देखते है, क्या सरप्राईज प्लान किया है, हर बार की तरह सिर्फ मंदिर लेके जाएंगे और एक ice cream या faluda साथ में पी लेंगे, और तो क्या ? "                 सोचते हुए प्रिया ने ड्रेस पहन ली, जो आज पहली बार परिमल उसके लिए लाया था। फिर वह दोनों साथ में चले, सब से पहले परिमल ने प्रिया को heavy brunch करवाया, वह भी अच्छे से अच्छी रेस्टोरेंट में,  फिर मूवी देखने गए, वह भी मेरे मनपसंद हीरो, hrithik Roshan कि मुझे तो बड़ा मज़ा आया, फिर मॉल में लेकर गए, और परिमल ने कहा कि " आज तुम्हें जो भी पसंद आए, वह शॉपिंग कर लो, आज का दिन तुम्हारा हुआ।"
       यह सुनते मेरे तो होश ही उड़ गए, मैंने मन ही मन सोचा, " आज यह कंजूस को आखिर हुआ क्या है ? यह परिमल ही है या और कोई ? जो पैसा तो अच्छा कमा लेते है, मगर ज्यादातर पैसे invetment करने में ही मानते है, कहते है, जरूरत के वक्त यही पैसे तुम्हारे और बच्चों के काम आएंगे।" 
         चलो छोड़ो, आज शॉपिंग का मौका मिला है, तो हाथ से नहीं जाने देते, ऐसा सोचते सोचते प्रिया ने अपनी पसंद के कुछ कपड़े और ज्वैलरी ले ही ली। परिमल ने दुकानदार को शॉपिंग की सारी बैग रात को घर पर डिलीवरी करने को कह दिया। फिर परिमल मुझे लेकर बीच पर जाते है, फ़िर वहाँ पर हम दोनों आराम से बैठकर बातें करते है, कुछ देर बाद एक दूजे का हाथ पकड़कर वहाँ से निकलते वक्त, रास्ते में थोड़ा पानीपुरी या चाट का नाश्ता किया, कुछ सेल्फी खींच के उन पल को अपने मोबाइल में कैद कर लिया, फिर किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में डिनर के लिए लेकर गए, तब प्रिया को खयाल आया, कि " हर रोज़ घर का बना खाना खानेवाला, मेरे हाथ की डाल रोटी भी खुशी खुशी खानेवाला इंसान आज सुबह से लेकर रात तक मुझे बाहर का खाना खिला रहे है, और वह खुद भी खा रहे है, जरूर कुछ तो बात है, यह कहीं आखिर में मुझे छोड़ने के बारे में तो नहीं कहेंगे, इनको मेरे अलावा कहीं और कोई लडकी पसंद तो नही आ गई ? फिर सोचा परिमल को मेरे लिए ही वक्त नहीं मिलता और मेरे साथ भी ज्यादा बातें नही करते तो किसी और लड़की के साथ क्या करेंगे, मैं भी ना क्या सोच रही हूँ ? " 
        अपने आप को संभालते हुए प्रिया रेस्टोरेंट को देखने लगी, जहाँ सब कुछ पहले से ही प्लान किया हुआ था, एक प्यारा सा दिखने वाला लड़का हाथ में गिटार लेकर गाना गा रहा था, चारों और फ्लावर्स से रेस्टोरेंट सजाया गया था, टेबल पर मोमबत्ती रखी हुई थी, आराम से बैठकर अपनी अपनी पसंद का खाना खाया और आख़िर में ice cream । फिर अच्छी सी five star होटल में रूम बुक कराया था, वहां नाइट बिताएंगे, ऐसा परिमल ने प्रिया से कहा, जो रूम फूलों से सजाया गया था और जिसकी गैलरी में एक स्लीपिंग चेयर पर दोनों साथ में बैठ कर आसमान की ओर तारों को देख रहे थे, साथ में मोबाइल में स्पोटिफाई पर किशोर कुमार के गाने बज रहे थे, प्रिया का तो जैसे आज दिन ही बन गया था, वह एक नज़र अपने पति परिमल को देखे जा रही थी।
        तभी प्रिया के मोबाइल की घंटी बजती है, जपक कर प्रिया अपने बिस्तर पर से उठ खड़ी होती है, देखा तो परिमल का ही फोन था, प्रिया ने आधी खुली नींद में से ही फोन उठाया, सामने से परिमल ने कहा, " प्रिया, क्या हुआ ? आज अब तक तुम सोई हुई हो क्या ? मैं कब से तुम्हें फोन लगा रहा हूँ और सुनो मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है, तुम सुबह बहुत गहरी नींद में थी, इसलिए तुम्हें नहीं जगाया, मैं अभी जरूरी काम से दिल्ली जा रहा हूँ, दो या तीन दिन बाद घर आ जाऊंगा, तुम अपना और बच्चों का खयाल रखना ठीक है ? और हा, आज हमारी शादी की सालगिरह है, मुझे याद था, मगर आज मुझे बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिलने वाला है, इसलिए जाना जरूरी है, सालगिरह तो हम कभी भी मना सकते है, तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा ना ? " 
        प्रिया मन ही मन थोड़ी चिढ़ सी गई, फिर अपने आप को संभालते हुए प्रिया ने कहा, " अरे आप भी क्या, उस में क्या हो गया, जो इस बार हम साथ नही होंगे, सालगिरह तो हम कभी भी मना सकते है, आप अपना काम देखिए, मैं यहाँ बच्चों को सँभाल लूंगी,  आप जब भी घर आओ तब आपकी पसंद का अच्छा सा डिनर बना दूंगी, मुझे बता दीजिएगा, कि कितने बजे और कब आप घर आने वाले हो ? " 
          परिमल ने कहा, " ok, बाबा जैसा तुम कहो, शादी की सालगिरह की बहुत बहुत बधाई। कहते हुए परिमल ने फोन रख दिया। और इस तरफ प्रिया ने सपने में जो अपनी शादी की सालगिरह बिताई थी, उसे याद करते करते मन ही मन मुस्कुरा रही थी, फिर प्रिया को थोड़ा गुस्सा परिमल पर आया, कि हर बार की तरह आज के ही दिन, उसको जान था, ना जाने मेरा यह सपना कभी सच होगा भी या नहीं ? कब परिमल अपने काम से ज़्यादा मेरे बारे में भी सोचेंगे ? कब काम से ज्यादा मुझे एहमियत देंगे ? कब तक मैं यूहीं सपने ही देखती रहूँगी ? कब मेरे सपने सच होंगे ? सोचते सोचते प्रिया अपने रोज़ के काम में लग जाती है। 
           तो दोस्तों, जहाँ तक मैं औरत को जानती और समझती हूँ, वहाँ तक ज़्यादातर एक औरत को अपने पति के दिल में और उनकी ज़िंदगी में सिर्फ एक जगह चाहिए, उसे सिर्फ और सिर्फ अपने पति का थोड़ा सा प्यार चाहिए, उनका थोड़ा सा वक्त और attention चाहिए, जिस से उसे लगे कि जितना प्यार वह अपने पति से करती है, उसका पति भी उसको उतना ही प्यार करता है और हां यह भी सही है, कि पति के ऊपर घर की सारी ज़िम्मेदारी होती है, उनका आधा दिन महीने के खर्चे और इन्वेस्टमेंट की गिनती में ही जाता होगा, लेकिन औरत भी तो अपना सब कुछ अपने घर के लिए अपने बच्चों के लिए ही तो करती हैं, जितनी ज़िम्मेदारी पति की होती है, उतनी ही पत्नी की भी होती है, कोई अपने काम में कम या ज़्यादा नहीं, दोनों बराबर के हिस्सेदार है और एक बात, ऐसा ज़िंदगी में क्यों होता हैं, कि आप जिसके साथ प्यार करते हो, जिसके साथ आपने अपनी ज़िंदगी के २५ साल बिता दिए हो, उसी से आप अपने मन की बात कहने में अब भी हिचकिचाते हो, जैसे कि रात को आपको अपने पति के साथ सोने का मन हो, उस से थोड़ा प्यार करने का मन हो, मगर पति तो बिस्तर पर आते ही सीधे आँख बंद कर के सो जाते हैं, जैसे, कि वह पूरा दिन काम कर के थक गए हो और कुछ बोलो तो नींद में ही जैसे हा, हा कहते हो, ऐसा लगता है, उनका थका हारा, मासूम सा चेहरा देखकर पत्नी को उसे छेड़ने का मन भी नही करता और वह भी अपनी इच्छाओं को अपने अंदर समेत कर सिर्फ अपने पति को गले लगकर सो जाती है, या फिर डर और शर्म की वजह से कभी कभी तो कह भी नही पाते। आखिर यह दूरियाँ कब और कैसे दूर होगी ? यह सवाल सिर्फ प्रिया का नहीं लेकिन ऐसी कई प्रिया होगी, जो आज भी अपने अंदर कई सवाल और कई बातों को दबाए हुए अपने परिवार और अपने पति के लिए ही अपनी जिंदगी गुज़ार देती है, बिना किसी शर्त या बिना किसी स्वार्थ के। हर प्रिया के चेहरे पर तो हर वक्त मुस्कान होती ही है, मगर उसके दिल के अंदर कभी किसी ने झांक कर देखने की कोशिश नहीं कि, आख़िर वह खुद क्या चाहती है, उसके क्या अरमान है ? उसके क्या सपने हैं, वह सपने जो कभी पूरे होंगे भी या नहीं ? 

                      29) समयचक्र
                   
            रोहित अपनी पत्नी रीता से बहुत प्यार करता था, आज होली के दिन वह रीता को एक बहुत बड़ी खुशखर देने वाला था, वह रीता से कुछ कहे उस से पहले ही रीता ने उसे बहुत बड़ा झटका दे दिया, वैसे रोहित और रीता के बीच आए दिन पैसों की वजह से छोटे मोटे झगड़े होते रहते थे, मगर वह रीता को कैसे भी कर के मना लेता था, मगर फिर भी रीता की मांगे दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही थी, जो वह पूरी नहीं कर पाता था, लेकिन रोहित को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था, की बात यहाँ तक पहुँच जाएगी, रोहित के लिए आज होली के रंग और सफेद रंग एक समान हो गए थे, उसका सब से प्यारा होली का त्यौहार, उसके लिए जैसे बेरंग सा फीका हो गया था, समय का चक्र इतनी जल्दी बदल जाएगा, रोहित को इस बात का अंदाज़ा ही नही था।
        जब रीता ने होली के दिन सुबह ही होली के रंगों की बजह डाइवोर्स पेपर्स उसके हाथ में थमा दिए, तब एक पल के लिए तो रोहित की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, रोहित ने सीधे ही रीता को पूछ लिया, " यह सब क्या है, रीता ? कहीं तुम आज के दिन मज़ाक तो नही कर रही ? अगर यह मज़ाक हैं, तो मुझे ऐसा मज़ाक बिलकुल पसंद नहीं ? तुम जानती हो, मैं तुम से कितना प्यार करता हूँ, तुम्हें याद तो होगा ही, कि आज से पाँच साल पहले आज ही के दिन मैंने तुमसे प्यार का इज़हार किया था और होली के दिन से ही हमारे प्यार की शुरुआत हुई थी। "
       रीता चिढ़ते हुए गुस्से से रोहित से कहती हैं, कि " हा, मुझे बहुत अच्छे से वह दिन याद हैं, भला वह दिन मैं कैसे भूल सकती हूँ, कि आज ही के दिन मैंने तुम्हारी बातों में आकर शादी के लिए हा कह दी थी और उस दिन से लेकर आज तक में पछता रही हूँ, सोचती हूँ, की " शायद मैंने तुम से शादी न कर के अपने दोस्त मुकेश से शादी की होती तो, आज मेरे पास मोटर, गाड़ी, बंगला, बैंक बैलेंस, i phone, ढेर सारे ज़ेवर और कपड़े होते, घर में नौकर चाकर होते, मगर मेरा ऐसा नसीब कहाँ ? उस वक्त मेरी अक्कल पर तो जैसे पर्दे पड़े हुए थे, जो मैंने बिना सोचे समझे तुम से शादी की। और उसके बाद मुझे मिला क्या ? दिन भर घर का काम और सास ससुर की सेवा करो, उनकी बेमतलब की बातें सुनो। लेकिन बस अब और नहीं, अब मैं इन सब से तंग आ चुकी हूँ, मुकेश आज भी मेरा इंतजार कर रहा हैं, मुझे वह आज भी अपनाने के लिए तैयार हैं, वह आज भी मुझ से बहुत प्यार करता हैं और मुकेश ने मुझ से कहा हैं, " वह मुझे वह सब कुछ देगा, जो मुझे  चाहिए था, इसलिए अब मैं मुकेश के साथ रहना चाहती हूँ, तुम्हारे साथ डाइवर्स के बाद हम दोनों शादी करने वाले हैं।" 
     रोहित ने कहा, " मुकेश, वहीं ना जो कॉलेज में कम और कॉलेज के बाहर ज़्यादा दिखता था, हर वक्त कैंटीन में सिगरेट का धुंआ आती जाती लड़कियों पर उड़ाया करता था, हर कोई उस से परेशान रहता था, उसे पढ़ाई की तो जरूरत ही नही थी, क्योंकि उसके पापा के पैसों पर ही वह ऐश करता था, शायद आज कल तो मैंने सुना हैं, कि उसके पापा के जाने के बाद उसने अपने पापा के बिजनेस में ध्यान नहीं दिया, बिज़नेस में घाटा होने की वजह से उसने अपने पापा का सब कुछ बेचकर कुछ ब्रोकरेज का काम कर रहा है, वह तुम्हें ऐशो आराम की ज़िंदगी देगा ? ऐसा तुमने सोच भी कैसे लिया ? उस आवारा लड़के के साथ तुम रहना चाहती हो ? वह भी सिर्फ पैसों की वजह से ? 
        रीता ने कहा, " हा, क्योंकि अब फिर से उसका समय का चक्र बदलने वाला है, एक बहुत बड़ी कंपनी से उसकी डील होने वाली है, ऐसा उसने मुझे कहा है। " 
       रोहित ने कहा, " तुम्हें उसकी कही बातों पर इतना यकीन है ? और मेरे हालात के बारे में मैंने तुमको सब कुछ पहले ही बता दिया था, तो फिर तब तुमने मुझ से शादी ही क्यों की ? "
     रीटा ने कहा, " उस वक्त मैंने सोचा था, कि हालात बदल भी सकते हैं, मैं तुम्हारी प्यार भरी बातों में फस चुकी थी, मगर अब नहीं, अब मेरा तुम्हारे साथ रहना नामुमकिन है, इसलिए जितना जल्दी हो सके, हम दोनों अलग हो जाते है, अब इतनी मेहरबानी मुझ पर कर लो। " 
      रोहित आज होली के दिन रीता को बताना चाहता था, कि " उसे उसकी कंपनी में ceo की जॉब मिल गई हैं और कंपनी वालों ने उसे नया घर और नई कार की चाबी भी दे दी है, वह बस अच्छा दिन और अच्छे मौके के इंतजार में था, मगर रीता का आज यह नया रूप देखकर रोहित का दिल टूट गया, इसलिए रोहित रीता को डाइवोर्स देने के लिए मान गया। रोहित ने डाइवोर्स पेपर्स पर साइन कर लिए और कहा, की " आज के बाद तुम्हारा मुझ पर या मेरी किसी भी चीज पर कोई अधिकार ना रहेगा। "
     घमंड में आकर रीता ने भी कह दिया, कि " तुम्हारे पास था ही क्या, जो मैं तुम से मांगू, मुझे कुछ नही चाहिए, मुझे जो कुछ भी चाहिए, मुकेश मुझे दे देगा।" कहते हुए रीता डाइवोर्स पेपर्स अपने हाथ में लेकर जाने लगी।
       तभी रोहित के ऑफिस के कुछ दोस्त रोहित से मिलने आते हैं और रोहित को होली के रंग लगाते हुए कहते है, कि " यार बहुत बहुत बधाई हो, अब अगली होली तुम्हारे नए घर में ही होगी और हम सब तुम्हारी नई कार में घूमने साथ में जाएंगे, पार्टी तो बनती है, मेरे दोस्त आख़िर अपनी लगन और मेहनत से तुम ceo बन ही गए, तुम्हारा बरसों पुराना सपना आज सच जो हो गया। "
      पीछे कमरें से बाहर निकलते वक्त रीता ने यह सब बातें सुन ली, उसकी आंखें बड़ी ही रह गई, उसने अपने हाथ में डाइवर्स पेपर्स देखे और अपने सिर पर पटके और रीता को याद आया, जो रोहित ने आखिर में उस से कहा था, कि " आज के बाद उस पर या उसकी किसी भी चीज़ पर मेरा अब कोई अधिकार नहीं रहेगा। " रोहित के दोस्तों की बातें सुनकर रीता को एक बार फिर से यह खयाल आया, कि " उसने  रोहित से  डाइवोर्स लेके सही किया या गलत ? "
       तो दोस्तों, कभी कभी जल्दबाजी में लिए हुए फ़ैसले सही नही होते और उन फैसलों पर हमें जीवन भर पछताना पड़ता है। ज़िंदगी में वक्त बदलते देर नहीं लगती, समय का चक्र कब और कैसे बदल जाता है, यह कोई नहीं जानता। 

