पति का संघर्ष

अनकही बातें

पति का संघर्ष

नितिन और नेहा की शादी को दस साल हो चुके थे। एक समय था जब नितिन बिना वजह नेहा के लिए कभी कभी फूल या छोटा मोटा कोई गिफ्ट ले आता था। छुट्टी के दिन नेहा को चाय बनाकर भी पिलाता, बच्चों के साथ घंटों खेलता और रात को देर तक बैठकर नेहा से बातें करता, मस्ती करता था। "समय के साथ ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, और उन्हीं ज़िम्मेदारियों के बीच नितिन का हँसता-मुस्कुराता चेहरा कहीं खोने लगा।"

पिछले एक साल में जैसे बहुत कुछ बदल गया था। जैसे अब नितिन सुबह जल्दी निकल जाता और रात को देर से लौटता। घर आते ही थका हुआ-सा खाना खाता, बच्चों के सिर पर हाथ फेरता और चुपचाप सो जाता।

नेहा कई बार नितिन से बात करने की कोशिश करती, लेकिन हर बार वही जवाब मिलता—
"बहुत थक गया हूँ... कल बात करेंगे।"

वह "कल" कभी नहीं आया।

धीरे-धीरे नितिन की चुप्पी ने नेहा के मन में सवाल खड़े कर दिए। नेहा खुद से ही बातें करने लगी।
"नितिन आज कल कुछ बदले बदले से नज़र आने लगे है, वह पहले तो ऐसे नहीं था... घर में भी चुप रहते है... क्या सचमुच काम ही इतना बढ़ गया है... या बात कुछ और है?"

नेहा ने कई बार नितिन का मोबाइल देखने का सोचा...फिर खुद ही रुक गई।
"नहीं... मुझे अपने पति पर भरोसा है..."
लेकिन अगले ही पल मन कहता—
"अगर भरोसा है...तो इतना डर क्यों लग रहा है?"

अब वह नितिन के देर से आने पर घड़ी देखने लगी। नितिन के चेहरे के भाव पढ़ने लगी।
हर छोटी बात में नेहा को दूरी महसूस होने लगी।

एक रात नितिन फिर देर से घर पहुँचा।
नेहा ने खाना परोसा, लेकिन उस दिन उसके हाथ काँप रहे थे।

नितिन ने पूछा,
"क्या हुआ?"

नेहा ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी।
"नितिन... सच-सच बताओ...
क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कोई और है?"

उसी वक़्त चम्मच नितिन के हाथ से छूटकर प्लेट में गिर पड़ा, कुछ पल तक वह बिना कुछ बोले नेहा को देखता रहा, फिर कुर्सी पीछे खिसकाकर खड़ा हो गया। नितिन की आँखों में गुस्सा नहीं था...बस गहरी थकान थी।

तभी नितिन की माँ, बच्चे और छोटा भाई भी बाहर आ गए।

नितिन ने धीमे स्वर में कहा—
"ऐसा लगता है, जैसे आज शायद मुझे पहली बार अपने लिए बोलना पड़ेगा।" नितिन ने नेहा की ओर देखा।
"तुम्हें लगता है मैं बदल गया हूँ...
हाँ...
मैं बदल गया हूँ।
क्योंकि शादी के बाद लड़के सिर्फ़ पति नहीं रहते...वे पूरे घर की ज़िम्मेदारी बन जाते हैं।"

