कहानी घर घर की, कहानी हर घर की
सारांश
यह कहानी सिर्फ़ आपके और मेरे घर की, या सिर्फ़ आपकी या मेरी नहीं, लेकिन यह कहानी शायद हर घर की है।
तो दोस्तों, आप लोग सच में सोच रहे होंगे कि अगर ज़िंदगी सच में ऐसी ही हो, ज़िंदगी में कोई मुश्किल ही न हो, ज़िंदगी खुशियों से भरी हो, तो कितना अच्छा रहेगा, मगर दोस्तों ऐसा सच में नहीं होता। ज़िंदगी है, तो परेशानियां भी होगी ही, जैसे दुःख के बाद सुख और सुख के बाद दुःख, यही तो ज़िंदगी का नियम है, इसलिए मेरी इन कहानियों में से कई कहानियाँ ज़िंदगी की सीख दिखला जाती है, ज़िंदगी से लड़ना सिखा जाती है।
Bela...
वैसे देखा जाए तो दोस्तों, एक हाउस वाइफ, हर घर की शोभा होती है, अगर वह अपना हर काम प्यार से करे तो, घर इतना सुंदर और सुव्यवस्थित नज़र आने लगता है, कि जैसे उसकी किसी के साथ कोई तुलना ही नहीं की जा सकती।
2) एकदूजे के सहारे
एक दिन मैं हॉस्टल में मेरे दादाजी और दादीजी को याद कर अपनी सहेली प्रिया को उनके बारे में बता रही थी, कि " मेरे दादाजी और दादीजी दुनिया में सबसे प्यारे और सबसे अनोखे दादाजी और दादीजी है, उनकी love story बड़ी दिलचस्प है और वो दोनों भी।
मेरे दादाजी और दादी एक दूसरे से जितना लड़ते है, उस से कई ज़्यादा एक दूसरे से प्यार भी करते है, मेरे दादाजी को अब उनकी उम्र के हिसाब से थोड़ा ऊँचा सुनने की आदत है, इसलिए दादी को हर बात उनसे ज़ोर से कहनी पड़ती है। कभी दादाजी रूठते है, तो कभी दादी। उनके बिच नोकझोंक चलती ही रहती है, फिर भी शाम को दोनों साथ बैठकर ही खाना खाते और बरामदे में बैठ कर बातें किया करते।
मैं उनसे पूछती, कि " रोज़ रोज़ आप क्या बातें करते रहते है, तब वो बताते, कि पहले हम दोनों को बातें करने का वक़्त ही नहीं मिलता था, इसलिए जो बातें हम हमारी जवानी में नहीं कर पाए, वो सब बातें अब कर लिया करते है और साथ-साथ कुछ पुरानी याद को भी ताज़ा कर लिया करते है, और तो क्या ! जब तू हमारी उम्र की होगी, तब तू भी यही करेगी, देख लेना । " और हम सब हँस पड़ते।
दादाजी को गुस्सा ज़रा जल्दी आ जाता है। कभी कभी दादाजी छोटी-छोटी बात पर बुरा भी मान जाया करते और दादीजी उनको मना लिया करती और कभी-कभी दादीजी को उनकी किसी बात का बुरा लग जाता तो, दादीजी दादाजी से बात ही नहीं करती, फिर दादाजी दादीजी को मनाते है, दोनों साथ में चाय-नास्ता करते, बाद में साथ मिलकर घर में कान्हाजी की सेवा पूजा करते और शाम को साथ में हमारे नज़दीकी नाना-नानी पार्क में चलने के लिए जाते, घर आकर खाना खा कर दोनों साथ में रेडियो पर पुराने गाने सुनते- सुनते बातें करते और एकदूसरे का हाथ पकड़कर सो जाते। "
फ़िर एक दिन दादीजी ने मुझ से कहा, कि मेरी दवाई ख़त्म हो गइ है, आज तुम कॉलेज से आते वक़्त मेरे लिए दवाई लेती आना। मगर तुम्हारे दादाजी को इस बात का पता चलना नहीं चाहिए, कि मेरी दवाइयांँ ख़त्म हो गइ है, वरना वे ख़ामखा ही परेशान हो जाएँगे और हांँ, साथ में थोड़े से पकोड़े भी लेती आना, बहुत मन कर रहा है खाने का।
मैंने कहा जी ज़रूर दादी, कहते हुए मैं कमरें से बाहर जा ही रही थी, की सामने से दादाजी अपनी लकड़ी के सहारे चलते हुए दादीजी की दवाई और पकोड़े लेकर आते है और कहते है, कि " ये लो तुम्हारी दवाइयांँ, इसे वक़्त पर ले लेना, वरना रात को घुटनों का दर्द तुमको होगा और नींद मेरी चली जाएगी और साथ में ये गरम पकोड़े भी लाया हूँ, बहुत दिनों से मेरा भी मन था खाने का।" दो पल के लिए तो ये देख मेरी आंँखें खुली की खुली ही रह गई।
मैंने दादीजी से कहा, कि " ये लीजिए, आपने इधर कहा और उधर दादाजी ने सुन लिया। आपकी दवाई और पकोड़े दोनों हाज़िर है और साथ में हमारे प्यारे दादाजी भी।"
मैं ख़ुशी से दोनों के गले लग गई। कभी-कभी उनका ऐसा प्यार देख मेरी भी आँखें भर आती है।
एक दिन दादाजी मंदिर जाते वक़्त अपना चश्मा और लकड़ी ऊपर कमरे में ही भूल आऐ थे, तो उन्होंने मुझ से कहा, कि ज़रा ऊपर से मेरा चश्मा और लकड़ी लेकर आओ, वार्ना तेरी दादी को ही ऊपर जाकर लाना पड़ेगा, वैसे भी उसके घुटनों में दर्द रहता है।
मैंने कहा, जी दादाजी अभी लेकर आती हूँ, तभी सामने से दादीजी, दादाजी का चश्मा और लकड़ी लेकर आती है और कहती है, कि " ये लीजिए आपका चश्मा और लकड़ी, जिसे आप ऊपर ही भूल आए थे और मुझे पता है, लकड़ी के बिना आप ठीक से चल नहीं पाते और चश्मे के बिना आप कान्हाजी के दर्शन कैसे करते भला ? आप भी है, ना... आज कल बहुत भुलक्कड़ होते जा रहे हो। "
दादाजी मन ही मन बोले, बस तेरे प्यार में !
और मैंने दादाजी से कहा, कि " आप ने कहा और आपका चश्मा और लकड़ी हाज़िर है।"
मेरा दिल ये देख बार-बार यही कहता है, कि " आप दोनों का प्यार और साथ उम्र भर ऐसे ही बना रहे। आप दोंनो ही एकदूजे का सहारा हो और हंमेशा रहेंगे, आप दोनों जैसे एकदूजे के लिए ही बने हुए है, आप दोनों को किसी और के सहारे की जरुरत ही नहीं। "
दादाजी दादीजी के बिना नाहीं कभी चाय-नाश्ता करते और नाहीं कभी कहीं जाते। जहाँ भी जाना हो दोनों साथ में ही जाते।
कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है, कि " जैसे दादाजी और दादी दोनों की दुनिया में बस वो दोनों ही है और कोई नहीं, ऐसे वो दोनों एकदूसरे का ख़्याल रखते और एकदूसरे से प्यार करते है।"
एक दिन मेरी दादीजी बहुत बीमार हो गई, तब दादाजी ने एक पल का भी आराम नहीं किया, दिन रात दादीजी के करीब बैठ के उनकी सेवा करते रहे, कभी दादीजी के सिर पर हाथ फेरते, तो कभी दादीजी को दवाई पिलाते, तो कभी दादीजी को बिस्तर से खड़े होने में मदद करते, उनको वक़्त पर चाय, नाश्ता, खाना खिला देते, आधी रात को उठकर दादीजी को चुपके से देखा करते कि वो ठीक तो है ना, कहीं उसे किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं। तब दादी चुपके से ये सब देखा करती और दादाजी को चिढ़ाते हुए धीरे से कहती, कि " मैं ठीक हूँ, अभी मैं आपको छोड़ के जानेवाली नहीं, मेरी इतनी फिक्र मत किया किजीए और आराम से सो जाइए।"
ये सुन दादाजी चिढ़ जाते और कहते, कि " ऐसी बात नहीं, मैं तो सिर्फ़ देख रहा था, कि तुम्हें बुखार कम हुआ की नहीं और मैं भला तुम्हें ऐसे कैसे जाने दूँगा, तुम्हारे पास अभी मुझ को बहुत सेवा करवानी है और लड़ना भी है, अगर तुम चली गई तो मैं किस के साथ झगड़ा करूँगा ? किस के रूठ ने पर उसे मनाया करूँगा ? किस के बालो में गजरा लगाऊँगा ? किस के साथ बातें करूँगा ? "
कहते-कहते दादाजी की आँखों में सच में आँसू आने लगे, ये देख दादीजी की आंँखें भी भर आई। उन दोनों को देख मुझे ऐसा लगता है, कि " असलियत में अब दोनों को एकदूसरे से दूर होने का डर है, कि अगर एक जल्दी चला गया तो दूसरे का क्या होगा ? " इसलिए दोनों एकदूसरे की ज़्यादा परवाह करते है, कल का तो पता नहीं मगर आज जब साथ है, तो क्यों ना एकदूसरे का सहारा बने रहे जिससे की साथ ना रह पाने का ग़म ना हो और ज़िंदगी यूहीं एकदूजे के सहारे चलती रहे। "
मेरी बात सुनते-सुनते प्रिया की आँखें भी भर आती है। प्रिया ने मुझ से कहा, कि " अब के vacation में अपने दादाजी-दादीजी से मिलवाने मुझे ज़रूर ले जाना, मुझे भी उनसे बातें करनी है। "
तो दोस्तों, ऐसे दादाजी-दादीकी की तरह सोच के हम भी अपनी ज़िंदगी में एकदूसरे का इतना ख़्याल रखे और एकदूसरे को इतना प्यार दे, कि उसी यादों के सहारे हमारी बाकि की ज़िंदगी भी आराम से बित जाए और ज़िंदगी में कुछ खोने का या ज़िंदगी में किसी का साथ ना रहा ऐसी फरियाद भी ना रहे। क्यूंँकि भगवान् के पास जाने की किस की बारी पहली आ जाए, ये आज तक किसी को नहीं पता, उसका बुलावा आए तो सब कुछ छोड़ के एक दिन तो सब को जाना ही है।
सत्य घटना पर आधारित
3) माँ का दूसरा रूप
7) छोटा मुँह बड़ी बात
9) भरोसा ( १०० शब्दों की कहानी )
10 ) पसंद नापसंद
11) एक फ़ैसला
बात उन दिनों की है, जब निधि १८ साल की उम्र की हुआ करती थी, निधि के घर के सामने वाले घर में अभी कुछ दिन पहले ही दो लड़के rent पे रहने आए थे। दोनों दिखने में हैंडसम और खानदानी घर के लगते थे, दोनों मुंबई इंजिनयरिंग की पढाई के लिए आए थे। उन में से एक लड़के का नाम निशित और दूसरे का नाम समीर था। निशित पढाई करने अपनी खिड़की के पास ही रोज़ बैठता था और निधि के कमरें की खिड़की के सामने ही उसकी खिड़की थी, तो कभी-कभी निधि उसे देखा करती थी। ये बात निशित ने कुछ दिनों बाद महसूस की, कि निधि उसे यूँ चुप के से रोज़ देखा करती।
एक दिन निशित अपनी खिड़की पर पूरा दिन नहीं दिखा, तब निधि का जी मचलने लगा, उसे रोज़ देखने की अब उसकी आदत जो हो गई थी। उस दिन निधि के मम्मी-पापा और भैया तीनों शादी में गए हुए थे, निधि की एग्जाम शुरू होने वाली थी, तो निधि ने जाने से इंकार कर दिया, कि उसे आज रात पढ़ना है। तो ये मौका अच्छा है मिलने का, ये सोच निधि सीधे उसके घर चली गई।
निधि ने निशित के घर का बेल बजाया। पहले तो समीर ने दरवाज़ा खोला, निधि ने घर के अंदर इधर-उधर झाकने की कोशिश की, मगर कहीं भी निशित दिखाई नहीं दिया। तब निधि से रहा नहीं गया, निधि ने समीर से सीधे ही पूछ लिया, कि " तुम्हारा दोस्त कहाँ है ? आज कहीं वो दिख नहीं रहा ? " समीरने कहा, " वह अंदर ही है, उसकी तबियत कुछ ठीक नहीं है, इसलिए वह सो रहा है, डॉक्टरने उसे आराम करने को कहा है। "निधि ने कहा, " ओह्ह, तो ये बात है, क्या मैं उस से एकबार मिल सकती हूँ ? " समीर ने कहा, " हाँ, हाँ क्यों नहीं ? आइऐ ना। " कहते हुए समीर निधि को निशित के कमरें में ले गए, निशित सच में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, निशित को बुखार था और ठण्ड के मारे उसका बदन काँप भी रहा था। निधि ने समीर से कहा, " इसे तो बहुत तेज़ बुखार है। " समीर ने कहा, " हाँ, दवाई तो पिलाई है, मगर बुखार कम नहीं हो रहा। "
निधि ने समीर के पास एक बाउल मैं ठन्डे बर्फ का पानी और रुमाल माँगा, निधि कुछ देर तक निशित के सिर पर ठन्डे पानी की पट्टी लगाती रही, इस से उसका बुखार कम हो गया, निशित के पास कोई कम्बल भी नहीं था, तो अपने घर से कम्बल लाकर निधि ने उसे ओढ़ाया, ताकि उसे ज़्यादा ठण्ड न लगे और वह आराम से सो सके, बिना किसी बात का सोच-विचार किए निधि पूरी रात उसकी सेवा करती रही, तब जाके सुबह को उसका बुखार कम हुआ और उसे थोड़ा अच्छा लगा, निशित ने निधि का शुक्रिया भी किया, फ़िर निधि अपने घर जाने लगी, तभी सामने से निधि के मम्मी-पापा की कार भी आई, निधि के मम्मी-पापा ने निधि को निशित के घर से इतनी सुबह-सुबह बाहर निकलते हुए देख लिया, तो पापा का गुस्सा आसमान पर था, उन्होंने निधि से बिना कुछ बात किए, उसे गलत समझकर कुछ दिन उसके कमरे में बंद कर दिया, मगर पापा को कहाँ पता था, कि वह दोनों आमने-सामने खिड़की में से एक-दूजे को देखा करते है। निशित ने इशारे से खिड़की में से फ़िर से निधि को कल रात के लिए THANK YOU कहा। निधि उसे मन ही मन चाहने लगी थी, मगर कभी बता ना सकी। बस खिड़की में से कभी-कभी एक दूजे से बातें कर लेते और मुस्कुराया करते। निधि का उसके साथ एक दिल का रिश्ता बन गया था। निधि के पापा उसूलों के बहुत पक्के थे, उन्होंने निधि की शादी कहीं ओर तय कर दी। इस बात को कुछ महीने गुज़र गए।
एक दिन किसी कॉफ़ी शॉप में निधि बैठ के अपनी दोस्त के इंतज़ार में थी, वही इत्फ़ाक से निशित भी आया हुआ था, दोनों ने एकदूसरे को देखा, पहले तो दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। कुछ देर बाद निशित ने निधि से पूछा, " तुम कैसी हो ? यहाँ कैसे ? " निधि ने कहाँ, " मैं अपनी दोस्त के इंतज़ार में हूँ, वह आज मुझ से यहाँ मिलने आनेवाली है, मगर पता नहीं, अब तक आई क्यों नहीं ? ओह्ह, same here, मेरा भी एक दोस्त मुझ से मिलने आनेवाला है, अब तक आया नहीं। अच्छा, तो हम दोनों ही बात कर लेते है। निधि ने कहा, " हाँ, ज़रूर ! क्यों नहीं ? "
निशित ने कहा, " अच्छा चलो बताओ, तुम्हारे पति, तुम्हारे घरवाले सब कैसे है ? तुम ख़ुश तो हो ना ? "
निधि निशित की बात सुनकर चौंकी। निधि ने कहा, " शादी और मेरी ? "
निशित ने कहा, " हां, उस रोज़ तुम्हारी शादी थी ना ?" निधि ने कहा, " हांँ, बारात भी आई थी, मगर उसी रोज़ बारात आने से पहले मैं घर छोड़कर वहाँ से भाग गई थी, क्योंकि मेरे पापा ने पैसो की ख़ातिर मेरी शादी मुझ से १० साल बड़े लड़के से तय की थी, जिसका एक छोटा बच्चा भी था, मगर ये बात मुझे मंज़ूर नहीं थी। इसलिए मैंने घर छोड़ दिया। मेरी सहेलीने मुझे अपने घर चंडीगढ़ में कुछ महीने के लिए आसरा दिया। फ़िर मैंने जॉब शुरू कर दी और खुद का घर ले लिया, मगर तुम ?
