दोस्ती का कर्ज़


अनकही बातें 

दोस्ती का कर्ज़

      "अमित और विजय बचपन के ऐसे दोस्त थे, जिनकी दोस्ती की मिसाल पूरा मोहल्ला देता था। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, पढ़ाई, शरारतें, सपने और संघर्ष—सब कुछ दोनों ने साथ जिया था।"

फिर ज़िंदगी की दौड़ शुरू हुई। दोनों की शादी हो गई, दोनों अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों में उलझ गए। मुलाकातें कम हो गईं, लेकिन रिश्ता कभी कमज़ोर नहीं पड़ा।
        एक दिन अचानक अमित की नौकरी चली गई। घर की सारी ज़िम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। अमित का बड़ा बेटा आरव अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता था, उसकी स्कूल की फीस बाकी थी। ऊपर से उसकी पत्नी अमी आठ महीने की गर्भवती थी। कभी भी कुछ भी हो सकता था, ऊपर से अस्पताल का खर्च, घर का किराया और रोज़मर्रा की ज़रूरतें... सब एक साथ सामने खड़ी थीं। लेकिन अमित का स्वाभिमान ऐसा था कि वह किसी से मदद लेने की बात सोच भी नहीं सकता था।
      अमी यह सब देख रही थी। वह रातों को चुपचाप रोती, मगर अमित के सामने हमेशा मुस्कुरा देती। अमी को एक दिन याद आया कि, अमित ने एक दिन उसके दोस्त विजय के बारे में बहुत कुछ बताया था, वह अच्छे घर का था और अमीर भी था।
      तब अमी ने घर की पुरानी फ़ोन डायरी में से विजय का नंबर ढूंढ लिया, आख़िर एक दिन उसने काँपते हाथों से विजय को फोन किया और कहा, "भैया... मैं पहली बार आपसे कुछ माँग रही हूँ। अगर आज आपने साथ नहीं दिया, तो शायद मेरा घर टूट जाएगा। ( कहते हुए अमी ने विजय को घर के बारे में और विजय की नौकरी के बारे में सब कुछ सच सच बता दिया ) लेकिन एक वादा कीजिए... अमित को कभी पता नहीं चलना चाहिए।"

विजय कुछ देर ख़ामोश रहा।
फिर बोला,
"आज से यह चिंता मेरी है।"

दो दिन बाद विजय ने अमित को फोन किया। 
बात कुछ ऐसे शुरू की, "  यार, कहां है ? आज कल तू और घर पर सब कैसे है ? भाभी जी को मेरी याद कहना। " क्योंकि "विजय चाहता था कि अमित खुद अपने हालात बता दे, ताकि उसे झूठ का सहारा न लेना पड़े। लेकिन अमित ने हमेशा की तरह हँसते हुए कहा—'सब बढ़िया है यार।' तभी विजय समझ गया कि दोस्त आज भी अपने दर्द छिपाना जानता है।"

       फ़िर बातों बातों में विजय ने अमित से कहना शुरू किया, कि "यार, एक ज़रूरी प्रोजेक्ट मिला है। मुझे पता है, तुमसे बेहतर यह काम कोई नहीं कर सकता, यह कुछ एडवांस है, काम आराम से पूरा कर देना।" और उसी वक़्त ऐसा कहते हुए पैसे अमित के अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए।

      अमित ने बिना किसी शक के पैसे ले लिए। उसे लगा, यह उसकी मेहनत की कमाई है।
उसे कभी एहसास भी नहीं हुआ कि वह काम सिर्फ़ उसके आत्मसम्मान को बचाने के लिए बनाया गया था।

समय का पहिया घूमता रहा।
अमित को पहले से भी ज़्यादा अच्छी नौकरी मिल गई। बच्चे बड़े हो गए। ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ गई।