                30)  डर के साथ ख़ुशी का पल 

        आज सुबह से लेकर शाम होने को आई, लेकिन पुरे दिन में नाहीं उनका कोई फ़ोन आया और नाहीं कोई मैसेज, जितनी भी बार मेरे मोबाइल की रिंग बजी, मुझे ऐसा ही लगा, कि उनका ही जैसे फ़ोन आया हो, मगर देखा तो कोई और ही था, फ़िर आज मेरा किसी से बात करने का मन भी नहीं था, थोड़ी बात कर के फ़ोन रख देती, जब भी मैसेज की तूण बजती तो भी लगता, कि जैसे उनका ही मैसेज आया होगा, मगर वह भी नहीं, अपने मोबाइल में उनके wats up पर जाकर फिर भी बार-बार चेक किया करती, कि मैसेज आया या नहीं, अब तो इंतज़ार की हद हो गई, मुझ से तो अब रहा भी नहीं जाता था, मन बहुत बैचेन सा लगने लगा था, दिल बैठा जा रहा था, अपने आप को मन ही मन कोश रही थी, कि हसी मज़ाक में भी मैंने उनसे ऐसा कहा ही क्यों ? मैंने उल्टा-सुलटा बोल दिया, तभी तो उनको बुरा लगा ना ! बगैर नास्ता किए, बगैर टिफ़िन लिए ऐसे ही घर से चल पड़े, अब क्या करू, कुछ समझ नहीं आ रहा था, वैसे भी ऑफिस जाकर रोज़ मैसेज कर दिया करते थे, कि " मैं ऑफिस पहुँच गया हूँ, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, अपना ख्याल रखना, किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो कॉल करना, दवाई वक़्त पर ले लेना। " फिर वह दिल और किसी वाला इमोजीस भी भेजते, उफ्फ्फ! और आज कुछ भी नहीं और देखो आज तो ऐसा कोई मैसेज भी नहीं आया, इसलिए दिल और भी ज़ोर से धड़क रहा था। नई नई शादी जो हुई थी, ऊपर से सब घरवालों को छोड़कर बेंगलोर आकर उनके साथ अकेले रहना था, इसलिए वह मेरा बहुत ख़याल रखते थे, हर एक-दो घंटे में फ़ोन कर के पूछ लिया करते, कि " मैं क्या कर रही हूँ, मुझे कुछ चाहिए तो वह ऑनलाइन ऑर्डर कर के मंगवा भी लेते, इसी बहाने मुझ से बात भी कर लिया करते।" मैं पूरा दिन इसी कश्मकश में लगी रही।  

            तभी मोबाइल में फ़िर से मैसेज आया, मैंने तुरंत खोल के देखा, तो उनका ही मैसेज था। लिखा था, कि " जल्दी से तैयार हो जाओ, पार्टी में जाना है, तुम वह रेड साड़ी पहन लेना, जो मैंने तुम्हें तुम्हारी सालगिरह पर दी थी। " पढ़कर मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, वह तो मुझ से नाराज़ थे ही नहीं, मैं ही पागल, उल्टा, सुलटा उनके बारे में सोच रही थी. फिर मैंने भी मैसेज कर के पूछ ही लिया, कि " आपने दोपहर का खाना खाया क्या ? टिफ़िन लेकर क्यों नहीं गए ? और ऑफिस जाकर नाहीं कोई मैसेज और नाहीं कोई कॉल ?" उनका तुरंत ही जवाब आया, कि " सुबह मुझे एक अर्जेंट मीटिंग में जाना था और टिफ़िन का इंतज़ार करता तो, लेट हो जाता। बहुत बड़ी कंपनी के साथ आज डील होने वाली थी, जो हो भी गई, बस सुबह से आज यहीं सब मेरे दिमाग में चल रहा था, इसलिए मैं बिना कुछ बताए जल्दी में घर से निकल गया। पूरा दिन इसी में गया, मुझे तुम्हें फ़ोन या मैसेज करने का भी वक़्त न मिला। लेकिंन आज तुम यह सब क्यों पूछ रही हो ? "

        अब जाके मेरा डर कुछ कम हुआ, मैंने कहा, " बस ऐसे ही, अचानक से पार्टी में जाने के लिए कहा इसलिए।"

         तो उन्होंने कहा, " हां, आज जो कंपनी के साथ डील हो गई, उन्ही के साथ पार्टी है, बाकि बातें बाद में घर आकर बतलाता हूँ, तुम अब जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं भी अभी ऑफिस से निकलता हूँ, आधे घंटे में घर पहुँच जाऊंगा।    

      मैंने मुस्कुराते हुए प्यार वाला इमोजी भेज दिया और फ़ोन रखकर तैयार होने के लिए चली गई, तैयार होते-होते यही सोच कर मुस्कुराती रही कि मैं भी कितनी पागल हूँ, बिना कुछ सोचे समझे युहीं डरती रही, वह रूठ तो नहीं गए, मगर शायद उन्होंने तो मेरी बात सुनी भी नहीं, क्योंकि उस वक़्त तो वह अपने क्लायंट से फ़ोन पर बात कर रहे थे। 😆😐 कुछ ही देर में वह आ गए और उन्होंने खुश होते हुए मुझे गले लगा लिया और कहा, कि आज मैं बहुत खुश हूँ, हमारी कंपनी को बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला है। मैंने भी उनको लगे लगते हुए बहुत-बहुत बधाई दी। फ़िर हम दोनों तैयार होकर पार्टी के लिए निकल पड़े। 😀😀

            इस बात को बीते ५ साल हो गए, लेकिन आज भी मुझे वह ख़ुशी के पल याद आते, तब मन ही मन बहुत हँसी आती और यह बात शायद मैं कभी ना भूल पाऊ। आज तक मैंने यह बात उनको बताई ही नहीं, कि उस वक़्त मेरा पूरा दिन कैसा गुज़रा था ? अब सोचती हूँ, कि बता ही दूँ। 😄😄    

         तो दोस्तों, बस यही तो ज़िंदगी है, कुछ खट्टी तो कुछ मीठी यादें।

      

                 

                    31) प्यार या स्वाभिमान 

           आज मैं उसी स्कूल के करीब से गुज़र रहा था, जहाँ से आराध्या के साथ मेरी ज़िंदगी की शुरुआत हुई थी। बीते हुए वह लम्हें जिसे हम चाहकर भी कभी भुला नहीं पाते। और मैं खुद भी उस पल कुछ देर के लिए वहीं रुक गया और उन बीते किताब के पन्नों को फ़िर से एक बार पढ़ने लगा, जैसे कि उन बीते हुए लम्हों को एक बार फ़िर से जीने लगा। 

        हाँ, मेरा नाम अविनाश। आज भी मुझे याद है, " आराध्या उस दिन सफ़ेद कुर्ता पहने, कानो में लम्बे झुमके, एक हाथ में घड़ी और दूसरे हाथों में बुक्स, काले घने उसके घुँघराले बाल, उसी के नरम गालों को जैसे बार-बार छूने की कोशिश कर रहे थे और मैं यहीं से अपनी साइकिल से उसे लाइब्रेरी से बाहर आते हुए देखता ही रह गया था। तब हम ८ वी कक्षा में एक ही क्लास में पढ़ते थे। हम दोनों पढाई में बहुत तेज़ थे, इसलिए टीचर क्लास में हम दोनों को ही सब से ज़्यादा एहमियत देते थे, प्रोजेक्ट भी हम दोनों साथ मिलके ही करते थे। पहले दोस्ती हुई फ़िर प्यार। 

       वही तो, आखिर एक लड़का और लड़की कब तक दोस्त बने रहेंगे, दोनों के बीच प्यार आ ही जाता है। माना की हम दोनों के ज़िंदगी जीने का तरीका, हमारी सोच, हमारा रेहन-सेहन सब कुछ अलग-अलग था। फ़िर भी देखो आप, " प्यार तो होना ही था "। हम दोनों ८ वी कक्षा से लेकर कॉलेज तक साथ ही थे, इसलिए हमारे सारे दोस्त हमसे जलते भी थे। हम दोनों ने ये तय किया था, कि हम पढ़ने में एक ही लाइन लेंगे, ताकि साथ मिलकर एकदूसरे के साथ वक़्त बीता सके और साथ-साथ पढ़ भी सके। आराध्या डॉक्टर बनना चाहती थी और मैं कम्पूयर एंजीनियर। पता नहीं उस वक़्त मैंने उसकी बात क्यों मान ली ? मैं एंजीनियरींग छोड़कर डॉक्टर बनने के लिए भी तैयार हो गया, सच में मैं उसके प्यार में बिलकुल अँधा था। वो महलो में रहनेवाली, बड़े घर की बेटी और मैं साधारण सी सरकारी नौकरी करने वाले पिता की एक लौटी संतान। जिसने बड़ी उम्मीद से मुझे पढ़ाया, लिखाया, प्यार दिया, अपने पैरो पर खड़ा होने लायक बनाया। हम दोनों की दोस्ती इतने सालों से थी, तो हमारे घर वालों को भी पता था, कि हम दोनों अच्छे दोस्त है और आए दिन एक दूसरे के घर बिना किसी हिचक के किसी न किसी बहाने जाया भी करते, कभी प्रोजेक्ट के बहाने, तो कभी बुक्स के बहाने, तो कभी बर्थडे पे, तो कभी पार्टी। एक दिन मेरे पापा किसी की शादी में गाँव गए हुए थे और आराध्या मेरे घर प्रोजेक्ट के लिए आई हुई थी, घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था, बातों-बातों में हमने पहली और आख़री बार प्यार की सारी सीमा भुला दी, हम दोनों दो में से एक बन गए। उसके लिए हम दोनों में से किसी को इस बात का रंज नहीं था, ज़िंदगी उन दिनों कितनी खूबसूरत हुआ करती थी, सिर्फ प्यार और पढाई, दोनों साथ में। लेकिन कहते है, ना " ज़िंदगी में हम जो सोचते है, वह नहीं होता मगर हमारे साथ जो होता है, वह ज़िंदगी होती है। "  बस वैसे ही हमारी ज़िंदगी में भी एक मोड़ आया और हम दोनों अलग हो गए, इतने सालो का प्यार जैसे एक पल में बिखर गया। 

     मुझे आज भी याद है,

            हम ने साथ मिलकर डॉक्टरी की पढ़ाई तो पूरी की, मगर जितना आसान ये सब आराध्या के लिए था, उतना आसान मेरे लिए नहीं था।  क्योंकि डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पैसे भी बहुत लगते है, फ़िर भी मेरे पापा ने जैसे-तैसे करके मेरी ज़िद्द की बजह से, मुझे अच्छे कॉलेज में पढ़ाने के लिए फीस का इंतेज़ाम कर ही लिया, मैं वो सब बात भी समज़ता था, मगर आरध्या इन सब बातों से परे थी, आराध्या बड़ी तो हो रही थी, मगर कई मामलो में अब भी वह बहुत नादान सी थी, वह दिमाग से नहीं, दिल से सोचती थी। मगर ज़िंदगी जीने के लिए कई बार दिल की नहीं दिमाग की बात सुननी पड़ती है। क्योंकि आराध्या अपने पापा की लाड़ली जो थी, बिना मांँगे ही उसे सब मिल जाता था, किसी बात के लिए या किसी चीज़ के लिए उसे इंतज़ार नहीं करना पड़ता। लेकिन अब मुझे डॉक्टरी ज़्यादा समझ नहीं आ रही थी और फ़िर भी मैंने आरध्या की मदद से डॉक्टरी की पढाई पूरी की, कुछ प्रोजेक्ट अगर मेरी समझ में नहीं आते, तो घर आकर वो मुझे आसानी से समझाया करती और मुझे कहती, " अरे बाबा ! डॉक्टरी समझ नहीं आती, तो क्यों कर रहे हो ? " कहते हुए आराध्या हँस पड़ती, पर मैं ही जानता था, कि डॉक्टरी मैंने उसी के लिए पसंद किया था। बात अब शुरू होती है, आराध्या को अब और आगे पढ़ने और डॉक्टरी करने के लिए अमेरिका जाना था और शायद वह वही रहना भी चाहती थी, ऐसा उसकी बातों से मुझे लगने लगा था। मगर अमेरिका जाने के लिए मेरे पापा के पास अभी उतने पैसे नहीं थे और उस तरफ़ आरध्या के एक बार कहने पर आरध्या के पापा ने उसका फॉर्म और फीस अमेरिका में भर भी दीया। तब 

      आराध्या ने मुझ से कहा, कि " तुम भी मेरे साथ अमेरिका चलो, साथ में अब भी आगे पढ़ लेंगे और वही डॉक्टरी भी साथ में कर लेंगे, ज़िंदगी आसान हो जाएगी। " 

       मैंने आराध्य से कहा, कि " तुमने तो बड़ी आसानी से कह दिया, कि अमेरिका चलते है, मगर मेरे पापा के पास इतने पैसे नहीं है, कि वो मेरे अमेरिका जाने के लिए इतना पैसा दे सके और इस के आगे भी डॉक्टरी की पढाई के लिए उन्होंने लोन ले रखी है, अब मैं उन पे और बोज नहीं डाल सकता, तुम तो हमारे घर के बारे में सब जानती ही हो, तो फ़िर तुमने यूँ अचनाक से अकेले ही ऐसे अमेरिका जाकर पढ़ने का और सेटल होने का फैसला कैसे कर लिया ?  तुमने मुझे बताया भी नहीं और अमेरिका कॉलेज में फॉर्म भी भर दिया। हम ने सालों पहले क्या तय किया था, वो तो तुम भूल ही गई, कि " हम साथ पढ़ेंगे, साथ ही काम करेंगे और साथ रहेंगे भी, ज़िंदगी का हर फैसला हम साथ मिलकर ही करेंगें । " तो अब क्या हुआ ? "

        तब आराध्या ने आसानी से कह दिया, कि " उस में क्या हुआ, मैंने अपने पापा को सिर्फ बताया, कि मैं अमेरिका जाके पढ़ना चाहती हूँ, तो उनका एक दोस्त का लड़का वही कॉलेज में पढता है, तो उन्होंने कहा, कि कॉलेज सच में बहुत अच्छी है और वह हमें हेल्प भी करेगा। इसलिए पापा ने तुरंत मेरा भी फॉर्म भर दिया। अगर तुम चाहो तो तुम्हारे लिए मैं अपने पापा से बात करुँगी, वो तुम्हारा भी फॉर्म और फीस भर देंगे, बात ख़तम। तुम चल रहे हो मेरे साथ, बाद की बाद में देख लेंगे। "

      कहते हुए आराध्या ने खड़े होते हुए मेरा हाथ खींचकर मुझे भी अपने साथ आने को राज़ी कराने लगी। उसे लगा, कि हर बार की तरह इस बार भी मैं उसकी ये बात भी आसानी से मान लूंँगा। लेकिन नहीं, मैंने उसका हाथ अपनी ओर खींचते हुए उसे रोका और उसे समझाते हुए कहा, कि देखो, आराध्या तुम्हारे पापा का दिल बहुत बड़ा है और वो मुझे कई सालो से जानते है, हमारी दोस्ती को जानते है, इसलिए शायद मना नहीं करेंगे, लेकिन मेरे पापा का क्या, उनका तो इस दुनिया में मेरे अलावा और कोई भी नहीं है। और वो ऐसे पैसे लेने से मना करेंगे। वह ऐसा बिलकुल नहीं चाहेंगे, कि मैं तुम्हारे पापा के दिए हुए पैसों से अमेरिका जाकर अपनी आगे की पढाई पूरी करूँ। इस से तो उनकी अब तक की सारी मेहनत पे पानी फ़िर जाएगा, उनके आत्म-सम्मान को कितनी ठेश पहोचेगी ? और शायद मैं भी इस बात के लिए राज़ी नहीं हूँ। "

