कॉफ़ की महक

 कॉफ़ी की महक 

        राकेश आज पूरे दो साल बाद अमेरिका से भारत लौटा था। अमेरिका जाना उसकी मजबूरी थी, दरअसल वह रश्मि से दूर जाना चाहता था,  लेकिन वहाँ जाने के कुछ ही महीनों बाद पिता की हार्ट अटैक से मौत और मां की बीमारियों ने उसे वापस भारत आने पर मजबूर कर दिया। अब उसने यहीं अपना नया बिज़नेस शुरू करने का फैसला किया था।

         नई कंपनी की एक मीटिंग के लिए वह  एक कॉफ़ी शॉप में पहुँचा। कॉफ़ी का ऑर्डर देकर जैसे ही उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, उसकी निगाह काउंटर पर खड़ी एक लड़की पर जाकर ठहर गई।

       उसने अपनी ही बाँह पर हल्की-सी चिकोटी काटी।

उसने अपने आप से ही पूछा, "क्या सचमुच...?"

" हाँ... वह रश्मि ही थी। "

        वही रश्मि... जिसे वह कॉलेज के दिनों में दिल ही दिल में चाहता था, लेकिन कभी अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पाया।

          उसी पल रश्मि की नज़र भी उस पर पड़ी। वह भी कुछ क्षणों के लिए ठिठक गई। दोनों ने एक साथ उँगली उठाकर कहा—

"तुम... यहाँ?"

अगले ही पल दोनों हँस पड़े।

कुछ देर बाद दोनों एक ही टेबल पर बैठे थे।

    रश्मि ने बिना रुके सवालों की झड़ी लगा दी—

"कहाँ थे इतने साल ? कैसे हो ? अचानक यहाँ कैसे ? शादी हो गई ? "

राकेश मुस्कुरा पड़ा।

"अरे... पहले साँस तो ले लो। एक कॉफ़ी हो जाए, फिर सारी कहानी सुनाता हूँ।"

तुरंत ही रश्मि ने राकेश की पसंद की कॉफी ऑर्डर कर दी।

      राकेश ने कहा, "तुम्हें अब तक याद है, मेरी पसंद? " 

रश्मि मन ही मन बड़बड़ाई, " भला, वह मैं कैसे भूल सकती हूँ ? "

राकेश ने कहा, " क्या कहा ? ज़रा फ़िर से कहो"

रश्मि ने बात को छुपाते हुए कहा, " कुछ नहीं, बस ऐसे ही। तुम अपनी सुनाओ, तब तक कॉफी भी आ जाएगी।

राकेश ने अपनी बात कहना शुरू किया, 

" मुझे अमेरिका से एक बहुत बड़ी कंपनी से जॉब का ऑफर आया था, भला वह मैं कैसे अपने हाथ से जाने देता। और तुम्हें तो पता ही है, मेरे घर के हालात उस वक्त कैसे थे ? मैंने तुरंत ही ऑफर स्वीकार कर लिया, और चल गया। " 

रश्मि ने कहा, " और शादी ? " 

राकेश ने मज़ाक करते हुए कहा, " आह्ह, शादी ? शादी के लिए तुम जो नहीं मिली ? कैसे करता किसी और से शादी? इसलिए अब तक अकेला ही हूँ, तुम्हारे इंतजार में, तुम्हारी यादों के साथ। " 

रश्मि ने ताजुब होके पूछा, " क्या ? मैं नहीं मिली ? " 

राकेश ने अपने जज़्बात को संभालते हुए, अपनी बात छुपाते हुए कहा, " तुम्हारे जैसी लड़ाकू जो नहीं मिली आज तक, तुम्हारी नज़र में कोई हो तो बता दो।" 

रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा, " तुम अब तक नहीं सुधरे, बिल्कुल वैसे के वैसे ही हो, मजाकिए। " 

राकेश ने कहा, " हा, वो तो मैं हूँ ही।" 

दोनों फिर  से हस पड़े।

राकेश ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "अब तुम्हारी बारी, तुम बताओ, कैसी हो? पति ? बच्चे ? तुम्हारा पति तुम्हें ज़्यादा परेशान तो नहीं करता ना, "उसे चिढ़ाते हुए

