अनकही बातें
बस, अब और नहीं
आज सुमन की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। रात से उसे तेज़ बुखार था, इसलिए वह सुबह रोज़ की तरह जल्दी उठकर रसोई का काम नहीं कर पाई।
थोड़ी देर बाद उसकी सास रसोई में पहुँचीं। आज रसोई बिल्कुल खाली थी। न चाय बनी थी, न नाश्ते की तैयारी हुई थी और न ही सफ़ाई।
उसी समय छोटी बहू पूजा ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर नीचे आई। उसने रसोई की हालत देखी और बोली,
"अरे मम्मी जी, आज क्या हो गया? बड़ी भाभी कहाँ हैं? बाहर की नौकरी भी संभालूँ या घर का काम भी करूँ? अगर भाभी को आराम करना था तो पहले बता देतीं। इतने देर तक सोती रहेंगी तो घर कैसे चलेगा?"
सास का चेहरा भी गुस्से से भर गया। उन्होंने ज़ोर से आवाज़ लगाई,
"सुमन... ओ सुमन...!"
आवाज़ सुनकर सुमन का पति सुमित नीचे आया।
"माँ, सुमन की तबीयत बहुत खराब है। उसे तेज़ बुखार है, इसलिए सो रही है।"
छोटी बहू बोली,
"अगर ऐसा था तो मुझे पहले बता देते। मैं थोड़ा जल्दी उठ जाती और काम निपटा देती। अब तो मेरे ऑफिस जाने का समय हो गया है। आज मैं बाहर से ही कुछ ऑर्डर कर दूँगी।"
इतना कहकर वह ऑफिस चली गई।
लेकिन सास का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ।
"ऐसी बात थी तो पहले बता देते। देखो, छोटी बहू बिना चाय-नाश्ते और टिफ़िन के ऑफिस चली गई। छोटे बेटे को भी बिना नाश्ते के जाना पड़ा।"
ऊपर कमरे में लेटी सुमन यह सब सुन रही थी। हर शब्द उसके दिल को चीर रहा था।
उससे रहा नहीं गया। तेज़ बुखार में भी वह किसी तरह उठी और लड़खड़ाते कदमों से नीचे आ गई। उसने सोचा, चलो कम से कम चाय ही बना दूँ।
लेकिन जैसे ही वह रसोई में पहुँची, सास फिर बोल उठीं,
"अब आने से क्या फ़ायदा? पहले आ जाती तो सब काम हो जाता। कितनी बार कहा है समय पर उठा करो। इस घर में मेरी कोई सुनता ही नहीं। आज तो मेरे कान्हाजी भी भूखे रह जाएँगे। उनकी सेवा भी नहीं हो पाई।"
आज सुमन के सब्र का बाँध टूट गया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ काँपी नहीं।
"मम्मी जी... हर बार गलती सिर्फ़ मेरी ही क्यों होती है?
क्या इसलिए कि मैं घर में पैसे कमाकर नहीं लाती?
या इसलिए कि मेरे मायके से आपको छोटी बहू जितने गहने और दहेज नहीं मिले?
या इसलिए कि मैं चुप रहती हूँ?
मैं भी इंसान हूँ... मेरा भी मन है, मेरा भी शरीर है। मुझे भी दर्द होता है। मुझे भी बुखार आता है।
लेकिन इस घर में मेरी बीमारी से ज़्यादा आपको रसोई की चिंता रहती है।
इतना ही नहीं... आपने हमेशा हमारे बच्चों में भी फ़र्क किया। छोटी बहू के बच्चों को दुलार मिला और मेरे बच्चों के हिस्से में सिर्फ़ डाँट।
जब भी मेरे बच्चे कुछ माँगते, उन्हें यही कहकर चुप करा दिया जाता कि 'तुम बड़े हो, बड़े हमेशा छोड़ना सीखते हैं।'
आख़िर कब तक?
कभी किसी को खाना पसंद नहीं आता, कभी चाय में कमी निकाल दी जाती है, कभी कपड़ों में और कभी सफ़ाई में।
क्या पूरे घर की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मेरी है?
मैं काम करने से नहीं भागती, लेकिन हर दिन अपमान सहते-सहते अब मैं थक चुकी हूँ।
आज मैंने फैसला कर लिया है...
मैं, सुमित और मेरे बच्चे इस घर से अलग रहेंगे।
हमें हमारा हिस्सा दे दीजिए।
फिर आप जानिए और इस घर की ज़िम्मेदारी।"
पूरा घर एकदम शांत हो गया।
छोटी-छोटी बातों पर ताने देने वाली सास पहली बार निरुत्तर थीं।
तभी सुमित आगे बढ़ा। उसने सुमन का हाथ थाम लिया और बोला,
"आज तक मैं सिर्फ़ बेटा बनकर जीता रहा, लेकिन पति होने का फ़र्ज़ निभाने में देर कर दी। अब और नहीं। जहाँ मेरी पत्नी का सम्मान नहीं, वहाँ मेरा भी कोई सम्मान नहीं।"
यह सुनकर छोटे बेटे और छोटी बहू भी घर लौट आए। उन्हें जब पूरी बात पता चली, तो दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ।
छोटी बहू सुमन के पास आई और बोली,
"भाभी... मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि आप अकेले कितना कुछ संभालती हैं।"
अब सबकी नज़र सास पर थी।
उनकी आँखों में आँसू आ चुके थे।
उन्होंने काँपते हाथों से सुमन का हाथ पकड़ा और कहा,
"बेटी... आज पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैंने बहू नहीं, सिर्फ़ घर का काम करने वाली एक औरत देखी। मैंने तुम्हारे त्याग को कभी समझा ही नहीं। मुझे माफ़ कर दो। अगर तुम आज चली गईं, तो यह घर कभी घर नहीं रह पाएगा।"
सुमन कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"मम्मी जी, घर दीवारों से नहीं, रिश्तों से बनता है। मैं अलग नहीं होना चाहती थी... मैं सिर्फ़ सम्मान चाहती थी।"
उस दिन के बाद उस घर के नियम बदल गए।
घर की ज़िम्मेदारियाँ बाँटी गईं। सास ने दोनों बहुओं को बराबर का सम्मान दिया। बच्चों के बीच भी कभी भेदभाव नहीं किया गया।
और सुमन ने पहली बार महसूस किया कि जिस घर में एक बहू की चुप्पी को भी सुना जाए, वही घर सच में परिवार कहलाता है।
सीख:
किसी भी घर की बड़ी बहू कोई मशीन नहीं होती। वह भी एक इंसान है, जिसे प्यार, सम्मान, आराम और अपनापन उतना ही चाहिए, जितना परिवार के किसी और सदस्य को।
Bela...
Comments
Post a Comment