         उस वक़्त आराध्या ने फ़िर से मुझे मनाने की बहुत कोशिश करते हुए कहा, कि " मैंने तो जाने का फैसला कर लिया है और तुम भी मेरे साथ चलोगे, चाहे कुछ भी हो जाए, सिर्फ़ कुछ पैसो की ही तो बात है, तो बाद में तुम पैसे मेरे पापा को दे देना। बात ख़तम। लेकिन तुम मेरे साथ आ रहे हो। "     

        आराध्या को आज भी जैसे लग रहा था, की हर बार की तरह उसके पापा के जैसे इस बार भी मैं उसकी बात मान जाऊँगा।  

      मैंने कहा, बात सिर्फ पैसो की नहीं है, बात है, स्वाभिमान की, मैं या मेरे पापा ऐसा बिलकुल नहीं चाहेंगे। तुम बस बात समझ ने की कोशिश करो, मेरे लिए ये बहुत मुश्किल है। 

     उसके बाद आराध्या रोते हुए वहांँ से उठ के चली जाती है और कहती जाती है, कि "अच्छा तो तुम यहाँ रहो अपने पापा के पास और मैं चली अमेरिका, अपना सपना पूरा करने। यहाँ से आगे का सफ़र शायद अब मुझे अकेले ही तय करना होगा। "

       मैं भी मन ही मन बोला, कि " हाँ, मुझे भी शायद आगे का सफर अब अकेले ही तय करना होगा। " 

      कहते हुए हम दोनों एकदूसरे से अलग हो जाते है। उसे अपना सपना पूरा करना था और मुझे अपना और अपने पापा का स्वाभिमान बचाना था। मैंने प्यार और स्वाभिमान में से स्वाभिमान चुना और आराध्या ने अपना सपना पूरा करने के लिए हमारा इतने साल का प्यार भुला कर अमेरिका जाने के लिए अपने पापा के दोस्त के बेटे के साथ कुछ ही दिनों में शादी कर ली और अमेरिका चली गई। 

      इस तरफ़ मैंने यहीं से आराध्या की तरह और आगे की अपनी डॉक्टरी की पढाई शुरू की मगर आराध्या के जाने के बाद मेरा नाहीं पढाई में मन लगा और नाहीं डॉक्टरी की पढाई मेरे पल्ले पड़ी। तब मैंने चाइल्ड साइकोलॉजी की पढाई की और अस्पताल में प्रैक्टिस के लिए लग गया। कुछ वक़्त के बाद पापा ने मेरे लिए अपने खुद का दवाख़ाना खोल दिया। भले ही यहाँ उसके जितना पैसा ना कमा पाउँगा, लेकिन  उस दिन मैं बहुत खुश था, कि चाहे मैं अमेरिका आराध्या के साथ ना जा सका, चाहे मैं एंजीनियर न बन पाया, मगर मेरा स्वाभिमान तो मेरे साथ रहा। क्योंकि आराध्या के ज़िंदगी जीने के तरीके से लगता था, कि शायद वह हर बात मुझ से मनवाती रहती और हर बार मेरे स्वाभिमान को ठेस पहोंचाती रहती, इसलिए मुझे अपने फैसले पर कोई शर्मिंदगी या अफ़्सोस नहीं और आज मेरे पापा मुझ पर बहुत गर्व करते है और आते-जाते सब को कहते रहते है, कि मेरा बेटा, डॉक्टर बन गया है, अब दवाई लेने उसके पास ही जाना और मुझे देखकर मुस्कुराते रहते, मैं उनको मुस्कुराता देख, अपने सारे ग़म भूलकर मुस्कुरा देता। बस यही मेरे लिए बहुत है। उस वक़्त मुझे पता नहीं था, कि " जो फैसला मैंने लिया था, वह सही था या ग़लत, कि प्यार और स्वाभिमान में से मैंने स्वाभिमान को चुना और प्यार को जाने दिया।  "

        लेकिन हाँ, ये बात भी सच है, कि आज भी अकेले में जब भी मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ, तो मेरे सामने आराध्या का ही हँसता हुआ चेहरा नज़र आता है, आज भी उसकी खुशबु मैं महसूस करता हूँ, भले ही आराध्या जैसी भी हो या जैसी भी थी, प्यार तो मैंने उस से सच्चा किया था और उसी से करता रहूंँगा और अब उसके साथ बिताए पल को गले से लगाकर अपनी आगे की  ज़िंदगी भी गुज़ार लूँगा। 

          तभी मेरे मोबाइल पर पापा का फ़ोन आता है, मैंने अपनी पलक झपकाई, अपने आप को उसी स्कूल के सामने पाया, मगर आज फ़र्क सिर्फ़ इतना था, कि " उस दिन मैं साइकिल पर था और आज मैं अपनी कार में था, उस दिन लाइब्रेरी से आराध्या बाहर आई थी, आज मेरे टूटे दिल के सपने बाहर आ रहे थे। " मगर आज मुझे ये लग रहा है, कि उस वक़्त जो फ़ैसला मैंने लिया था, वह शायद सही ही था, मुझे अपने लिए गए फैसले पर कोई पछतावा नहीं है।

        एक बात और कहना चाहता हूँ, कि " आज इतने सालों बाद यह महसूस हुआ कि वो उम्र ही यारों ऐसी होती है, कि अगर हमें किसी से प्यार हो जाए या कोई हमें थोड़ा सा प्यार दे दे, तो हम उसके लिए अपनी जान तक देने को तैयार हो जाते है। तब हमें प्यार के अलावा और कुछ भी नहीं दीखता। लेकिन जब ज़िम्मेदारी का एहसास होता है, तब जाके पता चलता है, कि प्यार अपनी जगह ठीक और हम और हमारी, हमारे अपनों के लिए ज़िम्मेदारी अपनी जगह होती है। ज़िंदगी जीने के लिए प्यार का होना बहुत ज़रूरी है, मगर सिर्फ प्यार के सहारे ही ज़िंदगी नहीं चलती, इस बात का एहसास हमें बहुत देर से होता है और जब तक इस बात का हमें एहसास होता है, तब तक ज़िंदगी हमारे हाथों से निकल जाती है। 

         तो दोस्तों, क्या आप बता सकते हो, कि अविनाश ने प्यार और स्वाभिमान में से स्वाभिमान को चुनकर फ़ैसला सही किया या गलत ?


                                                                                          32) हिम्मत 

       सुषमा अभी सिर्फ १७ साल की ही थी, मगर कहते है ना, कि " लड़कियांँ वक़्त से पहले ही जवान हो जाती है," वैसे ही सुषमा का यौवन दिखने में २० साल की लड़की जैसा था और तो और वह दिखने में भी पहले से ही बहुत सुंदर थी, एक ही बार में किसी का भी दिल उस पर आ जाए, तो फ़िर ये तो सब दारू के नशे में रहनेवाले पियक्कड़ थे। 

       हाँ, तो दोस्तों, आज मैं बात करने वाली हूँ, उस बस्ती की, जिस बस्ती में पैसो के लिए लोग कुछ भी करने को राज़ी हो जाते है, वह लोग सिर्फ़ एक ही भाषा जानते है, वह है, " भूख़ "। चाहे वो भूख़ रोटी की हो या हवस की। इसके लिए वह कुछ भी कर जाते है। अब आगे...  

       वैसे ही सुषमा का बाप भी रोज़ रात को नशे में घर आकर पैसो के लिए बीवी-बच्चों को मारता है, उन पर अपना रॉब जमाता है, जुआ खेलता रहता है, जुए में वह हर बार अपना सब कुछ हार जाता है, यहाँ तक की अपनी खोली भी वह जुए में हार जाता है, एक दिन तो उसने अपनी बड़ी बेटी सुषमा को नशे में दाव पर लगाया, वह तब भी हार गया। सुषमा की माँ कुसुम जैसे-तैसे करके लोगों के घर के बर्तन-झाड़ू कर के अपना घर चलाती है, जिस रात सुषमा के बाबा दाव पर लगी, सुषमा को हार गया, उसी रात दूसरा पियक्कड़ सुषमा को घसीटता हुआ, उसे अपने साथ ले जाने लगा, सुषमा की माँ अपनी बेटी को बचाने उसके पीछे जाती है, कुसुम ने उस पिय्यकड़ को रोकने की बहुत कोशिश की, तो  सुषमा के बाबा ने कुसुम के सिर पर लाठी दे मारी, उसी वक़्त सुषमा की माँ बेचारी गिर के बेहोश हो गई, सुषमा के बाबा ने अपनी दूसरी बेटी राधा को दूसरे कमरे में बंद कर दिया, ताकि दोनों बाहर ना आ सके और वह पिय्यकड़ सुषमा को घसीटते हुए किसी अँधेरी खोली में ले गया।  

       उस हैवान को नन्ही सी जान पर ज़रा भी दया नहीं आई। पूरी रात वह हैवान उसके मज़े लेता रहा और सुषमा दर्द के मारे चीख़ती-चिल्लाती रही। सुबह होने से पहले वह हैवान सुषमा को उसकी खोली के आगे फ़ेक आया। क्योंकि सुषमा का सौदा सिर्फ़ एक रात के लिए ही हुआ था। उस एक रात ने सुषमा को इंसान से पथ्थर बना दिया। सुषमा कि माँ को होश आने पर, उसने अपने घर का दरवाज़ा खोला तो, दरवाज़े के आगे सुषमा बेहोश हालत में पड़ी हुई थी, उसके कपड़े भी फटे हुए थे, उसका आधा नंगा बदन साफ-साफ दिख रहा था। सुषमा की माँ को अकेले ही सुषमा को उठा के घर के अंदर लाना पड़ा, सुषमा की माँ ने उसके बदन को पानी से साफ किया, उसके शरीर पर पड़े निशान से साफ पता चल रहा था, कि रात को उसके साथ क्या हुआ होगा ? मगर यह किस से कहे ? सुषमा की माँ ने रोते हुए सुषमा को दूसरे कपड़े पहनाए। उस वक़्त कुसुम का मन किया, कि यहाँ से भाग जाए मगर जाए भी तो कहाँ ? जहाँ खाने को रोटी नहीं, वहांँ सिर छुपाने के लिए जग़ह कहाँ मिलेगी ? और वह भी दो जवान होती हुई बेटी के साथ ? 

    रोज़ रात को ऐसे हैवानो की कामना जाग उठती है और उसकी हैवानियत का शिकार किसी भी घर की बहु, बेटी या माँ हो जाती है क्योंकि ऐसा सिर्फ़ सुषमा के साथ ही नहीं, उसकी माँ के साथ भी कई बार हो चूका था और बस्ती में शायद ओर भी कई औरतों और लड़कियों के साथ ऐसा होता होगा मगर डर और शर्म के मारे कोई किसी को कुछ नहीं कहता और रात के अँधेरे मैं हुए ऐसे दर्दनाक हादसे को सुबह होते ही भुला दिया जाता है और अपने मन में और झोपड़ी में ही छुपा दिया जाता है। मगर कुसुम को इस बात का अंदाज़ा नहीं था, कि उसका पति किसी दिन दाव पर अपनी बेटी को भी लगा देगा।         थोड़ी देर बाद सुषमा की आँख खुलती है, अपने सामने अपनी माँ को देखकर माँ के गले लग कर रोने लगती है और रोते-रोते कहने लगती है, कि " माँ, मुझे बहुत दर्द हो रहा है, कल रात उसने मेरे साथ बड़ा गन्दा बर्ताव किया, मुझे थप्पाड़ भी मारा, कल रात उस पियक्कड़ ने मुझ को कहीं अँधेरी खोली में ले जाकर मेरे सारे कपड़े फाड़ डाले, मैं अपने बचाव के लिए इधर-उधर खोली में भागति रही मगर मुझे बचाने के लिए कोई नहीं आया, मैंने तुम को भी कितनी आवाज़ लगाई माँ, तुम कहाँ रह गई थी ?  और तो और मेरी आवाज़ बाहर न जा सके इसलिए   उस पियक्कड़ ने मेरे मुँह में पहले से कपड़ा धुस दिया था, मेरे हाथ भी रस्सी से बांध दिए थे और तो और उसने....। " माँ क्या कहती, माँ ने सुषमा के होठों पर, हाथ रख के उसे चुप रहने को कहा, और कहाँ," बस बेटी बस, चुप हो जा, मुझे सब पता है, आगे क्या हुआ, मैं नहीं सुन पाऊँगी। " 

    कुसुम मन ही मन सोचती है, " और तो और अगर इस बात का पता, बस्ती में लग जाए, तो दूसरे हैवानो की नज़र भी उस पर पड़ती और वह भी उसे पाने की कोशिश में लग जाते। काश ! उस दरिन्दे से मैं अपनी फूल सी बेटी को बचा के रख पाती। "

     कुछ देर तक कुसुम की आँखों से आँसू की धारा बहती ही जाती है और वह अपनी फूल जैसी गुड़िया को गले से लगा कर प्यार करती रहती है । 

         कुछ देर बाद सुषमा ने माँ को कहा, " तुम बाबा को छोड़ दो। हम कहीं और चले जाएँगे, हमें बाबा के साथ नहीं रहना, वह भी बहुत गंदे है, रात को नशे में बाबा भी कभी-कभी मेरी छाती पर हाथ फेरते रहते है। मैं तुम को कैसे बतलाती ? मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता।"

      यह सुनकर सुषमा की माँ का कलेजा ही फट गया और सुषमा की माँ ने कहा, " उस हैवान की इतनी ज़ुर्रत ? आज हाथ फैरता है, कल वह नशे में कुछ भी कर सकता है। तू ठीक कहती है, बेटी, हम यहाँ नहीं रहेंगे, कहीं और चले जाएँगे, आज तेरे साथ जो हुआ वह तेरी बहन के साथ भी हो सकता है, उस से पहले ही हम यहाँ से चले जाएँगे। "

    सुषमा ने कहा, " हां माँ, अब मुझे भी यहाँ नहीं रहना है। " दोनों माँ-बेटी एक दूसरे से लिपत के रोने लगे। अब आगे... 

       कुसुम को उस वक़्त तो क्या करे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन कुसुम ने उस वक़्त सुषमा को " मैं कुछ सोचती हूँ, " कहते हुए, सुषमा को चुप रहने को और आज के दिन कमरे से बिलकुल बाहर निकलने को मना किया। वैसे भी उस हैवान ने सुषमा की हालत कहीं जाने के लायक छोड़ी ही नहीं थी। कुसुम रोज़ की तरह घर का खाना बनाकर सुषमा को कमरे में बंद कर के अपने काम के लिए चली जाती है। इतफ़ाक़ से वह जिस घर में झाड़ू-पोछा करती थी, वह घर एक बॅरिस्टर बाबू का ही था। सुषमा ने पहले तो बॅरिस्टर बाबू से कुछ नहीं कहा, मगर बॅरिस्टर बाबू को आज सुषमा का बर्ताव और उसका चेहरा कुछ अलग लगा, तो बॅरिस्टर बाबू ने कुसुम से ही पूछा, कि क्या बात है, आज आप इतनी दुखी और परेशान क्यों लग रही हो, कुछ बात भी नहीं कर रहे हो ? कुसुम ने कहाँ, कोई बात नहीं बॅरिस्टर बाबू, हम बस्ती वालों के तो नसीब ही फूटे हुए है, हमें तो दर्द से गुज़रना ही पड़ता है। 

        बॅरिस्टर बाबूने कहा, बस यही तो तुम लोगों की कमज़ोरी है, कुछ बताओगे नहीं, तो हम को पता कैसे चलेगा ? आप लोग जब तक ज़ुल्म सहते जाएंँगे, तब तक ज़ुल्म करने वाले ज़ुल्म करते रहेंगे, किसी को तो आवाज़ उठानी ही होगी ना ! 

