कश्मकश

कश्मकश 

अजीब सी कश्मकश में उलझा है
ये दिल मेरा,
माना आज तो हुस्न जवाँ है, 
पर ये आलम कहाँ रहेगा?  

वक़्त की स्याही से बालों पे,
चाँदी उतर आई है,
आईने में झाँका तो चेहरे पे,
 लकीरें नज़र आई हैं।

लाख फेशियल कर लूँ, 
क्रीमों से चेहरा सजा लूँ,
उम्र तो अपना काम करेगी, 
इसे कैसे बहला लूँ?

पैरों में अब वो ताक़त नहीं, 
जो तेरे संग क़दम बढ़ा दूँ, 
तू आगे निकल जाता है, 
मैं पीछे रह जाती हूँ।

बस उसी पल ये ख़ौफ़,
 दिल को घेर लेता है,
कहीं ज़िंदगी की राहों में,
तुम्हारे साथ कदम से कदम,
 मिला के चल ना पाए हम, 
तो
यूँ ही हाथ हमारा,
 छोड़ तो ना दोंगे ?
यूँ ही हमारा, 
साथ छोड़ तो ना दोंगे ?।
हर लम्हा इसी कश्मकश,
 में गुज़रता है हमारा,
फिर खुद ही दिल को,
 तसल्ली दे देते है।

नहीं... कल भी तू साथ था, 
आज भी तू साथ है, 
और कल भी तू,
यूँ ही साथ रहेगा हमारे,
इसी उम्मीद में आज भी,
तेरे संग क़दम से क़दम
 मिला के चल रहे है।

Bela...



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