घर में सन्नाटा छा गया, नितिन बोलता गया—
"सुबह आँख खुलते ही मैं यह नहीं सोचता कि आज क्या पहनना है...
मैं यह सोचता हूँ कि इस महीने किसकी फीस भरनी है...किसका बिल बाकी है...और कितना ?
कहाँ ईएमआई देनी है...
माँ की दवा खत्म तो नहीं हो रही...
बच्चों की ट्यूशन, ड्रॉइंग क्लास, डांस क्लास की फीस...
घर का राशन...
कामवाली की तनख़्वाह...
बिजली...
गैस...
मेंटेनेंस...
पेट्रोल..
म्यूचुअल फंड 
Lic payment 
हेल्थ इंश्योरेंस 
मोबाइल रिचार्ज...
रिश्तेदारी के फ़र्ज़...
और अगर किसी महीने कुछ कम पड़ जाए...
तो किस ख़र्च को अगले महीने तक टालूँ..."
उसने हल्की-सी मुस्कान दी, जो तुरंत टूट गई।
"तुम पूछती हो मैं देर से क्यों आता हूँ?
क्योंकि आज कल मैं ऑफिस के बाद पार्ट-टाइम काम करता हूँ, उधार लेकर घर चलाना मुझे कभी मंज़ूर नहीं।
इसलिए अपनी नींद कम कर दी...
अपनी छुट्टियाँ छोड़ दीं...
अपने शौक़ भूल गया..."
अब जैसे नितिन की आवाज़ काँप रही थी।
"लेकिन आज पता चला...
मैं सबसे ज़रूरी चीज़ ही भूल गया।"
नेहा की आँखें भर आईं।

नितिन बोला—"मैं तुम्हें यह बताना ही भूल गया कि मैं यह सब किसके लिए कर रहा हूँ।"
कुछ पल रुककर नेहा की आँखों से आँखें मिलाकर नितिन ने कहा—
"और तुमने मेरी चुप्पी का मतलब यह निकाल लिया...कि मेरी ज़िंदगी में कोई और है।"

"नेहा...मेरे पास किसी और से प्यार करने का वक़्त ही कहाँ है?
मैं तो हर दिन बस यही सोचता रहा कि मेरे अपने किसी कमी के साथ न जीएँ, तुम्हें किसी के आगे कभी हाथ ना फैलाना पड़े।"

नेहा अब खुद को रोक नहीं पाई, उसे अपनी गलती का एहसास हुआ
नेहा नितिन के पास आई और रोते हुए बोली—

"नितिन... मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें कितना गलत समझा।"

नितिन ने उसके आँसू पोंछते हुए हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—
"नहीं नेहा... माफ़ी मत माँगो, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है।"
"अगर मैं तुम्हारी जगह होता...तो मैं भी यही सोचता। मेरी पत्नी रोज़ देर से घर आती, मुझसे कम बात करती, हर समय थकी रहती, तो शायद मेरे मन में भी यही सवाल आता... कि कहीं उसकी ज़िंदगी में कोई और तो नहीं।"
"गलत तुम नहीं थीं... मेरी ख़ामोशी थी, मैंने कभी तुम्हें अपने संघर्ष का हिस्सा बनाया ही नहीं।
मैंने तुम्हें अपनी मुस्कान दिखाई...
अपना संघर्ष कभी दिखाया ही नहीं, मेरी ज़िंदगी कि उलझनें कभी तुम से कह ही नहीं पाया।
मैं यह समझता रहा कि तुम्हें परेशानियों से दूर रखूँगा तो तुम खुश रहोगी। लेकिन मैं भूल गया कि पति-पत्नी सिर्फ़ खुशियाँ ही नहीं, परेशानियाँ भी साथ बाँटते हैं।"

नितिन ने नेहा का हाथ अपने हाथों में लिया और कहा—
"एक बात हमेशा याद रखना... मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं था... और न कभी हो सकता हूँ। क्योंकि जिस इंसान से सबसे ज़्यादा प्यार होता है, उससे शिकायत हो सकती है... नाराज़गी नहीं।"

"बस... आज से एक वादा करते हैं। तुम मन में कोई सवाल मत रखना... और मैं मन में कोई बोझ नहीं रखूँगा।"

नेहा ने सिर हिलाया और नितिन के गले लग गई।
उस दिन दोनों ने कोई बड़ी कसम नहीं खाई... बस एक-दूसरे से कुछ भी न छिपाने का वादा किया।

अनकही बातें
"हर घर में एक ऐसा इंसान होता है, जो अपनी थकान दरवाज़े के बाहर छोड़कर अंदर मुस्कुराते हुए आता है। लोग उसकी कमाई तो देख लेते हैं, लेकिन उस कमाई के पीछे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटता हुआ इंसान नहीं देख पाते। शायद इसलिए पति की सबसे बड़ी 'अनकही बात' उसकी चुप्पी होती है।"

Bela...














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