     बॅरिस्टर बाबू की बात सुनते ही कुसुम की आँखों में छुपे आँसू बहने लगे और कुसुम को अपनी बेटी की चीख सुनाई दे रही थी, कि " उसने मुझे क्यों नहीं बचाया ?" बॅरिस्टर बाबू के बहुत पूछने पर आज कुसुम ने रात की बात बॅरिस्टर बाबू को बता दी। 

      कुसुम की बात सुनते ही बॅरिस्टर बाबु की आँखों में भी आँसू आ गए और गुस्सा भी, खड़े होते हुए वह बोले, कि " अब भी तुम बस चुप ही रहना चाहती हो ? क्या तुम चाहती हो, की आज जो सुषमा के साथ हुआ वह हर रात उसके साथ हो ? और वही सब राधा के साथ हो ? तुम कैसी माँ हो ? तुम्हारी जगह में होता तो, वह हैवान जेल में होता। 

        कुसुम ने कहा, उस पर केस करेंगे, तो मेरी सुषमा की कितनी बदनामी होगी, उस से कई सवाल पूछे जाएँगे, जिसका जवाब उसे सब के सामने देना पड़ेगा और यह हम नहीं चाहते, बस इसी बजह से चुप है। बस अब किसी भी तरह उस घर को और उस पियक्कड़ को छोड़ देने का फ़ैसला किया है और कहीं दूर चले जाएँगे, मगर कहाँ जाऊँ दो बच्ची को लेकर समझ नहीं आ रहा, हम गरीब के पास इतने पैसे भी तो नहीं है, और तो और दुनिया ऐसे हैवानो से भरी पड़ी है, जहाँ जाए, ये ख़तरा तो हर वक़्त हम औरत के सिर पर लगा ही रहता है, घर में ही हम औरत सुरक्षित नहीं है, तो बाहर कैसे सुरक्षित रह सकेंगे ? किस-किस से बचे और कब तक ? आप तो सब जानते ही है, आप जैसे लोग दुनिया में बहुत ही कम होते है, जो औरत को समज़ते है और उनका सम्मान भी करते है। 

        बॅरिस्टर बाबू को भी पता था, कि आखिर कोर्ट में ऐसा ही होगा, इसलिए वह कुछ देर सोचने लगे और कहा, कि देखो, " तुम वैसे तो सच ही कह रही हो, तो तुम ऐसा कर सकती हो, कि यहाँ पास में मेरी अपनी भी एक खोली है, जो अभी खाली पड़ी है, जिसे हम बेचने के बारे में सोच रहे थे और वैसे भी वह बहुत छोटी है, तो शायद ज़्यादा क़ीमत उसकी नहीं आनेवाली। तो तुम ऐसा करो, अभी के लिए अपनी बेटी सुषमा और राधा को लेकर मेरी खोली में रहो, यहाँ आस-पास सब लोग भी अच्छे रहते है, तो तुम्हें और तुम्हारी बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी, उसका अच्छे से डॉक्टर के पास इलाज कराओ और उसकी पढाई भी जारी रखो, अगर वह ज़्यादा पढ़ लेगी, तो उसे तुम्हारी तरह यूँ घर-घर जाकर काम नहीं करना पड़ेगा, उसे अच्छी जॉब मिल जाएगी। मैं सरकारी कॉलेज में उसका दाखिला करा दूँगा, ताकि फीस ज़्यादा ना हो। 

       कुसुम को बॅरिस्टर बाबू जी की यह बात सही लगी, और उसी दिन कुसुम अपना सामान और अपनी दोनों बेटी को लेकर बॅरिस्टर बाबू जी के बताए हुए खोली में जाकर रहने लगी। कुसुम का पति उसे ढूंँढता रहा, ढूंँढता ढूंँढता वह उस खोली तक भी आ गया, जहाँ कुसुम और उसकी बेटी रहते थे। कुसुम के पति ने उसे घर वापस आने को कहा और उसे रण्डी भी कहा, लेकिन इस बार कुसुम ने तय कर दिया था, कि वह अपने पति के साथ नहीं जाएगी और कुसुम ने बॅरिस्टर बाबु का दिया हुआ बड़ा सा डंडा उठाया और अपने पति को दिखाते हुए ज़ोर से गुस्से में कहा, कि " अगर ज़िंदा रहना चाहते हो, तो अब वापस इधर मत आना और नाही मेरी बेटी की और नज़र उठाके कभी देखना, वार्ना मुझ से बुरा और कोई नहीं होगा। "

      आज कुसुम की आँखें सच में गुस्से से लाल होती देख, कुसुम का पति वहाँ से उसे धमकी देता हुआ चला जाता है, कि " देख लूँगा तुझे और तेरी बेटी को "।  

         कुसुम में अब अपनी बेटी के लिए, सब से लड़ने की जैसे हिम्मत आ गई थी, कुसुम ने अपनी दोनों बेटी को पढ़ाया और बेरिस्टर साहब ने सुषमा को अच्छी नौकरी भी दिलाई, अब कुसुम और उसकी बेटी बिना किसी डर के सिर उठाकर ज़िंदगी जी रहे है। 

        तो दोस्तों, ज़ुल्म तब तक ही सहना चाहिए, जब तक बर्दास्त कर सको, जब तक सामने वाला अपनी हद में हो। आज जैसे हिम्मत दिखा के कुसुम ने अपनी दोनों बेटी को उस बदनाम बस्ती से भी निकाला और उनका जीवन बचा लिया, उसी तरह अगर कुसुम ने यही हिम्मत पहले दिखाई होती तो, उसकी बेटी को उस रात उस हैवान से बचा सकती। कुसुम ने अपनी बेटी के लिए हिम्मत दिखाकर बस्ती छोड़कर और अपने पति को धमका कर सही फैसला लिया ?   

     #वक़्त अच्छा हो तो सब अपने नहीं तो सब पराए
                     33)  वक़्त का ख़ेल  
  आधी रात को अपने ही बंगले के चारों ओर चक्कर लगाते हुए सौरभ अपनी ही धून में तेज़ दौड़ लगा रहा था। जैसे कि उसे किसी को हराना हो, उसकी आँखें गुस्से से आग बबूला हो रही थीं, उसे वक़्त और जगह का भी कोई होश नहीं था। तभी सौरभ की माँ उसे पीछे से आवाज़ लगाती है,
      " सौरभ बेटा, ये इतनी रात को क्यों दौड़ रहे हो ? अभी सुबह होने में बहुत देर है, घर में आकर सो जाओ। तुम्हें तो पता ही है, कि जब तक तुम नहीं सो जाओगे, मुझे नींद नहीं आती। "
          माँ की आवाज़ सुनते ही सौरभ दौड़ता हुआ वहीं रुक जाता है, उसकी साँसे भी फूल जाती है, उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ हो गया था। सौरभ हाँफते हुए अपनी माँ को जवाब देता है, "आया माँ, बस आप चलो। "       
        उसी वक़्त ऐसा कहते हुए सौरभ की नींद टूट जाती है और वह अपने आप को वहीं अपने छोटे से घर में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ महसूस करता है और एक बार घडी की ओर देखता है, अभी तो रात के दो बजे हुए थे और सौरभ फ़िर से सोच में पड़ जाता है, " ये वक़्त भी कितना बेरहम है, कल वक़्त के साथ मैं चलता था और आज वक़्त ने ही मेरा साथ छोड़ दिया। वक़्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है, लोग भी रास्ते भी, एहसास भी और कभी-कभी हम खुद भी। ज़िंदगी एक बात तो सिखा ही देती है, कि ज़िंदगी के सफर में अगर हमारा वक़्त अच्छा हो, तो सब अपने साथ होते है, अगर जो वक़्त ने हम से एक बार मुँह मोड़ लिया, तो हर कोई हम से भी मुँह मोड़ लेता है, अपने भी पराए होने लगते हैं, वहांँ गैरों से क्या शिकायत करें ? " 
       सौरभ की आवाज़ सुनते ही बगल वाले कमरें से सौरभ की माँ उस के पास आती है और सौरभ से पूछती है, " क्या हुआ बेटा ? तुमने मुझे आवाज़ लगाई ? तुम्हें कुछ चाहिए था ? तुम ठीक तो हो ना बेटा ? "
         अपनी माँ के सवाल सुनकर सौरभ की आँखें भर आती है, वह अपनी माँ को गले लगा कर पूछता है, कि " वक़्त ने हमारे साथ ही ऐसा मज़ाक क्यों किया ? मैं फीर से अपने पैरो पर कब चल सकूँगा ? कब दौड़ सकूँगा ? मुझे पापा की बहुत याद आ रही है, पापा हमें यूँ अकेला छोड़कर क्यों चले गए माँ ? उन्होंने एक बार भी नहीं सोचा, कि उनके जाने के बाद हम उनके बगैर कैसे जिएँगे ? "
          सौरभ की माँ ने सौरभ को समझाते हुए कहा, कि " उपरवाले की मर्ज़ी के आगे, भला किस की चली है ? कल वक़्त हमारा था, आज नहीं तो क्या हुआ ? कल ये वक़्त फ़िर से हमारा होगा, बस तू उम्मीद मत छोड़, जैसे वो वक़्त भी नहीं रहा, वैसे ही यह वक़्त भी नहीं रहेगा। हमारा वक़्त ज़रूर बदलेगा, तुम देख लेना और पहले की तऱह तुम अपने पैरो पर चल भी सकोगे और दौड़ भी सकोगे। ज़िंदगी से हम नहीं हारेंगे, ज़िंदगी को हमें हराना है। हर सुबह उम्मीद की एक नई किरण अपने साथ लेकर आती है, उसके साथ हमें भी उम्मीद बनाए रखनी है। "
          अपनी माँ की बात सुनते ही सौरभ को बड़ी हिम्मत मिलती, सौरभ की आँखों में उम्मीद की नई किरण जाग उठती है । अब आगे... 
             सौरभ सुबह उठकर अपना लेपटॉप लेकर अपने काम में लग जाता है, सौरभ ने ऑनलाइन जॉब शुरू कर दी थी, ताकि वो घर बैठकर कुछ कर सके। तभी लेपटॉप में सौरभ की नज़र शालिनी की तस्वीर पर पड़ी और कुछ वक़्त के लिए सौरभ फ़िर से अपने बीते हुए वक़्त में चला जाता है, उसे जैसे याद आ रहा था, कि " कैसे उसने शालिनी को वैलेंटाइन डे के दिन शादी का प्रपोज़ किया था और कैसे धूम-धाम से दोनों की शादी हुई थी, शहर के हर रईस लोग उस शादी में आए हुए थे, क्योंकि ये शादी लखनऊ के सब से बड़े बिज़नेस मेन के एक लौटे बेटे सौरभ की शादी जो थी। "
        उस वक़्त शायद सौरभ का वक़्त बहुत अच्छा चल रहा था, मगर कहते है, ना कि, " ज़िंदगी का हर वक़्त एक सा हो, ऐसा हो नहीं सकता। " बस ऐसा ही कुछ सौरभ की ज़िंदगी में भी हुआ। 
          सौरभ और उसके पापा की ख़ुशहाल ज़िंदगी से सब जलते थे। सौरभ के पापा के दो और छोटे भाई भी थे, जिनका बिज़नेस भी सौरभ के पापा के साथ ही जुड़ा हुआ था। सौरभ के पापा उम्र में और तजुर्बे में सब से बड़े थे, तो घर हो या बिज़नेस का सारा बड़ा छोटा फ़ैसला वही लेते थे और उनका हर फ़ैसला सही भी होता था, मगर यह बात सौरभ के दो चाचाओं को ज़रा ख़टकती रहती थी, हर महीने पैसो के लिए अपने बड़े भाई के सामने हाथ फ़ैलाने पड़ते थे, इस बात से दोनों परेशान हो गए थे, तब सौरभ के दो चाचाओं ने मिलकर सौरभ के पापा को ग़ैरकानूनी सामान विदेश भेजने के झूठे केस में फँसाया ताकि उनको जेल हो जाए और उनका पूरा बिज़नेस वह अपने नाम करवा ले मगर जैसे ही सौरभ के पापा को पता चला, कि " उन्हीं के दो भाइयों ने मिलकर उन्हें झूठे केस में फँसाया है, तब उन्हें उस बात का बहुत दर्द हुआ और उनको हार्ट अटैक आया, क्योंकि वह अपने परिवार से खास कर अपने भाइयों से बहुत प्यार करते थे। सौरभ के पापा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, कि उनके ही भाई उनके साथ ऐसा करेंगे। "
      उस वक़्त सौरभ अपनी बीवी शालिनी के साथ सिंगापूर से फ्लाइट में लौट रहा था। उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। 
           सौरभ की माँ उस वक़्त उसके पापा के पास ही थी, तो उसने तुरंत अपने पति को अस्पताल में भर्ती कराया, सौरभ के पापा अपने आखिरी वक़्त में उनके साथ जो भी हुआ, वह सब सौरभ की माँ को बताना चाहते थे, मगर वह कुछ कह पाते उस से पहले ही उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली।  
           उस तरफ़ जब सौरभ को पता चला, कि अस्पताल में उसके पापा आखरी साँस ले रहे है, तब जल्दबाज़ी में सौरभ अस्पताल पहुंँच तो गया, लेकिन सीढ़ियाँ जल्दबाज़ी में चढ़ने की बजह से उसका पैर फिसल जाता है और वह उलटे मुँह पूरी लम्बी सीढियों से गिर जाता है, शालिनी उसके साथ ही थी, सौरभ को गिरता देख, शालिनी ज़ोर से चिल्ला उठी, सौरभ के पैर में बड़ी ज़ोरो से चोट लगी, कि उस वक़्त वह खड़ा भी नहीं हो सका। तब अस्पताल में वॉर्ड-बॉय सौरभ को उठाकर एक कमरे में ले गए और डॉक्टर उसका इलाज करने लगे, मगर सौरभ तो उस वक़्त एक ही धुन लगाए हुए था, कि " उसको उसके पापा के पास जाना है।" लेकिन जब तक वह उसके पापा के पास पहुँचता है, तब तक तो सौरभ के पापा ने अपनी आँखें बंद कर दी थी। सौरभ ज़ोर-ज़ोर से पापा-पापा कहते हुए बस चिल्लाता रहता है और वही बेहोश हो जाता है। 
         सौरभ को जब होश आता है, तब वह व्हील चेयर पर अपने पापा की तस्वीर के सामने बैठा हुआ था। सौरभ व्हील चेयर से खड़ा होने की कोशिश करता है, लेकिन नहीं हो पाता, उसका एक पैर पैरालिसिस हो चूका होता है, जिस बात से वह अनजान था। अब आगे... 
         सौरभ भी उसके पापा के साथ ही बिज़नेस करता था, लेकिन इस वक़्त उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह इस वक़्त अपने पापा की अचानक से हुई मौत के ग़म में डूबा हुआ था और वह चल भी नहीं सकता था। इसलिए सौरभ ने कुछ दिनों के लिए बिज़नेस की सारी ज़िम्मेदारी अपने दोनों चाचाओं को दे दी। वो दोनों तो वैसे भी ऐसा ही चाहते थे, तो सौरभ के चाचा ने मौके का फ़ायदा उठाकर प्रॉपर्टी और शेर के पेपर्स पर धोखे से सौरभ और उसकी माँ के दस्तख़त ले लिए। जब तक सौरभ को इस बात का पता चलता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी, शालिनी भी एक अपाहिज और बेकार इंसान के साथ ज़िंदगी भर नहीं रह सकती, कहते हुए वह भी उसे छोड़कर अपने दूसरे बॉय फ्रेंड के साथ चली गई।
         सौरभ और उसकी माँ अब एक छोटे से घर में रहते है, ये घर भी वही घर है, जो सौरभ के पापा ने उसके वॉच-मेन को उस वक़्त दिया था, जब उसके पास रहने को घर नहीं था, एक बार बरसात की बाढ़ में उसका घर डूब गया था, तब सौरभ के पापा को उसकी बहुत दया आई थी, तब सौरभ के पापा ने वॉच-मेन को रहने के लिए छोटा सा घर दिया था।
       वॉच-मेन ने सौरभ और उसकी माँ से कहा, कि " मेरे बुरे वक़्त में साहब ही थे, जिन्होंने मेरी हर तरह से मदद की थी, उस वक़्त मैं यही सोचता था, कि मैं उनके इस एहसान का बदला कैसे चुकाऊँगा ? और अगर आज वक़्त ने ये मौका मुझे दिया है, तो मैं उसे ज़रूर निभाऊँगा। ये मेरा नहीं बल्कि आपका ही घर है और आप जब तक चाहे यहाँ रह सकते हो, वैसे तो मेरे पास इस खोली के अलावा आप को देने के लिए कुछ नहीं, लेकिन मुझ से जितना हो सकेगा, उतनी मदद मैं आप लोगों की ज़रूर करूंँगा। कोई भले ही आपका साथ दे या ना दे, आप के पापा को गलत समझे, मगर मैं जानता हूँ, वह कितने नेक इंसान थे, वह किसी के बारे में गलत सोच भी नहीं सकते थे, तो किसी का बुरा क्यों करेंगे ? मैं आप के साथ हूँ। " 
       ऐसा कहते हुए वॉच-मेन सौरभ और उसकी माँ को अपनी खोली में पनाह देता है, दोनों मजबूरन उस खोली में रहते है। सौरभ के डॉक्टर ने कहा, कि उसके पैरो के ऑपरेशन के लिए बहुत सारे पैसे चाहिए, जो इस वक़्त उसके पास नहीं थे। 
     और तो और वो सारे सौरभ के निकम्मे दोस्त जो हर वक़्त हर पार्टी में उसके इर्द-गिर्द घुमा करते थे, वह आज सौरभ से मिल के चले जाते थे और सिर्फ ये कहते थे, कि " उनसे जितना हो सकेगा, उसकी मदद करेंगे, मगर एक बार जाने के बाद कोई लौट के वापिस देखने तक नहीं आया, कि सौरभ और उसकी माँ आज किस हाल में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। ऐसे वक़्त में सौरभ के साथ खड़ा रहने वाला नाही कोई रिश्तेदार था और नाही कोई दोस्त... बस सौरभ की माँ ही थी, जो हर पल उसे हौसला दिलाए रखीं थी। 
        कुछ महीनो बाद म्यूच्यूअल फंड कंपनी में से सौरभ को फ़ोन आता है, की " आप के पापा ने आप की और आप की माँ के नाम म्यूच्यूअल फण्ड में जो पैसे सालो पहले भरे थे, उसकी रकम अब आप को मिलने वाली है। " ऐसा सुनते ही सौरभ और उसकी माँ के जान में जान आती है और वह भगवान् का शुक्रियादा करते है, उस पैसो से सौरभ ने सब से पहले अपने पैरों का ऑपरेशन करवाया, कुछ ही महीनो में वह फ़िर से चलने लगा, दौड़ने लगा।
       सौरभ ने ठान लिया था, कि जिसने भी उसके पापा से उसका हक़ छीना है, उसे वह सबक सीखा कर ही रहेगा। इसलिए सौरभ ने वही चाल अपने चाचा के साथ चली, जो एक साल पहले उसके चाचा ने उसके पापा के साथ किया था,  वो कहते है ना ! " जैसी करनी वैसी भरनी। " दोनों चाचाओं को जेल हो गई और सौरभ ने फिर से अपने पापा का बिज़नेस संँभाल लिया और अपनी मेहनत और लगन से कामियाबी की सीढ़ी चढ़ने लगा। जब शालिनी को पता चला, कि सौरभ फ़िर से ठीक हो गया है और उसने अपना बिज़नेस हैंड ओवर कर दिया है, तो वह फ़िर से सौरभ के पास आती है और उसकी गलती के लिए माफ़ी मांगती है, मगर सौरभ ने उस से अब मुँह फेर लिया, वक़्त के साथ जो रिश्तों को तोड़ दे, वैसे रिश्तों के साथ अब वह नहीं रहना चाहता था। 
         लेकिन उसका मन उसके पापा जैसा ही था, इसलिए उसने अपनी चाची और दूसरे भाई के बारे में सोचते हुए चाचा को जेल से कुछ दिनों के बाद रिहा करवा दिया और उनको छोटा सा अलग घर रहने को दे दिया और एक छोटी फैक्ट्री भी उनको ही सँभालने दे दी, जो पहले उनकी हुआ करती थी, सौरभ के चाचा ने सौरभ की माँ से भी माफ़ी मांँग ली, लेकिन अब सौरभ की माँ को भी ऐसे रिश्तों के साथ जीना मंज़ूर नहीं था, जो वक़्त के साथ बदल जाते है। इसलिए वह सब अलग हो गए। अब उस घर में सिर्फ़ सौरभ और उसकी माँ ही रहते है, और वो वॉच-मेन जो अब सौरभ और उसकी माँ के लिए खाना बनाता है, दोनों का ख़याल रख़ता है और पूरे घर की देखरेख भी करता है।  
             एक दिन सुबह-सुबह सौरभ अपनी बालकनी में खड़ा रहकर दूर आसमान में देख रहा था, तब उसकी माँ उसके पास आती है और कहती है, कि मैंने कहाँ था, ना कि " हमारा वक़्त भी ज़रूर बदलेगा। कल जो वक़्त हमारे साथ था, आज भी है, बस कुछ रिश्तें पीछे रह गए, वो कहते है, ना, कि " वक़्त अच्छा हो तो सब अपने नहीं तो सब पराए। " ऐसा सुनते ही सौरभ अपनी  माँ को गले लगा लेता है। दोनों की आँखें भर आती है। 
           तो दोस्तों, सौरभ ने आखिर में अपने चाचा की मदद कर सही फैसला किया या गलत ? ज़रूर बताइएगा। 

