अनकही बातें
क्यों हमेशा राधा?
एक ही घर में पली-बढ़ीं, एक ही माँ की गोद में खेलीं और एक ही पिता के संस्कारों में बड़ी हुईं।
लेकिन दोनों की सोच और स्वभाव बिल्कुल अलग थे।
राधा...
वह जैसे अपने नाम की तरह ही शांत, सुंदर और सरल थी।
उसके चेहरे की खूबसूरती से ज्यादा खूबसूरत उसका मन था। वह संस्कारी थी, समझदार थी और दूसरों की मदद करने में हमेशा सबसे आगे रहती थी। घर में कोई परेशान हो, पड़ोस में किसी को मदद की जरूरत हो या किसी को अपनी बात कहने के लिए एक भरोसेमंद इंसान चाहिए हो—हर किसी को राधा याद आती थी।
पढ़ाई में वह अव्वल थी।
खाना बनाने से लेकर घर सँभालने तक, हर काम में निपुण।
लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबी थी उसका व्यवहार।
वह किसी का दिल नहीं दुखाती थी।
अपने कर्म को अपना धर्म मानती थी और शायद इसी वजह से वह जहाँ भी जाती, लोगों के दिल में अपनी जगह बना लेती।
अगर कोई राधा से पूछता,
"तुम्हें इतना सब करना कैसे आता है?"
तो वह हमेशा मुस्कुराकर कहती,
"बस... जो काम सामने हो, उसे पूरे मन से कर लो।"
और सच में, राधा हर काम पूरे मन से करती थी।
दूसरी तरफ थी राधिका।
राधिका भी सुंदर थी। पढ़ाई में अच्छी थी। खाना बनाने में भी निपुण थी और अपने सपनों की एक अलग ही दुनिया में रहती थी।
लेकिन बचपन से ही उसके मन में एक बात धीरे-धीरे घर करती चली गई थी।
वह राधा से खुद की तुलना करने लगी थी।
जहाँ राधा को दस नंबर मिलते, वहाँ राधिका को आठ।
जहाँ राधा की तारीफ होती, वहाँ राधिका को लगता कि उसकी तारीफ कम क्यों हुई।
अगर राधा ने किसी के लिए कुछ अच्छा किया, तो लोग कहते,
"राधा जैसी बेटी हर घर में होनी चाहिए।"
अगर राधिका वही काम करती, तो कोई कह देता,
"अच्छा किया।"
बस...
यही अंतर राधिका के मन में एक गहरी टीस बनता चला गया।
धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि इस घर में उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है।
हर जगह सिर्फ़ राधा थी।
माँ कहतीं,
"राधा से सीखो।"
पिता कहते,
"राधा कितनी समझदार है।"
रिश्तेदार कहते,
"राधा तो पूरे घर का मान है।"
और राधिका के मन में हर बार एक ही सवाल उठता—
"क्यों हमेशा राधा?"
बचपन बीत गया।
दोनों बहनें बड़ी हो गईं।
लेकिन राधिका के मन की वह तुलना खत्म नहीं हुई।
बल्कि अब वह जलन में बदल चुकी थी।
राधा की एक मुस्कान पर पूरा घर मुस्कुरा देता था।
किसी की कोई समस्या होती, तो सबसे पहले राधा को याद किया जाता।
और राधिका?
वह चुपचाप अपने कमरे में बैठी सोचती रहती—
"आखिर मुझमें कमी क्या है?"
वह भी सुंदर थी।
वह भी पढ़ी-लिखी थी।
वह भी खाना बनाना जानती थी।
वह भी सपने देखती थी।
उसके भी कुछ अरमान थे।
राधिका का सपना था कि उसकी शादी किसी बेहद हैंडसम लड़के से हो और वह लड़का उस से बहुत बहुत प्यार करता हो ।
वह शादी के बाद विदेश जाए।
एक खूबसूरत ज़िंदगी जिए।
लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी किस्मत भी जैसे राधा से आगे नहीं निकल पा रही थी।
जिस लड़के को राधिका मन ही मन चाहती थी...
वह लड़का राधा से प्यार करता था।
और जल्द ही राधा की उसी लड़के से शादी तय हो गई।
राधिका के लिए यह खबर किसी तूफ़ान से कम नहीं थी।
उसने अपने मन में खुद से कहा,
"फिर से राधा..."
