दूसरा सवेरा

अनकही बातें

दूसरा सवेरा

अमृता अक्सर खिड़की के पास बैठकर घंटों बाहर देखती रहती थी। सड़क पर आते-जाते लोगों को देखना उसकी आदत बन चुका था। कभी कोई पति-पत्नी हँसते हुए साथ निकल जाते, तो कभी कोई बच्चा अपने पिता का हाथ थामे दौड़ता दिखाई देता। उन दृश्यों को देखकर उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आती, लेकिन अगले ही पल उसकी आँखें नम हो जातीं।

दिन भर अमृता घर के कामों में खुद को व्यस्त रखती। सबका ध्यान रखती, किसी को शिकायत का मौका नहीं देती। लेकिन रात होते ही उसका कमरा उसके अकेलेपन का साथी बन जाता।
उसके ससुराल वालों ने सोचा कि शायद किसी काम में मन लगाने से उसका दुख थोड़ा कम हो जाए। उनकी सहमति से अमृता ने मोहल्ले में एक छोटी-सी संगीत कक्षा शुरू कर दी। बच्चे गाना सीखने आने लगे और धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी फिर से चलने लगी।

वह दूसरों की आवाज़ों में सुर भर रही थी...
लेकिन उसकी अपनी ज़िंदगी अब भी बेसुरी थी।
एक दिन उसी संगीत कक्षा में आदित्य आया। उसे संगीत से बेहद लगाव था। कुछ ही दिनों में दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई। पहले संगीत पर, फिर ज़िंदगी पर। आदित्य ने कभी अमृता के अतीत के बारे में सवाल नहीं किए। शायद वह समझता था कि हर ख़ामोशी के पीछे कोई गहरा दर्द छिपा होता है।

एक दिन अमृता ने खुद ही कहा,
"आज से तीन साल पहले... मेरे पति आशीष की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी।"
कुछ पल के लिए दोनों के बीच सन्नाटा छा गया।
अमृता की आँखें भर आईं।
"उस दिन सिर्फ़ आशीष नहीं गया था... उसके साथ मेरी हँसी, मेरे सपने और जीने की वजह भी चली गई थी।"

आदित्य ने बस इतना कहा,
"कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं... लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारी ज़िंदगी भी उनके साथ चली जाए।"

यही शब्द पहली बार अमृता के दिल तक पहुँचे।
समय बीतता गया। दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे।

जब आदित्य ने अपने घर में शादी की बात की, तो पहले सबने विरोध किया। लेकिन उसके अटल फैसले के आगे परिवार को झुकना पड़ा।
उधर अमृता के ससुराल में यह बात पहुँची तो माहौल बदल गया। लोगों ने ताने देने शुरू कर दिए। किसी ने कहा, "बहू को ज़्यादा आज़ादी दे दी।" किसी ने परिवार की इज़्ज़त का हवाला दिया।

एक दिन उसकी सास ने सख़्त स्वर में कहा,
"आज से संगीत की कक्षा बंद। अब तुम घर से बाहर नहीं जाओगी। हमारे घर की मर्यादा सबसे पहले है।"

उस दिन पहली बार अमृता चुप नहीं रही।
उसने धीमी लेकिन काँपती आवाज़ में कहा,
"माँ जी... मैंने कभी आपसे कोई शिकायत नहीं की। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जब रात को घर के सभी लोग अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं, तब मैं किससे बात करूँ?
जब किसी पति-पत्नी को साथ देखती हूँ, तो एक पल के लिए मन करता है कि कोई मेरा हाथ भी थामे।
आशीष मेरी ज़िंदगी था। मैं आज भी उससे प्यार करती हूँ। लेकिन सिर्फ़ यादों के सहारे पूरी ज़िंदगी नहीं जी जा सकती।
अगर किसी ने मेरे अकेलेपन को समझ लिया, तो क्या मैंने कोई गुनाह कर दिया?
मुझे भी जीने का अधिकार है... किसी अपने का साथ पाने का अधिकार है।"

इतना कहकर अमृता अपने कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद होते ही वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

बाहर बैठक में गहरा सन्नाटा था।
पहली बार उसके सास-ससुर ने उसके शब्द नहीं, उसका दर्द महसूस किया।
उस रात किसी की आँखों में नींद नहीं आई।

अगली सुबह उसकी सास उसके कमरे में पहुँचीं। उन्होंने अमृता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"बेटी... हमें माफ़ कर दो। हम अपने बेटे के दुख में तुम्हारा दर्द देख ही नहीं पाए। अगर आदित्य के साथ तुम्हें फिर से जीने की वजह मिलती है, तो हमें यह रिश्ता मंज़ूर है।"

अमृता उनकी गोद में सिर रखकर रो पड़ी। अमृता के ससुराल वालों ने जिस अमृता को एक दिन बहु बनाकर घर लाये थे, आज एक बेटी की तरह उसका कन्यादान किया।

कुछ महीनों बाद उसी संगीत कक्षा में, जहाँ कभी अमृता और आदित्य पहली बार मिले थे, उनकी नई ज़िंदगी की शुरुआत हुई।

विदा होने के बाद आदित्य उसे समुद्र किनारे ले गया। उसने मुस्कुराकर अमृता का हाथ थामा और कहा,
"चलो... आज से तुम्हें कभी अकेले चलने नहीं दूँगा।"
अमृता ने एक पल आसमान की ओर देखा और मन ही मन बोली,
"आशीष... तुम्हारी याद हमेशा मेरे दिल में रहेगी... लेकिन आज मैं फिर से जीना सीख रही हूँ।"
उसने आदित्य का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
इस बार उसकी आँखों में आँसू नहीं थे...
एक नई सुबह की चमक थी।
कुछ रिश्ते किस्मत छीन लेती है...
और कुछ रिश्ते ईश्वर लौटाकर देता है।

Bela...

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