                    34) अपनापन

               #१०० शब्दों की कहानी 

            आज से 5 साल पहले मेरे बेटे और बहु की एक्सीडेंट में हुई मौत के बाद उनके बेटे अथर्व की ज़िम्मेदारी हम पर आ गई । मेरी पेंशन से घर का ख़र्चा निकल जाता, मगर जैसे अर्थव बड़ा होने लगा, वैसे वैसे पैसो की कमी महसूस होने लगी। तब हमने अपने घर का ऊपर का माला भाड़े पर दे दिया ताकि अथर्व की पढाई चल सके। 

        किराएदार के रुप में भगवान् ने रवि और रीता को हम से मिला दिया कयोंकि एक बेटे और बहु की तरह दोनों ने हमारे टूटते परिवार को और अथर्व को सँभाल लिया। रवि और रीता से अब तो इतना अपनापन हो गया, कि अगर एक दो दिन वे दोनों कहीं बाहर जाए तो भी हमारा घर सुना-सुना लगने लगता। 

     वो कहते है ना, कि कभी-कभी कुछ पराए भी अपनेपन का फ़र्ज़ निभा जाते है।  



               35) चेहरे पे चेहरा 

#दोहरे-चेहरे 

        डिम्पल के पापा ने डिम्पल की शादी एक बहुत ही बड़े घराने में की थी, उनको ये नहीं पता था, कि " ऐसे बड़े घरो में रहनेवाले लोगों के हाथी के दाँत दिखाने के कुछ ओर और चबाने वाले दाँत कुछ और होते है.. "
        डिम्पल एक बहुत खुले विचारों वाली पढ़ी-लिखी लड़की थी, घूमना फिरना, लोगों के साथ बाहर जाना, नई-नई चीज़ें देखना, समझना, महसूस करना, उसे अच्छा लगता था, पढाई में भी डिम्पल नंबर वन थी, इसलिए डिम्पल ने शादी से पहले ही अपने ससुराल में सब को बता दिया था, कि " इंजिनयरिंग की पढाई के बाद में जॉब करना चाहती हूँ, नाकि घर सँभालना। " तब तो डिम्पल के ससुराल वालो ने डिम्पल की हर शर्त को, हर बात को मंज़ूर कर लिया और डिम्पल की शादी भी बहुत धूम-धाम से हुई। डिम्पल के ससुराल वालों की सोने के गहने बेचने की दूकान थी, वो लोग सुनार थे, तो काफी सोने के गहने घर में भी रखा करते थे। 
     लेकिन शादी के कुछ ही दिनों में डिम्पल को पता चलने लगा, कि उसके लिए ये घर-घर नहीं बल्कि सोने का पिंजरा है, क्योंकि शादी के बाद डिम्पल और उसका पति दिनेश हनीमून पर भी नहीं जा पाए थे, क्योंकि उसकी सास अचनाक से बीमार हो गई या तो उसने बीमारी का दिखावा किया, डिम्पल को बाद में ऐसा लगा। उनको डॉक्टर ने बेड रेस्ट के लिए बोला था। ऊपर से घर में ढेर सारे सोने के गहने रखे हुए थे। इन गहनों को सँभालने के लिए हमें घर से बाहर जाना मना था, अगर कोई पूछे तो माँ की बीमारी का बहाना बनाया जाता। यहाँ तक की शादी के कुछ ही दिनों बाद डिम्पल को जॉब करने से भी मना कर दिया गया। कहते हुए कि " हमारे पास पहले से ही इतना कुछ है, तुम्हें अब जॉब करने की कोई ज़रूरत नहीं, लोग हमारे पीछे बातें करेंगे, कि इतना पैसा होते हुए भी नई बहु घर से बाहर जॉब करने जाती है। तुम तो वैसे भी बहुत समझदार हो, तुम्हें ज़्यादा समझाने की हमें ज़रूरत नहीं है। " ऐसी मीठी-मीठी बातें कर के डिम्पल को अपनी बातों से मना लिया करते और समझाते हुए कहते, कि " तुम वैसे भी घर पर रहकर हमारे लिए ही नए-नए डिज़ाइन हमें बना के दो तो हमारा काम भी आसान हो जाएगा और तुम्हारा वक़्त भी कट जाएगा। "
     डिम्पल ने एक दिन अपने पति दिनेश से  कहा, कि " मुझे यूँ घर में रहना पसंद नहीं, मुझे जॉब करने जाना है, बाहर जाना है, यूँ घर में मेरा दम घुटता है। "
      दिनेश ने भी डिम्पल को समझाते हुए कहा, कि " अच्छा, मैं पापा और मम्मी से बात करता हूँ, तुम्हें जॉब पर जाने देंगे। "
       लेकिन वह भी आखिर है, तो अपनी बाप की ही औलाद ना। दिनेश कभी अपने पापा-मम्मी से डिम्पल के बारे में बात नहीं करता था उल्टा डिम्पल की सास चुपके से दिनेश को समझाया करती थी, कि " देखो बेटा, बहु घर में रहे, इसी में हमारी शान है, लोग क्या कहेंगे, वो तो शादी से पहले लड़की का घर परिवार अच्छा था, इसलिए उसकी शर्त मान ली, अब सब कुछ उसी के मन का हो, ऐसा ज़रूरी तो नहीं। " ये सब मैंने अपने कानो से सुन लिया था, उस दिन तो मैं पूरी की पूरी टूट के बिखर गई थी। 
     घर में सब पूरा दिन बहु-बहु करते रहते, घर में अगर कोई मेहमान आया हो तो उनके सामने भी डिम्पल की तारीफ़ करते नहीं थकते और डिम्पल की पीठ पीछे उसे ही चुप कराने की कोशिश में लगे रहते। डिम्पल ने ऐसे दोहरे-चेहरे वाले लोगों को अपनी ज़िंदगी में पहली बार देखा था। 
      घर के बाहर भी पहरेदार रखे हुए थे, घर के हर कोने में cctv कैमरे लगे हुए थे, प्राइवेसी जैसी तो कोई चीज़ ही नहीं थी, हर वक़्त डर-डर के जी रहे हो जैसे....  
      बाहर की दुनिया में ये लोग ऐसा दिखावा करते की हम बहुत सुखी हैं, हमें किसी बात की कोई परेशानी नहीं है और घर में सब डर-डर के जीते है, कि कहीं किसी दिन कोई चोरी-चपाती, या घर में खून-खराबा ना हो जाए। आख़िर कब तक डिम्पल इस सोने के पिंजरे में रह सकती, इसलिए आख़िर एक दिन डिम्पलने ये सोने का पिंजरा तोड़ दिया और उड गई, खुले आसमान में, जहाँ ना कोई डर है, नाहीं कोई पाबन्दी। 
          डिम्पल ने पहले तो यह बात अपने मायके में किसी को नहीं बताई मगर बाद में जब कुछ महीनों बाद उसे अपने मायके भी जाने से किसी न किसी बहाने से रोक लिया करते तब, डिम्पल के पापा के बार-बार पूछने पर एक दिन डिम्पल ने अपने पापा को फ़ोन पर ही अपने ससुराल के बारे में सब कुछ सच-सच बता दिया। उसके बाद उसके पापा खुद डिम्पल को लेने उसके ससुराल चले गए और वहांँ से डिम्पल को अपने साथ अपने घर ले आए, अब डिम्पल एक बड़ी कम्पनी में जॉब करती है, वह बहुत ख़ुश भी है और आज़ाद है। 

सत्य घटना पर आधारित 


                   36) जैसे को तैसा

           मर्यादा एक बहुत बड़ा शब्द है, जो बचपन से हर लड़की को सिखाया जाता है, जैसे,  कि धीरे से बोलो, धीरे से हँसो, बड़ों का मान-सम्मान करो, घर का सारा काम सीखो और भी बहुत कुछ लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है और वह लड़की बिना किसी सवाल किए इन सब बातों का, इन सब रीती-रिवाज़ो को अपने जीवन का हिस्सा मान लेती है और वह मर्यादा के बंधन में बचपन से ही बंध जाती है। बचपन से ही हर लड़की अपना जीवन इन्हीं मर्यादा के मुताबिक जीना सिख लेती है। फिर उस लड़की की जब शादी हो जाती है, तब वह लड़की शादी के बाद भी उसके माँ-बाप ने जो सिखाया उसी के मुताबिक अपने ससुराल में सब का मन जित लेती है। पराए घर और लोगों को कुछ ही दिनों में अपना बना लेती है। अपना पूरा जीवन अपने पति और परिवार की सेवा में समर्पित कर देती है, अब वह लड़की, लड़की न रह कर एक औरत बन जाती है। मगर इतना कुछ करने के बाद भी उसे मिलता क्या है ? सिर्फ और सिर्फ धोखा ? 

         मेरी कहानी की शीला के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था, शादी के बाद उसने अपना जीवन, अपने पति, सास-ससुर और बच्चों के नाम कर दिया था। किसी भी मर्यादा का वह उल्लंघन नहीं करती, अपना पत्नी धर्म वह अच्छे से निभा रही थी और उसे अपने पति पर भी पूरा भरोसा था, लेकिन उसका पति किसी और औरत के चक्कर में था, शीला को जब पता चला तो, उसका दिल टूट गया, तब शीलाने अपने आप से पूछा, " क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में ? या मुझ में ? "

       मगर शीला को अपने सवाल का कोई जवाब नहीं मिला। मन ही मन बस वह अपने आप को कोसती रही, अपने आप को ही इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगी, कि उसकी ही गलती होगी, जो उसका पति उसे छोड़ के किसी और औरत से प्यार करने लगा, उसी के प्यार में कोई कमी रह गई होगी, या तो मैं ही उन्हें ठीक से समझ नहीं पाई, या मैं ही उन्हें अपना वक़्त नहीं दे पाई, जब भी वह मुझ से कुछ कहते मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर उनकी बात टाल दिया करती, मेरा ध्यान अपने पति से ज़्यादा अपने बच्चों और परिवार वालों पर ज़्यादा रहता था, मैंने उनकी कही बातों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया, ऐसा सोचते हुए वह अपने आप को ही इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगी थी।

      शीला जैसे वक़्त के हाथों मजबूर थी, वो अब करे भी तो क्या ? उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह मन ही मन बस अपने आप को ही इस बात के लिए दोषी ठहरा रही थी। उसी की लापरवाही और गैरज़िम्मेदारी की बजह से आज उसके पति उस से दूर हो गए थे। शीला को अपने पति के बारे में सब कुछ पता होने के बावजूद भी वह अपने बच्चों और परिवार वालों की खातिर चुप रही। उसने किसी से कुछ भी नहीं कहा। 

         कुछ दिनों बाद वेकेशन में शीला बच्चों के साथ अपने मायके कुछ दिनों के लिए रहने चली गई, तब वहांँ शीला की बचपन की सहेली मेघा उस से मिलने आई, दोनों ने दिन भर बातें की, बहुत दिनों के बाद आज शीला खुल के हँस पाई, लेकिन उसकी ये झूठी हँसी, उसकी दोस्त मेघा के सामने ज़्यादा देर तक नहीं छिप पाई, मेघा को पता चल गया, कि शीला अब भी मुझ से कुछ छिपा रही है, ज़्यादा पूछने पर शीला ने अपने पति के बारे में मेघा को सब कुछ बता दिया। मेघा ने शीला को पहले तो समझाया, कि इन सब में गलती तुम्हारी ही है, तुम ने ही शायद अपने पति पर ध्यान कम दिया, पूरा दिन काम, काम और काम। अपनी हालत देखो, क्या बना ली है तुमने ? मसाले की दुकान से आई हो ऐसा लगता है, तुम्हें भी थोड़ा घर में बन-ठन के रहना चाहिए। लेकिन जो हुआ सो हो गया, अब आगे की सोचते हैं, सुमित भाई साहेब को भी इतनी अच्छी बीवी को धोखा देने का कोई हक़ नहीं बनता। तुम कुछ बोलती नहीं हो, इसका मतलब यह तो नहीं, की उनकी मर्ज़ी में जो आए वो करे। अब मैं जैसा बोलूँ, वैसा तू करती जा। मैं तुम्हें ऐसे दुखी नहीं देख सकती, सुमित भाई साहब जैसे मर्द को रास्ते पर लाना मुझे अच्छे से आता है, कहते हुए मेघाने अपना प्लान शीला को बताया। 

