Bahu ki chuppi

  

बहू की चुप्पी

शर्मा परिवार की बहू अवनि को इस घर में आए पाँच साल हो चुके थे।

इन पाँच सालों में उसने कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं की। सास के ताने हों या रिश्तेदारों के सवाल, वह हर बार बस मुस्कुरा देती।

लेकिन उसकी एक आदत पूरे घर को अजीब लगती थी।

हर साल 17 सितंबर की शाम वह चुपचाप घर से निकल जाती। करीब एक घंटे बाद लौटती और किसी से कुछ नहीं कहती।

सास कई बार पूछतीं, "कहाँ जाती हो?"

अवनि हर बार सिर्फ़ इतना कहती—

"अभी नहीं माँ... एक दिन सब बता दूँगी।"

धीरे-धीरे सबने उसकी बात पूछना छोड़ दिया।

...

उस साल 17 सितंबर को जैसे ही अवनि घर से निकलने लगी, सास ने पहली बार उसका पीछा करने का फैसला किया।

अवनि शहर के एक छोटे-से मंदिर पहुँची।

वहाँ एक अधेड़ उम्र की महिला पहले से उसका इंतज़ार कर रही थी।

दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया।

सास दूर खड़ी सब देख रही थीं।

कुछ देर बाद उन्होंने उस महिला का चेहरा देखा...

और उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वह...

सरला थी।

उनकी बेटी...

जो पच्चीस साल पहले अपने प्रेमी के साथ घर छोड़कर चली गई थी।

उस दिन गुस्से में उसके पिता ने पूरे समाज के सामने कह दिया था—

"आज से हमारी बेटी हमारे लिए मर चुकी है।"

उसके बाद घर में उसका नाम लेना भी मना हो गया।

उसकी तस्वीरें हटा दी गईं।

उसका कमरा बंद कर दिया गया।

जैसे वह इस घर में कभी थी ही नहीं।

सास काँपते हुए दोनों के सामने पहुँचीं।

"अवनि... तुम... इसे जानती हो?"

अवनि की आँखें भर आईं।

"हाँ माँ..."

"शादी के कुछ दिन बाद मंदिर में मेरी मुलाकात इनसे हुई थी। इन्होंने अपना नाम नहीं बताया, बस इतना कहा कि इस घर के बारे में सब जानती हैं। बाद में मुझे सच पता चला।"

"फिर तुमने हमें बताया क्यों नहीं?"

अवनि ने सरला का हाथ थाम लिया।

"क्योंकि इन्होंने मुझसे एक वादा लिया था।"

सरला की आँखों से आँसू बहने लगे।

"मैंने अवनि से कहा था... जब तक पापा के दिल का गुस्सा खत्म न हो जाए, मेरे बारे में किसी को मत बताना। मैं घर तो छोड़कर गई थी... लेकिन अपने माँ-बाप को कभी नहीं छोड़ा।"

उन्होंने काँपती आवाज़ में आगे कहा—

"हर साल मैं इसी दिन मंदिर आती थी... इस उम्मीद में कि शायद एक दिन कोई मुझे माफ़ कर देगा।"

सास खुद को रोक नहीं पाईं।

उन्होंने बरसों बाद अपनी बेटी को सीने से लगा लिया।

उसी समय पीछे से एक आवाज़ आई—

"सरला..."

यह आवाज़ उसके पिता की थी।

वह भी चुपचाप उनके पीछे-पीछे मंदिर तक आ गए थे।

उनकी आँखों में आँसू थे।

उन्होंने धीरे से कहा—

"जिस दिन तुम गई थीं, उस दिन मैंने अपनी बेटी नहीं... अपना अहंकार चुन लिया था। सज़ा तुम्हें नहीं, हमने खुद को दी है।"

सरला फूट-फूटकर रो पड़ी।

पच्चीस साल बाद...

एक पिता ने पहली बार अपनी बेटी को गले लगाया।

और उस दिन सबको समझ आया...

बहू की चुप्पी किसी राज़ को छिपाने के लिए नहीं थी... वह एक बिखरे हुए परिवार को फिर से जोड़ने के लिए थी।

कुछ बातें इसलिए अनकही रहती हैं... क्योंकि उन्हें कहने का सही समय भी ईश्वर ही तय करता है।

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