पत्नी की अधूरी इच्छाएं

         अनकही बातें

पत्नी की अधूरी इच्छाएँ
सुबह के पाँच बजते ही सीमा की आँख खुल जाती थी। अलार्म बजने से पहले ही जैसे उसकी ज़िम्मेदारियाँ उसे जगा देती थीं। रसोई में चाय चढ़ती, बच्चों के टिफ़िन बनते, सास-ससुर की दवाइयाँ समय पर रखी जातीं, पूरे घर की सफ़ाई होती और फिर दोपहर के खाने की तैयारी। शाम तक कपड़े, बर्तन, मेहमान, बच्चों की पढ़ाई और रात का खाना...
दिन कब शुरू होता और कब ख़त्म, उसे खुद भी पता नहीं चलता था।
दूसरी तरफ़ उसका पति सुमित अपनी नौकरी में व्यस्त रहता। सुबह जल्दी निकलना और रात को लौटकर सीधे लैपटॉप या ऑफिस की फ़ाइलों में लग जाना उसकी आदत बन चुकी थी।
सीमा ने कभी शिकायत नहीं की। उसे लगता था कि सुमित परिवार के लिए ही तो इतनी मेहनत करता है। लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि घर की हर ज़रूरत पूरी हो रही है, बस उसकी अपनी इच्छाएँ कहीं पीछे छूट गई हैं।
उसे याद भी नहीं था कि आख़िरी बार उसने अपने लिए कब कोई साड़ी खरीदी थी। कब वह सुमित के साथ बिना किसी काम के कहीं घूमने गई थी। कब दोनों ने साथ बैठकर एक कप चाय पी थी या बिना किसी वजह के खुलकर बातें की थीं।
उसकी इच्छाएँ बहुत छोटी थीं। कभी बारिश में सड़क किनारे चाय पीना, कभी ट्रेन से लंबा सफ़र करना, कभी किसी शाम बिना किसी जल्दबाज़ी के हाथों में हाथ डालकर टहलना, या बस इतना कि सुमित एक दिन मुस्कुराकर पूछ ले...
"सीमा... तुम्हारा मन क्या चाहता है?"
लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।
एक रविवार की शाम सुमित हमेशा की तरह ड्रॉइंग रूम में बैठा ऑफिस की फ़ाइल देख रहा था। सीमा रसोई से उसे कई बार देख चुकी थी। आज पूरे दिन उसने अकेले ही घर के सारे काम निपटाए थे। शरीर जवाब दे रहा था और मन बरसों की चुप्पी से भर चुका था।
वह धीरे-धीरे सुमित के सामने आकर खड़ी हो गई।
"सुमित... क्या दो मिनट मेरे लिए हैं?"
"हाँ... बोलो ना," सुमित ने फ़ाइल से नज़र हटाए बिना कहा।
सीमा ने कुछ पल उसे देखा। फिर जैसे बरसों से रोके हुए शब्द अचानक बाहर निकल आए।
"बस... अब मुझसे नहीं होता।"
सुमित ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।
सीमा की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन इस बार वह रुकी नहीं।
"मैं थक गई हूँ, सुमित। सच कहूँ तो अब इस तरह जीते-जीते थक गई हूँ। सुबह से रात तक मैं इस घर के लिए जीती हूँ। सबकी पसंद याद रहती है, सबकी ज़रूरतें पूरी करती हूँ... लेकिन कभी किसी ने यह नहीं पूछा कि मुझे क्या चाहिए।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सीमा बोलती रही...
"मैंने कभी तुमसे हीरे नहीं माँगे... बड़ी गाड़ी नहीं माँगी... महँगा घर नहीं माँगा। बस थोड़ा-सा समय माँगा था। कभी सोचा था कि तुम अचानक कहोगे—'चलो सीमा, आज बाहर चाय पीते हैं।' कभी सोचा था कि जन्मदिन पर एक गुलाब ही दे दोगे। कभी लगा था कि मेरी पसंद की साड़ी देखकर कहोगे—'चलो, यह तुम्हारे लिए ले लेते हैं।'"
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"लेकिन हर बार तुम्हारे पास एक ही जवाब था—'अभी काम है... बाद में।' तुम्हारा वह 'बाद में' कभी आया ही नहीं।"
सुमित के हाथों से फ़ाइल नीचे गिर चुकी थी।
सीमा ने गहरी साँस ली और कहा—
"जानते हो... सबसे ज़्यादा दर्द किस बात का है? इस घर में मेरी ज़रूरत सबको है, लेकिन मेरी ख़ुशी किसी की ज़रूरत नहीं है। मैं इस घर की पत्नी हूँ... लेकिन कभी-कभी खुद को सिर्फ़ एक ज़िम्मेदारी निभाने वाली मशीन महसूस करती हूँ।"
यह सुनकर सुमित की आँखें भी भर आईं।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस औरत ने उसके घर को घर बनाया, उसकी मुस्कान कब की खो चुकी थी और उसे इसका एहसास तक नहीं हुआ।
वह धीरे से उठा, सीमा के सामने आकर खड़ा हो गया और उसके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"सीमा... आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। मैं हमेशा सोचता रहा कि पैसे कमाकर, सुविधाएँ देकर मैं अपना फ़र्ज़ निभा रहा हूँ। लेकिन मैं यह भूल गया कि एक पत्नी को सिर्फ़ सुविधाएँ नहीं, अपने पति का साथ भी चाहिए होता है।"
उसने सिर झुकाकर कहा—
"मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हारी हर छोटी इच्छा को 'बाद में' कहकर टालता रहा, और समझ ही नहीं पाया कि वही छोटी-छोटी इच्छाएँ तुम्हारी सबसे बड़ी खुशियाँ थीं।"
सीमा चुपचाप उसे देखती रही।
सुमित मुस्कुराया और बोला—
"फ़ाइलें कल भी रहेंगी... लेकिन अगर तुम्हारी मुस्कान खो गई, तो वह शायद कभी वापस नहीं आएगी। इसलिए आज से एक वादा करता हूँ। हर महीने कम-से-कम एक दिन सिर्फ़ तुम्हारे नाम होगा। उस दिन न ऑफिस होगा, न फ़ाइलें... सिर्फ़ मैं और तुम।"
सीमा की आँखों से आँसू फिर बह निकले, लेकिन इस बार उन आँसुओं में शिकायत नहीं, सुकून था।
अगले रविवार सुबह सुमित ने पहली बार खुद चाय बनाई।
जब सीमा रसोई में पहुँची तो वह मुस्कुराकर बोला—
"आज नाश्ता बाद में बनेगा... पहले चलो।"
"कहाँ?" सीमा ने हैरानी से पूछा।
सुमित ने कार की चाबी उठाई और मुस्कुराते हुए कहा—
"तुम्हारी पहली अधूरी इच्छा पूरी करने... सड़क किनारे वाली चाय पीने।"
सीमा के चेहरे पर बरसों बाद वैसी मुस्कान आई, जिसे देखकर सुमित समझ गया कि कभी-कभी खुशियाँ बहुत छोटी होती हैं... लेकिन उन्हें देने में पूरी ज़िंदगी निकल जाती है।
सीख:
"हर पत्नी की अधूरी इच्छाएँ महँगी नहीं होतीं। उन्हें बस अपने जीवनसाथी का थोड़ा-सा समय, थोड़ा-सा सम्मान और यह एहसास चाहिए कि वह सिर्फ़ घर संभालने वाली नहीं, बल्कि किसी की सबसे प्यारी साथी भी है।"

Bela...

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