GALATFAHMI

                            ग़लतफहमी

     काश ! की  उस दिन मेरा accident नहीं हुआ होता, तो शायद मैंने सीमा को अपने दिल की बात बता दी होती।  

      कॉलेज के पहले ही दिन से मैंने सीमाको प्यार किया, लेकिन बताने की कभी हिम्मत नहीं कर सका, कि शायद सीमाको मेरी बात का बुरा ना लग जाए !

      सीमा को मैं रोज़ चुपके से देखा करता था, कभी कॉलेज की क्लास में, कभी लाइब्रेरी में, कभी कैन्टीन में, कभी पार्टी में, तो कभी पिकनिक पे। मगर कभी सीमा के  सामने आने की हिम्मत ना कर सका, की शायद सीमाको मेरी बात का बुरा ना लग जाए ! और बिना वजह वह मुझ से नाराज़ ना हो जाए। 

      कई बार सीमा के सामने बात करने की कोशिश की, मगर सीमा के सामने आते ही मेरे होंठ सील जाते थे, मैं हर वो बात भूल जाता, कि मुझे सीमासे कहना क्या था ? और ऐसी कसमकस में मैं, उसको दूर से ही देखा करता। 

      मगर आज, मगर आज ना जाने क्यूँ मैं अपने आप को रोक ना सका, मुझे ख्याल आया कि कभी ना कभी तो बताना ही होगा, कि " मैं सीमा से बहुत बहुत प्यार करता हूँ, और करता रहूँगा, उसकी हांँ  हो या ना हो, इस से मुझे फर्क नहीं पड़ता। लेकिन किसी भी तरह मुझे अपने मन की बात उसे बतानी ही है, कि " मैं  तुम को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करता हूँ, भले ही मेरे पास मोटर, गाड़ी या बंगला नहीं, हो, मगर मैं तुम्हें बेशुमार प्यार ज़रूर दूँगा, भले ही मैं तुम्हें रोज़ होटल में खाना खाने या हर हफ्ते मूवी देखने ना ले जा सकूँ, मगर मैं तुम्हे घर पे ही हर रविवार को अपने हाथो से बना हुआ, होटल जैसा खाना ज़रूर खिालूँगा, और हर हफ्ते पॉपकॉर्न के साथ घर में हम दोनों मूवी देखेँगे, मैं  तुमको शायद रईसों जैसे ऐसो-आराम तो नहीं मगर प्यार इतना दूंँगा की तुम्हें वो सब याद नहि आएगा। " मैं ये सोचकर घर से निकला था, कि आज चाहे कुछ भी हो जाए मैं तुम को ये बात बता कर ही रहूँगा। मगर ये क्या हो गया ? 

     इन्ही सब सपनो को साथ लेकर मैं बाइक पे उस रोज़ उसे मिलने जा रहा था, मगर उसी दिन एक कार, पीछे से  मुझे टक्कर लगाकर चली गई, मेरी बाइक के साथ मैं  घसीटते हुए दूसरी ओर जा गिरा, कुछ लोग  मुझे अस्पताल ले गए, मेरा पैर का facture हो गया।  मुझे ना चाहने पर भी १ महीने तक आराम करना पड़ा। मगर मेरा मन तो अब भी सीमा के पास जाकर उस के सामने अपने प्यार का इज़हार करने को चाह रहा था। मैं बस जल्दी ठीक होने का इंतज़ार कर रहा था।  देखते ही देखते १ महीना बित गया। मेरे पैर का facture ठीक होने के बाद मैं तुरंत ही अपनी बाइक पे सीमा से मिलने निकल पड़ा। मगर उसकी गली के बाहर मैंने देखा, कि बहोत सी रौशनी कर रखी है, किसी की बारात आई लगती थी, जैसे किसी की शादी हो, मेरा दिल ज़ोरो से धड़कने लगा, कि " कहीं मैं जो सोच रहा हूँ, वो सही तो नहीं ? कहीं सीमा की आज शादी तो नहीं हो रही ?"                 वहांँ का ऐसा माहौल देख मेरे कदम रुक गए, आगे बढे ही नहीं। वहांँ से जाते हुए, एक आदमी से मैंने पूछा, कि "भाई यहाँ आज किस की शादी हो रही है?"

