अनकहीं बातें
वसीयत
ईश्वरलाल की पत्नी लक्ष्मी के निधन को अभी एक महीना ही हुआ था। उनकी बड़ी सी हवेली में चार बेटे, तीन बहुएँ और नौकर-चाकर होने के बावजूद ईश्वरलाल अपने आपको अकेला महसूस करते थे।
चारों बेटे अपने-अपने सपनों में खोए रहते। बड़ा बेटा लेखक बनने के पीछे पागल था। दिनभर नई कहानियाँ और कविताए लिखता और जो भी मिलता, उसे अपनी कहानी सुनाने बैठ जाता। दूसरा खुद को बड़ा गायक समझता था, उसका दिन भर गाना, बजाना शुरू रहता। तीसरा चित्रकार था, जिसकी पेंटिंग्स पूरे घर की दीवारों पर टंगी थीं, मगर खरीदने वाला कोई नहीं था। सबसे छोटा कॉलेज में था और ज़िंदगी को बस मौज-मस्ती समझता था।
घर का बरसों पुराना साड़ी का कारोबार केवल ईश्वरलाल के भरोसे चल रहा था।
लक्ष्मी अक्सर कहा करती थीं,
"मुझे अपनी मौत का डर नहीं है... डर इस बात का है, कि मेरे बाद आपका क्या होगा?"
अपनी आख़िरी साँसों से कुछ दिन पहले लक्ष्मी ने अपने पति ईश्वरलाल का हाथ पकड़कर कहा था,
"मेरे जाने के बाद बच्चों से कहना कि मैंने वसीयत बना दी है। लेकिन वसीयत तभी खुलेगी, जब यह तय हो जाएगा कि तुम्हारा सबसे ज़्यादा ख्याल किसने रखा। और हाँ... उसके साथ एक दूसरी फाइल भी है। उसे तब तक मत खोलना, जब तक सही समय न आ जाए।"
कुछ ही दिनों बाद लक्ष्मी इस दुनिया से चली गईं।
तक़रीबन एक महीने बाद पहली बार ईश्वरलाल ने पूरे परिवार को हॉल में बुलाया।
ईश्वरलाल ने शांत स्वर में कहा,
"तुम्हारी माँ अपनी वसीयत छोड़ गई हैं। मेरी सारी संपत्ति, कारोबार और हवेली उसी के अनुसार बाँटी जाएगी। क्योंकि मेरा जो कुछ भी था, वह मैंने अपनी पत्नी लक्ष्मी के नाम ही कर रखा था।लेकिन एक शर्त है... जो मेरा सबसे अच्छा ख्याल रखेगा, वही इस वसीयत का असली हकदार होगा।"
बस... इतना सुनना था कि पूरे घर का माहौल बदल गया।
जो बेटे महीनों तक पिता के कमरे में झाँकने नहीं आते थे, अब सुबह की चाय लेकर सबसे पहले पहुँच जाते। कोई दवा देता, कोई पैर दबाता, कोई मंदिर ले जाता, कोई घूमाने। बहुएँ उनकी पसंद का खाना बनाने लगीं।
ईश्वरलाल सब समझ रहे थे।
वे मुस्कुरा देते...
"लगता है, लक्ष्मी... तुम्हारी वसीयत सचमुच कमाल कर गई।"
लेकिन उनके मन में एक सवाल हर दिन बड़ा होता जा रहा था—
क्या ये सेवा मेरे लिए है... या मेरी संपत्ति के लिए?
उन्होंने एक आख़िरी परीक्षा लेने का निश्चय किया।
अपने पुराने डॉक्टर मित्र की मदद से उन्होंने हार्ट अटैक का नाटक रचा।
डॉक्टर ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,
"अब इनकी ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं... जितना समय साथ हैं, उतना इनके साथ बिताइए।"
"चारों बेटे अब पहले से भी ज़्यादा उनका ध्यान रखने लगे। यह बदलाव देखकर ईश्वरलाल के मन में बार-बार वही सवाल उठता—क्या यह सेवा सचमुच मेरे लिए है, या मेरी संपत्ति के लिए?"
उस दिन पहली बार चारों बेटों की आँखों में डर भी दिखाई दिया।
"कुछ दिन बीत गए, लेकिन ईश्वरलाल के मन का संशय पूरी तरह दूर नहीं हुआ।"
दो दिन बाद वे जान-बूझकर सीढ़ियों से गिर पड़े।
पूरा घर चीख उठा।
चारों बेटे दौड़ पड़े। किसी ने उन्हें उठाया, किसी ने एम्बुलेंस बुलाई, कोई बिना एक पल सोचे खून देने को तैयार था। बहुएँ रो रही थीं।
उस रात अस्पताल के कमरे में ईश्वरलाल चुपचाप चारों को देखते रहे।
वहाँ किसी की नज़र वसीयत पर नहीं थी...
