कोशिश
कोशिश की थी हमने, उनसे नफरत करने की, मगर क्या करें कि प्यार हमने उनसे इस कदर किया, कि उनकी बेवफाई भी हमें उनसे दूर कर ना पाई।
कोशिश की थी हमने, उनको भूल जाने की, मगर क्या करें कि उनका चेहरा आज भी हमारी आँखों से दूर होता नहीं और उनकी वो बातें जो दिल को छू जाती थी, कैसे उसे भूल जाए ?
कोशिश की थी हमने, उनको प्यार से भी ज़्यादा प्यार देने की, मगर क्या करें कि हमारा प्यार उन्हें रास नहीं आया।
कोशिश की थी हमने, उनके ढाँचे में ढलने की मगर क्या करें कि, उनको हमारी सादगी पसंद ना आई।
कोशिश की थी हमने, उनको अपने पल्लू से बांध के रखने की, मगर क्या करें कि जब उनको हमारे पल्लू से ज़्यादा मिनी स्कर्ट पसंद आ गया।
कोशिश की थी हमने, सपनों को सच करने की मगर क्या करें जब, हमारे सपनों का आशियाना ही उन्होंने तोड़ दिया।
कोशिश की थी हमने रिश्तों को जोड़े रखने की, मगर क्या करें कि उनको रिश्तों से ज़्यादा पैसो से प्यार था।
कोशिश की थी हमने, उनको छोड़ देने की मगर क्या करें कि हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे हैं, कि हम चाहकर भी उनको छोड़ नहीं सकते।
कोशिश की थी हमने उनको वापस लाने की, मगर क्या करें कि उनको हम से ज़्यादा वह नखरेवाली पसंद आ गई।
हमारी जगह कोई दूसरा होता, तो कब का उनको बेवफा कहकर छोड़ दिया होता।
बस अब उसी दिन के इंतज़ार में आज भी रोज़ घर के आँगन में उम्मीद का दीपक जला के उनका इंतज़ार करते हैं, जिस दिन वह लौट के आएँगे।
Bela...
कोशिश
कोशिश की थी हमने,
तुमसे नफ़रत करने की,
मगर मोहब्बत इतनी सच्ची थी,
कि तुम्हारी बेवफ़ाई भी
हमें तुमसे जुदा न कर सकी।
कोशिश की थी हमने,
तुम्हें भूल जाने की,
मगर क्या करें...
तुम्हारा चेहरा आज भी
मेरी आँखों में बसा है,
और तुम्हारी वो बातें,
जो कभी दिल को छू जाया करती थीं,
उन्हें भला कैसे भुला दूँ?
कोशिश की थी हमने,
तुम्हें अपनी मोहब्बत से
दुनिया की हर ख़ुशी देने की,
मगर...
शायद हमारा प्यार ही
तुम्हें रास न आया।
कोशिश की थी हमने,
तुम्हारे रंग में रंग जाने की,
अपने जीने का अंदाज़ बदलने की,
मगर...
तुम्हें हमारी सादगी तुम्हें
कभी पसंद ही नहीं आई।
कोशिश की थी हमने,
तुम्हें अपने आँचल से
बाँधकर रखने की,
मगर...
तुम्हें मेरे आँचल से ज़्यादा
दुनिया की चमक-दमक पसंद आ गई।
कोशिश की थी हमने,
अपने सपनों का आशियाना बनाने की,
मगर...
तुमने ही
उसकी नींव तोड़ दी।
कोशिश की थी हमने,
रिश्तों को सँभालकर रखने की,
मगर...
तुम्हें रिश्तों से ज़्यादा
दौलत प्यारी थी।
कोशिश की थी हमने,
तुम्हें छोड़ देने की,
मगर...
मेरे संस्कारों ने
हर बार मेरा हाथ थाम लिया।
कोशिश की थी हमने,
तुम्हें वापस लाने की,
मगर...
तुम्हें मुझसे ज़्यादा
किसी और की अदाएँ पसंद आ गईं।
कोई और होता,
तो शायद तुम्हें बेवफ़ा कहकर
कब का चला गया होता।
मगर...
हमने मोहब्बत की थी,
सौदा नहीं।
इसलिए आज भी,
हर शाम
घर के आँगन में
उम्मीद का एक दीपक
जला देती हूँ।
इस आस में...
कि शायद किसी दिन
तुम लौट आओ...
और फिर से
मेरे अधूरे सपने को पूरा कर दो और
हमारे इस घर को फ़िर से
घर बना दो।
Bela...
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