उसकी आँखों के सामने बचपन की सारी बातें घूमने लगीं।
राधा की तारीफ।
राधा की सफलता।
राधा की खूबसूरती।
राधा की अच्छाई।
और अब...
उसका प्यार भी।
जिसे राधिका अपना समझ बैठी थी, वह भी राधा का हो गया।
उस दिन राधिका के मन में वर्षों से दबा हुआ गुस्सा अपनी आखिरी सीमा पर पहुँच चुका था।
फिर आया राधा की सगाई का दिन।
पूरा घर खुशियों से भरा हुआ था।
रिश्तेदार आए थे।
हँसी-मजाक हो रहा था।
राधा लाल रंग के सुंदर कपड़ों में बेहद खूबसूरत लग रही थी।
उसके चेहरे पर खुशी थी।
उसके होने वाले पति की आँखों में उसके लिए प्यार था।
हर तरफ बस राधा की ही तारीफ हो रही थी।
"कितनी सुंदर लग रही है राधा!"
"सच में, बहुत भाग्यशाली है इसका होने वाला पति।"
"राधा जैसी लड़की मिलना तो किस्मत की बात है।"
राधिका एक कोने में खड़ी सब सुन रही थी।
उसका चेहरा धीरे-धीरे लाल होता जा रहा था।
ऐसा लग रहा था, जैसे उसके भीतर कुछ टूट रहा था।
या शायद...
वर्षों से उसके मन के किसी कोने में दबी हुई न जाने कितनी अनकही बातें, अनसुनी शिकायतें और अधूरे सवाल आज उसके भीतर ऐसा तूफ़ान बन चुके थे, जिसे वह चाहकर भी अब और नहीं रोक सकती थी। जो दर्द उसने बरसों से मुस्कुराहट के पीछे छिपा रखा था, वह आज सबके सामने आने वाला था। दूसरे ही पल नाजाने राधिका को क्या हुआ, कि
अचानक राधिका सबके सामने आ गई।
राधा ने राधिका के सामने देखकर मुस्कुराते हुए कहा,
"राधिका, तुम यहाँ अकेली क्यों खड़ी हो? आओ न..."
राधिका कुछ पल उसे देखती रही।
फिर अचानक उसने राधा को जोर से धक्का दे दिया।
पूरा घर सन्न रह गया।
"राधिका!"
किसी के मुँह से चीख निकल गई।
राधा लड़खड़ाकर पीछे हट गई।
उसकी आँखों में हैरानी थी।
राधिका ने बिना कुछ सोचे अपने होने वाले जीजा के गले लगकर रोते हुए कहा,
"क्यों राधा?"
सब लोग स्तब्ध थे।
राधिका लगातार रो रही थी।
"क्यों हमेशा राधा?"
राधा कुछ समझ नहीं पा रही थी।
राधिका ने उसे देखकर चीखते हुए कहा,
"हर बार तुम ही क्यों?"
"सब से सुंदर—राधा!"
"पढ़ाई में अच्छी—राधा!"
"जिसे सब प्यार करते—राधा!"
"हर किसी की नजर में नंबर वन —राधा!"
"और अब..."
उसने अपने सामने खड़े उस लड़के की तरफ़ इशारा किया।
"अब मेरा प्यार भी तुम्हारा हो गया!"
राधा की आँखों में आँसू आ गए।
वह धीरे से बोली,
"राधिका..."
लेकिन राधिका जैसे आज कुछ सुनने की हालत में नहीं थी।
वर्षों से उसके दिल में दबा हुआ तूफान आज सबके सामने आ चुका था।
"मैं भी सुंदर हूँ!"
"मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ!"
"मैं भी खाना बना सकती हूँ!"
"मैं भी किसी की बेटी हूँ!"
"मैं भी किसी के प्यार के लायक हूँ!"
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"फिर मुझमें क्या कमी है?"
वह फूट-फूटकर रोने लगी।
"क्यों हमेशा राधा?"
तभी राधिका के पिता आगे आए।
उन्होंने गुस्से में राधिका को एक थप्पड़ मार दिया।
पूरा घर फिर से शांत हो गया।
राधिका ने अपने गाल पर हाथ रखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार उन आँसुओं में गुस्सा नहीं था।
सिर्फ़ दर्द था।
उसके पिता की आवाज़ काँप रही थी।
"बस करो, राधिका!"