निशित ने कहा, बस मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, मेरी शादी पापा ने ज़बरदस्ती करवा दी, मगर सुहाग रात में लड़की ने कहा, कि मैं किसी और को चाहती हूँ, उससे मैं बहुत प्यार करती हूँ और उसी से शादी भी करना चाहती थी। तब मैंने अपनी पत्नी शीला के बॉय फ्रेंड के बारे में पता किया, वह लड़का सच में बहुत अच्छा था, शीला से प्यार भी बहुत करता था, इसलिए मैंने शीला को उसके बॉय फ्रेंड सुनील से मिला दिया, दोनों की शादी करवा दी और जॉब के लिए यहाँ आ गया, वैसे भी मैं उस से प्रेम नहीं करता था, तो ऐसे रिश्तों के साथ जीने से तो बेहतर अकेले रहना मुझे ठीक लगा। क्योंकि मैंने जब से तुमको देखा, मैनें सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम से ही प्यार किया, फ़र्क सिर्फ़ इतना है, कि ये बात कभी मैं अपनी ज़ुबान पे ला ना सका। मुझे लगा तुम्हारे पापा ने तुम्हारी शादी कहीं ओर तय कर दी, तो तुम्हारी डोली उठने से पहले ही मैं वहांँ से चला गया, मैं तुझे किसी ओर की होते हुए नहीं देख सकता था और उस वक़्त मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी, कि मैं तुम्हारे पापा से अपने प्यार के बारे में बात कर सकूँ। उस वक़्त मेरे मन की बात मन में ही रह गई, मगर मैंने अपनी ज़िंदगी में पहला प्यार तो तुम से ही किया था । मैंने तो तुम्हारी शादी के बाद तुम से मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, मगर आज तुम्हारा सच जानने के बाद, आज मैं तुम से कहना चाहता हूँ, कि मैं आज भी तुम से उतना ही प्यार करता हूँ, जितना पहले करता था, क्या तुम मेरे साथ अपनी बाकि की ज़िंदगी बिताना चाहोगी ? "
निधि तो उस वक़्त ख़ुशी के मारे आसमान में उड़ने लगी, मैंने भी तुम से कभी मिलने की उम्मीद छोड़ ही दी थी, मगर जहाँ दिल का रिश्ता इतना गहरा हो, तब दो दिल चाहे जितने भी दूर हो, मगर एक ना एक दिन तो मिल ही जाते है। ये दिलों का रिश्ता ही ऐसा है। इसी तरह तक़दीर ने निधि और निशित को मिला दिया।
मगर उसी वक़्त निधि की सहेली यानी मैं और रितेश का दोस्त यानी समीर, हम दोनों तालियाँ बजाते हुए उनके सामने आए क्योंकि हम दोनों ने मिल के निधि और निशित को मिलाने का ये प्लान किया था, क्योंकि हम दोनों ये बात जानते थे, कि निधि और निशित एक दूसरे से बहुत प्यार करते है।
उसके बाद निधि और निशित दोनों ने शादी भी कर ली, अब दोनों साथ में ही रहते है, जॉब भी दोनों साथ में करते है, उनका एक बच्चा भी है और वह दोनों आज बहुत खुश भी है।
तो दोस्तों, आपके नसीब में पहला प्यार लिखा हो और रिश्ता अगर दिल से दिल का हो तो बिछड़े प्रेमी एक ना एक दिन, किसी ना किसी तरह, किसी ना किसी रास्ते मिल ही जाते है।
15) एक फ़ैसला अपने लिए
डॉली ने अपनी कॉलेज से मुझे फ़ोन किया, मैं सामने से कुछ कह पाऊं, उस से पहले ही डॉली ने बात करना शुरू कर दिया," हेलो, पापा ! कल आपको मेरे कॉलेज के कन्वोकेशन सेरेमनी में आना ही है, चाहे कुछ भी हो जाए। "
मैंने कहा, कि " मैं समझता हूँ बेटा, कि तुम्हारे लिए ये सेरेमनी कितना ज़रूरी और आवाश्यक है। मगर बेटा, तुम मुझे भी समझने की कोशिश करो, मेरी कल एक बहुत ही ज़रूरी मीटिंग है, जो मैं कैंसल नहीं कर सकता, वार्ना मेरा बहुत नुकसान हो जाएगा, please बेटा, मेरी बात समझने की कोशिश करो। "
डॉली ने कहा, कि " मैं इन सब में कुछ नहीं जानती, आपको आना है, तो आना ही है, वार्ना मैं आप से कभी भी बात नहीं करुँगी, आप चाहे कितना भी मनाओ, मैं नहीं मानने वाली। "
कहते हुए डॉली ने रूठते हुए फ़ोन ऱख़ दिया। इस तरफ़ मेरे लिए यह मीटिंग करना बहुत ही ज़रूरी था, विदेश से कुछ क्लायंट सिर्फ़ एक दिन के लिए ही और सिर्फ़ इस डील के लिए ही आनेवाले है और वे लोग वहांँ से निकल भी गए है, अब मैं उन्हें कैसे रोकूँ या मना करूँ, कि " कल मेरी बेटी के कॉलेज में कन्वोकेशन सेरेमनी के लिए जाना है। " मैंने अपने चश्मे अपनी आँखों से उतारे और अपनी कुर्सी पर सिर रख आँख बंद कर कुछ सोचने लगा।
दूसरे दिन सुबह फिर से डॉली ने मुझे याद कराते हुए कहा, कि " आप को याद है ना पापा, कि आज शाम ठिक ५ बजे आपको हमारी कॉलेज आना है, मैं अपने दोस्तों के साथ जल्दी कॉलेज जाने वाली हूँ, आप बाद में आ जाना, मैं आपका इंतज़ार करुँगी।"
कहते हुए डॉली ने फोन रख दिया। मैं फिर से नाश्ता करते-करते सोच में पड़ गया, कि आज शाम को मैं क्या करूँ, डॉली के कॉलेज चला जाऊँ या मीटिंग में ?
आख़िर वो पल आ ही गया। कॉलेज का पूरा हॉल स्टूडेंटस और पेरेंट्स से भरा हुआ था, सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। डॉली बार-बार अपनी बगल वाली कुर्सी, जो उसने अपने पापा के लिए जगह रखी हुई थी उस कुर्सी को और दरवाज़े की तरफ़ देखे जा रही थी, ये जानने के लिए, कि उसके पापा कब आएँगे ? एक के बाद एक सब बच्चों को स्टेज पर बुलाया जा रहा था, सब को काला कोट, काली टोपी और हाथ में एक सर्टिफिकेट दिया जा रहा था, सब तालियाँ बजा रहे थे, डॉली के दिल की धड़कन और तेज़ होने लगी, जब उसका नाम पुकारा गया, "डॉली अग्रवाल"। तब डॉली ने फिर से एक बार दरवाज़े की और देखा, उसकी आँखें अब भी उसके पापा को ढूँढ रही थी, वो चाहती थी, कि उसे स्टेज पर काळा कोट और काली टोपी के साथ उसके पापा उसे देखे। जैसे उसके हर दोस्त के पेरेंट्स उनको देख रहे थे। तभी दूसरी बार डॉली का नाम पुकारा गया, तब डॉली मायूस होकर स्टेज की ओर आगे बढ़ने लगी, उसने सोच लिया, कि " छोड़ो, आज उसके पापा नहीं आनेवाले। "
मगर जैसे ही टीचर डॉली के हाथों में उसका सर्टिफिकेट देने जा रहे थे, तभी दर्शकों में पीछे से तालियों की आवाज़ सुनाई देने लगी, सब ने मूड कर पीछे की तरफ़ देखा, तो डॉली के पापा तालियांँ बजाते हुए अपनी बेटी डॉली की तरफ़ गर्व से देखते हुए आगे आ रहे थे। डॉली की ख़ुशी का तो ठिकाना ही ना रहा, डॉली ने तो अपने पापा के आने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। डॉली भागति हुई स्टेज से उतरकर अपने पापा की तरफ़ जाती है और अपने पापा को गले लगाकर कहती है, " थैंक यू, थैंक यू, थैंक यू, सो मच पापा, की आप आज आ गए, आपको पता नहीं, कि मैं आज कितनी खुश हूँ । "
मैंने कहा, "मैं भी आज बहुत ही खुश हूँ । अब स्टेज पर जाओ भी और अपनी ट्रॉफी लेकर आओ।"
डॉली उछलते-कूदते फिर से स्टेज पर जाती है, टीचर्स उसे सर्टिफिकेट देते है, काला कोट और कैप पहनाते है और उसके फर्स्ट प्राइज के लिए उसे ट्रॉफी भी देते है, उस पल मेरे हाथ न तो तालियांँ बजाते हुए रुके और नाहीं मेरी आँखों से ख़ुशी के आंँसू बहते रुके। चेहरे पर ख़ुशी और आँखों में आंँसू ये कैसा अनोखा संगम है, तालियाँ बजाते हुए मैं खुद उस पल ये समझ नहीं पा रहा था।
सोचते-सोचते मैं कुछ पल के लिए अपने ही बचपन में चला गया, जब मैंने पहली बार स्टेज पर गाना गाया था, जब मैंने स्टेज पर गिटार बजाया था, जब मैंने स्पोर्ट्स डे के दिन स्कूल मैं ट्रॉफी जीती थी, जब मैंने राइटिंग कॉम्पिटशन में ट्रॉफी जीती थी, जब मैंने साइकिल रेसिंग में, जब मैंने फुटबॉल में, जब मैंने पढाई में, जब मैंने अपनी कॉलेज के आखरी एग्जाम में टॉप किया था और मुझे ट्रॉफी मिलने वाली थी, तब-तब मेरी नज़र भी यूँही दरवाज़े पर अपने मम्मी-पापा को ढूँढ रही थी, सब मुझे बधाइयाँ देते थे, मगर में तब अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करता था। क्योंकि उस वक़्त मेरे मम्मी-पापा मेरी ख़ुशी में कभी सामिल नहीं हो सके, उनके लिए उनकी मीटिंग्स और उनका बिज़नेस ज़रूरी था, मेरे दादू जो घर में फ्री ही रहते थे, तो उनको भेज दिया करते और रात को घर आकर मेरे हाथ में नया खिलौना देकर, मुझे बहुत-बहुत बधाई देकर मुझे खुश कर दिया करते, मगर उनको क्या पता, कि मुझे उस वक़्त उस खिलौने की नहीं, मगर उनकी ज़रूरत थी, मेरे सारे दोस्त के पेरेंट्स आते थे, सिर्फ़ मेरे पापा और मम्मी ही नहीं आते थे, फिर रात को मैं अपने दादू के गले लगकर रो कर सो जाया करता, और सुबह जब उठता, तो कभी-कभी मम्मी और पापा शहर से बाहर किसी मीटिंग्स के लिए जा रहे होते थे, मैं दौड़कर खिड़की की तरफ़ भागता और उनको आवाज़ लगाता, " मम्मी-पापा, मम्मी-पापा, रुको, मुझे आप से कुछ कहना है, कुछ सुनना है, कुछ सुनाना है, कुछ देखना है, कुछ दिखाना है। " मगर मेरी आवाज़ उन तक नहीं पहुँच पाती और वे लोग मुझ से कई दूर चले जाते। मैं अपने दादू के पास जाकर मुँह फुलाकर बैठ जाता, दादू समझ जाते, इसलिए मुझे बातों में लगा लेते और हँसा दिया करते। "
तभी कॉलेज के हॉल में अचानक से गिटार बजने की आवाज़ सुनाई पड़ती है। मैं होश में आता हूँ, स्टेज पर देखता हूँ, तो मेरी बेटी, डॉली जो, मुझे अपनी जान से भी प्यारी है, वह हाथ में गिटार लिए बजा रही है और उसका दोस्त उसी की धुन पर गाना गा रहा है, डॉली की नज़र बार-बार मुझ पर आकर रुक जाती, मैं अपनी आँखों के आंँसू छुपा दिया करता और अपने हाथ उठाकर अपना थंब दिखाकर उसे चीयर-उप करने की कोशिश करता। आज मैं बहुत खुश हूँ, कि जो मेरी बेटी बचपन से मेरे साथ हर छोटी-बड़ी बात पे सवाल उठाती और आर्गुमेंट करती रहती, वह आज खुद एक वकील बन गई है। मेरी छोटी सी गुड़िया अब सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के साथ सच्चाई के लिए आवाज़ उठाएगी, हर औरत की तकलीफ़ को समझेगी, हर किसी को इन्साफ़ दिलाएगी, मेरी छोटी सी गुड़िया, आज बड़ी हो गई।
डॉली स्टेज से उतरकर फिर से मेरे गले लग जाती है, कॉलेज के कमरें में तालियों की आवाज़ अब भी सुनाई देती है। डॉली ने कहा, " पापा अगर आज आप के साथ माँ होती, तो मुझे ऐसे ट्रॉफी लेते देखकर वो भी कितना खुश होती ना ? "
मैंने कहा, " हांँ, बेटी, तुम्हारी माँ, होती तो शायद आज तुम वकील के काले कोट में नहीं बल्कि शादी के जोड़े में होती। "
मेरी बात सुनकर डॉली मुस्कुराकर बड़ी ज़ोरों से हँसने लगी, " क्या पापा, आप भी, मैं तो सोच रही थी, कि अपने लिए अब मैं नई मम्मी ढूँढना शुरू कर दूँ। "
हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
तो दोस्तों, मैं देवेन्द्र अग्रवाल अपने मम्मी-पापा का एकलौता बेटा या कहूंँ तो उनकी ज़मीन, ज़ायदाद और बिज़नेस का एक लौटा वारिस हूँ, जो आज भी अपने पापा का बिज़नेस सँभाल रहा हूँ, जो आज का बहुत बड़ा बिज़नेस मेन है और जो बचपन से अपने पापा और मम्मी के साथ सिर्फ़ वक़्त गुज़ारना चाहता था, मुझे उनका सब कुछ मिला मगर वक़्त ही ना मिला। इसलिए आज कल मैंने अपने जीवन में अपने आप पे ही एक किताब लिखनी शुरू की है, यह मेरे ही जीवन का एहसास, यह मेरी ही किताब का, मेरे ही जीवन का एक छोटा सा सच था, जो मैं आप सब के साथ बाँटना चाहता हूँ।
दुनिया की सारी ख़ुशी एक तरफ़ और बेटी की खुशी एक तरफ़। मेरी नज़र से देखो तो, अपने बच्चों को स्टेज पर ट्रॉफी लेते देखना और उसे कामियाब होते हुए देखना, यह एक पिता के लिए बड़े गर्व की बात है।
