अनकही बातें/ होली के रंग

अनकही बातें 

होली के रंग

       आज होली का दिन था। कहीं गुलाल उड़ रहा था, कहीं डीजे की धुन पर लोग झूम रहे थे। चारों ओर हँसी-ठिठोली और खुशियों का माहौल था।

       चौदह साल की परी भी अपने दोस्तों के साथ होली खेल रही थी। रंग खेलते-खेलते उसे प्यास लगी, तो वह पानी पीने के लिए रसोई में चली गई।

       रसोई में उसका चाचा पहले से मौजूद था। उसने नशा किया हुआ था और उसकी हालत ठीक नहीं थी। जैसे ही परी अंदर आई, उसने उसका मुँह दबा दिया और जबरदस्ती उसे घर के स्टोर रूम में ले गया।

           उस बंद कमरे में उसने परी के साथ एक ऐसा अपराध किया, जिसने उसकी पूरी दुनिया बदल दी। जाते-जाते उसने उसे धमकी दी—

        "अगर किसी को कुछ बताया... तो मैं तुम्हारी वीडियो सबको दिखा दूंगा।"

       परी काँप रही थी। उसकी चीखें कमरें की चार दीवारों में कैद होकर रह गईं। बाहर डीजे की तेज़ आवाज़ थी, लोग रंगों में मस्त थे। किसी ने उसकी सिसकियाँ नहीं सुनीं।

       उस दिन होली के रंग तो सबके चेहरों पर चढ़े, लेकिन परी की ज़िंदगी के सारे रंग हमेशा के लिए फीके पड़ गए।

        उसके बाद कुछ ही दिनों में उसका चाचा विदेश चला गया।

समय बीतता गया...

         लेकिन परी वहीं ठहर गई, उसी डर में, उसी दर्द में।

        हर साल जब होली आती, वह खुद को अपने कमरें में बंद कर लेती। बाहर रंगों का त्योहार होता और अंदर उसकी आँखों में सिर्फ़ आँसू होते।

        उसकी माँ कई बार पूछती—

         "क्या हुआ बेटा? तू हर होली पर इतनी सहमी-सहमी क्यों रहती है?"

लेकिन परी हर बार मुस्कुरा कर कह देती—

     "कुछ नहीं माँ... बस मन नहीं करता, अब होली के रंग मुझे अच्छे नहीं लगते, होली के रंगों से मुझे डर लगता है।"

         वह अपनी माँ को परेशान नहीं करना चाहती थी। उसे डर था कि अगर उसने सच बता दिया, तो शायद उसका घर बिखर जाएगा... और वह धमकी भी उसे हर पल डराती रहती थी।

सात साल बीत गए।

अब परी इक्कीस साल की हो चुकी थी। उसकी शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। उसका रिश्ता उसके कॉलेज के दोस्त प्रियांशु से तय हुआ था। दोनों एक-दूसरे को समझते थे और परिवार की रज़ामंदी से उनकी लव मैरिज होने वाली थी।

घर में खुशियों का माहौल था।

तभी वर्षों बाद उसका वही चाचा विदेश से लौटकर शादी में शामिल होने आया।

जैसे ही परी की नज़र उस पर पड़ी, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका शरीर काँपने लगा। उसे लगा जैसे सात साल पहले वाला अँधेरा फिर से उसके सामने खड़ा हो गया हो।

वह भागकर अपने कमरे में गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।

यह देखकर प्रियांशु भी उसके पीछे गया।

उसने दरवाज़ा खटखटाया।

"परी... दरवाज़ा खोलो। क्या हुआ?"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

कुछ देर बाद प्रियांशु ने चिंता से कहा—

"परी, अगर तुमने दरवाज़ा नहीं खोला, तो मुझे इसे तोड़ना पड़ेगा।"

काँपते हाथों से परी ने दरवाज़ा खोला।

दरवाज़ा खुलते ही वह प्रियांशु से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी।

प्रियांशु उसे कमरे के अंदर ले गया, दरवाज़ा बंद किया, उसे पानी पिलाया और शांत होने का इंतज़ार किया।

फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—

"परी... क्या बात है? अचानक तुम से भागकर कमरें में क्यों चली आई ? और इतना रो क्यों रही हो ? तुम्हें मुझसे कुछ भी छिपाने की ज़रूरत नहीं है।"

कई वर्षों से सीने में दबा दर्द आज शब्द बनकर बाहर आने लगा।

परी ने उस होली के दिन से लेकर आज तक का पूरा सच बता दिया।

कमरे के बाहर खड़ी उसकी माँ अनजाने में यह सब सुन चुकी थीं।

उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

आँखों से आँसू बहने लगे... लेकिन अगले ही पल उनकी आँखों में आँसुओं की जगह आग थी।

वे सीधे सबके सामने पहुँचीं।

बिना एक पल गंवाए उन्होंने परी के चाचा के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ मारा।

पूरा घर सन्न रह गया।

परी के पिता कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उसकी माँ ने काँपती आवाज़ में सबके सामने पूरा सच बता दिया।

एक पल में शादी की खुशियाँ खामोशी में बदल गईं।

प्रियांशु ने बिना देर किए पुलिस को फोन किया।

कुछ ही देर में पुलिस पहुँची और परी के चाचा को गिरफ्तार करके थाने ले गई।

परी के पिता शर्म, गुस्से और पछतावे से टूट चुके थे।

प्रियांशु ने परी का हाथ पकड़ कर सिर्कफ़ इतना ही कहा, " मैं कल भी तुम्हारे साथ था, मैं आज भी तुम्हारे साथ हूँ। "

सबके जाने के बाद उसकी माँ ने परी को अपने सीने से लगा लिया।

रोते हुए बोलीं—

"बेटा... तू इतने साल अकेली यह दर्द सहती रही? क्या मैं तेरी माँ नहीं थी? क्या तुझे मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?"

परी की आँखों से आँसू बह निकले।

वह बोली—

"माँ... भरोसा आप पर नहीं, खुद पर टूट गया था। मुझे डर था... लोग मुझसे ही सवाल करेंगे। कहेंगे कि गलती मेरी ही रही होगी। मुझे लगता था कि अगर सच सामने आया, तो हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी... और मेरी ज़िंदगी भी।"

उसकी माँ ने उसके आँसू पोंछे और दृढ़ आवाज़ में कहा—

"नहीं बेटा... इज़्ज़त किसी अपराधी को बचाने से नहीं बचती, बल्कि उसके खिलाफ़ खड़े होने से बचती है। गलती कभी पीड़ित की नहीं होती।"

उस दिन पहली बार परी ने महसूस किया कि उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का हुआ है।

होली के रंगों ने उससे सात साल पहले सब कुछ छीन लिया था...

लेकिन इस बार होली ने उसे उसका साहस, उसका विश्वास और न्याय वापस लौटा दिया।

Bela...

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