ख़ामोशी की हद

अनकही बातें

ख़ामोशी की हद — भाग 1

नंदिनी एक सुंदर, संस्कारी और पढ़ी-लिखी लड़की थी। कुछ महीने पहले ही उसकी पढ़ाई पूरी हुई थी और अब उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई थी।

लेकिन नंदिनी के लिए यह नौकरी सिर्फ़ नौकरी नहीं थी...

उसके परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी थी।

कुछ ही महीने पहले उसके पिता का निधन हुआ था। उनके जाने के बाद घर की सारी ज़िम्मेदारी अचानक नंदिनी के कंधों पर आ गई थी। सब कुछ अब नंदिनी की नौकरी पर निर्भर था।

उसके पिता के एक पुराने दोस्त ने बड़ी मुश्किल से अपनी पहचान और सिफ़ारिश लगाकर नंदिनी को यह नौकरी दिलवाई थी।

नंदिनी जानती थी कि अगर यह नौकरी चली गई, तो उसके लिए इस से बेहतर तनख्वा वाली नौकरी मिलना मुश्किल था।

शायद यही वजह थी कि वह पिछले कई महीनों से ऑफिस में होने वाली कुछ ऐसी बातें भी चुपचाप सह रही थी, जिन्हें सहना उसके लिए बिल्कुल आसान नहीं था।

ऑफिस में काम करने वाला एक लड़का अक्सर किसी न किसी बहाने नंदिनी के करीब आने की कोशिश करता।

कभी वह उसके पास आकर खड़ा हो जाता, कभी जानबूझकर उसका हाथ छूने की कोशिश करता और कभी ऐसी बातें करता, जिन्हें सुनकर नंदिनी भीतर तक असहज हो जाती।

नंदिनी हर बार उसे नजरअंदाज कर देती।

कभी-कभी वह साफ़ शब्दों में कह भी देती,

"प्लीज़... मेरे साथ इस तरह की हरकत मत कीजिए। मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है।"

लेकिन वह हँसकर बात टाल देता।

"अरे! इतना सीरियस होने की क्या ज़रूरत है? मज़ाक कर रहा था।"

नंदिनी चुप हो जाती।

वह चाहकर भी किसी से कुछ नहीं कह पाती थी।

न घर में...

न अपने किसी रिश्तेदार से...

और न ही ऑफिस में किसी से।

उसे डर था कि अगर उसने शिकायत की और बात बढ़ गई, तो कहीं उसकी नौकरी ही न चली जाए।

वह अपने परिवार को दोबारा मुसीबत में नहीं डालना चाहती थी।

हर सुबह ऑफिस जाने से पहले माँ उससे पूछतीं,

"बेटा, सब ठीक है ना?"

नंदिनी मुस्कुराकर कहती,

"हाँ माँ, बिल्कुल ठीक है। आप बस अपनी दवाई समय पर ले लिया करो।"

लेकिन वह यह नहीं बता पाती थी कि हर दिन ऑफिस जाने से पहले उसके मन में एक डर बैठा रहता है।

एक डर...

कि आज फिर कुछ ऐसा न हो जाए, जिसे वह सह न पाए।

दिन बीतते गए।

नंदिनी की ख़ामोशी उसकी मजबूरी बन चुकी थी।

वह सब कुछ सहती रही।

क्योंकि उसे नौकरी की ज़रूरत थी।

बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी।

लेकिन इंसान के सहने की भी एक सीमा होती है।

और नंदिनी की वह सीमा भी अब धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।

फिर एक दिन...

उस लड़के ने सारी हदें पार कर दीं।

नंदिनी अपने काम में व्यस्त थी। ऑफिस में कुछ और लोग भी मौजूद थे। तभी वह लड़का फिर उसके पास आया और इस बार उसने ऐसी हरकत कर दी, जिसे देखकर नंदिनी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गई।

उसकी आँखों के सामने जैसे अँधेरा छा गया।

पिछले कई महीनों से उसके भीतर दबा डर...

गुस्सा...

अपमान...

और दर्द...

सब कुछ एक साथ बाहर आ गया।

अगले ही पल...

नंदिनी ने पूरी ताकत से उसके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया।

पूरा ऑफिस अचानक शांत हो गया।

वह लड़का अपना गाल पकड़कर नंदिनी को घूरने लगा।

"तुमने मुझे थप्पड़ मारा?"

नंदिनी की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उसके भीतर डर नहीं था।

वह काँपती हुई आवाज़ में बोली,

"हाँ! मारा है मैंने तुम्हें थप्पड़!"

ऑफिस में मौजूद सभी लोग उसकी तरफ़ देखने लगे।

नंदिनी ने पहली बार अपनी आवाज़ ऊँची की।

"कितने दिनों से मैं तुम्हारी हरकतें सह रही हूँ! कभी मेरे पास आकर खड़े हो जाते हो, कभी बिना मेरी इजाज़त मुझे छूते हो और कभी ऐसी बातें करते हो, जिनसे मुझे शर्म आती है!"

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

लेकिन आज वह रुकना नहीं चाहती थी।

"मैं चुप रही तो इसलिए नहीं कि तुम्हारी हरकतें मुझे पसंद थीं। मैं चुप रही क्योंकि मुझे अपनी नौकरी की ज़रूरत थी!"

पूरा ऑफिस उसकी बातें सुन रहा था।

नंदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।

"मेरे पापा कुछ महीने पहले ही गुजर गए हैं। घर में मेरी माँ हैं, जिनकी दवाइयों का खर्च मुझे उठाना है। मेरा छोटा भाई पढ़ रहा है। मेरे घर का चूल्हा मेरी इसी नौकरी से जलता है। मुझे डर था कि अगर मैंने तुम्हारे खिलाफ़ आवाज़ उठाई, तो मेरी नौकरी चली जाएगी। इसलिए मैं हर दिन अपने डर को अपने अंदर दबाकर यहाँ आती रही।"

वह कुछ पल के लिए रुकी।

फिर उसने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

"लेकिन आज तुमने मेरी ख़ामोशी को मेरी कमजोरी समझने की गलती कर दी।"

नंदिनी ने अपने आँसू पोंछे।

"आज मुझे अपनी नौकरी जाने का डर नहीं है। आज मुझे सिर्फ़ अपने सम्मान की चिंता है। नौकरी दोबारा मिल सकती है... पैसा दोबारा कमाया जा सकता है... लेकिन अगर इंसान अपनी इज़्ज़त के लिए आवाज़ उठाना छोड़ दे, तो वह खुद की नज़रों में ही गिर जाता है।"

इतना कहकर नंदिनी अपनी सीट से उठी।

आज पहली बार उसके कदमों में डर नहीं था।

वह नहीं जानती थी कि अगले दिन उसे नौकरी पर बुलाया जाएगा या नहीं।

उसे यह भी नहीं पता था कि अब उसके साथ क्या होगा।

लेकिन आज...

कई महीनों बाद उसे अपने भीतर एक अजीब-सी शांति महसूस हो रही थी।

क्योंकि नंदिनी ने उस दिन सिर्फ़ एक थप्पड़ नहीं मारा था...

उसने अपने भीतर महीनों से दबे डर, दर्द और ख़ामोशी को भी एक साथ जवाब दिया था।

और शायद...

आज पहली बार उसने खुद से कहा था—

"अब और नहीं..."

Bela...

                अब आगे क्रमशः 

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