सबकी नज़र केवल अपने पिता पर थी।
घर लौटने के बाद उन्होंने पहली बार लक्ष्मी की तस्वीर के सामने खड़े होकर कहा,
"लक्ष्मी... शायद हम अपने बच्चों को पहचानने में गलती कर रहे थे। ये निकम्मे हो सकते हैं... लेकिन बेदिल नहीं हैं।"
उसी शाम उन्होंने सबको अपने कमरे में बुलाया।
टेबल पर दो फाइलें रखी थीं।
एक वसीयत...
दूसरी वही रहस्यमयी फाइल।
ईश्वरलाल ने धीमे स्वर में कहा,
"आज मैं तुम्हें वह सच बताने जा रहा हूँ, जो तुम्हारी माँ और मैंने पूरी ज़िंदगी किसी को नहीं बताया। क्योंकि मैं तुम सब को अब और धोखे में नहीं रखना चाहता, और इस बोझ के साथ मैं मरना नहीं चाहता।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उन्होंने गहरी साँस ली, कुछ पल आँखें बंद रखीं, फिर धीमे स्वर में बोले—
'तुम चारों... हमारे बेटे नहीं हो।'"
जैसे समय ठहर गया।
"डॉक्टरों ने हमें बहुत पहले बता दिया था कि हमारी कोई संतान नहीं हो सकती। तुम्हारी माँ बच्चों के बिना जी नहीं सकती थीं। इसलिए हमने अलग-अलग समय पर तुम चारों को अनाथालय से गोद लिया। किसी को कभी एहसास भी नहीं होने दिया कि तुम हमारे खून से नहीं हो... क्योंकि हमारे लिए खून से बड़ा रिश्ता प्यार था।"
चारों बेटों की आँखों से आँसू बह निकले।
ईश्वरलाल आगे बोले,
"तुम्हारी माँ ने कहा था, कि यह सच मेरी मौत के बाद बताना... लेकिन अब मुझे लगता है, कि सच जानने का हक़ तुम्हें आज ही है।"
उन्होंने दूसरी फाइल उनकी ओर बढ़ा दी।
"इसमें उस अनाथालय का नाम और तुम्हारे गोद लेने से जुड़े सारे कागज़ हैं।"
चारों बेटे फूट-फूटकर रो पड़े।
सबने एक साथ पिता को गले लगा लिया।
सबसे बड़े बेटे ने रोते हुए कहा,
"हमें आपका साथ और आशीर्वाद चाहिए... आपकी दौलत नहीं।"
फाइल वहीं टेबल पर पड़ी रही।
किसी ने उसे छूने तक की कोशिश नहीं की।
अगली सुबह बड़ा बेटा रोज़ की तरह चाय लेकर पिता के कमरे में पहुँचा।
ईश्वरलाल अपनी कुर्सी पर बैठे थे...
सामने लक्ष्मी की तस्वीर थी।
होठों पर हल्की-सी मुस्कान...
"मानो बरसों बाद उन्हें अपनी सबसे बड़ी चिंता से मुक्ति मिल गई हो।"
आँखें उसी तस्वीर पर टिकी हुई थीं।
बड़े बेटे ने आवाज़ दी—
"पापा..."
कोई उत्तर नहीं आया।
वह हमेशा के लिए लक्ष्मी के पास जा चुके थे।
पूरा घर रो पड़ा।
सारे संस्कार पूरे होने के बाद भी लक्ष्मी की वह फाइल उसी टेबल पर वैसी ही रखी रही।
अब किसी में उसे खोलने की हिम्मत नहीं थी।
आख़िरकार परिवार के वकील ने सबके सामने फाइल खोली।
कमरे में फिर एक बार सन्नाटा छा गया।
वसीयत में लिखा था—
"मेरी सारी संपत्ति, कारोबार और घर... मेरे चारों बेटों में बराबर-बराबर बाँटे जाएँगे। किसी को एक रुपया भी कम या ज़्यादा नहीं मिलेगा। क्योंकि जिस दिन हमने इन्हें गोद लिया था, उसी दिन तय कर लिया था कि हमारे प्यार की तरह हमारा अधिकार भी कभी बराबरी से कम नहीं होगा।"
फाइल के आख़िरी पन्ने पर लक्ष्मी की लिखावट थी—
उस एक पंक्ति ने सिर्फ़ एक वसीयत का फैसला नहीं सुनाया... उसने चार बेटों को यह एहसास करा दिया कि रिश्ते खून से नहीं, निभाने से अपने बनते हैं।
Bela...
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