*मेरी वेलवेट मून डायरी*
मेरी वेलवेट डायरी के कुछ पन्ने जो, मेरे शब्दों के बिना मायूस और बेरंग से हो गए हैं, उसे फिर से अपने शब्दों के माया जाल में पिरो देना चाहती हूँ। जैसे चंद्रमा अपनी चाँदनी को अपने अंदर छुपा के रखता है, वैसे ही मैंने भी अपने जज़्बात अपने अंदर छुपा रखे हैं। आज शायद वक़्त आ गया है, फिर से उन जज़्बातों को बाहर निकालने का।
एक अधूरी मेरी वेलवेट मून कहानी, जिसे आज पूरी करनी है। बदलते मौसम के साथ बदल रही है मेरी वेलवेट मून कहानी। वक़्त की स्याही से लिखनी है, आज फिर से वही अधूरी चाँद और चाँदनी की कहानी, जिसे हम छोड़ आए थे बहुत पीछे।
काश! कहीं से वो एक शब्द मिल जाए, जिससे मैं अपनी जीवन की दास्ताँ, अपनी वेलवेट मून कहानी आप सब को सुना सकूँ।
लेकिन सबकी ज़िंदगी की कहानी लिखने वाली आज "मैं" जैसे मेरे पास अपनी ही वेलवेट मून डायरी में लिखने के लिए शब्द नहीं। कागज़, स्याही और कलम भी मेरे सामने देख सोच रहे हैं कि बिना रुके हम पे चलने वाले हाथ आज रुक क्यों गए हैं?
कलम को स्याही में डुबोते हुए, फिर से लिखना शुरू किया, मगर शुरू कहाँ से करूँ? तब एहसास हुआ कि जैसे शब्द मुझसे भाग रहे हैं कहीं दूर। कहानी मुझसे पूछ रही सवाल, कविताएँ पंछी बनकर उड़ रही आसमान में और मैं कोरे कागज़ को एक नज़र देखे ही जा रही हूँ।
वैसे ही मुझे याद आ रहे हैं, बचपन के वो दिन, जब में स्कूल की परीक्षा के समय, इम्तिहान में हमें कुछ लिखना याद नहीं आता था और हम उन कागज़ के पन्नों को मायूस होकर देखते रह जाते थे। तब यही पन्ने हम पे हँसते थे।
आज वही कागज़ के पन्ने हमें लिखने के लिए अपने पास बुला रहे हैं और आज भी जैसे हम बचपन की तरह, उन्हीं कागज़ के पन्नों को मायूस होकर देख रहे हैं, और सोच रहे हैं कि कहीं आज भी पहले की तरह मेरी "वेलवेट मून डायरी" फिर से अधूरी ना रह जाए।
Bela...
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