      तब उस आदमी ने बताया, कि " किशोरीलाल की बेटी की शादी हो रही है, क्या आप को नहीं पता ? किशोरीलाल बहोत खुश है, बहुत अच्छा और बहुत  पैसेवाला दामाद जो मिला है उनको, इसलिए तो आज पुरे महोल्ले को खाने पे न्योता दिया है, इन्होने। चाहो तो तुम भी आ जाना खाने पे, बहोत मज़ेदार खाना बनाया है। में अभी खाके आया, बड़ा मज़ा आ गया यार !" इतना बताकर वो आदमी चला गया। मैंने सोचा, मैंने आने में थोड़ी देर कर दी। ' आज तू दुल्हन तो बनेगी, लेकिन मेरी नहीं किसी और की।" खैर ! मुझे तुझ से कोई फरियाद नहीं, फरियाद सिर्फ और सिर्फ उस उपरवाले से है, जिसने मेरा सपना किसी और को दे दिया। मगर तू चाहे जहाँ भी रहे जिस के साथ भी रहे खुश रहे, यही मेरी दुआ  है। 

       ऐसा सोच मैं वहांँ से अपनी बाइक पे घर चला गया।  अपने आपको कुछ दिन तक एक कमरे में बंद कर दिया, जैसे की अब जीने की कोई तमन्ना ही ना रही थी। फिर कुछ दिन बाद अपने आप को सँभालते हुए मैंने फिर से अपनी ज़िंदगी शुरू कर दी।  मुझे अच्छी  कंपनी में फोटोग्राफी का काम मिल गया था, बॉस को मेरा काम बहुत पसंद आता था, और उनका कोई बेटा नहीं था, वह मुझे ही अपना बेटा मानते थे, इसलिए तो बॉस ने वो कंपनी ही मेरे नाम कर दी। अब मेरी एक बहोत बड़ी गाड़ी है, बंगला है, बस वो नहीं है, जिसे मैं अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था। 

        आज सुबह में ऑफिस जाने के लिए घर से जल्दी ही निकल गया, ऑफिस जाते ही मैंने सब को बता दिया कि कोई आज मुझे डिस्टर्ब ना करे। और मैंने अपने आप को उसी ऑफिस  में फिर से एक बार बंद कर दिया।  क्यूंँकि आज सीमा की शादी को ३ साल हो गए थे, मगर मेरी ज़िंदगी अभी भी वही रुकी हुई थी, जहाँ मैं उसे छोड़ के आया था। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया, मैंने कहाँ, मुझे आज कोई डिस्टर्ब ना करे, फिर भी कोई लड़की हाथो में पर्स और फाइल लिए ज़बरदस्ती ऑफिस के कमरे में चली आई।

      मैंने उसे पलटकर देखा तो एक नज़र देखता ही रह गया।  हाँ, वो सीमा ही थी, जिसके बारे में मैं कुछ देर पहले सोच रहा था। " मगर वो आज यहाँ, कैसे, क्यूँ, इतने सालो  बाद, अचनाक, ऐसे कई सवाल मेरे मन में घूम रहे थे।" में उसे एक नज़र देखे ही जा रहा था। 

       थोड़ी देर बाद उसने मुझे आवाज़ लगाई " sir " वो आपके आदमी मुझे अंदर नहीं आने दे रहे थे, और आज के दिन मेरी आप के साथ मीटिंग है, जो शायद आप भूल गए है, मगर मैं बड़ी दूर से आ रही हूँ, इसलिए आज मैं  आप से मिले बिना कैसे जा सकती ? इसिलए बिना इजाज़त के आपके कमरे में चली आई, हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा sir, और क्या आपको याद नहीं, की आप ही ने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया था ? "