रश्मि ने हल्की-सी मुस्कान ओढ़ ली।

"सब ठीक है... ज़िंदगी चल रही है।"

फिर रश्मि ने पूरे कैफ़े की तरफ़ देखते हुए कहा—

        कॉफ़ी शॉप में चारों ओर नज़र दौड़ाई, ताज़ी बनी कॉफ़ी की भीनी-भीनी ख़ुशबू पूरे माहौल में घुली हुई थी। हल्का-सा सुकून भरा संगीत बज रहा था। कुछ लोग हँसते हुए बातें कर रहे थे, कोई लैपटॉप पर अपने सपनों को आकार दे रहा था, तो कोई खिड़की के पास बैठा चुपचाप अपनी कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ ख़यालों में खोया हुआ था। वह मुस्कुराई और बोली, "यही तो मेरा सपना था, राकेश। मैं हमेशा से ऐसी जगह बनाना चाहती थी, जहाँ लोग सिर्फ़ कॉफ़ी पीने न आएँ, बल्कि कुछ पल सुकून के भी जी सकें। जहाँ बाहर की भागदौड़, तनाव और शोर दरवाज़े पर ही छूट जाए। यहाँ हर कप कॉफ़ी के साथ एक नई उम्मीद परोसी जाती है, हर मेज़ पर कोई नई कहानी जन्म लेती है, कोई पुरानी याद फिर से मुस्कुरा उठती है, तो किसी टूटे हुए दिल को जीने की एक नई वजह मिल जाती है। मुझे लगता है कि कॉफ़ी की महक में एक अजीब-सी जादुई गर्माहट होती है, जो अजनबियों को भी अपनेपन का एहसास करा देती है। इसलिए मैं चाहती हूँ कि जो भी इस कॉफ़ी शॉप से बाहर निकले, उसके चेहरे पर एक मुस्कान हो... चाहे वह मुस्कान सिर्फ़ एक कप कॉफ़ी की वजह से ही क्यों न आई हो, और तुम्हें पता है, यहाँ आकर मैं अपने सारे ग़म भूल जाती हूँ।"

राकेश एक नज़र रश्मि को देखता ही रह गया, 

रश्मि मुस्कुरा रही थी...

लेकिन उसकी आँखें नहीं।

राकेश ने कुछ देर रुक कर धीरे से पूछा—

"ग़म...? कौन से ग़म?"

रश्मि तुरंत सँभल गई।

"अरे... ऐसे ही। छोड़ो। आज की कॉफ़ी मेरी तरफ़ से। लेकिन कल से फ्री में कुछ नहीं मिलेगा... समझे?"

दोनों हँस पड़े।

      लेकिन राकेश उसकी आँखों में छिपा दर्द पढ़ चुका था। तभी राकेश की जिसके साथ मीटिंग थी, वह लोग भी आ गए थे, तो कॉफी और नष्ट के साथ मीटिंग शुरू तो हो चुकी थी, मगर राकेश की नजरें बारबार रश्मि को ही देखे जा रही थी। मीटिंग ख़तम होने पर राकेश रश्मि को bye कहा और बहुत जल्द फ़िर से मिलेंगे, कहते हुए चला गया और अब रश्मि भी एक नज़र राकेश को जाता हुए देखती रही।

         दो दिन बाद राकेश फ़िर से रश्मि के कॉफ़ी शॉप पहुँचा, इस बार वह उसे अपनी नई कंपनी के ओपनिंग का निमंत्रण देने आया था।

       लेकिन आज रश्मि वहाँ नहीं थी।

       वेटर से पूछ ने पर उसने बताया— मेम कल फोन पे किसी से बात कर रही थी, कोर्ट जाने की, तो शायद  मैम आज हाई कोर्ट गई होगी, अब शाम को देर से ही शायद आएगी।"

"हाई कोर्ट?"

राकेश के मन में एक अजीब-सी बेचैनी उठी। वह बिना कुछ सोचे सीधे हाई कोर्ट पहुँच गया।

दूर खड़ा वह सब देखता रहा।

रश्मि कटघरे में थी...

