डर भाग-6
तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, कि माया २ साल बाद आज पहली बार अपने कमरे से बाहरआई थी, ये देख अजय और लक्ष्मी को लगता है, की बाबाजी की जड़ीबूटीयों का असर माया पे हो रहा है, तभी माया ठीक हो रही थी। माया को अपने कमरे के बाहर देख कर अजय को याद आता है, कि माया और वो दोनों छुपम-छुपाई खेल रहे थे, तब माया ने कैसी शरारत की थी, और एक दूसरे के पीछे भागते हुए दोनों ज़ोर-ज़ोर से हस पड़ते है, अजय माया-माया कहके आवाज़ लगाता है, अब आगे...
( अजय कोर्ट में जाते हुए देखता है, कि रामलाल और सुनीता पीछे कुर्सी पे बैढे हुए थे। उनकी आँखों में गभराहट सी थी, सुनीता के बाबा इशारे से अजय के सामने हाथ जोड़कर जैसे इंसाफ के लिए मिन्नते मांँग रहे थे। अजय ने इशारे से उनको धीरज रखने को कहा। सामने जज साहब भी आ गए थे और वो लफंगा दिनेश उसके दोस्त और जमींदार साहब भी आ गए थे। अजय कुछ सबूत इक्क्ठे करने में लगा था, इसलिए उसे आते-आते थोड़ी देर हो गई थी। अजय को देख जज साहबने कहा। )
जज : मिस्टर अजय, अगली बार वक़त पे आना और अदालत के वक़्त का ध्यान रखना । केस की कारवाई शुरू की जाए।
जगमोहन दास : ( जो दिनेश के वकील है और दिनेश के बचाव पक्ष में कुछ कहना चाहते है। अपनी कुर्सी पे से खड़े होते हुए, )
मी लॉर्ड, मिस सुनीता ने मेरे मुवकिल पर ये इल्ज़ाम लगाया है, कि वो जब बस स्टॉप पे खड़ी थी, तब दिनेश उसके चेहरे पे तेज़ाब डाल के चला गया। लेकिन मेरा मुवकिल दिनेश जो बिलकुल बेकुसूर है, जिसे ये लड़की ना जाने क्यों उसका दोषी समज़कर यहाँ अदालत में घसीट ले आई है। बल्कि जिस दिन और समय, ये हादसा हुआ था, उस समय दिनेश अपने कॉलेजे में एग्जाम दे रहा था।
( एग्जाम की रिपोर्ट जज साहब को दिखाते हुए )
ये रहा उसका कॉलेज का रिपोर्ट। मी लॉर्ड, इस तरह दिनेश पे तो कोई केस बनता ही नही है। सुनीता को ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है, इसलिए दिनेश पे ऐसा इलज़ाम लगा रही है, जबकि गुनेगार कोई और ही है और उसकी जाँच करवाई जाए ताकि सही अपराधी को सही सजा मिल पाए। बस और मुझे कुछ नहीं कहना है, मी लाॅर्ड।
जज : ( अजय की ओर देखते हुए,)
इस बारे में आपको कुछ कहना है, मिस्टर अजय प्रताप ?
अजय : ( अपनी कुर्सि से खड़े होते हुए ) अब मैं क्या कहुँ मी लॉर्ड ? जबकि मिस्टर जगमोहन दास ने दिनेश के बचाव के लिए कॉलेज के झूठे कागज़ सुबूत के तौर पे पेश कर ही दिए है और कानून अपना इंसाफ सुबूत के तौर पे ही देखेगा, मेरी या किसी और की कही सुनी बातो पे क्यों गौर करेगा, इसलिए हमें किसी बेगुनाह को कुसूरवार के तौर पे ढूंँढना होगा। आज से पहले भी यही तो होता आ रहा है और आज भी यही होगा। क्या कानून किसी के लिए बदल सकता है ?
जज : आप क्या कहना चाह रहे है, साफ-साफ कहिए। यु अदालत को गुमराह करने की कोशिश मत कीजिए और नाहीं अदालत का वक़्त जाया करे।
( अजय ने सुनिता के दोस्त को, बस स्टॉप पे खड़े लोग और अस्पताल ले जाने वाले सब को अदालत में बुलाया था। सब से पूछा गया मगर सब ने दिनेश के डर से झूठ बोला और पहचान ने से इंकार कर दिया। अजय को तो पता ही था की अदालत में ऐसा ही होने वाला है )
जगमोहन दास : मी लार्ड, मिस्टर अजय प्रताप के पास दिनेश के कुसुरवार होने का कोई सुबूत नहीं है तभी तो ऐसी उलटी-सुल्टी बाते कर रहे है। ( अजय की और घूमते हुए )
अगर आप के पास कोई सुबूत और गवाह नहीं है तो सीधे सीधे अदालत को बता दीजिए, ताकि हमारा आपका और अदालत का वक़्त झाया ना हो।
अजय : हाँ, तो हो गया फैंसला, सुनीता को कह दिया जाए, कि वो अपना मुज़रिम खुद ही ढूंँढ ले और अपने साथ हुए अन्याय का फैंसला वो खुद ही कर ले।
जज : आप फिर से अदालत को गुमराह करने की कोशिश कर रहे है। साफ-साफ बताइए आपको क्या कहना है ?