        पहले तो शीला मेघा की बात से राज़ी नहीं हुई, फ़िर मेघा ने उसे समझाया, अगर अपने पति को अपना बनाना है, तो मेरी बात मानो, मैं जैसा कहुँ बस तुम वैसे ही करती जाओ। तब, मेघा शीला की बात मान गई। बच्चों के वेकेशन की छुट्टी के बाद शीला वापस अपने घर जाती है और शीला बिलकुल वैसा ही करती जाती है, जैसा उसकी दोस्त मेघा ने बताया था, शीला अब अपने काम से ज़्यादा सजने-सँवरने में ज़्यादा ध्यान देती थी, बार-बार अपने मोबाइल पर किसी के साथ बातें करती रहती, पूछने पर कहती, मेरी दोस्त ही है, उसी से बातें करती हूँ, बच्चों पर भी ध्यान कम देने लगी, सुमित का टिफ़िन भी वक़्त पर नहीं बनाती, सुबह भी देर से उठती, सुमित के कपड़े प्रेस किए हुए ना मिलते सुमित की कोई भी चीज़ उसे अब नहीं मिलती, पूरा कमरा बिखरा पड़ा रहता और शीला अपने नाखूनों को नेल पालिश लगाया करती, हर वक़्त सोशल मीडिया पर अपने फोटो अपडेट किया करती, कभी अपनी फोटो तो कभी रील्स बनाके सोशल मीडिया पर अपडेट करती रहती, सीधे मुँह बात भी नहीं करती थी, अगर कुछ पूछे या कहे तो हर बात का उलट-पुल्टा ही जवाब दे देती, अब तो हफ्ते में तीन दिन अपने दोस्त के साथ बाहर जाने लगी, बच्चे और घरवाले भी शीला से अब परेशान हो गए थे, सुमित भी अब तो उसकी ऐसी आदतों से तंग आ गया था। एक बार शीला ने अपनी दोस्त के साथ मॉल में शॉपिंग के लिए जा रही हूँ, ऐसा कहा था और सुमित ने शीला को किसी लड़के से बातें करते, खिलखिला कर हँसते हुए देख लिया, आज तो सुमीत का गुस्सा सातवें आसमान पर था, उस वक़्त सुमित अपने ऑफिस के काम से क्लायंट के साथ मीटिंग कर रहा था, तो उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर जाते ही सुमित ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, " शीला... शीला... कहाँ गई थी, तुम आज ? आजकल तुम कितनी बदचलन हो गई हो ? तुम में किसी की भी शर्म नहीं है, नाहीं किसी का डर, शॉपिंग के बहाने ना जाने किस-किस के साथ घूमती रहती हो ? मेरा तो छोड़ो बच्चों का भी ज़रा सा ख्याल नहीं है तुम्हें, क्या असर पड़ेगा, बच्चों पर, यह कभी सोचा भी है तुमने ? " 

      शीला ने आराम से जवाब दिया," अपनी दोस्त के साथ शॉपिंग करने, उस में इतना चिल्लाने की क्या बात है ? "

   सुमीत ने अपने मोबाइल में किसी लड़के के साथ उसकी फोटो दिखाते हुए कहा, " अच्छा....तो ये कौन है ? तुम या तुम्हारा भूत ? ये लड़का कौन है और तुम आज कल इसके साथ कर क्या रही हो ? हम से झूठ क्यों बोला, की अपनी सहेली के साथ जा रही हो ? कहाँ गए तुम्हारे सारे संस्कार और मर्यादा ? कहाँ है मेरी शीला ? जो किसी के आगे देखने में भी शर्मा जाती थी, वह आज मेरे सामने जवाब देने लगी है, तुम पहले ऐसी तो नहीं थी, मैंने जिस शीला से शादी की थी, वह तुम तो नहीं हो। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा, कि आखिर तुम इतनी बदल क्यों गई हो ? "

       तब जाके शीला ने कहा, कि तुम भी तो ऐसे नहीं थे, नैना के साथ तुम भी तो मॉल में घूमते रहते थे, तब मैंने तो कुछ नहीं कहा... घर पर कहते थे, की मीटिंग में जा रहा हूँ और रात को खाने को कहो, तो भूख नहीं है, क्योंकि नैना के साथ आपका डिनर हो जाता था और मैं यहाँ आपका मनपसंद खाना बनाकर भूखे पेट आपका इंतज़ार किया करती, एक बार भी आपने सच नहीं कहा, कि दोस्त के साथ खाना खाकर आया हूँ, क्यों ? दूसरे दिन आपके शर्ट की जेब से फाइव स्टार होटल्स के बिल मिल जाते थे, तो कभी मोबाइल पर आधी रात को छुप-छुप के मैसेज करना, तो कभी बालकनी में जाके बातें करना, तो कभी आपके शर्ट पर लिपस्टिक के निशान, तो कभी कपड़े भी बदल जाया करते थे, सुबह नीला शर्ट पहन कर ऑफिस के लिए निकलते, तो शाम को लाल शर्ट पहन कर घर आते, पूछने पर कहते, कि नया लिया है, क्या मेरी समझ में कुछ नहीं आता ? क्योंकि वह शर्ट जिस कंपनी का होता है, ऐसे महँगे कपड़े आप कभी नहीं खरीदते, क्योंकि महँगे कपड़े खरीदने की आपकी हैसियत ही नहीं है। फिर भी में चूप रहती, मुझे तब लगता की, गलती मेरी ही होगी, कई दिनों तक मैं अपने आप को कोसती रही। अकेले में रोती रही, मगर अब बस, अब नहीं, अगर मेरे होते हुए आप किसी और से प्रेम कर सकते है, तो मैं क्यों नहीं ? मैं अपने आप को कमरे में बंद क्यों करू ? क्या मेरा मन नहीं है ? 

        अगर आप मुझे किसी और के साथ देख नहीं सकते, तो भला सोचिए, मैं कैसे आपको किसी और के साथ देख सकती ? मुझे भी यह सब नहीं करना था, मगर क्या करती मजबूर थी, मैं चाहती तो उसी वक़्त आपको छोड़ देती। जब मैंने आपको नैना के गले मिलते देखा, मगर तब भी मैं अपने बच्चों की वजह से चुप रह गई, मगर आखिर कब तक ? अब इस घर में, आप के साथ मेरा दम घुटने लगा है, क्योंकि आप साथ होते हुए भी साथ नहीं, पास होते हुए भी मेरे पास नहीं, ऐसा मुझे महसूस होने लगा। 

        आखिर कब तक आप हमारा इस्तमाल करते रहेंगे, घर में आप को एक संस्कारी बहु चाहिए, जो मर्यादा में रहे और जो घर का सारा काम करे और दिल बहलाने के लिए बाहर एक और लड़की... मगर हम, हमारा क्या ? हम औरत कहाँ जाए, हमारे पैर परिवार, बच्चे, समाज और संस्कार के नाम पर बांध दिए जाते हैं, औरत घर में ही अच्छी, बाहर जाए तो बेरहम और बदचलन... ये कैसा न्याय है आप सब का ? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा, आज हम से दिल भर गया तो कोई और सही और अगर उस से भी दिल भर गया तो कोई और सही... कहते हुए शीला अपने आप ही ताली बजाने लगी और कुछ आँसू शीला की पलकों में ही छिप गए। "

    सुमीत तो आज शीला का एक और नया रूप देखता ही रह गया, शीला की बातें सुनकर सुमीत को अपनी गलती का एहसास होने लगा, सुमीत ने शीला से माफ़ी माँगी और आगे से ऐसा कभी नहीं करेगा, ऐसा सुमीत ने शीला से वादा करते हुए कहा, कि " बस तुम पहले की तरह मेरी वाली शीला बन जाओ, तुम जो थी, जैसी भी थी, अच्छी थी। " 

       अब की बार मुझे छोड़ा या मेरे अलावा किसी और लड़की के सामने देखा भी तो, मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, कहते हुए शीला सुमीत को गले लगा लेती है। 

      तो दोस्तों, आख़िर शीला ने अपने पति का साथ ना छोड़कर वह अपने हक़ के लिए लड़ी, भटके हुए अपने पति को उसकी गलती का एहसास कराया, क्या शीला ने सही किया ? या उसे अपने पति को छोड़ देना चाहिए था ? आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा। 

                37) औरत का संघर्ष 

     एक औरत का पूरा जीवन संघर्ष ही तो है, अपने जीवन में कई उतर-चढाव वो चुप रह कर सह जाती है, ऐसा ही कुछ मेरी कहानी की लक्ष्मी और उसकी माँ के साथ हुआ था। 

      लक्ष्मी अपने माँ-बाप की बड़ी लड़की थी, लक्ष्मी के जन्म से घर में सब खुश तो थे, मगर मन ही मन सब आस लगाए हुए थे, कि लड़का हो, लेकिन लड़की हुई। सब ने फिर से मन बना लिया कि " चलो, कोई बात नहीं इस बार नहीं तो, दूसरी बार तो लड़का ही होगा। " उसकी माँ ने उसका नाम लक्ष्मी रखा था। देखते ही देखते लक्ष्मी ३ साल की हो गई तब, बड़ी मन्नौतों के बाद लक्ष्मी की माँ को एक लड़का हुआ, सब की ख़ुशी का ठिकाना ही न रहा, लक्ष्मी को भी लगा, कि मेरा भाई आया है, अब हम दोनों साथ में खेलेंगे, लेकिन लक्ष्मी के हिस्से के प्यार, दुलार सब उस के भाई के आने बाद कम होने लगा, वो छोटी थी, मगर वो सब देखती थी, समझती थी, बार-बार उसे अपने भाई के करीब जाने से भी रोक दिया जाता, कहते हुए कि भाई अभी छोटा है, बड़ा होगा तब उसके साथ खेलना, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और एक दिन अचानक लक्ष्मी के पापा एक्सीडेंट में मर गए, अब घर की सारी ज़िम्मेदारी लक्ष्मी की माँ पर आ गई। इस दौरान लक्ष्मी के दादाजी भी अचानक एक दिन गुज़र गए। अब घर में लक्ष्मी की माँ, उसका भाई और उसकी दादी ही थे। दादी अक्सर बीमार ही रहती थी। सिलाई मशीन घर में ही था तो, लक्ष्मी की माँ घर का काम निपटा के सिलाई का काम करती, नए-नए डिज़ाइनर कपड़े बनाना धीरे-धीरे उसे अच्छे से आ गया। लक्ष्मी की माँ वह सब कर लेती, उस में से अच्छे खासे पैसे भी मिल जाते। साथ में लक्ष्मी और उसके भाई की ट्यूशन फ़ीस वो नहीं भर सकती थी, इसलिए बच्चों को खुद ही पढ़ाया करती, ऊपर से सासुमा की सेवा अलग। लक्ष्मी स्कूल से घर आकर अपने भाई को सँभालती और माँ का छोटे-मोटे काम में हाथ भी बँटाती। अपनी बीमार दादी को भी वह दवाई, चाय, पानी, नास्ता दे देती। लक्ष्मी की समझदारी देखकर उसकी माँ की आँखों में अक्सर आंँसू आ जाते। छोटी सी उम्र में बेचारी कितना कुछ समझती है। धीरे-धीरे लक्ष्मी बड़ी होने लगी, लक्ष्मी पहले से ही दिखने में सुंदर और संस्कारी लड़की थी, इसलिए उसके लिए शादी के रिश्तें आने लगे, अच्छा सा लड़का देखकर लक्ष्मी की माँ ने उसकी शादी तय कर दी।        लक्ष्मी ने तब अपनी माँ से कहा, कि " आप को ऐसी हालत में अकेले कैसे छोड़कर जाऊँ ? मैं आप के साथ ही रहूंँगी, मुझे नहीं करनी किसी से शादी।"

     तब लक्ष्मी की माँ ने उसे समझाया, कि " तू मेरी फ़िक्र मत कर, तेरी अपनी भी तो ज़िंदगी है, कब तक तू युहींँ मेरा साथ देती रहेगी, एक ना एक दिन तो तुझे जाना ही होगा और अब तो तेरा भाई भी एक-दो साल में अपनी पढाई के बाद कमाने लगेगा, फ़िर सब ठीक हो जाएगा। मैं तुझे कहती थी ना, कि एक दिन तेरे लिए राजकुमार आएगा और तुझे महलों में ले जाएगा। तो समझ लो, वो राजकुमार आ ही गया। देखते ही देखते लक्ष्मी की बारात आ ही गई और जाते-जाते लक्ष्मी ने डोली में से एकबार मुड के अपने घर को देखा और थोड़ा रोते हुए, आँखों में ढ़ेर सारे सपने लेकर अपने पति के साथ ससुराल चली गई।               मगर लक्ष्मी के सपने बस कुछ ही दिन के लिए सच हुए, ससुराल जाने के बाद कुछ दिन सब ने नई बहु के साथ बहुत अच्छा रखा, उसके पति ललित ने भी। मगर कुछ दिनों बाद लक्ष्मी पर काम का बोझ बढ़ने लगा। उसके पति ललित की जॉब चली गई, ललित बैंक में जॉब करता था, बैंक में कुछ घोटाला हुआ था, जिसका इलज़ाम ललित पर लगाया गया और दो ही दिन में उसे नौकरी से निकाल दिया गया, अब नौकरी जाने की वजह ऐसी थी, की उसे और कहीं बैंक में नौकरी नहीं मिल रही थी। लक्ष्मी इतना पढ़ी-लिखी नहीं थी, की उसे अच्छी नौकरी मिल सके। लक्ष्मी के घर में उसके सास-ससुर, उसकी छोटी ननंद और छोटा देवर भी था, जो अभी पढ़ रहे थे और उनकी पढाई की ज़िम्मेदारी भी ललित पर ही थी, ललित के पापा जो कभी सरकारी नौकरी करते थे, जो अब रिटायर हो चुके थे, उनके पेंशन से घर चल जाता था, मगर बाकि का खर्चा निकालना मुश्किल था। ललित के कहने पर लक्ष्मी ने सिलाई काम करना शुरू कर दिया, जो उसने अपने मायके में अपनी माँ से थोड़ा बहुत सिख लिया था। सब को लक्ष्मी के हाथ के सिले हुए कपड़े बहुत अच्छे लगने लगे, अब उसके पास वक़्त ही नहीं रहता, घर का काम करो, फिर सिलाई काम। इन्हीं बीच जैसे-तैसे करके ललित की नौकरी भी लग गई, तो थोड़ा अच्छा लगा, लक्ष्मी ने सिलाई का काम जारी रखा, उसका वक़्त भी उस में कट जाता। दिन बीतते गए देखते ही देखते लक्ष्मी को भी एक लड़का और एक लड़की हो गए, लेकिन अपने तजुर्बे के हिसाब से उसने लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं रखा। लक्ष्मी की ननंद और देवर की भी शादी आई, तो उन दोनों के भी शादी में पहनने के नए कपड़े सब कुछ लक्ष्मी ने ही सील कर दिए, बस काम में वह अपना पूरा दर्द भूल जाती, कुछ वक़्त के बाद लक्ष्मी की सास को कैंसर हुआ, उसकी देखभाल में उसका थोड़ा काम छूट गया, मगर तीन महीने में ही सासुमा चल बसे, काम का बोझ लक्ष्मी पर और बढ़ गया, क्योंकि उसकी सास घर का थोड़ा बहुत काम सँभाल लेती थी, उसकी देवरानी नौकरी करती थी तो, सुबह वह टिफ़िन लेकर चली जाती, शाम को देर से आती, तब तक घर का सारा काम हो जाता, फिर भी लक्ष्मी ने कभी फरियाद नहीं की। उस से जितना हो सके कर दिया करती। 

     इतना कम था, कि एक दिन उसके पति ललित को पैरालिसिस हो गया, उसके देवर ने तो अस्पताल का पैसा देने से साफ इंकार कर दिया, कि " मेरे पास इतना पैसा नहीं है।" लक्ष्मी ने अपनी सिलाई के पैसाे में से निकालकर अस्पताल का खर्चा उठाया, क्योंकि ललित का सारा पैसा दो भाई-बहन की पढाई और शादी के खर्चे के बाद कुछ खास बचा नहीं था। अब ऐसे में लक्ष्मी ने अपने पति की सेवा की, घर का काम किया और साथ में अपना सिलाई का काम भी शुरू किया।           