हाँ दोस्तों, उस ख़ुशी के आगे और कुछ भी नहीं, इस पल के आगे और कुछ भी नहीं, मीटिंग्स फिर कभी हो सकती है, पैसा फिर कभी कमाया जा सकता है, शॉपिंग फिर कभी हो सकती है, दोस्तों के साथ गप्पे फिर कभी लगाए जा सकते है, लेकिन यह पल फिर नहीं आएगा, यह एहसास फ़िर नहीं होगा। इसलिए दोस्तों, अपने बच्चों की ख़ुशी में शरीफ रहकर भी आप जता सकते हो, कि आप के लिए उन से ज़रूरी और कोई काम या और कोई बात हो ही नहीं सकती।
20 ) ज़िंदगी
आज मैंने गाजर का हलवा बनाया था, तो सोचा हेमा आंटी को जाकर दे आती हूँ, वह हमारे पड़ोस में ही रहती है और उनसे मेरा रिश्ता एक माँ-बेटी के रिश्ते जैसा ही है। इसी बहाने उनसे मिल भी लूँगी, दो दिन से ऑफिस के काम की वजह से उनसे मिल ही नहीं पाई। मैं उनके घर की डोर बेल बजाने ही वाली थी, कि अंदर से किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैं मन ही मन बड़बड़ाई, " ये देखो, आंटीजी फिर से रोने लगी पता नहीं, आज फ़िर से अकेले में बैठे हुए उन्हें क्या याद आ गया होगा ? " लेकिन सोचते-सोचते मैंने बेल बजा ही दिया, बेल बजते ही अंदर से रोने की आवाज़ बंद हो गई। तब मैंने दूसरी बार बेल बजाया, तब जाकर आंटीजी ने दरवाज़ा खोला।
मैंने आंटीजी से कहा, "आंटीजी आप क्या कर रही हो ? मैं कब से डोर बेल बजा रही हूँ, मैंने आज गाजर का हलवा बनाया है, वही देने आई हूँ, सोचा इसी बहाने आप से बातें भी हो जाएँगी ज़रा चख़ के तो बताइए कैसा बना है गाजर का हलवा ? " ( आंटी जी को गाजर के हलवे का डिब्बा देते हुए )
लेकिन हेमा आंटी तो मेरी बात सुनकर फिर से फूट-फूट कर रोने लगी। उनको हँसाने के लिए मैंने हेमा आंटी से फ़िर से कहा, " क्या हुआ आंटी जी ? क्या आपको गाजर का हलवा पसंद नहीं ? आपको कुछ और चाहिए था ? मुझे क्या पता ? अच्छा चलो, ठीक है, इसे कचरे के डिब्बे में फेंक देती हूँ ।
मेरी बात सुनते ही हेमा आंटी ने मेरे हाथ से डिब्बा छीन लिया और कहा, " अरी पगली किस ने कहा तुझसे, कि मुझे गाजर का हलवा पसंद नहीं है ? " कहते हुए आंटी जी रोते-रोते हँसने लगे और डिब्बे में से हलवा खाने लगे और हलवा खाते-खाते कहने लगे, कि बहुत अच्छा बना है हलवा और दूसरे ही पल हँसते हँसते फ़िर से रोने लगे। उनको रोते हुए देख, मेरी भी आँखें भर आई और मैंने उनको गले लगा लिया। कुछ पल के लिए मैं उनका दर्द महसूस करने की कोशिश करती रही, मगर जिसका दर्द हो वही जाने।
आंटी जी का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए मैंने उनसे कहा, क्या हुआ आंटी जी ? आज फ़िर से क्यों अकेले में रो रहे थे ? आपको कुछ चाहिए था ? या आप से किसी ने कुछ कहा क्या ? मगर कुछ देर तक आंटी जी बस रोती ही रही, बहुत समझाने के बाद उन्होंने कहा, कि बेटी, " अब तुम से क्या छुपाना ? तुम्हारे अंकल के जाने के बाद मैं तो जैसे बिल्कुल अकेली पड़ गई हूँ। वो थे तो उनके लिए चाय बनाना, खाना बनाना, कपड़े धोना, मंदिर जाना, बाहर घूमने जाना, इधर-उधर की बातें करना, कभी रुठना-तो कभी मनाना, कभी लड़ना-कभी झगड़ना, कभी खरी-खोटी भी सुनाना, ये सब करते थे और अच्छा भी लगता था। वो थे तो पूरे घर में कितनी रौनक थी, अब एक सन्नाटा सा छा गया है, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मेरी बेटी नैना की शादी यहाँ से दूर बंगलोर शहर में हुई है और वह जाइंट फेमली में रहती है। फ़ोन पर रोज़ बातें तो हो जाती है, मैं चाहकर भी उसके साथ नहीं रह सकती और वो चाहकर भी मेरे पास नहीं आ सकती। तुम्हारे अंकल के बिना पूरा दिन मेरा कैसा भारी सा जाता है, तुम्हें पता नहीं, मैं घर संभालती थी तो वो बाहर का सारा काम, मतलब की बैंक का काम, उनका ऑफिस, बिल भरना, lic का पेमेंट, म्यूच्यूअल फण्ड का पेमेंट, पैसों का सारा हिसाब किताब और भी बहुत कुछ वही सँभालते थे, मुझे उन्होंने कभी कुछ भी नहीं बताया, मुझे जब भी जितने भी पैसों की ज़रूरत होती, बिना कोई सवाल किए मेरे हाथ में रख देते थे। बैंक में जाती हूँ, तो कहते हैं कि आप ऑनलाइन भी सब कुछ कर सकती है अब इस ऑनलाइन के ज़माने में मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा, कि कैसे करूँ सब ? आंटी जी कहते-कहते बस सिर्फ़ रोए जा रही थी।
मैं समझ सकती थी, कि हेमा आंटी ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी और ऊपर से इस ऑनलाइन के ज़माने में एक अकेली औरत के लिए यह सब कुछ कितना मुश्किल हो जाता है इसलिए मैंने उनको दिलासा देने की कोशिश करते हुए कहा, कि ओफ्फो आंटी ! बस इतनी सी बात और इतनी सी बात के लिए आप इतना रो रही हो, मुझसे कह दिया होता, क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ ? क्या अंकल जी मुझे अपनी बेटी से कम समझते थे ?
मेरी बात सुनकर आंटी जी ने कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम्हारा अपना भी तो घर है, पति है, ऊपर से तुम ऑफिस भी तो जाती हो, कितनी सारी ज़िम्मेदारी है तुम्हारे ऊपर तो और ऊपर से मैं तुम्हारी ओर तक़लीफ़ बढ़ाना नहीं चाहती।
मैंने कहा, तक़लीफ़, उस में क्या तक़लीफ़ ? मैं तो यह सब चुटकी बजाते कर लेती हूँ। तभी उनकी आँखें, मेरी ओर शर्म से फ़िर झुक जाती है, मैं तुरंत ही उनकी परेशानी समझ गई और कहा, कि " मेरे कहने का मतलब यह है, कि अगर मैं यह सब आसानी से कर लेती हूँ, तो आप भी तो यह सब कुछ कर ही लेंगे ना, उस में कौन सी बड़ी बात है, मैं आपको सब कुछ सिखा दूँगी। "
तब आंटी जी ने कहा, कि " मगर बेटी मुझे तो अंग्रेजी आती भी नहीं है। "
मैंने कहा, " तो क्या हुआ ? आप नहीं जानते मोबाइल में आप हिंदी में सब लिख-पढ़ सकते हो। "
आंटी जी ने कहा, " क्या सच में ऐसा होता है ? "
मैंने कहा , " क्यों नहीं ? आज कल सब कुछ घर बैठे ही हो जाता है, आपको किसी चीज़ के लिए बाहर जाने की ज़रूरत नहीं। "
आंटी जी ने कहा कि " मगर मुझे फ़िर भी बहुत डर लग रहा है, गलती से अगर कुछ गड़बड़ कर दी, मैंने तो ? "
मैंने कहा, " तब भी कुछ नहीं होगा, अगर कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो मैं देख लूँगी। अब आपको सब कुछ सिखाने की ज़िम्मेदारी मेरी। "
आंटी जी ने कहा, " मगर बेटी, तुम अब भी समझ नहीं रही हो, मेरे लिए यह सब बहुत मुश्किल है। "
मैंने कहा, " मैं सब समझ रही हूँ, आप क्या कहना चाहती हैं लेकिन आप कोशिश तो कर ही सकती है ना ? अगर नहीं आया, तब भी कोई बात नहीं, हम कुछ और सोचेंगे, मगर आप शुरू तो करो। "
आंटी जी ने कहा, " मगर बेटी... "
मैंने कहा, " अगर मगर कुछ नहीं, देखिए आंटी जी, मैं आपको समझाती हूँ, जैसे कि मेरे लिए ऑफिस का काम करना, या ऑनलाइन मोबाइल पर सब कुछ करना जितना आसान है, उतना ही आसान आप के लिए खाना बनाना है, है ना ? मुझे भी शादी से पहले कहाँ खाना बनाना आता था। धीरे-धीरे सब सीख लिया। फ़िर भी अब भी मुझ से आप के जितना अच्छा खाना बनाना और आप को जितनी dishes बनानी आती है, मुझे नहीं आती। आप जैसा घर सँभालती आई है, वह सब मेरे लिए आज भी मुश्किल ही है, मगर जैसे-तैसे कर ही लेती हूँ, इसी बजह से कई बार मेरे और रितेश के बीच में झगड़ा भी हो जाता है, but its ok, हो जाता है। दूसरे दिन हम दोनों एकदूसरे को सॉरी भी बोल देते है। तो आप भी तो ये सब सीख ही सकती है, ना ? ज़्यादा नहीं तो थोड़ा बहुत समझ में तो आएगा। इस से आपको बार-बार किसी और पर निर्भर भी नहीं रहना पडेगा, अगर आप अपना सब कुछ जब खुद सँभालने लगेंगे, तब आप को भी बहुत अच्छा लगेगा, देख लेना। अब रोना बंद कीजिए और बताइए हलवा कैसा बना है ? वैसे सच बताना। "
आंटी ने कहा, " हलवा सच में अच्छा बना है, मगर इस में थोड़ी शक्कर ज़्यादा हो गई है और अगर इस में तुम मावे के साथ थोड़ी मलाई भी डालती तो इसका स्वाद और भी अच्छा आता, लेकिन यह भी चलेगा। "
कहते हुए आंटी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
मैंने कहा, " देखा ना, आंटी, आप खाने के बारे में कितना अच्छे से जानती हो, आपको हलवा चखते ही पता चल गया, कि हलवे में मैंने मलाई नहीं डाली। तो वैसे ही आप भी सब कुछ सीख जाओगी। मुझे तो शायद इतना वक़्त ना मिले मगर मेरी एक पहचान में रूपा आंटी है, जो आप ही की तरह हाउस वाइफ है, मगर उसे यह सब कुछ उसके पति ने ही सिखाया है, तो मैं उनसे कह दूँगी, वो दोपहर को या जब भी उनको वक़्त मिले यहाँ आकर आप को सब सिखा देंगे। इसी बहाने आपका वक़्त भी थोड़ा कट जाएगा और आप की एक नई दोस्त भी बन जाएगी। वैसे भी वह रूपा आंटी भी बहुत अच्छी है और वह बातें तो मुझ से भी ज़्यादा अच्छी करती है। "
मेरे कहे मुताबिक रूपाने आंटी जी से कुछ ही दिनों में दोस्ती कर ली और आंटी जी को ऑनलाइन सब कुछ मोबाइल में सिखा भी दिया, माना कि उनको यह सब सिखाने और समझाने में बहुत ज़्यादा वक़्त लग गया और उनसे कई बार ग़लतियाँ भी हो जाती हैं मगर सीखना भी तो ज़रूरी है। अंकल जी के पेंशन से उनका घर चल जाता है और अंकल जी ने म्यूच्यूअल फण्ड में भी आंटी के नाम बहुत पैसे जमा कर रखे हैं, घर भी आंटी जी के नाम ही है, तो अब आंटी जी पूरा दिन घर में न रहकर घर का काम ख़तम कर मंदिर जाती है, योगा और मैडिटेशन क्लास ज्वाइन कर लिया है, ऑनलाइन सब पेमेंट भी कर लेती हैं । अकेले हैं, मगर खुश रहते हैं, सब की मदद करते है।
यह तो अच्छा हुआ, कि धीरे-धीरे हेमा आंटी ने वक़्त रहते सब कुछ सीख लिया, मगर इस दुनिया में और भी कई ऐसी औरतें होंगी जिन्हें इन सब के बारे में कुछ पता नहीं और वह इस बात को लेकर शर्मिंदगी महसूस करती होगी और यह सब कुछ नहीं आने की वजह से उनको अपनी ज़िंदगी में कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता होगा। मैं ये अच्छे से समझ सकती हूँ, कि यह सब एक औरत के लिए बहुत ही मुश्किल है, मगर वक़्त रहते सब कुछ सीख लेना ही समझदारी है। क्योंकि किसी के चले जाने से हमारी ज़िंदगी तो रूकती नहीं, हमें तो अपनी आगे की ज़िंदगी उन्हीं बीती हुई यादों के सहारे गुज़ारनी ही पड़ती है। चाहे हम चाहे या ना चाहे। तो दोस्तों, इस कहानी से मैं बस सिर्फ़ यही कहना चाहती हूँ, कि इस बदलते ज़माने में या कहूँ तो मोबाइल और ऑनलाइन के ज़माने में हर एक को यह सब सीख लेना बहुत ज़रूरी है, पता नहीं क्या कब हो जाए ? पता नहीं कौन, कब अपना रंग बदल दे ? इसलिए किसी और के लिए नहीं तो अपने लिए वक़्त रहते सब कुछ सीख ही लेना चाहिए।
डॉली का घर आज सुबह से सजाया जा रहा था, जैसे दिवाली में घर सजाते है। डॉली के माँ-पापा और डॉली की भाभी, सब लोग आज बहुत ही खुश थे। डॉली ने अपनी माँ को चिढ़ाते हुए कहा, " वाह, मम्मी क्या बात है, आज रसोई से सुबह से ही बहुत ही अच्छी-अच्छी खुशबु आ रही है। वाह ! रस-मलाई, फ्रूट-सलाड, कचोरियाँ, समोसे, पनीर की सब्जी, छोले-भटूरे, पराठा, पापड़, अचार, पूरी, साथ में पुरण पूरी भी... आज से दो दिन पहले जब मैंने बोला था, कि मुझे समोसे खाने का बड़ा मन कर रहा है, तब तो आपने कहा, कि आज मैं बहुत थक गई हूँ, फ़िर कभी बना लुंँगी और देखो, आज भैया के आने की ख़ुशी में इतने सारे पकवान... बहुत अच्छे...
