आख़िरी चाबी

अनकही बातें

आख़िरी चाबी

सविता जी आज बहुत दिनों बाद अपने पुराने घर के सामने खड़ी थीं।
वही घर, जहाँ उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ारी थी। पति के जाने के बाद बेटा रोहन उन्हें अपने साथ शहर ले गया था। उम्र और अकेलेपन को देखते हुए उन्होंने भी चुपचाप अपना घर छोड़ दिया था।
लेकिन आज रोहन उस पुराने घर को बेचने आया था।
घर की सफ़ाई करते हुए सविता जी की नज़र एक पुरानी लकड़ी की अलमारी पर पड़ी। अलमारी के नीचे बने छोटे से खाने में उन्हें एक पुरानी चाबी मिली।
वह चाबी देखते ही उनकी आँखें ठहर गईं।
"यह तो..." उन्होंने धीरे से कहा।
रोहन ने पूछा, "क्या हुआ माँ?"
सविता जी ने चाबी को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।
"कुछ नहीं।"
रोहन ने घर की सफ़ाई जारी रखी, लेकिन सविता जी का मन कहीं और चला गया था।
यह चाबी उनके पति महेश जी ने उन्हें शादी के कुछ साल बाद दी थी।
उस दिन उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, "सविता, इसे संभालकर रखना। कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसी चीज़ें होती हैं, जिनका सच सही समय आने पर ही सामने आता है।"
सविता जी ने बहुत पूछा था, लेकिन महेश जी ने कभी नहीं बताया कि चाबी किसकी है।
सालों तक वह चाबी उनकी साड़ी के पुराने संदूक में पड़ी रही। फिर एक दिन संदूक खोला तो चाबी गायब थी। उन्होंने समझा शायद कहीं गिर गई होगी।
आज इतने वर्षों बाद वही चाबी उन्हें फिर मिल गई थी।
सविता जी ने घर के हर कमरे को ध्यान से देखा।
तभी उनकी नज़र सीढ़ियों के नीचे बने एक छोटे से पुराने कमरे पर पड़ी। उस कमरे पर हमेशा ताला लगा रहता था।
वह आगे बढ़ीं।
ताले में चाबी लगाई।
चाबी घूम गई।
दरवाज़ा खुलते ही धूल और बंद पड़े कमरे की गंध बाहर आई।
रोहन भी पीछे-पीछे आ गया।
कमरे के अंदर एक पुराना लोहे का संदूक रखा था।
सविता जी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उन्होंने संदूक खोला।
अंदर कुछ पुराने कागज़, एक डायरी और कई लिफ़ाफ़े रखे थे।
सबसे ऊपर एक लिफ़ाफ़े पर लिखा था—
"सविता के लिए। जब उसे लगे कि मैंने उससे कुछ छुपाया था।"
सविता जी के हाथ काँपने लगे।
उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर महेश जी का एक पत्र था।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
"सविता,
तुम हमेशा मुझसे पूछती रही कि मैंने तुम्हें यह चाबी क्यों दी थी। शायद मैं कभी तुम्हें सच बता नहीं पाया।
शादी के बाद जब तुम्हारे मायके से तुम्हें हिस्सा मिलने वाला था, तब तुम्हारे भाई ने तुम्हें धोखा देने की कोशिश की थी। उसने कुछ कागज़ों पर तुम्हारे हस्ताक्षर करवाकर तुम्हारा हिस्सा अपने नाम करने की कोशिश की थी। मुझे समय रहते पता चल गया था। मैंने सारे असली कागज़ यहाँ सुरक्षित रख दिए थे।
मैं तुम्हें बताना चाहता था, लेकिन तुम्हारे भाई के साथ तुम्हारा रिश्ता टूट जाए, यह मैं नहीं चाहता था। इसलिए मैंने तुम्हें कभी सच नहीं बताया।
तुम्हारे पिता की आख़िरी निशानी तुम्हारे पास सुरक्षित रहे, यही मेरी आख़िरी इच्छा थी।
और हाँ... इस संदूक में सिर्फ़ तुम्हारे मायके की संपत्ति के कागज़ नहीं हैं। हमारे बेटे रोहन की पढ़ाई और भविष्य के लिए मैंने जो कुछ बचाया था, उसका हिसाब भी है।
मैंने हमेशा तुमसे कहा कि मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाया। लेकिन सच यह है कि मेरी पूरी ज़िंदगी तुम्हारे नाम थी।
अगर कभी यह चाबी तुम्हारे हाथ लगे, तो समझना... अब तुम्हें मेरे किसी राज़ का इंतज़ार नहीं करना।
क्योंकि यह मेरी आख़िरी चाबी है।
तुम्हारा,
महेश।"
पत्र पढ़ते-पढ़ते सविता जी की आँखों से आँसू बहने लगे।
रोहन चुपचाप अपनी माँ को देख रहा था।
कुछ देर बाद उसने पूछा, "माँ... पापा ने आपसे इतना सब छुपाया था?"
सविता जी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "नहीं बेटा... उन्होंने मुझसे कुछ छुपाया नहीं था। उन्होंने बस मेरी ज़िंदगी की कुछ परेशानियाँ मुझसे छुपाकर रखी थीं।"
रोहन की नज़र संदूक में रखे कागज़ों पर गई।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके पिता, जो हमेशा कम बोलते थे, उन्होंने परिवार के लिए कितना कुछ किया था।
रोहन ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"माँ, हम यह घर नहीं बेचेंगे।"
सविता जी ने उसकी ओर देखा।
"क्यों?"
रोहन मुस्कुराया।
"क्योंकि कुछ घर सिर्फ़ ईंटों से नहीं बने होते। उनमें किसी की पूरी ज़िंदगी छुपी होती है।"
सविता जी ने आख़िरी बार उस चाबी को देखा।
उन्होंने उसे अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया।
आज उन्हें समझ आया था कि वह चाबी किसी ताले की नहीं थी।
वह उनके पति के दिल में छुपी उन अनकही बातों की चाबी थी, जिन्हें वह अपने साथ लेकर चले गए थे।
और जाते-जाते...
उनकी आख़िरी चाबी सविता जी को दे गए थे।

Bela...

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