"तुम्हें अपनी बहन से शिकायत है, तो हमसे कहती।"
"लेकिन तुमने आज जो किया है, उसने सिर्फ़ राधा को नहीं... हम सबको शर्मिंदा किया है।"
राधिका फूट पड़ी।
"मैं क्या करती पापा?"
"मैंने कभी राधा से नफरत नहीं करनी चाही थी।"
"लेकिन बचपन से हर किसी ने मुझे राधा से तुलना करना सिखाया।"
"हर बार मुझे यही सुनने को मिला कि राधा से सीखो।"
"राधा जैसी बनो।"
"राधा तुमसे बेहतर है।"
"राधा समझदार है।"
"राधा सुंदर है।"
वह अपने पिता की तरफ देखते हुए बोली,
"किसी ने कभी मुझसे नहीं पूछा कि मैं कैसी हूँ।"
"किसी ने कभी नहीं कहा कि राधिका, तुम भी अच्छी हो।"
"मैंने हर बार राधा को देखा और खुद को उससे कम समझा।"
"धीरे-धीरे मुझे राधा की अच्छाई भी अपनी हार लगने लगी।"
राधा की आँखों से आँसू बहने लगे।
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हारी एक मुस्कान पर सब खुश हो जाते थे, राधा।"
"और मैं..."
वह हँसी।
एक ऐसी हँसी, जिसमें वर्षों का दर्द था।
"मैं तुम्हारी बहन होकर भी तुम्हारे सामने खुद को हमेशा छोटा समझती रही।"
राधा अब खुद को रोक नहीं पाई।
वह आगे बढ़ी और राधिका को गले लगा लिया।
राधिका कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।
फिर वह राधा के सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।
राधा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"राधिका..."
"तुम मुझसे कभी कम नहीं थीं।"
राधिका ने रोते हुए कहा,
"लेकिन सब कहते थे..."
राधा ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।
"दुनिया कुछ भी कहे, राधिका।"
"तुम मेरी बहन हो।"
"और मेरे लिए तुम कभी किसी से कम नहीं थीं।"
राधिका ने पहली बार राधा की आँखों में सीधे देखा।
राधा ने धीरे से कहा,
"तुमने कभी मुझसे पूछा ही नहीं कि तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी क्या है।"
राधिका चुप रही।
"तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी यह है कि तुम मेरी बहन हो।"
राधिका की आँखों से फिर आँसू बहने लगे।
राधा ने आगे कहा,
"तुम्हें मेरी तरह बनने की जरूरत नहीं थी।"
"तुम्हें सिर्फ़ राधिका बनना था।"
कुछ पल के लिए दोनों बहनें एक-दूसरे से लिपटी रहीं।
उस दिन राधिका को पहली बार समझ आया कि उसकी असली लड़ाई राधा से नहीं थी।
उसकी लड़ाई उस सोच से थी...
जिसने उसे सालों तक यह विश्वास दिलाया था कि किसी की अच्छाई उसकी अपनी कमी है।
राधा ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
"एक बात याद रखना।"
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
राधा मुस्कुराई।
"तुम्हें जिंदगी में किसी से आगे निकलने की जरूरत नहीं है।"
"बस अपने कल से बेहतर बनना।"
राधिका की आँखों में आँसू थे।
उसने धीरे से राधा का हाथ दबाया।
शायद उस दिन पहली बार...
उसे राधा से जलन नहीं हुई।
बल्कि गर्व हुआ।
और राधा?
वह भी उस दिन समझ गई कि कभी-कभी किसी की लगातार तारीफ करना भी दूसरे के दिल में अनजाने में एक कमी का एहसास पैदा कर सकता है।
क्योंकि हर इंसान की अपनी एक अलग खूबसूरती होती है।
किसी को राधा बनना जरूरी नहीं।
किसी को राधिका से बेहतर होना जरूरी नहीं।
जरूरी सिर्फ़ इतना है कि इंसान खुद को पहचान सके।
और शायद...
उस दिन राधिका ने पहली बार खुद को पहचान लिया था।
वह राधा से कम नहीं थी।
वह बस राधिका थी।
और यही उसकी सबसे बड़ी पहचान थी।
Bela...
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