बीते कल का सच

        बीते कल का सच 

      कॉलेज के दिनों में नैना की दुनिया सिर्फ़ आदित्य था। दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे। दोनों ने प्यार की हर दहलीज पार कर दी थी, शादी के सपने देख चुके थे और एक-दूसरे के साथ पूरी ज़िंदगी बिताने की कसमें भी खा चुके थे।

      नैना ने कई बार हिम्मत जुटाई कि घरवालों से आदित्य के बारे में बात करे, लेकिन हर बार डर जीत गया।

        फिर एक दिन उसके पिता ने बिना उससे पूछे उसकी शादी शहर के एक अमीर और सफल व्यापारी राघव से तय कर दी।

       नैना ने अपने पापा से कहा, "पापा... मैं ये शादी नहीं करना चाहती।"

       अपने प्यारबकी खातिर उसने पहली बार अपने पिता के सामने आवाज़ उठाई।

लेकिन जवाब सिर्फ़ इतना मिला...

"बेटियाँ अपनी पसंद नहीं, अपने घर की इज़्ज़त देखती हैं।"

उसकी एक नहीं सुनी गई।

उस दिन के बाद नैना ने अपने अतीत को अपने दिल के सबसे अंधेरे कोने में दफ़ना दिया।

नैना ने अपनी दोस्त के हाथों आदित्य को एक ख़त भेज दिया, जिस में उसने लिखा था, कि मैं इस जन्म में कभी भी तुम्हारी नहीं हो सकती, हो सके तो मुझे माफ कर दो और एक सपने की तरह मुझे भूल जाओ।


    राघव एक अच्छा पति था।

     उसने कभी नैना को किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।

     धीरे-धीरे नैना ने भी अपने रिश्ते को पूरी ईमानदारी से निभाना शुरू कर दिया। उसने कभी आदित्य से संपर्क नहीं किया, न उसे ढूँढने की कोशिश की। उसके लिए वह अध्याय हमेशा के लिए बंद हो चुका था।

समय बीतता गया...

पच्चीस साल गुजर गए।

     नैना और राघव के दो बच्चे बड़े हो गए।

     ज़िंदगी सामान्य चल रही थी।

    एक दिन राघव बिज़नेस मीटिंग के लिए दूसरे शहर गया।

     वहाँ उसकी मुलाकात आदित्य से हुई।

      दोनों की सोच मिलती थी। कुछ ही मुलाकातों में राघव और आदित्य के बीच अच्छी दोस्ती हो गई।

राघव ने मुस्कुराते हुए कहा...

     "कभी हमारे घर आइए। परिवार से भी मिलिए।"

      आदित्य ने भी दोस्ती के लिए बिना कुछ जाने निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

जिस दिन वह घर पहुँचा...

दरवाज़ा नैना ने खोला।

      दोनों की आँखें एक पल के लिए ठहर गईं।

     समय जैसे पच्चीस साल पीछे लौट गया। तभी पीछे से राघव आया और उसने नैना को कहा, “ अरे मेरा दोस्त, मेरा यार मेरे घर आया है, उसे अंदर तो बुलाओ।” 

      अजनबी बनते हुए, दूसरे ही पल दोनों ने अपने चेहरे पर एक झूठी सी मुस्कान ओढ़ ली।

नैना ने मुस्कुराते हुए कहा, 

"आइए..."

बस इतना ही कहा नैना ने।

     सब ने साथ मिलकर खाना खाया, नैना ने खाना बहुत अच्छा बनाया था, राघव ने उसकी बहुत तारीफ़ की, यह देख आदित्य को तसल्ली हुई, कि नैना खुश तो है, बस मुझे और कुछ न चाहिए। वैसे भी राघव खाने का शौकीन था, इसलिए उसके घर खाने में कुछ न कुछ अच्छा बनता ही रहता।

    रात के खाने के बाद राघव किसी ज़रूरी फ़ोन पर बाहर चला गया।

तभी आदित्य और नैना बरामदे में अकेले रह गए।

    आदित्य ने नैन से पूछा, "कैसी हो?"