अजय : अगर आप जानना ही चाहते है तो सुनिए, दिनेश अपनी कॉलेज का एक आवारा और बद्तमीज़ लड़का है , जो लड़की को रोज़ किसी न किसी तरह से छेड़ता और परेशान करता रहता है। सारा कॉलेज उस से तंग आ चूका है, मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है और खुद दिनेश को धमकी भी दी थी ऐसा दुबारा ना करने की, मगर उस में कोई सुधार नहीं है। मैं सुनीता से दरखास्त करना चाहूंँगा, कि उसके साथ क्या हुआ है, वो खुद अदालत को अपने लब्ज़ो में बताए।
जज : ( सुनीता से ) तुम्हें जो कुछ भी कहना है, तुम कह सकती हो, तुम्हारे साथ ये हादसा कब और कैसे हुआ।?
( अजय ने आँखों के इशारे से सुनीता को सब सच बोलने को कहा )
सुनीता : जी जज साहेब, वो बात ये है की
( सुनीता ने अपनी पूरी बात सब के सामने जज को बता दी )
जगमोहन दास : ( सुनीता से ) मगर वो लड़का दिनेश ही है ऐसा तुम कैसे कह सकती हो ? क्यूंँकि जिस लड़के ने तुम्हारे चेहरे पर एसिड डाला उसका चेहरा ढका हुआ था।
अजय : एक मिनिट रुकिए जगमोहन दास, आपको कैसे पता चला की उस लड़के का चेहरा ढका हुआ था, क्योंकि अभी तक सुनीता ने ये बात अदालत में कही भी नहीं है। मतलब की आप उस लड़के को जानते है।
जगमोहन दास : ( थोड़ा गभराते हुए )
नहीं-नहीं, मैं भला कैसे जानता हूँ उसे ? वो तो मैंने अंदाज़ा लगाया की कोई ऐसे ही थोड़े खुल्लेआम ऐसी हरकत करेगा ?
अजय : ओह्ह , तो ये बात है। आपके कहने का मतलब है की अगर कोई किसी पे तेज़ाब डालेगा तो पहले अपना चेहरा ढक लेगा, उसके बाद ही वो ऐसा करे ताकि उसे कोई पहचान न पाए, गुड आईडिया मिस्टर जगमोहन दासजी । कही आपने ही तो ये आईडिया दिनेश को नहीं दिया था ? ताकि उसका जुर्म साबित ना हो पाए अदालत में, और आप तो अच्छी तरह जानते है, कि कानून सुबूतों पे ही अपना फैंसला सुनाती है।
जगमोहन दास : आप मुझे क्यों घसीट रहे है ? इन सब बातो में, मैं भला ऐसा क्यों करूँगा ? ( डरते हुए )
अजय : तो मी लॉर्ड ,लड़के का चेहरा ढका हुआ होने से अब तक ये साबित नहीं हुआ की लड़का दिनेश ही था या कोई और ? सुनीता का कहना है की उस लड़के ने जो हाथो में हैंडबैण्ड पहनी थी वैसी ही हैंडबैण्ड दिनेश भी पेहनता है। और आज भी उसके हाथो में वही है। मगर हमारे मुवकिल मिस्टर जगमोहन दास बताये इस से पहले मैं बता देता हूँ, कि ऐसे हैंडबैण्ड तो बाजार में बहुत मिलते है और आज कल के सारे लड़के ये पहनते ही है। मगर मेरे पास अभी भी एक और सुबूत है, जो एक पल में ये साबित कर देगा की गुनेगार दिनेश ही है। क्या हर औरत को अपने साथ हुए अन्याय के लिए इतना लड़ना पड़ता है ? एक नहीं बल्कि बार-बार बेइज़्ज़त होना पड़ता है। क्या औरत बिना डरे कही भी आ-जा नहीं सकती ? क्यों हर औरत को इतनी परेशानी और शर्मिदगी का सामना करना पड़ता है। घर में हो या घर के बाहर, स्कूल हो या कॉलेज, ऑफिस में हो या पार्टी में हर वक़्त किसी न किसी की बुरी नज़र उस पे लगी रहती है। हर वक़्त औरत ये डर के साथ जीती है, कि कही उसके साथ कोई हादसा ना हो जाए। क्यों हर लड़की को इंसाफ के लिए लड़ना पड़ता है ? उसका रेप होने के बाद अदालत में भी उसे सब के बिच नंगा किया जाता है। उसने कहा छुआ ? कैसे छूआ ? कैसे कपडे पहने थे ? अकेले क्यों गई थी ? आपका इरादा क्या था ? आपने भागने की कोशिश क्यों नहीं की ? आप क्यों नहीं चिल्लाई ? किसी को मदद के लिए क्यों नहीं बुलाया ? ऐसे बेबुनियादी सवाल क्यों किऐ जाते है औरत से ? जिसका जवाब देना तो क्या उस पल के बारे में वो सोच के भी डर जाती है। क्यों उसके एक बार बोलने पर नहीं माना जाता की गुनेगार वही है। हर बार सबुत सबुत और सबूत का होना ज़रूरी है क्या ? क्यों लड़की की आँखों से और उसके ज़ुबान से पता नहीं चल जाता, कि वो सच बोल रही है या झूठ ? एक लड़की के जले हुए चेहरे से क्या पता नहीं चलता की वो सच बोल रही है या झूठ ? ऐसी हालत में कोई लड़की क्यों झूठ बोलेगी ? और उसे क्या मिलेगा झूठ बोल कर ? वो अंदर ही अंदर कितना घुट-घुट के जी रही होगी। एक औरत जिसको अपना चेहरा जान से भी प्यारा होता है, वो ये कैसे बर्दाश्त कर सकेगी ? मी लाॅर्ड, आपसे और यहाँ पे आए हर इंसान से मैं पूछता हूँ, कि क्या कल को अगर आपके घर में किसी के भी साथ ऐसा हादसा हो, आपकी ही माँ, बेटी या बहन, भाभी के साथ अगर ये हादसा हो तब क्या आपको गुस्सा नहीं आएगा ?