माँ ने इतराते हुए कहा, " मेरा लाडला बेटा, दो साल बाद घर आ रहा है, तो उसके आने की ख़ुशी क्या तुझे नहीं है ? "
डॉली ने कहा, " मैं तो मज़ाक कर रही थी, माँ। " तभी डॉली की भाभी अपने कमरे से तैयार होकर बाहर आती है, उसे देखकर डॉली उसे भी चिढ़ाने लगी, " अरे वाह, भाभी आज तो आप क़यामत ढा रही है, भैया कहीं आपको देखते ही बेहोश ना हो जाए ? "
भाभी शरमाते हुए कहती है, " चल हट पगली, क्यों मुझे हर बार छेड़ती रहती है। " डॉली ने मन ही मन गौर किया, कि आज सच में भाभी के चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। डॉली के पापा सुबह जल्दी ही मंदिर जाके आते है और साथ में घर का ज़रूरी सामान भी लेकर आते है। डॉली भी वैसे आज बहुत खुश थी, क्योंकि आज दो साल बाद उसका बड़ा भाई घर वापस जो आ रहा है, तो सब की ख़ुशी दो गुनी तो होगी ना। वह भी राखी के दिन।
उस तरफ़ डॉली का बड़ा भाई विजय अपने देश के लिए लड़ रहा था, वहांँ युद्ध में उस वक़्त गोलियांँ दोनों तरफ़ से आमने-सामने लगातार चल रही थी, विजय अपनी जान की परवाह किए बिना वहांँ से बच्चों और औरतों को किसी सुरक्षित जगह पर भी ले जा रहा था, ताकि उन्हें कहीं दुश्मन की गोलियांँ ना लग जाए।
दूसरी तरफ़ विजय ने किसी भी तरह आज राखी के दिन घर आने का वादा अपनी बहन, पत्नी और माँ-पापा से किया था। इसलिए घर में सब विजय के विजय होकर लौटने के इंतज़ार में ही थे। डॉली के पापा सुबह से महा मृत्युंजय का जाप कर रहे थे, सब के मन में एक अजीब सी ख़ुशी और डर भी था। इसलिए डॉली सब को खुश रखने की कोशिश में थी और उसे भरोसा था अपने भाई पर और उनके किए वादे पर, कि आज वह ज़रूर आएँगे। डॉली भाभी को बार-बार चिढ़ा रही थी, मम्मी को सत्ता रही थी, मगर अंदर ही अंदर डॉली का खुद का मन भी रो रहा था और अपने भाई को पुकार रहा था, कि " आज तो चाहे कुछ भी हो जाए, आप को आना ही है और अपना वादा निभाना ही है। "
देखते ही देखते सुबह से शाम और शाम से रात हुई, मगर विजय भैया की आने की कोई खबर नहीं थी। ( ये उस वक़त की बात है, जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे।) रात के तक़रीबन १० बजने वाले थे, घर में किसी ने सुबह से ठीक से खाना भी नहीं खाया था, सब की नज़रें दरवाज़े पर थी, कि कब विजय घर आ जाए।
कुछ देर के इंतज़ार के बाद घर के दरवाज़े की घंटी बजती है। डॉली भाग के जाती है और दरवाज़ा खोलती है, दरवाज़ा खोलते ही देखा, तो तीन फौजी अपनी वर्दी में दरवाज़े के बाहर खड़े थे। मगर उनके साथ विजय भैया ही नहीं थे। डॉली आगे पीछे नज़र करते हुए सिर्फ़ अपने भैया को ही ढूँढ रही थी। उन तीन फौजी को देख़ घर में सब के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी। तभी उन में से एक फौजी ने भैया की बैग आगे करते हुए कहा, कि ये विजय की बैग और... इतना सुनते ही, उसी वक़्त पीछे खड़ी विजय की माँ वही रखीं कुर्सी पर जैसे गिर के अपना दिल थाम बैठ जाती है, विजय की पत्नी जिस खम्भे के पास खड़ी थी, उसी खमभें को उसने अपने दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया, विजय के पापा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर आँसू के साथ भगवान् से एक बार और प्रार्थना की, विजय की बहन तो वही पर खड़ी-खड़ी अपनी आँखें बंद कर चकराके गिरने ही वाली थी, कि तभी उन तीनों फौजी के पीछे से विजय ने बाहर निकल कर ज़ोर से आवाज़ लगाई, सरप्राइज.... ! और विजय ने खुद ही अपनी बहन को गिरते हुए सँभाल लिया। विजय को अपनी आँखों के सामने देख सब की आंँखें ख़ुशी से भर आई। डॉली तो विजय से छोटी बच्ची की तरह रोके, लिपट कर, नाराज़ होकर, झगड़ पड़ी और कहने लगी, " ऐसा भी कोई मज़ाक करता है भला, मेरी तो जान ही निकल गई थी, जाओ अब मैं आप को राखी नहीं बाँधूँगी। " डॉली अपना मुँह फुलाकर पलटकर खड़ी रह गई।
विजय ने अपनी बहन डॉली से मज़ाक करते हुए कहा, कि "अच्चा, तो मैं फ़िर से यहाँ से चला। " तभी विजय की माँ ने आके ज़ोर से विजय के कान खींचे और कहा, अब तक तेरी शैतानी करने की आदत नहीं गई, क्यों ? "
विजय अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर उसके गले लग जाता है और अपनी माँ को मनाते हुए कहता है, " अब, माफ़ कर दे माँ, मैं तो बस यूँहीं ! मज़ाक कर रहा था। " तभी विजय की पत्नी भी रोते हुए आगे आकर विजय से लिपट जाती है । विजय के पापा भगवान् से शुक्रियादा कर रहे थे और उनके मंदिर में विजय के लौट ने की ख़ुशी में फ़िर से दिया करने लगे। विजय ने अपने पापा के पास जाकर उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया और उनके गले लग गया।पापा ने विजय को ढ़ेर सारा आशीर्वाद दिया और कहा, बस सुबह से तेरे ही आने का इंतज़ार था। विजय ने अपनी बहन की ओर प्यार भरी नज़र से देखते हुए कहा, " कैसे ना आता भला ? आज के दिन मैंने बहन से जो राखी का वादा किया था, वह भी तो निभाना था। "
डॉली ने हँस्ते हुए विजय और उनके साथ आए तीनों फौजी दोस्तों को भी उनकी सलामती के लिए राखी बाँधी और मुँह मीठा कराया। भाई ने अपनी बहन को उसकी रक्षा करने का वचन दिया। उसके बाद हँसी मज़ाक करते हुए सब ने साथ मिलकर खाना खाया। इतना सारा अपनी पसंद का खाना देखकर विजय बहुत खुश हो गया, उसकी आँखें भी ख़ुशी से भर आती है और आज उसने सच में दबा के खाना खाया और सब ने रात भर बैठ के बहुत सी बातें की, विजय बिच-बिच में आज युद्ध में क्या-क्या हुआ ये सब भी कहता गया, तब सब के दिल की धड़कन दो पल के लिए फिर से रुक जाती है।
तो दोस्तों, आज के दिन मैं सिर्फ अपने भाई के लिए नहीं बल्कि हर बहन के भाई के लिए और हर उस देश के जवान के लिए प्रार्थना करती हूँ, जो अपना सब कुछ छोड़ के देश की सेवा में जिन्होंने अपना सब कुछ समर्पण किया है, कि वे जहाँ भी रहे स्वस्थ और तंदुरस्त रहे, उनको कभी किसी की बुरी नज़र ना लगे वे देश के हर युद्ध में जीत के आए और वे दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करे....
25 ) भाई बहन
मुझे आज भी याद है,
बचपन में मुझे झूले में झुलाना, रातो को अगर मुझे नींद ना आए तो गाना गा के मुझे सुलाना, मेरी चोटी खींच के मेरे पीछे पीछे भागना, मुझे बिल्ली कहकर बार - बार चिढ़ाते रहना, कभी मैं रोऊँ, तो मुझे हँसाना, कभी मैं रुठु तो मुझे मनाना, मुझे माँ की डांट और पापा की मार से बचाने के लिए खुद पापा से मार खाना, ये कहकर की " गलती दीदी की नहीं हमारी है " मेरे लिए tution में teacher से भी लड़ जाना, चुपके से मेरा homework भी कर देना, मुझे cycle चलाना सिखाना, अगर मैं गिर जाऊ तो मुझे संभालना, मेरी हर गलती पापा से छुपाना, मेरी हर गलती पर मुझे माफ़ कर देना और " ज़िंदगी में सही और गलत का फ़र्क मुझे समझाना"
मेरे जन्मदिन पर हर साल कुछ ना कुछ surprise मेरे लिए ज़रूर रहता ही है, भाभी को पसंद हो या नापसंद मेरी favourite केक और पानीपुरी मुझे मिल ही जाती है, मेरे जन्मदिन पर party ना हो ऐसा कभी नहीं हो सकता।
मेरे shoe की लैस भी बांँध देना, मेरी हर बात को गौर से सुनना, मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं मानना, मुझे पढ़ाना, लिखाना, exam में रातो को मेरे संग जागना, अगर मुझे exam में कुछ ना आए तो फिर से मुझे वह lesson सिखाना, मेरे लिए अपने दोस्तों से भी भीड़ जाना, मम्मी और पापा से छूप -छूप के मुझे आइस-क्रीम खिलाना, मेरी बीमारी में मुझे समजा - बुजा के दवाई पीला देना, मुझे college में पढ़ने भेजनें के लिए पापा को मनाना, पापा को किसी भी तरह पटा कर मेरी college जाने की permission पापा से दिलाना, मेरी शादी के लिए लड़का भी खुद पसंद करने जाना, मेरे लिए भाभी के साथ में नौकझौंक में पड़ जाना, लेकिन हर बार साथ मेरा ही देना ।
मेरी शादी में मेरे जाने के बाद चुपके से अकेले में रोना, मेरी शादी के बाद भी मेरी हर मुसीबत में मेरे साथ खड़े रहना, भला कैसे मैं भूल सकती हूँ, ऐसा प्यार और ऐसा मेरा बचपन ? काश कोई मुझे लौटा दे फिर से मेरा बचपन !
