वो जो खुद को भूल गई

अनकही बातें

वो जो खुद को भूल गई

देविका का एक छोटा-सा सपना था—उसे ऐसा पति मिले, जो उसे बहुत प्यार करे, उसकी छोटी-से-छोटी खुशी का ध्यान रखे और उसकी आँखों में छिपी खुशी और उदासी को बिना कहे समझ जाए।

जब उसकी शादी हुई, तो उसे लगा कि उसका सपना सच हो गया है। पति शुरू में उसका बहुत ख्याल रखते थे और देविका अपने नए घर में खुश थी।

वह एक गृहिणी थी। सुबह सबसे पहले उठना, घर के लिए नाश्ता बनाना, सास-ससुर का ध्यान रखना और पति की हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी करना—यही उसकी जिंदगी बन गई थी।

कुछ साल बाद उसके दो बच्चे हुए। अब उसकी दुनिया पति और बच्चों तक सिमट गई। परिवार की खुशी में ही वह अपनी खुशी ढूँढ़ने लगी।

पति को जो पसंद, वही बनाती। सास को जो अच्छा न लगे, वह काम छोड़ देती। बच्चों को कुछ चाहिए तो अपनी जरूरत भूलकर भी उनके लिए सब कुछ करती।

धीरे-धीरे उसे खुद भी पता नहीं चला कि कब उसने अपनी पसंद और इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया।

उसे क्या पसंद है?
वह क्या करना चाहती है?
किस चीज से उसे खुशी मिलती है?

इन सवालों के जवाब अब उसके पास नहीं थे।

वह हमेशा यही सोचती थी—

"मेरे परिवार के लिए जो अच्छा है, वही मेरे लिए भी अच्छा है।"

समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो गए। अब वे भी माँ को समझाने लगे।

"माँ, आपको थोड़ा बदलना चाहिए। अब जमाना बदल गया है।"

देविका उनकी बातें सुनकर मुस्कुरा देती। वह समझती थी कि समय बदल रहा है और शायद उसे भी थोड़ा बदलना चाहिए। वह कोशिश भी करती—कभी नए कपड़े पहनती, कभी नई चीजें सीखने की कोशिश करती।

लेकिन वह बहुत ज्यादा बदल नहीं पाती थी।

क्योंकि कहीं न कहीं उसे लगता था कि खुद को पूरी तरह बदलने का मतलब सिर्फ अपनी आदतें बदलना नहीं है, बल्कि अपनी पहचान और अपनी पर्सनेलिटी को खो देना भी है।

जिस तरह से वह बड़ी हुई थी, जिस तरह के संस्कार उसे मिले थे और जिस तरह की जिंदगी उसने इतने सालों तक जी थी, वह सब उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था।

इसलिए जब भी वह खुद को किसी और जैसा बनाने की कोशिश करती, उसके मन को वह बदलाव अच्छा नहीं लगता।

वह बदलना चाहती थी...

लेकिन खुद को खोकर नहीं।

तभी उसकी जिंदगी में एक ऐसा सच सामने आया, जिसने उसके भीतर सब कुछ हिला दिया।

उसे धीरे-धीरे पता चला कि उसका पति दूसरी महिलाओं में रुचि रखता है। कुछ बातें उसने दूसरों से सुनीं, कुछ खुद महसूस कीं और कुछ संदेशों और फोन कॉल्स ने उसके शक को सच में बदल दिया।

जिस आदमी को उसने अपनी पूरी जिंदगी दे दी थी, जिसके परिवार को उसने अपना समझकर निभाया था, वही आदमी अपनी खुशियाँ कहीं और तलाश रहा था।

देविका टूट गई।

वह चाहती तो पति से सवाल कर सकती थी। घर में हंगामा कर सकती थी। लेकिन वह चुप रही।

शायद इसलिए नहीं कि उसे दर्द नहीं था, बल्कि इसलिए कि उसने पूरी जिंदगी सहना सीखा था।

उसने उल्टा खुद को ही दोष देना शुरू कर दिया।

"शायद मुझमें ही कोई कमी है।"

एक दिन वह अपनी पुरानी सहेली से मिलने गई। बातों-बातों में उसके दिल का दर्द बाहर आ गया।

रोते हुए उसने कहा,

"मैंने अपनी पूरी जिंदगी उनके लिए जी। उनके परिवार को अपना परिवार समझा। कभी उनसे कुछ नहीं माँगा... फिर भी मैं उनके लिए काफी नहीं थी।"

सहेली ने उसका हाथ पकड़कर कहा,

"देविका, तुम्हारे पति का गलत होना तुम्हारी कमी नहीं है। तुम्हें खुद को दोष देने की जरूरत नहीं। अब तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में सोचना होगा।"

देविका ने धीरे से पूछा,

"लेकिन मैं अब क्या करूँ?"

इस सवाल का जवाब आसान नहीं था।

उस रात देविका देर तक सोचती रही। उसने अपने जीवन के पिछले तीस साल याद किए।

वह किसी की बेटी रही थी।
फिर किसी की पत्नी बनी।
किसी की बहू बनी।
फिर किसी की माँ।

लेकिन इन सब रिश्तों के बीच...

वह खुद कब देविका रही?

अगली सुबह उसने हमेशा की तरह घर का सारा काम किया। लेकिन उस दिन उसके मन में एक नया विचार था।

"मैंने पूरी जिंदगी सबके लिए जी है... अब मुझे अपने लिए भी थोड़ा जीना सीखना होगा।"

उस दिन से देविका ने अपनी जिंदगी एकदम से नहीं बदली।

न उसने घर छोड़ा।
न किसी से बदला लिया।

बस, उसने धीरे-धीरे खुद को वापस ढूँढ़ना शुरू किया।

वह अपनी सहेली से मिलने लगी। अपने लिए थोड़ा समय निकालने लगी। कभी अकेले चाय पीती, कभी मंदिर में बैठती और कभी अपनी पसंद का खाना बनाती।

धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि खुद को बदलना गलत नहीं है, लेकिन खुद को खो देना भी जरूरी नहीं।

वह अपने अंदर बदलाव लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा बदलाव नहीं चाहती थी जिसमें उसकी अपनी पहचान ही मिट जाए।

अब वह दूसरों को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को समझने के लिए बदलना चाहती थी।

देविका के मन में आज भी बहुत से सवाल थे। पति से शिकायत भी थी। लेकिन अब वह हर बात के लिए खुद को दोष नहीं देती थी।

उसे समझ आ गया था कि किसी रिश्ते को निभाने के लिए खुद को मिटा देना जरूरी नहीं होता।

उसने बहुत देर से सही, लेकिन यह सीख लिया था—

सबका ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन खुद को भूल जाना नहीं।

क्योंकि खुद को पा लेने की शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती।

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