अनकही बातें
दो मिनट की देरी
शालिनी की शादी को कुछ साल हो चुके थे। उसका पति सुनील उसे प्यार तो करता था, लेकिन उसके प्यार में एक ऐसी चीज़ थी, जिसने शालिनी का जीना मुश्किल कर दिया था—शक।
शालिनी को ऑफिस से घर पहुँचने में दो मिनट देर हो जाती, तो सवाल शुरू हो जाते।
“इतनी देर क्यों हुई?”
“ऑफिस से निकलने में क्या हुआ था?”
अगर शालिनी किसी पुरुष सहकर्मी को काम के सिलसिले में फोन कर लेती, तो भी सवाल।
“उसे फोन करने की क्या जरूरत थी?”
कभी ऑनलाइन सामान देने कोई डिलीवरी बॉय घर आ जाता, तो सुनील पूछता—
“वो लड़का घर क्यों आया था?”
“तुमने उसे अंदर क्यों बुलाया?”
शालिनी कुछ महीनों तक हर सवाल का जवाब देती रही। हर बार सफाई देती रही। हर बार खुद को सही साबित करने की कोशिश करती रही।
लेकिन धीरे-धीरे वह थकने लगी थी।
उसे लगने लगा था कि वह इस घर में पत्नी बनकर नहीं, बल्कि हर वक्त कटघरे में खड़ी किसी आरोपी की तरह रह रही है।
एक दिन ऑफिस से लौटते हुए शालिनी को फिर थोड़ी देर हो गई।
सुनील ने पहले ऑफिस में फोन किया। फिर शालिनी के घर फोन किया। फिर उसकी सहेली को फोन करके पूछा कि शालिनी उसके साथ तो नहीं है।
उस दिन शालिनी के भीतर महीनों से दबा हुआ गुस्सा आखिरकार बाहर आ गया।
घर पहुँचते ही वह सुनील पर बरस पड़ी।
“बस! अब और नहीं!”
सुनील उसे हैरानी से देखने लगा।
शालिनी की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में डर नहीं था।
“हर दिन तुम्हारे सवालों का जवाब देते-देते मैं थक गई हूँ। मेरी जिंदगी में हर चीज़ का हिसाब चाहिए तुम्हें। मैं कहाँ गई, किससे बात की, किसे फोन किया, घर आने में दो मिनट देर क्यों हुई… आखिर क्यों?”
वह कुछ पल के लिए रुकी, फिर बोली—
“आज मैं तुमसे एक बात साफ कह रही हूँ। अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है, तो मुझ पर भरोसा करना सीखो। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, तुम्हारी कैदी नहीं।”
सुनील चुप रहा।
उस रात पहली बार शालिनी ने अपने मन की सारी बातें कह दी थीं।
कुछ देर बाद सुनील ने धीरे से कहा—
“ठीक है… अब तुम्हें किसी बात का जवाब देने की जरूरत नहीं होगी।”
शालिनी ने उसकी तरफ देखा।
उस दिन के बाद सचमुच बहुत कुछ बदल गया।
अब शालिनी को कहीं से आने में देर हो जाती, तो सुनील खुद परेशान होने के बजाय उसके लिए पानी रख देता और खुद अपने माथे पर बर्फ रख लेता।
अगर शालिनी किसी से फोन पर बात करती, तो सुनील अपनी आँखें और कान बंद करने का नाटक करता।
शालिनी उसे देखकर धीरे से मुस्कुरा देती।
और फिर तिरछी नजरों से अपने पति को देखते हुए कहती—
“दो मिनट की देरी हुई है… पूछोगे नहीं?”
सुनील मुस्कुराकर कहता—
“नहीं। अब भरोसा करने में दो मिनट की भी देरी नहीं होगी।”
शालिनी हँस देती।
क्योंकि उस दिन उसे सिर्फ अपने पति का बदला हुआ व्यवहार नहीं मिला था…
उसे अपनी आज़ादी वापस मिली थी।
और शायद रिश्ते में प्यार से भी ज्यादा जरूरी होता है—भरोसा।
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