         कुछ वक़्त के बाद ललित भी ऐसे ही एक दिन सुबह अचानक चल बसा। लेकिन लक्ष्मी ने तब भी हिम्मत नहीं हारी। ललित की बीमारी के बाद ही उसके देवर-देवरानी अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए थे, लक्ष्मी ने अपने दोनों बच्चों की परवरिश अच्छे से की थी इसलिए बेटी की शादी के बाद उसका बेटा उसे अच्छे से रखता था और लक्ष्मी ने अच्छी सी लड़की देख़कर अपने बेटे की भी शादी कर दी। बहु भी पढ़ी लिखी थी, इसलिए वह भी नौकरी करती थी इसलिए बहु और बेटे दोनों टिफ़िन लेकर सुबह से नौकरी पे चले जाते, पीछे से लक्ष्मी आज भी पूरा घर सँभाल लेती, उसकी बहु उसे सिलाई का काम करने से मना करती, मगर वह फिर भी अपना सिलाई का काम भी करती है, कहते हुए कि " उसे अब सिलाई का काम करना अच्छा लगता है और उसका वक़्त भी कट जाता है। " 

    अब लक्ष्मी को काम की आदत सी हो गई थी, बेटा और बहु अच्छे थे और लक्ष्मी का अच्छे से ख्याल रखते थे। इसलिए अब उसे अपनी संघर्ष भरी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। लक्ष्मी से जितना हो सके उतना वह आज भी अपने बेटे और बहु के लिए करती, उसकी बहु और उसकी बेटी के कपड़े भी वही सील दिया करती। उसकी बहु को भी उसके सिलाई किए हुए कपड़े अच्छे लगते। 

   सपनों का राजकुमार ऐसा सिर्फ सपनो में होता है, असल ज़िंदगी में औरत की ज़िंदगी में संघर्ष ही है और कुछ भी नहीं।  

     तो दोस्तों, ये सिर्फ एक लक्ष्मी और उसकी माँ की कहानी नहीं, मगर हर घर में शायद एक लक्ष्मी ऐसी होती है, जिसने अपने परिवार के लिए, अपना पूरा जीवन संघर्ष में ही बिताया हो। हांँ, वह एक औरत है, इसलिए उसे आदत सी हो जाती है, ऐसे संघर्ष के साथ जीने की।


                                                                                38) औलाद

              विधि की माँ सुरेखा जी आज फिर से अकेले में रोते हुए अपने आप को ही जैसे दोषी ठहरा रही थी, कि " मेरी ही परवरिश में कोई कमी रह गई होगी, जो मुझे आज ये दिन देखने को मिल रहा है, क्या कभी कोई बेटी अपनी माँ से ऐसी बातें करती है ? कि " पापा के बदले तू मर जाती तो अच्छा होता ? " वह भी राखी के कुछ दिन पहले ही। पता नहीं क्या कमी रह गई थी, मेरे प्यार में ? "
         तभी सुरेखा जी की बहु नमिता सुरेखा जी के कमरें में उन्हें चुपके से रोता हुआ देख लेती है और उनके पास जाकर सुरेखा जी को दिलासा देते हुए कहती है, कि " आप फिर से उन्हीं सब बातों को लेकर रोने लग गई ? इस बात को गुज़रे 4 साल हो गए, जो होना था, वह हो गया, आप बार-बार अपने आप को दोषी मत ठहराया करिए, अगर विधि ऐसी थी, उस में आप की कोई गलती नहीं है, या समझ लो, कि पिछले जन्म का कोई क़र्ज़ या कोई लेन-देन आप दोनों का और आप के बेटे का आपकी बेटी विधि के साथ बाकी रह गया होगा, जो इस जन्म में पूरा हो गया। आप अगर ऐसे ही रोती रहेगी, तो फिर से आपका बी.पि हाई हो जाएगा, आप को नींद नहीं आएगी और आपकी तबियत फिर से बिगड़ जाएगी और आप को तो पता ही है, कि अगर आपके बेटे निशांत को पता चला की आप अब भी उसे लेकर परेशान और दुखी हो रहे है, तो उनका भी दिल टूट जाएगा। विधि ना सही, हम तो हैं, ना आप के साथ। चलो अब आपका मनपसंद हलवा बनाया है, निशांत भी ऑफिस से आते ही होंगे, साथ मिलके खाना खा लेते है, पुरानी बातों पे मिट्टी डालिए। 
      कहते हुए नमिता अपनी सास को समझा देती है।  लेकिन निशांत उस पल बाहर ही खड़ा था, उसने माँ और नियति के बीच की बात सुन ली थी, फिर भी निशांत ने बात को अनसुना कर " नियति तुम कहाँ हो ? आज बहुत भूख लगी है, जल्दी से खाना दे दो। " कहते हुए अपना ब्लू सूट और टाई निकालते हुए अपने कमरें में फ्रेश होने चला जाता है, नियति रसोई में खाने की तैयारी में लग जाती है, कुछ देर बाद सब साथ में खाना खाते है। 
         कुछ दिनों बाद फिर से रक्षा बंधन का त्यौहार आ रहा था, इस बार फिर से बहन होते हुए भी मेरे निशांत का हाथ राखी के बिना खाली रह जाएगा। ऐसा सोचते हुए  सुरेखा जी को अपनी बेटी, विधि की याद आने लगी, कैसे वह बचपन में हर रक्षाबंधन पर अपने मनपसंद कपड़े, अपने भाई के लिए राखी, मिठाई, चॉकलेट्स, केक सब कुछ अपनी पसंद का ही उसे चाहिए था, ऐसा नहीं सिर्फ राखी पर, दिवाली हो, होली हो, क्रिसमस हो, स्कूल का कोई फंक्शन हो, किसी के या अपने खुद के घर शादी हो, कहीं दोस्तों के साथ बाहर आना-जाना हो, उसे हर बार नए कपड़े, जूते, ज्वेलरी, मेक-अप का सामान, मोबाइल हो, पर्स हो या हेड-फ़ोन्स हो उसे हर बार सब कुछ नया ही चाहिए, उसका पूरा कमरा ढ़ेर सारे कपड़े, जूते, पर्स से भरा पड़ा रहता। उसे कितना भी समझाओ, डाँटों लेकिन आखिर में वह अपनी बात अपने पापा से मनवा ही लेती। उसके पापा भी उस से परेशान होकर उसको जो चाहिए, वह दे देते, शादी भी उसने ज़िद्द कर के अपने पसंद के लड़के से ही की। भगवान् से मैंने कितनी मन्नतें मांँगी, रोज़ उसी के लिए प्रार्थना करती, मगर उस में कोई फर्क नहीं था, वो जो बचपन से जैसी थी, वैसी ही आज भी है। झूठ भी बात-बात पर बोलती रहती। अगर कभी पकड़ी जाए, तो इलज़ाम अपने भाई पर या किसी और पर लगा लेती। 
    विधि की हर ज़िद्द पूरी करने में उसके पापा की आधी ज़िंदगी गुज़र गई और एक दिन अचानक उनको हार्ट-अटैक आ गया और वह चल बसे। उनका बिज़नेस अब उनके बेटे निशांत ने सँभाल लिया, निशांत बड़े अच्छे से बिज़नेस करता था, निशांत की तरक्की से भी विधि जलती थी। उस तरफ विधि के पति की मामूली नौकरी थी, सो वह उसके पति के साथ अब खुश नहीं थी, क्योंकि उसकी हर मांग, हर ज़िद्द को वह पूरा नहीं कर सकता था, दामाद तो अच्छा था, मगर विधि ही उस से किसी न किसी बात पर बार-बार झगड़ा करती रहती, फिर निशांत और विधि आकर कुछ पैसे विधि को दे जाया करते, ताकि वह दामाद जी को परेशान न करे और उसके साथ खुश रहे। लेकिन विधि को वह पैसे भी कभी-कभी कम पड़ते, हर तीज-त्यौहार पर भी उसे अपने मायके से महंँगा गिफ्ट चाहिए। 
        विधि ने एक दिन तो हद्द ही कर दी, अपने भाई और माँ के पास उसने घर, बिज़नेस और माँ के गहनों में आधा हिस्सा मांँग लिया, कहते हुए कि " पापा की यही आख़री इच्छा या मर्ज़ी थी, ऐसा उन्होंने मेरे घर आकर कहाँ था। " जब की ऐसी कोई बात विधि के पापा ने विधि को कभी नहीं कही थी। साथ में सुनाया, कि आज अगर पापा ज़िंदा होते तो, वह मुझे ख़ुशी-ख़ुशी यह सब दे देते, मुझे बार-बार निशांत के सामने पैसो के लिए हाथ फैलाना नहीं पड़ता और अपने हक़ के लिए यूँ लड़ना नहीं पड़ता। जबकि पापा के जाने बाद निशांत ने भाई होकर भी पापा का हर फ़र्ज़ निभाया, उसकी हर बात, हर मांँग को उसने पूरा किया, उसको एक घर भी दिलाया, उसके बच्चों की स्कूल फीस भी भर देता, उसके लिए कितना भी करो, उसे कम ही पड़ता, कभी अपने भाई-भाभी और माँ के लिए वह अच्छा नहीं सोचती या कहती, सब के घर जाकर अपने भाई और माँ की बुराई करती फिरती, कि पापा के जाने के बाद ये लोग मुझे बुलाते नहीं और कुछ देते भी नहीं। अब आज के ज़माने में कौन इतना करता है, अपनी बहन के लिए ? हर कोई अपने बीवी-बच्चों के बारे में भी तो सोचेगा, ही ना ! लेकिन क्या करे, विधि की अक्कल पर तो पत्थर पड़े हुए थे। भगवान् जब अक्कल दे रहे थे, तब ये शायद ब्यूटी-पार्लर में अपना मुँह चमका रही होगी। नालायक और बद-दिमाग कहिकी !
      निशांत बहुत समझदार था, वह भी अपनी बहन के खर्चे और माँगो और तानों से परेशान हो गया था, निशांत ने अपनी माँ और नियति को समझाया, कि " उसे जो भी चाहिए, वह दे देते है, वह कुछ भी मानने वाली नहीं। पैसा चाहिए, तो दे देते है, मैं अब तक मेहनत करता आया हूँ, आगे और ज़्यादा मेहनत कर लूंँगा, मुझे सिर्फ़ माँ आपका और पापा का आशीर्वाद चाहिए, आप हमारे साथ हो तो मुझे कोई फिक्र नहीं। भगवान् ने चाहा, तो मैं और कमा लूंँगा, लेकिन अब मुझे इस विधि के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना है, मैं परेशान हो गया हूँ। " 
       निशांत की माँ को भी यह बात ठीक ही लगी, तो निशांत ने विधि को पहले ही समझा दिया, कि " अगर उसे पैसे चाहिए तो हम से आज के बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।" फिर भी विधि पैसो के लिए रिश्ता तोड़ ने के लिए भी तैयार हो गई।  
        सुरेखा जी ने भी मान लिया, कि ऐसी बेटी होने से तो बेटी ना हो वही सही। आज के बाद मेरा एक ही बेटा है, वह है, निशांत। फिर भी माँ का दिल है, कभी-कभी बीती बातें-बीती यादें याद आ ही जाती है।  
       तो दोस्तों, आख़िर निशांत का फैसला सही था या गलत ? माँ या बाप कभी भी अपने बच्चों को बुरे संस्कार नहीं देते, मगर कुछ बच्चें ही ऐसे होते है, कि लाख समझाने पर भी अपने माँ-बाप की बात नाहीं उनके पल्ले पड़ती है और नाहीं वह उनकी बात मानते है, तब उनको अपने हाल पर छोड़ देने में ही समझदारी है। क्या करे, कुछ फैसले हमें ना चाहने पर भी लेने पड़ते है,  ताकि हम अपनी ज़िंदगी में खुश और सामने वाला अपनी ज़िंदगी में ख़ुश रह सके। 

               39)  पछतावा 
  
           माँ-पापा के कहने पर भी अच्छे से मन ना लगाकर पढ़ने का पछतावा अब ज़िंदगी भर रहेगा। माँ-पापा ने बहुत समझाया, कि " मन लगाकर पढाई करो, अपने पैरों पर खड़े रहो, इतने काबिल बनो कि, ज़िंदगी में कभी भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने की ज़रूरत ना पड़े। " मगर क्या करे, १६ साल की बाली उम्र ही ऐसी होती है, कि उस वक़्त बस पढाई के अलावा सब कुछ अच्छा लगता था, सपने देखना, हवाओं से बातें करना, आईने के आगे घंटो बैठ के अपने आप को देखा करना, अपने आप से बातें करते रहना, सजना, सवरना, शर्मा जाना, और तो और सपनों में किसी राज कुमार के आने का इंतज़ार करना, जो हमें प्यार से भी ज़्यादा प्यार करे और हमारे लिए बस जैसे कुछ भी कर जाए। कभी-कभी ख्याल आता है, कि इस उम्र में ज़्यादातर लड़कियांँ ऐसा ही करती होगी, जो उस वक़्त मैं किया करती थी। पढाई कम, बातें ज़्यादा, सपने में आसमान को छूने की चाह, मगर पैर ज़मीन पर।         
           बात शुरू हुई थी, स्कूल के दिनों से, उन्हीं दिनों एक लड़का, जो स्कूल से मेरे पीछे पड़ा हुआ था, मेरे स्कूल पहुँचने से पहले वह पहुँच जाता, मेरे रास्ते में खड़ा रहकर मुझे रोज़ एक लाल गुलाब का फूल दिया करता, पहले-पहले तो मैं वह फूल नहीं लेती और मुँह फेर कर अपने रास्ते चली जाती, लेकिन क्लास में भी वह मुझे एक निगाह से देखा करता, मेरे पीछे-पीछे मेरे घर तक आ जाता,  इसलिए मैंने और मेरी सहेली ने उसका नाम मजनू रख दिया था। धीरे-धीरे वह मुझे भी अच्छा लगने लगा, प्यार हुआ, इकरार हुआ, उम्मीदें और बढ़ने लगी, १६ साल की बाली उम्र में दिल पे आख़िर किस का ज़ोर चलता है, बस थोड़ा सा प्यार कहीं से मिला और पैर फिसल गए, बस कुछ ऐसी ही हालत उन दिनों मेरी और मेरे मजनू की थी। ।  
             माँ-पापा के मना करने के बावजूद भी हम दोनों ने १८ साल की उम्र में घर से भाग कर शादी तो कर ली, लेकिन यूँ समझ लीजिए, कि ज़िंदगी का सही मायने में इम्तिहान तो अब शुरू हुआ था, मुझे अभी खाना बनाना नहीं आता था, उस मजनू को भी खाना बनाना नहीं आता था। अब जैसे-जैसे दिन बीतते गए मुझे तो माँ के हाथ का टेस्टी और मज़ेदार खाना याद आने लगा, एक तो किराए के घर में रहते थे, ऊपर से प्यार के चक्कर में हम दोनों ने पढाई भी अधूरी छोड़ दी थी, अच्छी नौकरी कैसे मिलती ? मेरे मजनू को, जिसे अपने दोस्त की सिफारिश से किसी होटल में काम मिल गया। मुझे नर्सरी स्कूल में बच्चे सँभालने का काम मिला, हमने जो घर किराए पर लिया था, उस घर में नीचे सिर्फ एक मौसी रहती थी, जिसका बेटा कुछ साल पहले उसे अकेली छोड़कर विदेश चला गया था, इसलिए ऊपर का एक कमरा उसने हमें किराए पर दिया, जिस से उसे कुछ पैसे मिल जाए और उसका गुज़ारा चलता रहे। मौसी को जब पता चला. कि हमें खाना बनाना नहीं आता, तब कभी-कभी वह हमें खाना दे जाती और धीरे-धीरे उन्होंने मुझे खाना बनाना भी सीखा दिया, इसलिए थोड़ा बहुत तो अब में बना ही लेती हूँ। सुबह खाना बनाकर और घर का काम निपटाकर, मेरा और मेरे मजनू का टिफिन लेकर हम दोनों अपने-अपने काम पर निकल जाते है, लौटते वक़्त फिर से घर का सामान और सब्जी लेके घर आते है, फिर रात का खाना बनाओ, खाना खाओ, दूसरे दिन सुबह की तैयारी करो, सब कपड़े बर्तन अपनी जगह पर सही से लगाओ, जो सब मौसी ने सिखाया था, क्योंकि उनको सफाई पसंद है, इसलिए घर गन्दा रहेगा, तो वह हमें निकाल देंगे, ऐसा पहले से ही कहाँ था, इसलिए सब कर लेते थे, कमरा अच्छा था और बाकि के घर से किराया भी कम था और मौसी कभी-कभी खाना बनाकर दे जाती थी, इसलिए उनका मन रखने के लिए सफाई कर देती थी। और अब सफाई की आदत भी लग गई थी। सारा काम निपटाने में वक़्त बिट जाता और रात तक इतने थक जाते है, कि कुछ बात करने का मन ही नहीं करता और चुप-चाप एकदूसरे का मुँह देखकर-पलटकर सो जाते... और हांँ, अब तो जो भी हो हफ्ते में एक दिन संडे को तो बाहर ही खाना खाने चले जाते है, मैंने बोल ही दिया, कि एक दिन मुझे भी थोड़ा आराम चाहिए। शादी अपनी मर्ज़ी से की थी, इसलिए माँ-पापा पे कोई इलज़ाम नहीं लगा सकते और फरियाद भी नहीं कर सकते, जाए भी तो क्या मुँह लेकर उनके पास जाए, हिम्मत ही नहीं होती, इसलिए कभी पलटकर देखा नहीं, और वैसे भी उनकी मर्ज़ी के बिना हमने शादी की इसलिए उन्होंने भी हमें माफ़ नहीं किया, ऐसा हम को लगता है। लेकिन अब पछताने से क्या फायदा ? 
         धीरे-धीरे दिन भर छोटे बच्चों के साथ रहते-रहते मुझे भी रोना आने लगा, तब कई बार याद आ जाता, कि पहले माँ-पापा सच ही कहते थे, कि प्यार से पेट भरता नहीं, पहले पढाई करो, अपने पैरों पर खड़े रहना सिख लो, बाद में प्यार और शादी के सपने देखना शुरू करो, क्योंकि ज़िंदगी सिर्फ प्यार के सहारे नहीं गुज़रती, प्यार के साथ-साथ पेट भी भरना होता है और उसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। 
        मजनू के साथ प्यार तक तो अच्छा था, मगर ज़िंदगी ऐसे गुज़ारना अब बहुत मुश्किल लग रहा है, पता नहीं आगे क्या होगा ? सोचती हूँ, काश! माँ-पापा की बात मानकर पहले पढाई पर ध्यान दिया होता, तो आज मैं भी अच्छी कंपनी में नौकरी करती, मगर अब पछताने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती।  
        तो दोस्तों, अपने से बड़े अगर हमें कुछ सिख देते है, तो तब उसे अमल में लाना चाहिए, बाद में पछतावे के अलावा कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। 