      थोड़ा याद करने के बाद मुझे याद आया, की मैंने ही आज का इंटरव्यू किसी सीमा नाम की लड़की को देने के लिए रखा था, मैंने अपने आप को सँभालते हुए, कहा, जी "हांँ, में भूल गया था, और मैंने ही अपने आदमी को किसी को अंदर नहीं आने के लिए कहा था, और इसीलिए वह आप को रोके रखा था, मगर कोई बात नहीं,  आप बैठिये।" कहते हुए में अपनी कुर्शी पे बैठ गया। 

       मैंने सीमा का इंटरव्यू लेना शुरू किया। वो अपना प्रोजेक्ट्स और फोटो दिखाए जा रही थी, मगर मेरा ध्यान तो उसकी बातो पे कम उस पे ज़्यादा जा रहा था, मुझे यकींन  ही नहीं हो रहा था, कि इतने सालो बाद आज वो मेरे सामने है, मैं बस उसे देखे ही जा रहा था।  थोड़ी देर बाद सीमा ने चुटकी बजाते हुए फिर से मुझे आवाज़ लगाई, " sir sir ". मैंने अपने आप को सँभालते हुए, कहा, हाँ, अब आप जा सकती हो, मेरा जो भी फैसला होगा, वो मैं आपको इ-मेल कर दूँगा। सीमा ने Thank you कहा, और वहांँ से चली गइ। 

        मैं उसे जाते हुए देख रहा था, उसने आज वाइट कुर्ती और जीन्स पहनी थी, कानो में छोटी सी बाली और होथो में सिर्फ घडी पहनी थी, उसने नाही अपनी माँग में सिंदूर और नाही गले में मंगरसूत्र पहना था, तभी बहार से clark ने आके मेरे टेबल पे कॉफ़ी ऱखते हुए कहा, की sir आपकी कॉफ़ी और वो मेडम जो अभी आई थी, वो मेडम आपके लिए ये एक चिठ्ठी देकर गई है, उसने बोला की साहब को दे देना।  मैंने clark से कहा, ठीक है, तुम जाओ, clark दरवाज़ा बंध करके चला जाता है। clark के जाने के बाद मैंने वो चिठ्ठी खोल के पढ़ी, जिस में लिखा था, कि  

      " शायद तुम्हे नहीं पता होगा, मगर मुझे पता है, की कॉलेज के पहले ही दिन से तुम मुझे चुपके से देखा करते थे, क्लास में भी मेरे पीछेवाली सीट पे बैठ मेरे बालो को अपने हाथो से सराहा करते थे, कैंटीन में बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठ मेरा इंतज़ार किया करते थे, कभी कभी मेरे सामने से गुज़र जाया करते थे, तुम को लगा की मुझे ये सब पता नहीं, मगर मुझे ये सब पहले से पता है, क्यूंँकि मैं भी तुम को चुपके से देखा करती थी, और शायद ये तुम को पता नहीं, मैंने तुम्हारा बहोत इंतज़ार किया, मगर तुम कभी सामने से नहीं आए, नाही कॉलेज के टाइम और नाही कॉलेज के बाद। आज भी तुम मुझ को पहचानकर भी अनजान बने रहे, ना जाने तुम ऐसे क्यों हो ? इसीलिए मैंने सोचा, कि आज तो मुझे  वो बात बतानी ही है, जो मैंने इतने साल तुम से छुपा के रखी थी, वो बात ये की मैं भी तुम से बहुत प्यार करती हूँ, मगर कभी तुम से कहा नहीं, अब मैं किसी और की हो जाऊँ  उस से पहले अगर तुझे मेरा साथ मंज़ूर है, तो कल शाम ठीक ५ बजे  कॉफ़ी शॉप पे मिलने आ जाना।"  

