तूटी चप्पल, फूटी किस्मत !
" हाय रे मेरी किस्मत, तूटी चप्पल, फूटी किस्मत ! "
जब में है रुपैया एक, हाय रे मेरी फूटी किस्मत,
मगर... किसी के पास तो वो भी नहीं।
बारिश में मेरी झोपड़ी की छत से टपके पानी, हाय रे मेरी फूटी किस्मत,
मगर... कुछ के पास तो झोपड़ी भी नहीं।
गरमियों में पड़ गए पैरों में छाले, हाय रे मेरी तूटी चप्पल, फूटी किस्मत, मगर... कुछ के पास तो टूटी चप्पल भी नहीं,
आज किस्मत से मिली रोटी एक, पर खानेवाले दो, हाय रे मेरी फूटी किस्मत, मगर... कुछ को तो आज रोटी भी किस्मत में नहीं।
आज खुश था में सरदियो में मिली चद्दर, पर चद्दर भी है फटी हुई, हाय रे मेरी फूटी किस्मत, मगर... किसी को तो फटी चद्दर भी किस्मत में नहीं।
फिर मैंने सोचा, मंदिर जाके पुछू उस भगवान से,
तेरे दर पर रोज़ में आता, फिर भी क्यूँ है फूटी किस्मत मेरी...?
तेरे सामने रोज़ सिर झुकाता, फिर भी क्यूँ है फूटी किस्मत मेरी ?
मंदिर जाके देखा तो मंदिर भी था आज बंद,
किस से करता फरियाद अपनी ?
हाय रे मेरी फूटी किस्मत !
मैंने सोचा,
शायद भगवान भी है नाराज़ मुझ से, या फ़िर
शायद भगवान के पास भी जवाब नहीं,
क्यूँ है फूटी किस्मत मेरी ?😐
Bela...
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👏👏👏❤
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