सामने उसका पति खड़ा था।

कुछ ही देर में उसे समझ आ गया, कि यह तलाक़ का मुक़दमा है।

कोर्ट की कार्यवाही खत्म हुई। बाहर निकलते ही रश्मि के पति ने गुस्से में कहा—

"इतनी आसानी से तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।"

रश्मि ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप वहाँ से निकल गई।

राकेश भी उसके पीछे-पीछे कॉफ़ी शॉप तक आ गया।

आज रश्मि का गुस्सा हर छोटी-सी बात पर फूट रहा था। वह कर्मचारियों पर चिल्ला रही थी। पहले तो राकेश दूर से उसको देखता रहा, 

आख़िरकार राकेश उसके सामने आ गया।

"बस करो, रश्मि... गलती इन लोगों की नहीं है।"

इतना सुनते ही जैसे बरसों से रोके हुए आँसू बाँध तोड़कर बाहर आ गए।

रश्मि फूट-फूटकर रो पड़ी और पहली बार राकेश से गले लगते हुए कहने लगी, "जब मुझे तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी... तब तुम भी मुझे छोड़कर चले गए थे। मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना था और बहुत कुछ सुनना भी था। मैं तुमसे प्यार करती थी, राकेश... कॉलेज के दिनों से। लेकिन कभी कह नहीं पाई। मेरे मना करने के बावजूद पापा ने मेरी शादी तय कर दी। मैंने नैना के हाथ तुम्हें खबर भी भेजी थी कि एक बार मिल लो... शायद सब बदल जाए। लेकिन तुम आए ही नहीं।"

राकेश कुछ पल तक बिल्कुल चुप रहा। उसकी आँखें भी भीग चुकी थीं। 

      राकेश ने धीरे से कहा, " मैंने यही समझा कि शायद यह तुम्हारी मर्ज़ी होगी। मैं तुम्हारी खुशियों के बीच नहीं आना चाहता था। इसलिए चुपचाप पीछे हट गया। जब दो साल बाद वापस लौटा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैंने कभी तुम्हें ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की... क्योंकि मुझे लगा तुम अपनी दुनिया में खुश होगी।

        रश्मि की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। फ़िर रश्मिने अपनी शादी का पूरा सच बताया। शराबी पति, रोज़ की मारपीट, अपमान और एक ऐसी ज़िंदगी जहाँ उसके सपनों की कोई कीमत नहीं थी। आख़िरकार वह सब छोड़कर मायके लौट आई। माता-पिता ने अपनी गलती स्वीकार की, उसका साथ दिया और मेरा मन फिर से लगने लगे इसलिए यह कॉफ़ी शॉप खुलवा दी।

रश्मि की बात सुनकर राकेश की आँखें नम हो गईं। इतने सालों से जिस लड़की को वह सिर्फ़ अपनी यादों में ढूँढ़ता रहा, आज उसकी ज़िंदगी की सच्चाई उसके सामने थी।

राकेश ने धीरे से कहा,

"माफ़ कर दो, रश्मि। उस दिन अगर मैं एक बार तुमसे मिल लेता... अगर एक बार तुम्हारी आँखों में देख लेता... तो शायद ज़िंदगी आज कुछ और होती।"

      रश्मि मुस्कुरा दी। वह मुस्कान खुशी की नहीं, बल्कि उन आँसुओं की थी जो बरसों से भीतर कैद थी। रश्मि को लगा जैसे, आज उसका मन थोड़ा हल्का हुआ।

रश्मि ने राकेश की ओर देखा। बरसों बाद किसी ने उसके हाथ इस तरह पकड़े थे, जैसे वह कोई बोझ नहीं, बल्कि किसी की सबसे कीमती अमानत हो।

उस दिन के बाद राकेश रोज़ कॉफ़ी शॉप आने लगा। कभी किसी मीटिंग के बहाने, कभी नई कॉफ़ी चखने के बहाने, तो कभी बिना किसी बहाने।

      राकेश कभी उसके लिए फूल नहीं लाता था। वह सिर्फ़ इतना करता कि जब भी रश्मि थक जाती, चुपचाप उसके लिए एक कप कॉफ़ी बना देता और कहता—

"आज यह कॉफ़ी मेरी तरफ़ से... 