की मुझे फिर से मेरे भैया झुला झुलाए, गाना गाके मुझे सुलाए, मेरे पीछे पीछे भागे, मुझे चिढ़ाए, मुझे पढाए, मेरे लिए मम्मी, पापा, दोस्त, टीचर सब से भीड़ जाए, काश ! की मुझे कोई लौटा दे मेरा बचपन।
बस इस से आगे अब मुझे और क्या चाहिए ? मुझे ज़िंदगी में अच्छा बनने का पाठ सिखाया, नहीं सिखाया तो बस किसी से झूठ बोलना, किसी से लड़ना, झगड़ना, और बिना मतलब किसी से अपना हक़ मांँगना।
राखी तो सिर्फ एक बहाना है, दिल से रोज़ मांँगती हूँ आप दोनों के लिए दुआ, आप दोनों जहाँ भी रहे, रहे हर पल सलामत, आप दोनों दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करे, आप पर कभी मुसीबतों का साया भी ना आ पाए,
" मेरी दुवाओ में,
असर इतना रहे, की
मेरे भाई का आँगन,
हमेंशा ख़ुशियों से भरा रहे। "
Dedicated to my beloved brothers,
Rakesh ajmeri
Hiren ajmeri
सत्य घटना पर आधारित
26 ) बेचारे भैया
27 ) वे सब से अच्छें
28) एक अधूरा सपना
आज सुबह से लेकर शाम होने को आई, लेकिन पुरे दिन में नाहीं उनका कोई फ़ोन आया और नाहीं कोई मैसेज, जितनी भी बार मेरे मोबाइल की रिंग बजी, मुझे ऐसा ही लगा, कि उनका ही जैसे फ़ोन आया हो, मगर देखा तो कोई और ही था, फ़िर आज मेरा किसी से बात करने का मन भी नहीं था, थोड़ी बात कर के फ़ोन रख देती, जब भी मैसेज की तूण बजती तो भी लगता, कि जैसे उनका ही मैसेज आया होगा, मगर वह भी नहीं, अपने मोबाइल में उनके wats up पर जाकर फिर भी बार-बार चेक किया करती, कि मैसेज आया या नहीं, अब तो इंतज़ार की हद हो गई, मुझ से तो अब रहा भी नहीं जाता था, मन बहुत बैचेन सा लगने लगा था, दिल बैठा जा रहा था, अपने आप को मन ही मन कोश रही थी, कि हसी मज़ाक में भी मैंने उनसे ऐसा कहा ही क्यों ? मैंने उल्टा-सुलटा बोल दिया, तभी तो उनको बुरा लगा ना ! बगैर नास्ता किए, बगैर टिफ़िन लिए ऐसे ही घर से चल पड़े, अब क्या करू, कुछ समझ नहीं आ रहा था, वैसे भी ऑफिस जाकर रोज़ मैसेज कर दिया करते थे, कि " मैं ऑफिस पहुँच गया हूँ, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, अपना ख्याल रखना, किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो कॉल करना, दवाई वक़्त पर ले लेना। " फिर वह दिल और किसी वाला इमोजीस भी भेजते, उफ्फ्फ! और आज कुछ भी नहीं और देखो आज तो ऐसा कोई मैसेज भी नहीं आया, इसलिए दिल और भी ज़ोर से धड़क रहा था। नई नई शादी जो हुई थी, ऊपर से सब घरवालों को छोड़कर बेंगलोर आकर उनके साथ अकेले रहना था, इसलिए वह मेरा बहुत ख़याल रखते थे, हर एक-दो घंटे में फ़ोन कर के पूछ लिया करते, कि " मैं क्या कर रही हूँ, मुझे कुछ चाहिए तो वह ऑनलाइन ऑर्डर कर के मंगवा भी लेते, इसी बहाने मुझ से बात भी कर लिया करते।" मैं पूरा दिन इसी कश्मकश में लगी रही।
तभी मोबाइल में फ़िर से मैसेज आया, मैंने तुरंत खोल के देखा, तो उनका ही मैसेज था। लिखा था, कि " जल्दी से तैयार हो जाओ, पार्टी में जाना है, तुम वह रेड साड़ी पहन लेना, जो मैंने तुम्हें तुम्हारी सालगिरह पर दी थी। " पढ़कर मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, वह तो मुझ से नाराज़ थे ही नहीं, मैं ही पागल, उल्टा, सुलटा उनके बारे में सोच रही थी. फिर मैंने भी मैसेज कर के पूछ ही लिया, कि " आपने दोपहर का खाना खाया क्या ? टिफ़िन लेकर क्यों नहीं गए ? और ऑफिस जाकर नाहीं कोई मैसेज और नाहीं कोई कॉल ?" उनका तुरंत ही जवाब आया, कि " सुबह मुझे एक अर्जेंट मीटिंग में जाना था और टिफ़िन का इंतज़ार करता तो, लेट हो जाता। बहुत बड़ी कंपनी के साथ आज डील होने वाली थी, जो हो भी गई, बस सुबह से आज यहीं सब मेरे दिमाग में चल रहा था, इसलिए मैं बिना कुछ बताए जल्दी में घर से निकल गया। पूरा दिन इसी में गया, मुझे तुम्हें फ़ोन या मैसेज करने का भी वक़्त न मिला। लेकिंन आज तुम यह सब क्यों पूछ रही हो ? "
अब जाके मेरा डर कुछ कम हुआ, मैंने कहा, " बस ऐसे ही, अचानक से पार्टी में जाने के लिए कहा इसलिए।"
तो उन्होंने कहा, " हां, आज जो कंपनी के साथ डील हो गई, उन्ही के साथ पार्टी है, बाकि बातें बाद में घर आकर बतलाता हूँ, तुम अब जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं भी अभी ऑफिस से निकलता हूँ, आधे घंटे में घर पहुँच जाऊंगा।
मैंने मुस्कुराते हुए प्यार वाला इमोजी भेज दिया और फ़ोन रखकर तैयार होने के लिए चली गई, तैयार होते-होते यही सोच कर मुस्कुराती रही कि मैं भी कितनी पागल हूँ, बिना कुछ सोचे समझे युहीं डरती रही, वह रूठ तो नहीं गए, मगर शायद उन्होंने तो मेरी बात सुनी भी नहीं, क्योंकि उस वक़्त तो वह अपने क्लायंट से फ़ोन पर बात कर रहे थे। 😆😐 कुछ ही देर में वह आ गए और उन्होंने खुश होते हुए मुझे गले लगा लिया और कहा, कि आज मैं बहुत खुश हूँ, हमारी कंपनी को बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला है। मैंने भी उनको लगे लगते हुए बहुत-बहुत बधाई दी। फ़िर हम दोनों तैयार होकर पार्टी के लिए निकल पड़े। 😀😀
इस बात को बीते ५ साल हो गए, लेकिन आज भी मुझे वह ख़ुशी के पल याद आते, तब मन ही मन बहुत हँसी आती और यह बात शायद मैं कभी ना भूल पाऊ। आज तक मैंने यह बात उनको बताई ही नहीं, कि उस वक़्त मेरा पूरा दिन कैसा गुज़रा था ? अब सोचती हूँ, कि बता ही दूँ। 😄😄
तो दोस्तों, बस यही तो ज़िंदगी है, कुछ खट्टी तो कुछ मीठी यादें।
31) प्यार या स्वाभिमान
आज मैं उसी स्कूल के करीब से गुज़र रहा था, जहाँ से आराध्या के साथ मेरी ज़िंदगी की शुरुआत हुई थी। बीते हुए वह लम्हें जिसे हम चाहकर भी कभी भुला नहीं पाते। और मैं खुद भी उस पल कुछ देर के लिए वहीं रुक गया और उन बीते किताब के पन्नों को फ़िर से एक बार पढ़ने लगा, जैसे कि उन बीते हुए लम्हों को एक बार फ़िर से जीने लगा।
हाँ, मेरा नाम अविनाश। आज भी मुझे याद है, " आराध्या उस दिन सफ़ेद कुर्ता पहने, कानो में लम्बे झुमके, एक हाथ में घड़ी और दूसरे हाथों में बुक्स, काले घने उसके घुँघराले बाल, उसी के नरम गालों को जैसे बार-बार छूने की कोशिश कर रहे थे और मैं यहीं से अपनी साइकिल से उसे लाइब्रेरी से बाहर आते हुए देखता ही रह गया था। तब हम ८ वी कक्षा में एक ही क्लास में पढ़ते थे। हम दोनों पढाई में बहुत तेज़ थे, इसलिए टीचर क्लास में हम दोनों को ही सब से ज़्यादा एहमियत देते थे, प्रोजेक्ट भी हम दोनों साथ मिलके ही करते थे। पहले दोस्ती हुई फ़िर प्यार।
वही तो, आखिर एक लड़का और लड़की कब तक दोस्त बने रहेंगे, दोनों के बीच प्यार आ ही जाता है। माना की हम दोनों के ज़िंदगी जीने का तरीका, हमारी सोच, हमारा रेहन-सेहन सब कुछ अलग-अलग था। फ़िर भी देखो आप, " प्यार तो होना ही था "। हम दोनों ८ वी कक्षा से लेकर कॉलेज तक साथ ही थे, इसलिए हमारे सारे दोस्त हमसे जलते भी थे। हम दोनों ने ये तय किया था, कि हम पढ़ने में एक ही लाइन लेंगे, ताकि साथ मिलकर एकदूसरे के साथ वक़्त बीता सके और साथ-साथ पढ़ भी सके। आराध्या डॉक्टर बनना चाहती थी और मैं कम्पूयर एंजीनियर। पता नहीं उस वक़्त मैंने उसकी बात क्यों मान ली ? मैं एंजीनियरींग छोड़कर डॉक्टर बनने के लिए भी तैयार हो गया, सच में मैं उसके प्यार में बिलकुल अँधा था। वो महलो में रहनेवाली, बड़े घर की बेटी और मैं साधारण सी सरकारी नौकरी करने वाले पिता की एक लौटी संतान। जिसने बड़ी उम्मीद से मुझे पढ़ाया, लिखाया, प्यार दिया, अपने पैरो पर खड़ा होने लायक बनाया। हम दोनों की दोस्ती इतने सालों से थी, तो हमारे घर वालों को भी पता था, कि हम दोनों अच्छे दोस्त है और आए दिन एक दूसरे के घर बिना किसी हिचक के किसी न किसी बहाने जाया भी करते, कभी प्रोजेक्ट के बहाने, तो कभी बुक्स के बहाने, तो कभी बर्थडे पे, तो कभी पार्टी। एक दिन मेरे पापा किसी की शादी में गाँव गए हुए थे और आराध्या मेरे घर प्रोजेक्ट के लिए आई हुई थी, घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था, बातों-बातों में हमने पहली और आख़री बार प्यार की सारी सीमा भुला दी, हम दोनों दो में से एक बन गए। उसके लिए हम दोनों में से किसी को इस बात का रंज नहीं था, ज़िंदगी उन दिनों कितनी खूबसूरत हुआ करती थी, सिर्फ प्यार और पढाई, दोनों साथ में। लेकिन कहते है, ना " ज़िंदगी में हम जो सोचते है, वह नहीं होता मगर हमारे साथ जो होता है, वह ज़िंदगी होती है। " बस वैसे ही हमारी ज़िंदगी में भी एक मोड़ आया और हम दोनों अलग हो गए, इतने सालो का प्यार जैसे एक पल में बिखर गया।
मुझे आज भी याद है,
हम ने साथ मिलकर डॉक्टरी की पढ़ाई तो पूरी की, मगर जितना आसान ये सब आराध्या के लिए था, उतना आसान मेरे लिए नहीं था। क्योंकि डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पैसे भी बहुत लगते है, फ़िर भी मेरे पापा ने जैसे-तैसे करके मेरी ज़िद्द की बजह से, मुझे अच्छे कॉलेज में पढ़ाने के लिए फीस का इंतेज़ाम कर ही लिया, मैं वो सब बात भी समज़ता था, मगर आरध्या इन सब बातों से परे थी, आराध्या बड़ी तो हो रही थी, मगर कई मामलो में अब भी वह बहुत नादान सी थी, वह दिमाग से नहीं, दिल से सोचती थी। मगर ज़िंदगी जीने के लिए कई बार दिल की नहीं दिमाग की बात सुननी पड़ती है। क्योंकि आराध्या अपने पापा की लाड़ली जो थी, बिना मांँगे ही उसे सब मिल जाता था, किसी बात के लिए या किसी चीज़ के लिए उसे इंतज़ार नहीं करना पड़ता। लेकिन अब मुझे डॉक्टरी ज़्यादा समझ नहीं आ रही थी और फ़िर भी मैंने आरध्या की मदद से डॉक्टरी की पढाई पूरी की, कुछ प्रोजेक्ट अगर मेरी समझ में नहीं आते, तो घर आकर वो मुझे आसानी से समझाया करती और मुझे कहती, " अरे बाबा ! डॉक्टरी समझ नहीं आती, तो क्यों कर रहे हो ? " कहते हुए आराध्या हँस पड़ती, पर मैं ही जानता था, कि डॉक्टरी मैंने उसी के लिए पसंद किया था। बात अब शुरू होती है, आराध्या को अब और आगे पढ़ने और डॉक्टरी करने के लिए अमेरिका जाना था और शायद वह वही रहना भी चाहती थी, ऐसा उसकी बातों से मुझे लगने लगा था। मगर अमेरिका जाने के लिए मेरे पापा के पास अभी उतने पैसे नहीं थे और उस तरफ़ आरध्या के एक बार कहने पर आरध्या के पापा ने उसका फॉर्म और फीस अमेरिका में भर भी दीया। तब
आराध्या ने मुझ से कहा, कि " तुम भी मेरे साथ अमेरिका चलो, साथ में अब भी आगे पढ़ लेंगे और वही डॉक्टरी भी साथ में कर लेंगे, ज़िंदगी आसान हो जाएगी। "
मैंने आराध्य से कहा, कि " तुमने तो बड़ी आसानी से कह दिया, कि अमेरिका चलते है, मगर मेरे पापा के पास इतने पैसे नहीं है, कि वो मेरे अमेरिका जाने के लिए इतना पैसा दे सके और इस के आगे भी डॉक्टरी की पढाई के लिए उन्होंने लोन ले रखी है, अब मैं उन पे और बोज नहीं डाल सकता, तुम तो हमारे घर के बारे में सब जानती ही हो, तो फ़िर तुमने यूँ अचनाक से अकेले ही ऐसे अमेरिका जाकर पढ़ने का और सेटल होने का फैसला कैसे कर लिया ? तुमने मुझे बताया भी नहीं और अमेरिका कॉलेज में फॉर्म भी भर दिया। हम ने सालों पहले क्या तय किया था, वो तो तुम भूल ही गई, कि " हम साथ पढ़ेंगे, साथ ही काम करेंगे और साथ रहेंगे भी, ज़िंदगी का हर फैसला हम साथ मिलकर ही करेंगें । " तो अब क्या हुआ ? "
तब आराध्या ने आसानी से कह दिया, कि " उस में क्या हुआ, मैंने अपने पापा को सिर्फ बताया, कि मैं अमेरिका जाके पढ़ना चाहती हूँ, तो उनका एक दोस्त का लड़का वही कॉलेज में पढता है, तो उन्होंने कहा, कि कॉलेज सच में बहुत अच्छी है और वह हमें हेल्प भी करेगा। इसलिए पापा ने तुरंत मेरा भी फॉर्म भर दिया। अगर तुम चाहो तो तुम्हारे लिए मैं अपने पापा से बात करुँगी, वो तुम्हारा भी फॉर्म और फीस भर देंगे, बात ख़तम। तुम चल रहे हो मेरे साथ, बाद की बाद में देख लेंगे। "