          40)  अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना 

          आज विशाखा फिर से अपने कमरें में खिड़की के पास अपने पाँव को जैसे अपनी गोदी में समेटे मुँह फुलाकर बैठी हुई थी। तभी विशाखा का पति जिसका नाम विकास है, वह ऑफिस से लौटकर आता है और विशाखा को यूँ मुँह फुलाकर बैठा देख विकास समझ जाता है, कि आज विशाखा को फिर से कुछ तो हुआ है, क्योंकि किचन में भी उसने जाकर देखा तो सारे बर्तन ऐसे ही बिखरे पड़े हुए थे और किचन का हाल देखकर पता चलता था, कि शायद आज खाना भी कुछ बनाया नहीं था। लेकिन विकास समझदार पति था, वह अपनी पत्नी विशाखा के नियत और उसके नखरे को अच्छे से जानता था। मगर वह भी क्या करे, पहले तो प्यार किया फिर जल्दबाज़ी में आकर शादी भी कर ली, अब जो भी है, निभाना तो पड़ेगा ही ! इसलिए विकास ने विशाखा के करीब जाकर धीरे से उस से पूछा, " क्या हुआ ? आज फिर से ऐसे मुँह  फुलाकर क्यों बैठी हुई हो ? कुछ खाना बनाने का मूड नहीं है क्या ? ऐसा हो तो बता दो, कोई बात नहीं, हम आज बाहर जाकर खाना खा लेते है, उस में कौन सी बड़ी बात है ? चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं भी फ्रेश होकर आ जाता हूँ, आज तुम्हारी रसोई से छुट्टी, बाहर चलते है। आज बाहर का मौसम भी बड़ा अच्छा है। " विशाखा को मनाते हुए विकास उस से कहता है। 
      लेकिन ये क्या आज तो ऐसा सुनकर भी विशाखा के चेहरे पे थोड़ी सी भी हसीं या नाराज़गी नहीं आई। विशाखा तो बस अपने पाँव को देखते हुए कुछ सोच रही थी, जैसे की विकास ने क्या कहा, उसे कुछ भी पता ही नहीं। 
      विकास ने सोचा ऐसा तो कभी हुआ नहीं, कि मैंने बाहर जाकर घूमने और खाने के लिए कहा हो और विशाखा खुश नहीं हुई हो। विशाखा चाहे जैसी भी थी, फिर भी विकास उस से बहुत प्यार करता था, बस उसके नखरे थोड़े-थोड़े दिन में बार-बार उठाने पड़ते, उसको बार-बार कुछ ना कुछ समझाना पड़ता, जिसकी विकास को अब आदत पड़ चुकी थी, जैसे एक छोटे बच्चे को हम समझाते और  मनाते रहते है, बिलकुल वैसे।  
       इसलिए विकासने विशाखा को फिर से मनाने की कोशिश करते हुए कहा, कि " क्या हुआ मेरी जान ? आज मेरी जान इतनी उदास क्यों है ? किसी ने कुछ कहा क्या ? कुछ तो बताओ, वार्ना मैं भी अपना मुँह फुलाकर बैठ जाऊंँगा, तुम्हारा तो पता नहीं, लेकिन वैसे अभी तो मुझे बहुत ज़ोरों की भूख भी लगी है। " कहते हुए विकास विशाखा के पीछे मुँह पलटकर मुँह फुलाकर बैठ जाता है।  
       तब विशाखा छोटी बच्ची की तरह जोर-जोर से रोने लगी, विशाखा को ऐसे रोते हुए देख विकास मन ही मन बड़बड़ाता है, कि " है भगवान् ! पता नहीं आज इसे फिर से क्या हो गया है, छोटी-छोटी बात को दिल पर लगाकर मुँह फुलाकर बैठ जाती है और रोने भी लगती है, यहाँ पति दिन भर काम कर के थका हारा घर आया हो और उसे खाना देने के बदले खुद ही मुँह फुलाकर मेडम साहिबा रोने लगी। है भगवान् ! मुझे इस से ही प्यार क्यों होना था ? दुनिया की सारी लड़कियाँ पता नहीं कहाँ छुप गई थी, जब मुझे इस से प्यार हो रहा था। 
     तभी फिर से वह रोने लगी, विकास ने फिर से पूछा, " ओए माय बेबी, क्या हुआ ? ये तो बताओ। "
     तब विशाखा ने कहा, " क्या बताऊँ अभी आपको मैं, जबकि सारी गलती मेरी ही थी. जो आज समझ में आया। 
    विशाखा के मुँह से एसी बात सुनकर विकास को बड़ा अजीब लगा, कि विशाखा ने आज अपनी गलती मान ली, मगर कौन सी गलती, ये तो पता चले, ये विशाखा भी ना ! सोचते हुए विकास ने विशाखा से पूछा, कि " कौन सी गलती ? तुम से क्या कभी कोई गलती हुई भी है, तुम तो कितनी प्यारी और समझदार हो ! " 
       विशाखा ने कहा, तुम्हारे लाख मना करने के बावजूद भी मैंने ही खुद अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारी, अब मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, मेरे हाथ से मायके का भी सुख गया और माँ के हिस्से के घर के पैसे और गहने जो सब अब मेरी बहन नियति को मिल रहा है और मुझे कुछ भी नहीं। काश! उस वक़्त आपकी बात मानकर उन्होंने शादी में जो दिया उसी में खुश रहकर माँ, बहन और भैया-भाभी से लड़ती झगड़ती न रहती, तो आज मेरा भी उस घर पर और माँ के ढ़ेर सारे गहनों पर मेरा भी हिस्सा होता। पता नहीं उस वक़्त मेरी अक्कल पे तो पत्थर पड़े हुए थे, जो मैंने अपनी मौसी की बात में आकर माँ, नियति और भैया-भाभी से हर छोटी-छोटी बात पर झगड़ा किया, हर बार कुछ ना कुछ बहाना बनाकर ज़िद्द में आकर लड़ती रही और कुछ न कुछ मांँगती रही और अपनी एक लौटी भाभी और उसके मायके वालों को भी कितना भला-बुरा सुनाया करती थी, जबकि वह तो कितने अमिर और खानदानी घर के है। अब तो मुझे उनके सामने जाने में भी शर्म आएगी, माँ के अंतिम समय में मैं नाही उनका चेहरा देख पाई और नाही वहांँ जा सकी। मुझे तो जैसे माँ ने पहले से ही दूर कर दिया था, आपको तो सब पता ही है ना ! आप तो माँ को देखने गए थे न ! तब आप ज़िद्द कर के मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गए ? 
      और तो और पता है विकास, आज फिर से मौसी जी का फ़ोन आया था, उन्होंने कहा, कि " माँ ने वकील के हाथों पहले से ही एक चिठ्ठी लिखवा दी थी, जो माँ की तेरहवीं के बाद वकील ने घर आकर सुनाई। जिस में लिखा था कि " अब घर के हिस्से में और उनके गहनों में मेरा कोई हक़ नहीं है, मैं मतलब उनकी बेटी विशाखा। माँ ने अपने घर के हिस्से में से सिर्फ दो भाग किए, एक उसके बेटे राजेश का और दूसरा उसकी बड़ी बेटी नियति का, जिस ने उनके अंत समय में उसकी बड़ी सेवा की थी और उसका गिला बिस्तर और कपडे भी बिना किसी हिचकिचाहट के साफ किया था। " 
        मेरे नसीब में तो ठेंगा आया, कहते हुए विशाखा फिर से जोर-जोर से रोने लगी। विकास उसे समझाते हुए कहता है, कि " देखो अब तुम ने खुद ही अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारी है, तो किसी और पर इसका इल्ज़ाम मत लगाओ, तुम्हरी मौसी ने चाहे तुम से जो कुछ भी कहा हो, लेकिन तुम ने उसकी बात मानी ही क्यों ? और तो और मेरे इतने समझाने के बावजूद भी मेरी हर बात को अनसुना करती गई, अब पछताने से क्या फायदा ? मैं तो यह सब पहले से जानता ही था, कि ऐसा ही होगा, लेकिन उस वक़्त तुम तो बार-बार अपनी मौसी से बातें करती रहती और उनके घर पर भी मेरे मना करने के बावजूद भी आती-जाती रही। अब हमारे पास जो है, जितना है उसी में खुश रहो, अगर तुमने अपनी माँ के अंत समय में जाकर उसकी सेवा की होती, तो भैया-भाभी की नजरों में भी तुम ऊपर उठ जाती। लेकिन तुम तो एक बार भी उनसे मिलने भी नहीं गई और आज जब माँ के गहने नियति के नाम कर दिए तो अब तुम्हारा दिल जल रहा है, ये सब तुम्हें नखरें करने और बातें सुनाने से पहले सोचना चाहिए था। मैं तो तुम्हें समझाते-समझाते थक गया मगर तुम पर तो मौसी की बातों का नशा चढ़ा था, अब जाओ ओर मौसी के घर, उसी के आगे अपना दुखड़ा रोओ और हाँ, अब अगर तुम्हें सच में इतना बुरा लग रहा है, तो अब भी वक़्त है, अपनी बड़ी बहन और भैया के पास जाओ और सिर्फ उनसे अपने किए के लिए माफ़ी माँगो और बदले में वह तुम्हें कुछ देंगे, ऐसी आस लेकर तो बिलकुल मत जाना। वह तुम्हें तुम्हारे किए पर माफ़ कर दे तो भी बहुत है। अगर तुम्हारी मर्ज़ी हो तो मैं राजेश भैया से बात करता हूँ।" 
      लेकिन इधर तो माफ़ी मांँगने की बात पर भी विशाखा तो कुछ पल के लिए सोच में पड़ गई, उसे यूँ सोचता हुआ देख विकास समझ गया, कि ये कभी माफ़ी नहीं मॉंग सकती, लेकिन फिर भी विकास ने उस से फिर से एक बार कहा, " क्या सोच रही हो अब इतना ? माफ़ी मांँग सकती हो या नहीं ? "
     विशाखा ने कहा, " हांँ, हांँ ज़रूर, लेकिन आज नहीं कल, आज मुझे रसोई में कुछ काम है और बाजार से सब्जी लेने भी तो जाना है, वार्ना कल सुबह टिफ़िन में क्या दूंँगी ? मेरा मेक-अप का सामान भी ख़तम हो गया है, वह भी तो लाना है। आप बस मुझे कुछ पैसे दे दीजिए. दो दिन बाद मेरी सहेलियों के साथ मेरी किट्टी पार्टी भी तो है, तो नई ड्रेस भी लानी है। मैं अभी मार्किट जाकर आती हूँ। " कहते हुए वह अपने आँसू पोछते हुए किचन की और चली जाती है। 
      विकास अच्छे से जानता था, कि " इस से ज़िंदगी में कभी माफ़ी नहीं माँगी जाएगी, दूसरों को सिर्फ परेशान करने में ही इस को तो मज़ा आता है और कुछ नहीं। है भगवान्! इस जन्म तो में इस विशाखा को जैसे-तैसे कर के झेल लूंँगा, इसके नखरें भी उठा लूँगा, मगर अगले जन्म नहीं, प्लीज भगवान् बस मेरी यह इच्छा पूरी कर देना, एक तो भूख के मारे मेरी तो जान जा रही है और मेडम जी को अभी शॉपिंग करने जाना है। " मन ही मन बड़बड़ाते हुए विकास ज़ोर से आवाज़ लगाता है, " सुनो, शॉपिंग के लिए कल चली जाना, अभी बाहर जाके कुछ खा लेते है, घर पर बनाने बैठोगी, तो काफी वक़्त निकल जाएगा और तुम थकी हुई भी लग रही हो, मैं ज़रा फ्रेश होके आता हूँ, फिर चलते है। "
      विशाखा किचन में से जवाब देती है, " ठीक  है, जैसा आपको ठीक लगे, शॉपिंग के लिए कल चली जाऊँगी, घर में आलू और प्याज़ तो है ही, तो कल टिफ़िन में आलू प्याज़ की सब्जी दे दूंँगी, या घर आते वक़्त साथ में कुछ लेकर आ जाएँगे, और हाँ, हमारे पास में एक नया चाइनीस रेस्टोरेंट खुला है, मेरी सहेली कह रही थी, वहांँ बहुत अच्छा खाना मिलता है, हम कभी वहाँ गए नहीं, तो सोचती हूँ, वहीं पास में ही चले जाते है, मुझे भी अब तो बहुत भूख लगी है, शाम से कुछ नहीं खाया। "
       विकास पहले तो मन ही मन बड़बड़ाया, " शाम से कुछ भी नहीं खाया, कह तो एसे रही है, जैसे सुबह से कुछ नहीं खाया हो, वेफर्स और चॉकलेट्स के खाली पैकेट्स ऐसे ही किचन के प्लेटफार्म पर पड़े हुए थे,वह पैकेट्स उसने नहीं तो क्या किसी भूत ने आकर खा लिए ?😂 " 
     विशाखा ने फिर से बाहर से आवाज़ लगाई, " आप तैयार हुए के नहीं, भूख के मारे मेरी तो जान जा रही है। "
     " अभी आया मेरी जान, जो तुम्हें ठीक लगे और जहाँ तुम्हें ठीक लगे, मेरी माँ ! कहते हुए विकास तैयार होकर बाहर आता है और दोनों खाना खाने बाहर चले जाते है।  
    आखिर विशाखा को मनाना विकास के अलावा और कोई नहीं कर सकता। 😄😄
         तो दोस्तों, किसी की कही-सुनी बातों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। हाँ, सुनो सब की लेकिन फ़ैसला अपने दिलो-दिमाग से सोचकर ही लेना चाहिए, नहीं तो खुद ही अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसी हालत हो जाती है, जैसी आज विशाखा की हालत हुई। 
   
         तो दोस्तों, यह तो सिर्फ मेरी " कहानी घर  घर की, कहानी हर घर की " का भाग 1 है, दूसरा भाग भी बहुत जल्द आपके सामने लेकर आएंगे। इस किताब में मैंने कई कहानी सत्य घटना पर आधारित लिखी है, जो आज कल की ज़िंदगी में सब के साथ होता है। मैं उम्मीद करती हूं कि मेरी यह कहानी आप सभी को पसंद आई होगी।
 
Bela...
   







 
    

   


                  

Comments