नैना ने कहा, "अच्छी हूँ... और तुम?"

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद आदित्य बोला…

        बस आज भी किसी की याद में ज़िंदगी जी रहा हूँ। मैं तब भी अकेला था, आज भी अकेला हूँ।


आदित्य की बातें सुन,

नैना की आँखें भर आईं।

आदित्य ने पूछा, कि “ तुमने उस वक़्त शादी से मना क्यों नहीं किया ? अपने पापा की बात तुमने क्यों मान ली ? “ 


      नैना ने कहा, कि “ मेरे फैसले उस दिन मेरे अपने नहीं रहे थे, मेरे पापा ने मुझे अपनी कसम दे रखी थी, कि “ अगर मैंने शादी से इनकार किया तो, वह अपनी जान दे देंगे।” अब तुम ही बताओ, ऐसे हालात में मैं क्या करती ? " कहते हुए नैना की आँखें भर आई।


      "और मैंने पूरी ज़िंदगी तुम्हारी यादों को दिल में बंद रखा... लेकिन आज तक कभी भी मैंने अपने पति के विश्वास को नहीं तोड़ा।"

      इतने में पीछे से एक आवाज़ आई...

राघव ने कहा, "तो यही सच था...?"

दोनों ने मुड़कर देखा।

राघव दरवाज़े पर खड़ा था।

राघव ने उन दोनों की पूरी बातचीत सुन ली थी।

नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।

पच्चीस साल से दबा हुआ राज़ आज उसके सामने खड़ा था।

राघव ने धीमी आवाज़ में पूछा...

"क्या तुम आज भी आदित्य से प्यार करती हो?"

नैना की आँखों से आँसू बह निकले।

"नहीं...

हां, लेकिन मैं उससे कभी नफ़रत भी नहीं कर पाई...

लेकिन शादी के बाद मैंने सिर्फ़ तुम्हें अपना पति माना।

मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया।

बस... अपने अतीत का सच बताने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाई।

मुझे डर था कि कहीं हमारे बीते कल का सच, हमारा आज न छीन ले।"

राघव लंबे समय तक चुप रहा।

फिर उसने आदित्य की तरफ़ देखा।

"अगर तुम दोनों चाहते तो आज भी झूठ बोल सकते थे...

लेकिन मैंने जो सुना, उसमें मोहब्बत से ज़्यादा अधूरापन था...

और बेवफ़ाई से ज़्यादा मजबूरी।"

उसने नैना की ओर देखा।

"मुझे तुम्हारे अतीत से शिकायत नहीं है...

मुझे इस बात का दुख है, कि तुमने पच्चीस साल तक यह बोझ अकेले उठाया... और मुझे इतना अपना नहीं समझा कि सच बता पाती।"

     नैना राघव को गले लगाते हुए फूट-फूटकर रो पड़ी।

     उस दिन तीनों ने अपने-अपने हिस्से का दर्द स्वीकार किया।

      उसके बाद आदित्य वहां से चला गया और कभी नैना या उसकी ज़िंदगी में वापस लौट कर नहीं आया, क्योंकि आदित्य सिर्फ़ और सिर्फ़ नैना की खुशी चाहता था और आज उसने अपनी आँखों से नैना की खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी को देख लिया था। आदित्य अब उन दोनों के बीच आना नहीं चाहता था।

    और राघव ने पहली बार अपनी पत्नी को उसके अतीत के साथ स्वीकार कर लिया था। इस से पता चलता है, कि राघव कितना अच्छा पति साबित हुआ, क्योंकि ऐसे बीते कल का सच हर कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता।

कुछ राज़ इसलिए नहीं छिपाए जाते कि कोई गुनाह हुआ था...

बल्कि इसलिए कि बरसों से बसाया हुआ घर एक पुराने सच से बिखर न जाए।

Bela...

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