कहते हुए आराध्या ने खड़े होते हुए मेरा हाथ खींचकर मुझे भी अपने साथ आने को राज़ी कराने लगी। उसे लगा, कि हर बार की तरह इस बार भी मैं उसकी ये बात भी आसानी से मान लूंँगा। लेकिन नहीं, मैंने उसका हाथ अपनी ओर खींचते हुए उसे रोका और उसे समझाते हुए कहा, कि देखो, आराध्या तुम्हारे पापा का दिल बहुत बड़ा है और वो मुझे कई सालो से जानते है, हमारी दोस्ती को जानते है, इसलिए शायद मना नहीं करेंगे, लेकिन मेरे पापा का क्या, उनका तो इस दुनिया में मेरे अलावा और कोई भी नहीं है। और वो ऐसे पैसे लेने से मना करेंगे। वह ऐसा बिलकुल नहीं चाहेंगे, कि मैं तुम्हारे पापा के दिए हुए पैसों से अमेरिका जाकर अपनी आगे की पढाई पूरी करूँ। इस से तो उनकी अब तक की सारी मेहनत पे पानी फ़िर जाएगा, उनके आत्म-सम्मान को कितनी ठेश पहोचेगी ? और शायद मैं भी इस बात के लिए राज़ी नहीं हूँ। "
उस वक़्त आराध्या ने फ़िर से मुझे मनाने की बहुत कोशिश करते हुए कहा, कि " मैंने तो जाने का फैसला कर लिया है और तुम भी मेरे साथ चलोगे, चाहे कुछ भी हो जाए, सिर्फ़ कुछ पैसो की ही तो बात है, तो बाद में तुम पैसे मेरे पापा को दे देना। बात ख़तम। लेकिन तुम मेरे साथ आ रहे हो। "
आराध्या को आज भी जैसे लग रहा था, की हर बार की तरह उसके पापा के जैसे इस बार भी मैं उसकी बात मान जाऊँगा।
मैंने कहा, बात सिर्फ पैसो की नहीं है, बात है, स्वाभिमान की, मैं या मेरे पापा ऐसा बिलकुल नहीं चाहेंगे। तुम बस बात समझ ने की कोशिश करो, मेरे लिए ये बहुत मुश्किल है।
उसके बाद आराध्या रोते हुए वहांँ से उठ के चली जाती है और कहती जाती है, कि "अच्छा तो तुम यहाँ रहो अपने पापा के पास और मैं चली अमेरिका, अपना सपना पूरा करने। यहाँ से आगे का सफ़र शायद अब मुझे अकेले ही तय करना होगा। "
मैं भी मन ही मन बोला, कि " हाँ, मुझे भी शायद आगे का सफर अब अकेले ही तय करना होगा। "
कहते हुए हम दोनों एकदूसरे से अलग हो जाते है। उसे अपना सपना पूरा करना था और मुझे अपना और अपने पापा का स्वाभिमान बचाना था। मैंने प्यार और स्वाभिमान में से स्वाभिमान चुना और आराध्या ने अपना सपना पूरा करने के लिए हमारा इतने साल का प्यार भुला कर अमेरिका जाने के लिए अपने पापा के दोस्त के बेटे के साथ कुछ ही दिनों में शादी कर ली और अमेरिका चली गई।
इस तरफ़ मैंने यहीं से आराध्या की तरह और आगे की अपनी डॉक्टरी की पढाई शुरू की मगर आराध्या के जाने के बाद मेरा नाहीं पढाई में मन लगा और नाहीं डॉक्टरी की पढाई मेरे पल्ले पड़ी। तब मैंने चाइल्ड साइकोलॉजी की पढाई की और अस्पताल में प्रैक्टिस के लिए लग गया। कुछ वक़्त के बाद पापा ने मेरे लिए अपने खुद का दवाख़ाना खोल दिया। भले ही यहाँ उसके जितना पैसा ना कमा पाउँगा, लेकिन उस दिन मैं बहुत खुश था, कि चाहे मैं अमेरिका आराध्या के साथ ना जा सका, चाहे मैं एंजीनियर न बन पाया, मगर मेरा स्वाभिमान तो मेरे साथ रहा। क्योंकि आराध्या के ज़िंदगी जीने के तरीके से लगता था, कि शायद वह हर बात मुझ से मनवाती रहती और हर बार मेरे स्वाभिमान को ठेस पहोंचाती रहती, इसलिए मुझे अपने फैसले पर कोई शर्मिंदगी या अफ़्सोस नहीं और आज मेरे पापा मुझ पर बहुत गर्व करते है और आते-जाते सब को कहते रहते है, कि मेरा बेटा, डॉक्टर बन गया है, अब दवाई लेने उसके पास ही जाना और मुझे देखकर मुस्कुराते रहते, मैं उनको मुस्कुराता देख, अपने सारे ग़म भूलकर मुस्कुरा देता। बस यही मेरे लिए बहुत है। उस वक़्त मुझे पता नहीं था, कि " जो फैसला मैंने लिया था, वह सही था या ग़लत, कि प्यार और स्वाभिमान में से मैंने स्वाभिमान को चुना और प्यार को जाने दिया। "
लेकिन हाँ, ये बात भी सच है, कि आज भी अकेले में जब भी मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ, तो मेरे सामने आराध्या का ही हँसता हुआ चेहरा नज़र आता है, आज भी उसकी खुशबु मैं महसूस करता हूँ, भले ही आराध्या जैसी भी हो या जैसी भी थी, प्यार तो मैंने उस से सच्चा किया था और उसी से करता रहूंँगा और अब उसके साथ बिताए पल को गले से लगाकर अपनी आगे की ज़िंदगी भी गुज़ार लूँगा।
तभी मेरे मोबाइल पर पापा का फ़ोन आता है, मैंने अपनी पलक झपकाई, अपने आप को उसी स्कूल के सामने पाया, मगर आज फ़र्क सिर्फ़ इतना था, कि " उस दिन मैं साइकिल पर था और आज मैं अपनी कार में था, उस दिन लाइब्रेरी से आराध्या बाहर आई थी, आज मेरे टूटे दिल के सपने बाहर आ रहे थे। " मगर आज मुझे ये लग रहा है, कि उस वक़्त जो फ़ैसला मैंने लिया था, वह शायद सही ही था, मुझे अपने लिए गए फैसले पर कोई पछतावा नहीं है।
एक बात और कहना चाहता हूँ, कि " आज इतने सालों बाद यह महसूस हुआ कि वो उम्र ही यारों ऐसी होती है, कि अगर हमें किसी से प्यार हो जाए या कोई हमें थोड़ा सा प्यार दे दे, तो हम उसके लिए अपनी जान तक देने को तैयार हो जाते है। तब हमें प्यार के अलावा और कुछ भी नहीं दीखता। लेकिन जब ज़िम्मेदारी का एहसास होता है, तब जाके पता चलता है, कि प्यार अपनी जगह ठीक और हम और हमारी, हमारे अपनों के लिए ज़िम्मेदारी अपनी जगह होती है। ज़िंदगी जीने के लिए प्यार का होना बहुत ज़रूरी है, मगर सिर्फ प्यार के सहारे ही ज़िंदगी नहीं चलती, इस बात का एहसास हमें बहुत देर से होता है और जब तक इस बात का हमें एहसास होता है, तब तक ज़िंदगी हमारे हाथों से निकल जाती है।
तो दोस्तों, क्या आप बता सकते हो, कि अविनाश ने प्यार और स्वाभिमान में से स्वाभिमान को चुनकर फ़ैसला सही किया या गलत ?
32) हिम्मत
सुषमा अभी सिर्फ १७ साल की ही थी, मगर कहते है ना, कि " लड़कियांँ वक़्त से पहले ही जवान हो जाती है," वैसे ही सुषमा का यौवन दिखने में २० साल की लड़की जैसा था और तो और वह दिखने में भी पहले से ही बहुत सुंदर थी, एक ही बार में किसी का भी दिल उस पर आ जाए, तो फ़िर ये तो सब दारू के नशे में रहनेवाले पियक्कड़ थे।
हाँ, तो दोस्तों, आज मैं बात करने वाली हूँ, उस बस्ती की, जिस बस्ती में पैसो के लिए लोग कुछ भी करने को राज़ी हो जाते है, वह लोग सिर्फ़ एक ही भाषा जानते है, वह है, " भूख़ "। चाहे वो भूख़ रोटी की हो या हवस की। इसके लिए वह कुछ भी कर जाते है। अब आगे...
वैसे ही सुषमा का बाप भी रोज़ रात को नशे में घर आकर पैसो के लिए बीवी-बच्चों को मारता है, उन पर अपना रॉब जमाता है, जुआ खेलता रहता है, जुए में वह हर बार अपना सब कुछ हार जाता है, यहाँ तक की अपनी खोली भी वह जुए में हार जाता है, एक दिन तो उसने अपनी बड़ी बेटी सुषमा को नशे में दाव पर लगाया, वह तब भी हार गया। सुषमा की माँ कुसुम जैसे-तैसे करके लोगों के घर के बर्तन-झाड़ू कर के अपना घर चलाती है, जिस रात सुषमा के बाबा दाव पर लगी, सुषमा को हार गया, उसी रात दूसरा पियक्कड़ सुषमा को घसीटता हुआ, उसे अपने साथ ले जाने लगा, सुषमा की माँ अपनी बेटी को बचाने उसके पीछे जाती है, कुसुम ने उस पिय्यकड़ को रोकने की बहुत कोशिश की, तो सुषमा के बाबा ने कुसुम के सिर पर लाठी दे मारी, उसी वक़्त सुषमा की माँ बेचारी गिर के बेहोश हो गई, सुषमा के बाबा ने अपनी दूसरी बेटी राधा को दूसरे कमरे में बंद कर दिया, ताकि दोनों बाहर ना आ सके और वह पिय्यकड़ सुषमा को घसीटते हुए किसी अँधेरी खोली में ले गया।
उस हैवान को नन्ही सी जान पर ज़रा भी दया नहीं आई। पूरी रात वह हैवान उसके मज़े लेता रहा और सुषमा दर्द के मारे चीख़ती-चिल्लाती रही। सुबह होने से पहले वह हैवान सुषमा को उसकी खोली के आगे फ़ेक आया। क्योंकि सुषमा का सौदा सिर्फ़ एक रात के लिए ही हुआ था। उस एक रात ने सुषमा को इंसान से पथ्थर बना दिया। सुषमा कि माँ को होश आने पर, उसने अपने घर का दरवाज़ा खोला तो, दरवाज़े के आगे सुषमा बेहोश हालत में पड़ी हुई थी, उसके कपड़े भी फटे हुए थे, उसका आधा नंगा बदन साफ-साफ दिख रहा था। सुषमा की माँ को अकेले ही सुषमा को उठा के घर के अंदर लाना पड़ा, सुषमा की माँ ने उसके बदन को पानी से साफ किया, उसके शरीर पर पड़े निशान से साफ पता चल रहा था, कि रात को उसके साथ क्या हुआ होगा ? मगर यह किस से कहे ? सुषमा की माँ ने रोते हुए सुषमा को दूसरे कपड़े पहनाए। उस वक़्त कुसुम का मन किया, कि यहाँ से भाग जाए मगर जाए भी तो कहाँ ? जहाँ खाने को रोटी नहीं, वहांँ सिर छुपाने के लिए जग़ह कहाँ मिलेगी ? और वह भी दो जवान होती हुई बेटी के साथ ?
रोज़ रात को ऐसे हैवानो की कामना जाग उठती है और उसकी हैवानियत का शिकार किसी भी घर की बहु, बेटी या माँ हो जाती है क्योंकि ऐसा सिर्फ़ सुषमा के साथ ही नहीं, उसकी माँ के साथ भी कई बार हो चूका था और बस्ती में शायद ओर भी कई औरतों और लड़कियों के साथ ऐसा होता होगा मगर डर और शर्म के मारे कोई किसी को कुछ नहीं कहता और रात के अँधेरे मैं हुए ऐसे दर्दनाक हादसे को सुबह होते ही भुला दिया जाता है और अपने मन में और झोपड़ी में ही छुपा दिया जाता है। मगर कुसुम को इस बात का अंदाज़ा नहीं था, कि उसका पति किसी दिन दाव पर अपनी बेटी को भी लगा देगा। थोड़ी देर बाद सुषमा की आँख खुलती है, अपने सामने अपनी माँ को देखकर माँ के गले लग कर रोने लगती है और रोते-रोते कहने लगती है, कि " माँ, मुझे बहुत दर्द हो रहा है, कल रात उसने मेरे साथ बड़ा गन्दा बर्ताव किया, मुझे थप्पाड़ भी मारा, कल रात उस पियक्कड़ ने मुझ को कहीं अँधेरी खोली में ले जाकर मेरे सारे कपड़े फाड़ डाले, मैं अपने बचाव के लिए इधर-उधर खोली में भागति रही मगर मुझे बचाने के लिए कोई नहीं आया, मैंने तुम को भी कितनी आवाज़ लगाई माँ, तुम कहाँ रह गई थी ? और तो और मेरी आवाज़ बाहर न जा सके इसलिए उस पियक्कड़ ने मेरे मुँह में पहले से कपड़ा धुस दिया था, मेरे हाथ भी रस्सी से बांध दिए थे और तो और उसने....। " माँ क्या कहती, माँ ने सुषमा के होठों पर, हाथ रख के उसे चुप रहने को कहा, और कहाँ," बस बेटी बस, चुप हो जा, मुझे सब पता है, आगे क्या हुआ, मैं नहीं सुन पाऊँगी। "
कुसुम मन ही मन सोचती है, " और तो और अगर इस बात का पता, बस्ती में लग जाए, तो दूसरे हैवानो की नज़र भी उस पर पड़ती और वह भी उसे पाने की कोशिश में लग जाते। काश ! उस दरिन्दे से मैं अपनी फूल सी बेटी को बचा के रख पाती। "
कुछ देर तक कुसुम की आँखों से आँसू की धारा बहती ही जाती है और वह अपनी फूल जैसी गुड़िया को गले से लगा कर प्यार करती रहती है ।
कुछ देर बाद सुषमा ने माँ को कहा, " तुम बाबा को छोड़ दो। हम कहीं और चले जाएँगे, हमें बाबा के साथ नहीं रहना, वह भी बहुत गंदे है, रात को नशे में बाबा भी कभी-कभी मेरी छाती पर हाथ फेरते रहते है। मैं तुम को कैसे बतलाती ? मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता।"
यह सुनकर सुषमा की माँ का कलेजा ही फट गया और सुषमा की माँ ने कहा, " उस हैवान की इतनी ज़ुर्रत ? आज हाथ फैरता है, कल वह नशे में कुछ भी कर सकता है। तू ठीक कहती है, बेटी, हम यहाँ नहीं रहेंगे, कहीं और चले जाएँगे, आज तेरे साथ जो हुआ वह तेरी बहन के साथ भी हो सकता है, उस से पहले ही हम यहाँ से चले जाएँगे। "
सुषमा ने कहा, " हां माँ, अब मुझे भी यहाँ नहीं रहना है। " दोनों माँ-बेटी एक दूसरे से लिपत के रोने लगे। अब आगे...
कुसुम को उस वक़्त तो क्या करे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन कुसुम ने उस वक़्त सुषमा को " मैं कुछ सोचती हूँ, " कहते हुए, सुषमा को चुप रहने को और आज के दिन कमरे से बिलकुल बाहर निकलने को मना किया। वैसे भी उस हैवान ने सुषमा की हालत कहीं जाने के लायक छोड़ी ही नहीं थी। कुसुम रोज़ की तरह घर का खाना बनाकर सुषमा को कमरे में बंद कर के अपने काम के लिए चली जाती है। इतफ़ाक़ से वह जिस घर में झाड़ू-पोछा करती थी, वह घर एक बॅरिस्टर बाबू का ही था। सुषमा ने पहले तो बॅरिस्टर बाबू से कुछ नहीं कहा, मगर बॅरिस्टर बाबू को आज सुषमा का बर्ताव और उसका चेहरा कुछ अलग लगा, तो बॅरिस्टर बाबू ने कुसुम से ही पूछा, कि क्या बात है, आज आप इतनी दुखी और परेशान क्यों लग रही हो, कुछ बात भी नहीं कर रहे हो ? कुसुम ने कहाँ, कोई बात नहीं बॅरिस्टर बाबू, हम बस्ती वालों के तो नसीब ही फूटे हुए है, हमें तो दर्द से गुज़रना ही पड़ता है।
बॅरिस्टर बाबूने कहा, बस यही तो तुम लोगों की कमज़ोरी है, कुछ बताओगे नहीं, तो हम को पता कैसे चलेगा ? आप लोग जब तक ज़ुल्म सहते जाएंँगे, तब तक ज़ुल्म करने वाले ज़ुल्म करते रहेंगे, किसी को तो आवाज़ उठानी ही होगी ना !