      लेकिन अमी के दिल पर एक बोझ हमेशा बना रहा। एक रात अमित पानी पीने उठा तो उसने अमी को फोन पर कहते सुना—
"अगर उस दिन आपने मेरी मदद नहीं की होती, तो शायद हमारा परिवार बिखर जाता।"
"अब मैं और यह सच अपने दिल में नहीं रख सकती। लगता है, अमित को सब सच बता देना चाहिए... और आपके पैसे भी लौटा देने चाहिए।"
अमित के कदम वहीं रुक गए।
अमी ने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसके हाथ से फोन नीचे गिर गया, फोन कट चुका था।
    अमी डर के मारे रो पड़ी और विजय से कहने लगी "मुझे माफ़ कर दीजिए, अमित... मैंने आपसे झूठ नहीं बोला... बस आपका आत्मसम्मान बचाने के लिए एक सच छिपा लिया।" ( अमी ने सब सच बता दिया उसके साथ ही बरसों तक जो राज अमी ने अपने अंदर छुपा के रखा था, वह आज बाहर आ गया।)

उस रात अमित कुछ नहीं बोला।

सुबह उसने अलमारी से उतनी ही रकम निकाली, जितनी वर्षों पहले विजय ने 'एडवांस' के नाम पर दी थी।
वह सीधे विजय के ऑफिस पहुँचा।
दरवाज़ा खुलते ही विजय मुस्कुराया।
          " अरे मेरे यार.. इतने साल बाद दोस्त को याद कैसे आ गई?"

अमित ने विजय से सीधा ही कह दिया,  "तुमने मुझे इतना पराया समझ लिया था कि मुझसे झूठ बोलना पड़ा?"

विजय ने कहा, "नहीं दोस्त... मैंने झूठ नहीं बोला, बस तुम्हारे आत्मसम्मान को सच से बचा लिया।"

उसके बाद अमित ने सीधे ही बैग विजय के सामने रख दिया। और कहा, 
"यह तुम्हारे पैसे हैं।"

विजय ने बैग खोला भी नहीं।

धीरे से उसे वापस अमित की ओर बढ़ाते हुए कहने लगा, 
"दोस्ती में हिसाब नहीं होता, अमित।"

अमित की आँखें भर आईं।
फ़िर कुछ देर बाद अमित ने कहा, 
"अगर आज यह पैसे तुम ने नहीं लिए... तो मुझे ज़िंदगी भर लगेगा, कि मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूँ।"

विजय मुस्कुराया। मगर पहले तो विजय ने पैसे लेने से साफ़ इनकार कर दिया। तब मुंह फैलाते हुए अमित वापस घर जाने लगा। विजय को अपने दोस्त का यूं रूढ़ के जाना पसंद नहीं आया इसलिए विजयने अमित के कंधे पर हाथ रखा और बोला— " रुक अमित, अगर तू सच में मेरा कर्ज़ उतारना चाहता है...
तो ये पैसे मुझे मत दे।"
"शहर के जिस वृद्धाश्रम में मैं हर महीने जाता हूँ... वहाँ बहुत से बुज़ुर्ग हैं, जो अपने बच्चों का इंतज़ार करते-करते थक चुके हैं।
इन पैसों से उनके लिए दवाइयाँ, खाना और ज़रूरत का सामान पहुँचा देना।
समझूँगा, मेरा पैसा सही जगह पहुँच गया।"

अमित अब ख़ुद को रोक नहीं पाया। उसने विजय को कसकर गले लगा लिया। दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसी दिन शाम को अमित और अमी उसी वृद्धाश्रम पहुँचे।
उन्होंने किसी को अपना नाम नहीं बताया।
चुपचाप सारी रकम वहाँ दान कर दी।
वापस लौटते समय अमित ने आसमान की तरफ़ देखा और मुस्कुराकर कहा—
"यार...
तूने एक बार फिर मुझे देना सिखा दिया।"
"उस दिन अमित को एहसास हुआ कि कृष्ण और सुदामा की दोस्ती सिर्फ़ इतिहास नहीं, आज भी ज़िंदा है। फ़र्क बस इतना है कि आज भी कुछ कृष्ण अपने सुदामा की मदद बिना बताए कर जाते हैं।"

दोस्ती का कर्ज़ कभी पैसों से नहीं उतरता।
सच्चे दोस्त बदले में कुछ नहीं माँगते, 
क्योंकि सच्चे दोस्त हाथ नहीं पकड़ते....वे गिरने से पहले संभाल लेते हैं।

Bela...


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