लेकिन कल से फ्री में कुछ नहीं मिलेगा।"

रश्मि हर बार हँस पड़ती।

यही तो वह पुराना राकेश था।

कुछ महीनों बाद कोर्ट का फैसला आया।

रश्मि को उसके पति से तलाक़ मिल गया।

कोर्ट से बाहर निकलते ही रश्मिने आसमान की तरफ़ देखा। बरसों बाद रश्मि को लगा जैसे उसने पहली बार खुलकर साँस ली हो।

उसी समय राकेश उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

"अब तो तुम आज़ाद हो..."

रश्मि ने कहा—

"हाँ... लेकिन अब किसी भी रिश्ते से डर लगता है।"

राकेश मुस्कुराया।

"मैं तुम्हें किसी रिश्ते में बाँधने नहीं आया। मैं सिर्फ़ तुम्हारे साथ चलना चाहता हूँ। जब तक तुम चाहो... जितना तुम चाहो।"

रश्मि की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे पहली बार समझ आया कि प्यार किसी को हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि उसके टूटे हुए भरोसे को फिर से जीना सिखाने का नाम है।

एक साल बीत गया।

राकेश ने अपनी कंपनी भारत में शुरू कर दी। हर शाम ऑफिस से निकलकर वह उसी कॉफ़ी शॉप पहुँच जाता।

एक दिन उसने पूरे कैफ़े को सफ़ेद और पीले फूलों से सजा दिया।

रश्मि ने हैरानी से पूछा—

"आज क्या है?"

राकेश ने जेब से एक छोटा-सा पुराना बिल निकाला।

वही बिल...

जिस पर कॉलेज के दिनों में भेलपुरी और दो कॉफ़ी का हिसाब लिखा था।

रश्मि उसे देखते ही मुस्कुरा दी।

राकेश बोला—

"याद है... तुमसे कहा था, एक दिन सारे पैसे एक साथ ले लूँगा?"

रश्मि हँसते हुए बोली—

"हाँ... कितना हुआ हिसाब?"

राकेश घुटनों के बल बैठ गया।

"याद है, कॉलेज में तुम हमेशा कहती थीं कि कॉफ़ी का स्वाद साथ बैठने वाले इंसान से आता है। तब मैं समझ नहीं पाया था। लेकिन इन सालों ने मुझे सिखा दिया कि कॉफ़ी चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो... अगर साथ सही इंसान का न हो, तो हर चुस्की अधूरी लगती है।"

हिसाब बहुत छोटा है...

"उस दिन मैंने मज़ाक में कहा था कि एक दिन तुमसे सारे पैसे एक साथ ले लूँगा। आज हिसाब करने आया हूँ... लेकिन पैसों का नहीं। बस अपनी बाकी की ज़िंदगी तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ। क्या तुम मेरी हर सुबह की पहली और हर शाम की आख़िरी कॉफ़ी बनोगी?"

पूरा कैफ़े तालियों से गूँज उठा।

रश्मि की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने बिना कुछ कहे अपना हाथ राकेश के हाथ में रख दिया।

इस बार दोनों ने कोई वादा नहीं किया।

क्योंकि जिन रिश्तों में भरोसा होता है, वहाँ वादों की ज़रूरत नहीं पड़ती।

कुछ महीनों बाद उसी कॉफ़ी शॉप के बाहर एक नया बोर्ड लगा—

" कुछ रिश्ते कॉफ़ी की तरह होते हैं... 

  हर चुस्की के साथ गहरे होते जाते हैं, 

और उनकी महक उम्रभर साथ रहती है।"

        राकेश और रश्मि दोनों को अपनी अधूरी मोहब्बत नहीं मिली थी... दोनों को अपनी पूरी दुनिया मिल गई थी और कॉफ़ी की वह महक, जो कभी सिर्फ़ यादों में बसती थी, अब उन दोनों की हर सुबह और हर शाम का हिस्सा बन चुकी थी।

Bela...

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