बॅरिस्टर बाबू की बात सुनते ही कुसुम की आँखों में छुपे आँसू बहने लगे और कुसुम को अपनी बेटी की चीख सुनाई दे रही थी, कि " उसने मुझे क्यों नहीं बचाया ?" बॅरिस्टर बाबू के बहुत पूछने पर आज कुसुम ने रात की बात बॅरिस्टर बाबू को बता दी।
कुसुम की बात सुनते ही बॅरिस्टर बाबु की आँखों में भी आँसू आ गए और गुस्सा भी, खड़े होते हुए वह बोले, कि " अब भी तुम बस चुप ही रहना चाहती हो ? क्या तुम चाहती हो, की आज जो सुषमा के साथ हुआ वह हर रात उसके साथ हो ? और वही सब राधा के साथ हो ? तुम कैसी माँ हो ? तुम्हारी जगह में होता तो, वह हैवान जेल में होता।
कुसुम ने कहा, उस पर केस करेंगे, तो मेरी सुषमा की कितनी बदनामी होगी, उस से कई सवाल पूछे जाएँगे, जिसका जवाब उसे सब के सामने देना पड़ेगा और यह हम नहीं चाहते, बस इसी बजह से चुप है। बस अब किसी भी तरह उस घर को और उस पियक्कड़ को छोड़ देने का फ़ैसला किया है और कहीं दूर चले जाएँगे, मगर कहाँ जाऊँ दो बच्ची को लेकर समझ नहीं आ रहा, हम गरीब के पास इतने पैसे भी तो नहीं है, और तो और दुनिया ऐसे हैवानो से भरी पड़ी है, जहाँ जाए, ये ख़तरा तो हर वक़्त हम औरत के सिर पर लगा ही रहता है, घर में ही हम औरत सुरक्षित नहीं है, तो बाहर कैसे सुरक्षित रह सकेंगे ? किस-किस से बचे और कब तक ? आप तो सब जानते ही है, आप जैसे लोग दुनिया में बहुत ही कम होते है, जो औरत को समज़ते है और उनका सम्मान भी करते है।
बॅरिस्टर बाबू को भी पता था, कि आखिर कोर्ट में ऐसा ही होगा, इसलिए वह कुछ देर सोचने लगे और कहा, कि देखो, " तुम वैसे तो सच ही कह रही हो, तो तुम ऐसा कर सकती हो, कि यहाँ पास में मेरी अपनी भी एक खोली है, जो अभी खाली पड़ी है, जिसे हम बेचने के बारे में सोच रहे थे और वैसे भी वह बहुत छोटी है, तो शायद ज़्यादा क़ीमत उसकी नहीं आनेवाली। तो तुम ऐसा करो, अभी के लिए अपनी बेटी सुषमा और राधा को लेकर मेरी खोली में रहो, यहाँ आस-पास सब लोग भी अच्छे रहते है, तो तुम्हें और तुम्हारी बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी, उसका अच्छे से डॉक्टर के पास इलाज कराओ और उसकी पढाई भी जारी रखो, अगर वह ज़्यादा पढ़ लेगी, तो उसे तुम्हारी तरह यूँ घर-घर जाकर काम नहीं करना पड़ेगा, उसे अच्छी जॉब मिल जाएगी। मैं सरकारी कॉलेज में उसका दाखिला करा दूँगा, ताकि फीस ज़्यादा ना हो।
कुसुम को बॅरिस्टर बाबू जी की यह बात सही लगी, और उसी दिन कुसुम अपना सामान और अपनी दोनों बेटी को लेकर बॅरिस्टर बाबू जी के बताए हुए खोली में जाकर रहने लगी। कुसुम का पति उसे ढूंँढता रहा, ढूंँढता ढूंँढता वह उस खोली तक भी आ गया, जहाँ कुसुम और उसकी बेटी रहते थे। कुसुम के पति ने उसे घर वापस आने को कहा और उसे रण्डी भी कहा, लेकिन इस बार कुसुम ने तय कर दिया था, कि वह अपने पति के साथ नहीं जाएगी और कुसुम ने बॅरिस्टर बाबु का दिया हुआ बड़ा सा डंडा उठाया और अपने पति को दिखाते हुए ज़ोर से गुस्से में कहा, कि " अगर ज़िंदा रहना चाहते हो, तो अब वापस इधर मत आना और नाही मेरी बेटी की और नज़र उठाके कभी देखना, वार्ना मुझ से बुरा और कोई नहीं होगा। "
आज कुसुम की आँखें सच में गुस्से से लाल होती देख, कुसुम का पति वहाँ से उसे धमकी देता हुआ चला जाता है, कि " देख लूँगा तुझे और तेरी बेटी को "।
कुसुम में अब अपनी बेटी के लिए, सब से लड़ने की जैसे हिम्मत आ गई थी, कुसुम ने अपनी दोनों बेटी को पढ़ाया और बेरिस्टर साहब ने सुषमा को अच्छी नौकरी भी दिलाई, अब कुसुम और उसकी बेटी बिना किसी डर के सिर उठाकर ज़िंदगी जी रहे है।
तो दोस्तों, ज़ुल्म तब तक ही सहना चाहिए, जब तक बर्दास्त कर सको, जब तक सामने वाला अपनी हद में हो। आज जैसे हिम्मत दिखा के कुसुम ने अपनी दोनों बेटी को उस बदनाम बस्ती से भी निकाला और उनका जीवन बचा लिया, उसी तरह अगर कुसुम ने यही हिम्मत पहले दिखाई होती तो, उसकी बेटी को उस रात उस हैवान से बचा सकती। कुसुम ने अपनी बेटी के लिए हिम्मत दिखाकर बस्ती छोड़कर और अपने पति को धमका कर सही फैसला लिया ?
34) अपनापन
#१०० शब्दों की कहानी
आज से 5 साल पहले मेरे बेटे और बहु की एक्सीडेंट में हुई मौत के बाद उनके बेटे अथर्व की ज़िम्मेदारी हम पर आ गई । मेरी पेंशन से घर का ख़र्चा निकल जाता, मगर जैसे अर्थव बड़ा होने लगा, वैसे वैसे पैसो की कमी महसूस होने लगी। तब हमने अपने घर का ऊपर का माला भाड़े पर दे दिया ताकि अथर्व की पढाई चल सके।
किराएदार के रुप में भगवान् ने रवि और रीता को हम से मिला दिया कयोंकि एक बेटे और बहु की तरह दोनों ने हमारे टूटते परिवार को और अथर्व को सँभाल लिया। रवि और रीता से अब तो इतना अपनापन हो गया, कि अगर एक दो दिन वे दोनों कहीं बाहर जाए तो भी हमारा घर सुना-सुना लगने लगता।
वो कहते है ना, कि कभी-कभी कुछ पराए भी अपनेपन का फ़र्ज़ निभा जाते है।
35) चेहरे पे चेहरा
36) जैसे को तैसा
मर्यादा एक बहुत बड़ा शब्द है, जो बचपन से हर लड़की को सिखाया जाता है, जैसे, कि धीरे से बोलो, धीरे से हँसो, बड़ों का मान-सम्मान करो, घर का सारा काम सीखो और भी बहुत कुछ लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है और वह लड़की बिना किसी सवाल किए इन सब बातों का, इन सब रीती-रिवाज़ो को अपने जीवन का हिस्सा मान लेती है और वह मर्यादा के बंधन में बचपन से ही बंध जाती है। बचपन से ही हर लड़की अपना जीवन इन्हीं मर्यादा के मुताबिक जीना सिख लेती है। फिर उस लड़की की जब शादी हो जाती है, तब वह लड़की शादी के बाद भी उसके माँ-बाप ने जो सिखाया उसी के मुताबिक अपने ससुराल में सब का मन जित लेती है। पराए घर और लोगों को कुछ ही दिनों में अपना बना लेती है। अपना पूरा जीवन अपने पति और परिवार की सेवा में समर्पित कर देती है, अब वह लड़की, लड़की न रह कर एक औरत बन जाती है। मगर इतना कुछ करने के बाद भी उसे मिलता क्या है ? सिर्फ और सिर्फ धोखा ?
मेरी कहानी की शीला के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था, शादी के बाद उसने अपना जीवन, अपने पति, सास-ससुर और बच्चों के नाम कर दिया था। किसी भी मर्यादा का वह उल्लंघन नहीं करती, अपना पत्नी धर्म वह अच्छे से निभा रही थी और उसे अपने पति पर भी पूरा भरोसा था, लेकिन उसका पति किसी और औरत के चक्कर में था, शीला को जब पता चला तो, उसका दिल टूट गया, तब शीलाने अपने आप से पूछा, " क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में ? या मुझ में ? "
मगर शीला को अपने सवाल का कोई जवाब नहीं मिला। मन ही मन बस वह अपने आप को कोसती रही, अपने आप को ही इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगी, कि उसकी ही गलती होगी, जो उसका पति उसे छोड़ के किसी और औरत से प्यार करने लगा, उसी के प्यार में कोई कमी रह गई होगी, या तो मैं ही उन्हें ठीक से समझ नहीं पाई, या मैं ही उन्हें अपना वक़्त नहीं दे पाई, जब भी वह मुझ से कुछ कहते मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर उनकी बात टाल दिया करती, मेरा ध्यान अपने पति से ज़्यादा अपने बच्चों और परिवार वालों पर ज़्यादा रहता था, मैंने उनकी कही बातों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया, ऐसा सोचते हुए वह अपने आप को ही इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराने लगी थी।
शीला जैसे वक़्त के हाथों मजबूर थी, वो अब करे भी तो क्या ? उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह मन ही मन बस अपने आप को ही इस बात के लिए दोषी ठहरा रही थी। उसी की लापरवाही और गैरज़िम्मेदारी की बजह से आज उसके पति उस से दूर हो गए थे। शीला को अपने पति के बारे में सब कुछ पता होने के बावजूद भी वह अपने बच्चों और परिवार वालों की खातिर चुप रही। उसने किसी से कुछ भी नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद वेकेशन में शीला बच्चों के साथ अपने मायके कुछ दिनों के लिए रहने चली गई, तब वहांँ शीला की बचपन की सहेली मेघा उस से मिलने आई, दोनों ने दिन भर बातें की, बहुत दिनों के बाद आज शीला खुल के हँस पाई, लेकिन उसकी ये झूठी हँसी, उसकी दोस्त मेघा के सामने ज़्यादा देर तक नहीं छिप पाई, मेघा को पता चल गया, कि शीला अब भी मुझ से कुछ छिपा रही है, ज़्यादा पूछने पर शीला ने अपने पति के बारे में मेघा को सब कुछ बता दिया। मेघा ने शीला को पहले तो समझाया, कि इन सब में गलती तुम्हारी ही है, तुम ने ही शायद अपने पति पर ध्यान कम दिया, पूरा दिन काम, काम और काम। अपनी हालत देखो, क्या बना ली है तुमने ? मसाले की दुकान से आई हो ऐसा लगता है, तुम्हें भी थोड़ा घर में बन-ठन के रहना चाहिए। लेकिन जो हुआ सो हो गया, अब आगे की सोचते हैं, सुमित भाई साहेब को भी इतनी अच्छी बीवी को धोखा देने का कोई हक़ नहीं बनता। तुम कुछ बोलती नहीं हो, इसका मतलब यह तो नहीं, की उनकी मर्ज़ी में जो आए वो करे। अब मैं जैसा बोलूँ, वैसा तू करती जा। मैं तुम्हें ऐसे दुखी नहीं देख सकती, सुमित भाई साहब जैसे मर्द को रास्ते पर लाना मुझे अच्छे से आता है, कहते हुए मेघाने अपना प्लान शीला को बताया।
पहले तो शीला मेघा की बात से राज़ी नहीं हुई, फ़िर मेघा ने उसे समझाया, अगर अपने पति को अपना बनाना है, तो मेरी बात मानो, मैं जैसा कहुँ बस तुम वैसे ही करती जाओ। तब, मेघा शीला की बात मान गई। बच्चों के वेकेशन की छुट्टी के बाद शीला वापस अपने घर जाती है और शीला बिलकुल वैसा ही करती जाती है, जैसा उसकी दोस्त मेघा ने बताया था, शीला अब अपने काम से ज़्यादा सजने-सँवरने में ज़्यादा ध्यान देती थी, बार-बार अपने मोबाइल पर किसी के साथ बातें करती रहती, पूछने पर कहती, मेरी दोस्त ही है, उसी से बातें करती हूँ, बच्चों पर भी ध्यान कम देने लगी, सुमित का टिफ़िन भी वक़्त पर नहीं बनाती, सुबह भी देर से उठती, सुमित के कपड़े प्रेस किए हुए ना मिलते सुमित की कोई भी चीज़ उसे अब नहीं मिलती, पूरा कमरा बिखरा पड़ा रहता और शीला अपने नाखूनों को नेल पालिश लगाया करती, हर वक़्त सोशल मीडिया पर अपने फोटो अपडेट किया करती, कभी अपनी फोटो तो कभी रील्स बनाके सोशल मीडिया पर अपडेट करती रहती, सीधे मुँह बात भी नहीं करती थी, अगर कुछ पूछे या कहे तो हर बात का उलट-पुल्टा ही जवाब दे देती, अब तो हफ्ते में तीन दिन अपने दोस्त के साथ बाहर जाने लगी, बच्चे और घरवाले भी शीला से अब परेशान हो गए थे, सुमित भी अब तो उसकी ऐसी आदतों से तंग आ गया था। एक बार शीला ने अपनी दोस्त के साथ मॉल में शॉपिंग के लिए जा रही हूँ, ऐसा कहा था और सुमित ने शीला को किसी लड़के से बातें करते, खिलखिला कर हँसते हुए देख लिया, आज तो सुमीत का गुस्सा सातवें आसमान पर था, उस वक़्त सुमित अपने ऑफिस के काम से क्लायंट के साथ मीटिंग कर रहा था, तो उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर जाते ही सुमित ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, " शीला... शीला... कहाँ गई थी, तुम आज ? आजकल तुम कितनी बदचलन हो गई हो ? तुम में किसी की भी शर्म नहीं है, नाहीं किसी का डर, शॉपिंग के बहाने ना जाने किस-किस के साथ घूमती रहती हो ? मेरा तो छोड़ो बच्चों का भी ज़रा सा ख्याल नहीं है तुम्हें, क्या असर पड़ेगा, बच्चों पर, यह कभी सोचा भी है तुमने ? "
शीला ने आराम से जवाब दिया," अपनी दोस्त के साथ शॉपिंग करने, उस में इतना चिल्लाने की क्या बात है ? "
सुमीत ने अपने मोबाइल में किसी लड़के के साथ उसकी फोटो दिखाते हुए कहा, " अच्छा....तो ये कौन है ? तुम या तुम्हारा भूत ? ये लड़का कौन है और तुम आज कल इसके साथ कर क्या रही हो ? हम से झूठ क्यों बोला, की अपनी सहेली के साथ जा रही हो ? कहाँ गए तुम्हारे सारे संस्कार और मर्यादा ? कहाँ है मेरी शीला ? जो किसी के आगे देखने में भी शर्मा जाती थी, वह आज मेरे सामने जवाब देने लगी है, तुम पहले ऐसी तो नहीं थी, मैंने जिस शीला से शादी की थी, वह तुम तो नहीं हो। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा, कि आखिर तुम इतनी बदल क्यों गई हो ? "
तब जाके शीला ने कहा, कि तुम भी तो ऐसे नहीं थे, नैना के साथ तुम भी तो मॉल में घूमते रहते थे, तब मैंने तो कुछ नहीं कहा... घर पर कहते थे, की मीटिंग में जा रहा हूँ और रात को खाने को कहो, तो भूख नहीं है, क्योंकि नैना के साथ आपका डिनर हो जाता था और मैं यहाँ आपका मनपसंद खाना बनाकर भूखे पेट आपका इंतज़ार किया करती, एक बार भी आपने सच नहीं कहा, कि दोस्त के साथ खाना खाकर आया हूँ, क्यों ? दूसरे दिन आपके शर्ट की जेब से फाइव स्टार होटल्स के बिल मिल जाते थे, तो कभी मोबाइल पर आधी रात को छुप-छुप के मैसेज करना, तो कभी बालकनी में जाके बातें करना, तो कभी आपके शर्ट पर लिपस्टिक के निशान, तो कभी कपड़े भी बदल जाया करते थे, सुबह नीला शर्ट पहन कर ऑफिस के लिए निकलते, तो शाम को लाल शर्ट पहन कर घर आते, पूछने पर कहते, कि नया लिया है, क्या मेरी समझ में कुछ नहीं आता ? क्योंकि वह शर्ट जिस कंपनी का होता है, ऐसे महँगे कपड़े आप कभी नहीं खरीदते, क्योंकि महँगे कपड़े खरीदने की आपकी हैसियत ही नहीं है। फिर भी में चूप रहती, मुझे तब लगता की, गलती मेरी ही होगी, कई दिनों तक मैं अपने आप को कोसती रही। अकेले में रोती रही, मगर अब बस, अब नहीं, अगर मेरे होते हुए आप किसी और से प्रेम कर सकते है, तो मैं क्यों नहीं ? मैं अपने आप को कमरे में बंद क्यों करू ? क्या मेरा मन नहीं है ?