( पूरी अदालत में अजय की बात सुनकर सन्नाटा छा जाता है।)
क्या आपका दिल नहीं करेगा, कि उसी वक़्त उस आदमी के चेहरे पे भी तेज़ाब की बोतल डाल दूँ।
( बोलते हुए अजय अपनी बैग में रखी बोतल निकाल कर दिनेश के चेहरे के पास लेकर जाता है और )
जल्दी-जल्दी में दिनेश से पूछता है, कि " क्या तूने उस दिन सुनीता से बदला लेने के लिए उसके चेहरे पे तेज़ाब डाला था या नहीं ? "
( दिनेश को गभराहट में लगा, कि अजय के हाथो में तेज़ाब की बोतल है और वो गुस्से में मेरे ही चेहरे पे डालने जा रहा है, सो उसने बिना सोचे सच बोल दिया की )
दिनेश : हांँ, हाँ, मैंने ही सुनीता के चेहरे पे तेज़ाब डाला था। मुझ पे तेज़ाब मत डाल ना साहब।
( पूरी अदालत में दिनेश के दिए गए बयांन से सनाट्टा सा छा जाता है। )
सुनीता, रामलाल, जगमोहन दास, जज और बाकि सब लोग ये देखते ही रह गए और दिनेश ने खुद अपनी ज़ुबान से सब के सामने अदालत में अपना जुर्म कबुल कर लिया। अजय ने लम्बी गहरी सांँस ली और सब के सामने उसी बोतल से पानी पीने लगा। सब उसको देखते ही रह गए क्योंकि अजय की बातों से सबको लगा था, कि उस की बोतल में सच में तेज़ाब है। )
अजय ने अपनी बोतल दिखाते हुए कहा, कि डरिए मत। इस बोतल में तेज़ाब नहीं सिर्फ पानी था। ( अदालत में खड़े सब लोग तालिया बजाने लगे )
जज : मिस्टर अजय में आपकी बातो से सेहमत हूँ। अदालत के भी कुछ कायदे कानून होते है उसी को मद्देनज़र रखते हुए आज अदालत ये फैसला सुनाती है की, दिनेश ने ही सुनीता के चेहरे पे तेज़ाब डाल कर बहुत बड़ा गुनाह किया है, तो सजा के तौर पे दिनेश को सुनीता के परिवार को ५ लाख जुर्माना देना पड़ेगा, ताकि वो अपना इलाज अच्छे से कर सके और फ़िर से अपनी ज़िंदगी शुरु कर सके और दिनेश को पूरी उम्र कालकोठरी में कैद रहने की सजा सुनाई जाती है, ताकि लोग ये देख कर सिख सके, कि ऐसा जुर्म करने वालो की क्या हालत होती है।
( जज का ये फैसला सुनकर सब लोग खुश होके नाचने लगे। सुनीता अजय के पैरो में गिरती है )
सुनीता : वकील साहब, आपका ये अहसान मैं कैसे चुकाऊँगी ? बहुत-बहुत शुक्रिया साहब।
( सुनीता को उठाते हुए )
अजय : इस में धन्यवाद की कोई ज़रूरत नहीं है, मैंने इसीलिए तो ये काला कोट पहना है, ताकि मैं ऐसे काळे लोगों को काल कोठरी में डाल सकूँ। अब तुम अच्छे से अपना इलाज कराना और पढ़ लिख कर डॉक्टर बनना । अब तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है।
सुनीता : बहुत-बहुत शुक्रिया साहब।
तो दोस्तों, क्या आपको लगता है की जज ने सही फैसला सुनाया ?
अगला भाग क्रमशः ।।
Bela...
https://belablogs2021.blogspot.com/2021/11/blog-post_24.html
https://www.instagram.com/bela.puniwala/



Comments
Post a Comment