कुछ तो हुआ है



कुछ तो हुआ है...

आजकल ऐसा लगता है, जैसे...
कभी तेरे नाम से धड़कने वाला यह दिल,
आज तेरे ही नाम पर ख़ामोश हो गया है।

जिस दिल में कभी तेरी मोहब्बत बसी थी,
आज उसी में अनकही फ़रियादें बस गई हैं।

कुछ तो हुआ है तेरे-मेरे दरमियाँ...
जो बिना लफ़्ज़ों के कह देने वाली निगाहें,
आज एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगी हैं।

कुछ तो हुआ है तेरे-मेरे दरमियाँ...
कि साथ होकर भी अब
साथ होने का एहसास नहीं होता।

तेरा हाथ आज भी मेरे हाथ में है,
मगर उस छुअन में अब वो
 अपनापन नहीं रहा।

तेरी आवाज़ आज भी सुनाई देती है,
मगर उसमें अब न वो दर्द है,
न वो अपनापन।

जिस दिल को तेरे लौट आने का
हर पल इंतज़ार रहता था,
आज उसी दिल ने
इंतज़ार करना छोड़ दिया है।

अब तुम आओ या न आओ,
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
साथ रहो या दूर चले जाओ,
अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

हाँ... ज़िंदगी आज भी साथ कट रही है,
मगर अब वो पहले-सी बात नहीं रही।

न जाने कब शिकायतें 
मोहब्बत से बड़ी हो गईं,
कब ख़ामोशियाँ बातों
 पर भारी पड़ गईं,
और कब एक ही छत के
 नीचे रहते-रहते
हम अजनबी बन गए।

आख़िर ऐसा क्यों हुआ?

पहले तुमसे मिलने को,
तुम्हारी बातें सुनने को,
दिल बेताब रहता था।

आज तुमसे दूर रहने
 का मन करता है,
क्योंकि तुम्हारी बातों में अब
सिर्फ़ गुस्सा और नाराज़गी
 नज़र आती है।

न जाने कहाँ खो गए वो दिन,
जब तेरे दीदार के लिए
ये आँखें बेचैन रहती थीं।

तुम्हारे पास न होने पर
घंटों तुम्हारी तस्वीर से बातें किया करते थे।
जब उससे भी मन नहीं भरता था,
तो रातों को तुम्हारी तस्वीर
सीने से लगाकर सो जाया करते थे।

पता नहीं कहाँ खो गए वो दिन,

वो एहसास...
जब दिल को लगता था,
तुम साथ हो।

याद है...

तेरे आने की आहट से ही
मेरे चेहरे पर मुस्कान उतर आती थी।
तेरे एक संदेश पर
पूरा दिन ख़ूबसूरत लगने लगता था।
तेरी हँसी में मेरी खुशी थी,
तेरी ख़ामोशी में मेरी बेचैनी।
तेरी आँखों में अपना कल दिखाई देता था,
और तेरे साथ बिताया हर पल
ज़िंदगी का सबसे हसीन लम्हा लगता था।

और आज...

तुम सामने होकर भी
दिल मुस्कुराना भूल गया है।
पहले तुम्हारे बिना
एक पल भी अधूरा सा लगता था,

और आज...
साथ रहकर भी
सालों की दूरी महसूस होती है।
शायद मोहब्बत मरी नहीं है...
बस थक गई है।

बस एक दुआ है...
सपनों को पूरा करने की चाह में,
कहीं किसी रोज़
तुम हमें ही न भूल जाना।
अगर कभी मेरी याद आए,
तो इतना ज़रूर सोचना...
कि कोई था,
जो तुम्हें अपनी दुआओँ से
 भी ज़्यादा चाहता था।

"कुछ तो हुआ है तेरे-मेरे दरमियाँ...
जो पहले-सी अब वो बात नहीं रही।
मोहब्बत शायद आज भी वहीं खड़ी है...
बस उसे निभाने वाले लोग बदल गए हैं।"

रिश्ते कभी एक पल में नहीं टूटते।
हर दिन एक भरोसा कम होता है,
हर रोज़ एक मुस्कान मरती है,
हर शाम एक उम्मीद बिखरती है।
और फिर एक दिन...
दो लोग एक ही छत के नीचे रहते हुए भी,
एक-दूसरे की ज़िंदगी से
चुपचाप चले जाते हैं।

कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते,
बस उनमें साथ रहने की वजह
ख़त्म हो जाती है।
घर वही रहता है,
लोग वही रहते हैं,
मगर एक दिन एहसास होता है...
कि उस घर में
अब रिश्ते नहीं,
सिर्फ़ लोग रहते हैं।

और तब...
दिल आख़िरी बार
धीरे से यही कहता है—

"कुछ तो हुआ है तेरे-मेरे दरमियाँ...
जो पहले-सी अब वो बात नहीं रही।
मोहब्बत आज भी है शायद...
मगर पहले जैसी अब वो बात नहीं रही।"

Bela...


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