अगर आप मुझे किसी और के साथ देख नहीं सकते, तो भला सोचिए, मैं कैसे आपको किसी और के साथ देख सकती ? मुझे भी यह सब नहीं करना था, मगर क्या करती मजबूर थी, मैं चाहती तो उसी वक़्त आपको छोड़ देती। जब मैंने आपको नैना के गले मिलते देखा, मगर तब भी मैं अपने बच्चों की वजह से चुप रह गई, मगर आखिर कब तक ? अब इस घर में, आप के साथ मेरा दम घुटने लगा है, क्योंकि आप साथ होते हुए भी साथ नहीं, पास होते हुए भी मेरे पास नहीं, ऐसा मुझे महसूस होने लगा।
आखिर कब तक आप हमारा इस्तमाल करते रहेंगे, घर में आप को एक संस्कारी बहु चाहिए, जो मर्यादा में रहे और जो घर का सारा काम करे और दिल बहलाने के लिए बाहर एक और लड़की... मगर हम, हमारा क्या ? हम औरत कहाँ जाए, हमारे पैर परिवार, बच्चे, समाज और संस्कार के नाम पर बांध दिए जाते हैं, औरत घर में ही अच्छी, बाहर जाए तो बेरहम और बदचलन... ये कैसा न्याय है आप सब का ? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा, आज हम से दिल भर गया तो कोई और सही और अगर उस से भी दिल भर गया तो कोई और सही... कहते हुए शीला अपने आप ही ताली बजाने लगी और कुछ आँसू शीला की पलकों में ही छिप गए। "
सुमीत तो आज शीला का एक और नया रूप देखता ही रह गया, शीला की बातें सुनकर सुमीत को अपनी गलती का एहसास होने लगा, सुमीत ने शीला से माफ़ी माँगी और आगे से ऐसा कभी नहीं करेगा, ऐसा सुमीत ने शीला से वादा करते हुए कहा, कि " बस तुम पहले की तरह मेरी वाली शीला बन जाओ, तुम जो थी, जैसी भी थी, अच्छी थी। "
अब की बार मुझे छोड़ा या मेरे अलावा किसी और लड़की के सामने देखा भी तो, मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, कहते हुए शीला सुमीत को गले लगा लेती है।
तो दोस्तों, आख़िर शीला ने अपने पति का साथ ना छोड़कर वह अपने हक़ के लिए लड़ी, भटके हुए अपने पति को उसकी गलती का एहसास कराया, क्या शीला ने सही किया ? या उसे अपने पति को छोड़ देना चाहिए था ? आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।
37) औरत का संघर्ष
एक औरत का पूरा जीवन संघर्ष ही तो है, अपने जीवन में कई उतर-चढाव वो चुप रह कर सह जाती है, ऐसा ही कुछ मेरी कहानी की लक्ष्मी और उसकी माँ के साथ हुआ था।
लक्ष्मी अपने माँ-बाप की बड़ी लड़की थी, लक्ष्मी के जन्म से घर में सब खुश तो थे, मगर मन ही मन सब आस लगाए हुए थे, कि लड़का हो, लेकिन लड़की हुई। सब ने फिर से मन बना लिया कि " चलो, कोई बात नहीं इस बार नहीं तो, दूसरी बार तो लड़का ही होगा। " उसकी माँ ने उसका नाम लक्ष्मी रखा था। देखते ही देखते लक्ष्मी ३ साल की हो गई तब, बड़ी मन्नौतों के बाद लक्ष्मी की माँ को एक लड़का हुआ, सब की ख़ुशी का ठिकाना ही न रहा, लक्ष्मी को भी लगा, कि मेरा भाई आया है, अब हम दोनों साथ में खेलेंगे, लेकिन लक्ष्मी के हिस्से के प्यार, दुलार सब उस के भाई के आने बाद कम होने लगा, वो छोटी थी, मगर वो सब देखती थी, समझती थी, बार-बार उसे अपने भाई के करीब जाने से भी रोक दिया जाता, कहते हुए कि भाई अभी छोटा है, बड़ा होगा तब उसके साथ खेलना, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और एक दिन अचानक लक्ष्मी के पापा एक्सीडेंट में मर गए, अब घर की सारी ज़िम्मेदारी लक्ष्मी की माँ पर आ गई। इस दौरान लक्ष्मी के दादाजी भी अचानक एक दिन गुज़र गए। अब घर में लक्ष्मी की माँ, उसका भाई और उसकी दादी ही थे। दादी अक्सर बीमार ही रहती थी। सिलाई मशीन घर में ही था तो, लक्ष्मी की माँ घर का काम निपटा के सिलाई का काम करती, नए-नए डिज़ाइनर कपड़े बनाना धीरे-धीरे उसे अच्छे से आ गया। लक्ष्मी की माँ वह सब कर लेती, उस में से अच्छे खासे पैसे भी मिल जाते। साथ में लक्ष्मी और उसके भाई की ट्यूशन फ़ीस वो नहीं भर सकती थी, इसलिए बच्चों को खुद ही पढ़ाया करती, ऊपर से सासुमा की सेवा अलग। लक्ष्मी स्कूल से घर आकर अपने भाई को सँभालती और माँ का छोटे-मोटे काम में हाथ भी बँटाती। अपनी बीमार दादी को भी वह दवाई, चाय, पानी, नास्ता दे देती। लक्ष्मी की समझदारी देखकर उसकी माँ की आँखों में अक्सर आंँसू आ जाते। छोटी सी उम्र में बेचारी कितना कुछ समझती है। धीरे-धीरे लक्ष्मी बड़ी होने लगी, लक्ष्मी पहले से ही दिखने में सुंदर और संस्कारी लड़की थी, इसलिए उसके लिए शादी के रिश्तें आने लगे, अच्छा सा लड़का देखकर लक्ष्मी की माँ ने उसकी शादी तय कर दी। लक्ष्मी ने तब अपनी माँ से कहा, कि " आप को ऐसी हालत में अकेले कैसे छोड़कर जाऊँ ? मैं आप के साथ ही रहूंँगी, मुझे नहीं करनी किसी से शादी।"
तब लक्ष्मी की माँ ने उसे समझाया, कि " तू मेरी फ़िक्र मत कर, तेरी अपनी भी तो ज़िंदगी है, कब तक तू युहींँ मेरा साथ देती रहेगी, एक ना एक दिन तो तुझे जाना ही होगा और अब तो तेरा भाई भी एक-दो साल में अपनी पढाई के बाद कमाने लगेगा, फ़िर सब ठीक हो जाएगा। मैं तुझे कहती थी ना, कि एक दिन तेरे लिए राजकुमार आएगा और तुझे महलों में ले जाएगा। तो समझ लो, वो राजकुमार आ ही गया। देखते ही देखते लक्ष्मी की बारात आ ही गई और जाते-जाते लक्ष्मी ने डोली में से एकबार मुड के अपने घर को देखा और थोड़ा रोते हुए, आँखों में ढ़ेर सारे सपने लेकर अपने पति के साथ ससुराल चली गई। मगर लक्ष्मी के सपने बस कुछ ही दिन के लिए सच हुए, ससुराल जाने के बाद कुछ दिन सब ने नई बहु के साथ बहुत अच्छा रखा, उसके पति ललित ने भी। मगर कुछ दिनों बाद लक्ष्मी पर काम का बोझ बढ़ने लगा। उसके पति ललित की जॉब चली गई, ललित बैंक में जॉब करता था, बैंक में कुछ घोटाला हुआ था, जिसका इलज़ाम ललित पर लगाया गया और दो ही दिन में उसे नौकरी से निकाल दिया गया, अब नौकरी जाने की वजह ऐसी थी, की उसे और कहीं बैंक में नौकरी नहीं मिल रही थी। लक्ष्मी इतना पढ़ी-लिखी नहीं थी, की उसे अच्छी नौकरी मिल सके। लक्ष्मी के घर में उसके सास-ससुर, उसकी छोटी ननंद और छोटा देवर भी था, जो अभी पढ़ रहे थे और उनकी पढाई की ज़िम्मेदारी भी ललित पर ही थी, ललित के पापा जो कभी सरकारी नौकरी करते थे, जो अब रिटायर हो चुके थे, उनके पेंशन से घर चल जाता था, मगर बाकि का खर्चा निकालना मुश्किल था। ललित के कहने पर लक्ष्मी ने सिलाई काम करना शुरू कर दिया, जो उसने अपने मायके में अपनी माँ से थोड़ा बहुत सिख लिया था। सब को लक्ष्मी के हाथ के सिले हुए कपड़े बहुत अच्छे लगने लगे, अब उसके पास वक़्त ही नहीं रहता, घर का काम करो, फिर सिलाई काम। इन्हीं बीच जैसे-तैसे करके ललित की नौकरी भी लग गई, तो थोड़ा अच्छा लगा, लक्ष्मी ने सिलाई का काम जारी रखा, उसका वक़्त भी उस में कट जाता। दिन बीतते गए देखते ही देखते लक्ष्मी को भी एक लड़का और एक लड़की हो गए, लेकिन अपने तजुर्बे के हिसाब से उसने लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं रखा। लक्ष्मी की ननंद और देवर की भी शादी आई, तो उन दोनों के भी शादी में पहनने के नए कपड़े सब कुछ लक्ष्मी ने ही सील कर दिए, बस काम में वह अपना पूरा दर्द भूल जाती, कुछ वक़्त के बाद लक्ष्मी की सास को कैंसर हुआ, उसकी देखभाल में उसका थोड़ा काम छूट गया, मगर तीन महीने में ही सासुमा चल बसे, काम का बोझ लक्ष्मी पर और बढ़ गया, क्योंकि उसकी सास घर का थोड़ा बहुत काम सँभाल लेती थी, उसकी देवरानी नौकरी करती थी तो, सुबह वह टिफ़िन लेकर चली जाती, शाम को देर से आती, तब तक घर का सारा काम हो जाता, फिर भी लक्ष्मी ने कभी फरियाद नहीं की। उस से जितना हो सके कर दिया करती।
इतना कम था, कि एक दिन उसके पति ललित को पैरालिसिस हो गया, उसके देवर ने तो अस्पताल का पैसा देने से साफ इंकार कर दिया, कि " मेरे पास इतना पैसा नहीं है।" लक्ष्मी ने अपनी सिलाई के पैसाे में से निकालकर अस्पताल का खर्चा उठाया, क्योंकि ललित का सारा पैसा दो भाई-बहन की पढाई और शादी के खर्चे के बाद कुछ खास बचा नहीं था। अब ऐसे में लक्ष्मी ने अपने पति की सेवा की, घर का काम किया और साथ में अपना सिलाई का काम भी शुरू किया।
कुछ वक़्त के बाद ललित भी ऐसे ही एक दिन सुबह अचानक चल बसा। लेकिन लक्ष्मी ने तब भी हिम्मत नहीं हारी। ललित की बीमारी के बाद ही उसके देवर-देवरानी अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए थे, लक्ष्मी ने अपने दोनों बच्चों की परवरिश अच्छे से की थी इसलिए बेटी की शादी के बाद उसका बेटा उसे अच्छे से रखता था और लक्ष्मी ने अच्छी सी लड़की देख़कर अपने बेटे की भी शादी कर दी। बहु भी पढ़ी लिखी थी, इसलिए वह भी नौकरी करती थी इसलिए बहु और बेटे दोनों टिफ़िन लेकर सुबह से नौकरी पे चले जाते, पीछे से लक्ष्मी आज भी पूरा घर सँभाल लेती, उसकी बहु उसे सिलाई का काम करने से मना करती, मगर वह फिर भी अपना सिलाई का काम भी करती है, कहते हुए कि " उसे अब सिलाई का काम करना अच्छा लगता है और उसका वक़्त भी कट जाता है। "
अब लक्ष्मी को काम की आदत सी हो गई थी, बेटा और बहु अच्छे थे और लक्ष्मी का अच्छे से ख्याल रखते थे। इसलिए अब उसे अपनी संघर्ष भरी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। लक्ष्मी से जितना हो सके उतना वह आज भी अपने बेटे और बहु के लिए करती, उसकी बहु और उसकी बेटी के कपड़े भी वही सील दिया करती। उसकी बहु को भी उसके सिलाई किए हुए कपड़े अच्छे लगते।
सपनों का राजकुमार ऐसा सिर्फ सपनो में होता है, असल ज़िंदगी में औरत की ज़िंदगी में संघर्ष ही है और कुछ भी नहीं।
तो दोस्तों, ये सिर्फ एक लक्ष्मी और उसकी माँ की कहानी नहीं, मगर हर घर में शायद एक लक्ष्मी ऐसी होती है, जिसने अपने परिवार के लिए, अपना पूरा जीवन संघर्ष में ही बिताया हो। हांँ, वह एक औरत है, इसलिए उसे आदत सी हो जाती है, ऐसे संघर्ष के साथ जीने की।
38) औलाद






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