                                                                  सीमा 

         उसकी चिठ्ठी पढ़ के मेरी समज में नहीं आया की मुझे खुश होना चाहिए या नहीं, क्यूंँकि जहाँ तक मुझे पता है, वहांँ तक उसकी तो शादी 3 साल पहले आज ही के दिन हो गइ थी, फिर उसने ऐसा क्यों कहा, और मुझे कॉफ़ी  शॉप पे क्यों बुलाया ? पहले तो मेरा मन नहीं किया,  उससे मिलने जाने का, फ़िर मैंने सोचा, की एक बार मिलने में क्या जाता है, शायद कोई और भी ज़रूरी बात हो, ये सोच दूसरे दिन वक़्त पे मैं उसे मिलने कॉफ़ी शॉप पहुँच गया। 

             सीमा पहले से ही वहांँ आ गइ थी। आज वो बहोत खूबसूरत लग रही थी, उसने इशारे से मुझे बैठने को कहा, मैं कुर्सी पे बैठ गया, फिर क्या ? हम दोनोंने कुछ देर तक चुपी  लगा रखी थी, हम दोनों एकदूसरे को देखे ही जा रहे थे, फिर मैंने कहा, की सीमा तुम्हारी तो शादी 3 साल पहले  हो गइ  है, तो फिर तुम अब भी मुझ से मिलना क्यों चाहती हो ? क्या कुछ हुआ क्या ? तुम्हारा अपने पति से कुछ झगड़ा हुआ क्या ? सीमा को ये सुन बड़ा अजीब लगा, उसने हस्ते हुए  कहा, की शादी और मेरी ? ये आपको किसने कहाँ ? वो भी 3 साल पहले ? नहीं तो। लेकिन हाँ..., 3 साल पहले मेरी बड़ी बहिन नव्या की शादी ज़रूर हुइ थी, मगर ये तुम को कैसे पता चला ? और तुम को ऐसा क्यों लगा की उस दिन मेरी ही शादी हो रही थी ? तब मैंने सीमा को उस दिन के बारे में सब कुछ बता दिया।   

     मेरी बात सुनकर सीमा ज़ोर-ज़ोर से हसने लगी, उसको हस्ता देख मैं भी अपनी हसी रोक ना सका, और हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से हसने लगे, कॉफ़ी शॉप में सब हमें देखे जा रहे थे। फिर सीमा ने हस्ते हुए कहा, कि "एक बार उस आदमी से उस लड़की का नाम भी तो पूछ लेते, तो इतने साल अकेला नहीं रहना पड़ता। उसकी बात सुन फिर से हम दोनों हसने लगे। और हम दोनों ने अपने अपने प्यार का इज़हार किया, और कुछ ही दिनों में माँ और पापा की रज़ामंदी से हम दोनों ने शादी कर ली। 

         शादी की पहली रात भी हम उस दिन को याद कर हसे जा रहे थे, की कैसे मैंने उस दिन बिना कुछ जाने समजे वो जो शादी हो रही थी, वो सीमा की ही शादी हो रही है, मानकर वहांँ से चला गया था। 

    अगर आज सीमा इंटरव्यू के लिए यहाँ नहीं आती, तो शायद आज भी मैं इसी ग़लतफहमी में रहता की सीमा की शादी किसी और के साथ हो गई है। और में यूँही तनहा रह जाता।  

      मगर खैर ! की आज वो मेरे पास मेरे करीब है। मैंने आज भगवान को धन्यवाद किया, अपना सपना मुझे वापिस देने के लिए।  

     तो दोस्तों, ज़िंदगी में कभी कभी ऐसा भी होता है, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाए, अपने मन की बात कभी मन में नहीं रखनी चाहिए, जो बात आप के दिल में है, उसे बता देने में ही समझदारी है। इसलिए बिना पूरा सच जाने समजे कभी कोई फैसला ना ले, वार्ना छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से हम बहुत कुछ खो भी सकते है। 

                                                            Bela... 

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