एक बेटी की घुटन

अनकही बाते

एक बेटी की घुटन

राधिका हमेशा की तरह सुबह ऑफिस जाने के लिए घर से निकली। जाते-जाते उसने माँ से कहा, "शाम तक आ जाऊँगी।"

माँ ने मुस्कुराकर टिफ़िन उसके हाथ में रखा और दरवाज़े तक छोड़ने आईं। सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।

लेकिन उस दिन शाम हो गई...
फिर रात होने लगी...
और राधिका घर नहीं लौटी।

राधिका की माँ ने पहले सोचा, शायद ऑफिस में काम ज़्यादा होगा। उन्होंने कई बार फोन मिलाया, लेकिन हर बार घंटी बजती रही। कुछ देर बाद राधिका का फोन स्विच ऑफ़ हो गया।
अब उनकी बेचैनी डर में बदलने लगी।
राधिका के पिता ने राधिका के दोस्तों को फोन किया। किसी को उसके बारे में कुछ पता नहीं था। फिर ऑफिस में बात की गई।
उधर से जवाब मिला, "राधिका आज ऑफिस आई ही नहीं... और उसने दो दिन पहले ही नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था।"
यह सुनते ही घर में सन्नाटा छा गया।

राधिका की माँ को इस बात का सब से बड़ा सदमा लगी, कि राधिका ने यह बात अपनी माँ को भी नही बताई। राधिका की माँ सोच में पड़ गई, कि " राधिका आज भी अगर ऑफिस भी नहीं गई... तो फिर कहाँ गई होगी?"
रात के नौ बज चुके थे।

राधिका का कोई पता नहीं था।
आख़िरकार राधिका के पिता ने अपने एक पुराने दोस्त को फोन किया, जो पुलिस विभाग में थे।
उन्होंने पूरी बात सुनी और कहा,
"घबराइए मत। पहले उसे एक संदेश भेजिए। लिखिए कि अगर वह घर नहीं लौटी, तो गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ेगी। पुलिस उसे ढूँढ़ लेगी, लेकिन उससे पहले हम चाहते हैं कि वह अपनी मर्ज़ी से घर लौट आए। जो भी बात होगी, बैठकर सुलझा लेंगे।" 
और कहा, कि अगर राधिका अपनी मर्ज़ी से घर छोड़कर गई होगी, तो वह यह मैसेज पढ़ के वापस लौट आएगी।

 पिता ने वही संदेश राधिका को भेज दिया।
करीब आधे घंटे बाद राधिका का फोन आया।
माँ ने फोन उठाया, पहले ज़रा नाराज़ होते हुए राधिका की माँ ने राधिका से बात करनी शुरू की।
"राधिका... तू कहाँ है?"
दूसरी तरफ़ कुछ पल ख़ामोशी रही।
फिर धीमी आवाज़ आई—
"माँ... मैं ठीक हूँ। लेकिन अब मैं उस घर में वापस नहीं आना चाहती।"
एक पल के लिए माँ का दिल जैसे बैठ गया।
राधिका की माँ ने कहा, "एक बार घर आ जा,  कोई तुझसे कुछ नहीं कहेगा। हम एक बार बैठ के बात करते है, अगर उसके बाद भी तुझे लगे कि तुझे नहीं रहना... तो हम तुझे रोकेंगे नहीं।"

कुछ देर की चुप्पी के बाद राधिका ने सिर्फ़ इतना कहा—
"मैं आ रही हूँ।"

करीब एक घंटे बाद घर की घंटी बजी।
दरवाज़ा खुला।
राधिका घर के दरवाज़े पर खड़ी थी,

राधिका के पिता सामने खड़े थे।
उनके चेहरे पर गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था...
लेकिन आज उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा।

राधिका के पिता ने सिर्फ़ इतना कहा—
"बैठो..."

राधिका चुपचाप सोफ़े पर बैठ गई।
कमरे में ऐसा सन्नाटा था, जैसे हर किसी के पास बहुत कुछ कहने को हो... लेकिन कोई शुरुआत करने की हिम्मत न जुटा पा रहा हो। राधिक के पिता भी वहीं खड़े थे। चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन आज उन्होंने अपने गुस्से को शब्द नहीं बनने दिया।

आख़िर राधिका के पिता ने शांत स्वर में कहा,
"बोलो बेटा... ऐसी कौन-सी बात थी कि तुम्हें घर छोड़ना पड़ा?"
राधिका ने नज़रें झुका लीं।
उसके होंठ काँप रहे थे।
कई बार उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"डर मत... आज तेरे दिल में जो है, सब कह दे।"
इतना सुनते ही राधिका की आँखों से आँसू बह निकले।
वह रोते-रोते बोली,
"मैं थक गई हूँ...अपने ही घर में हर वक़्त डर-डर कर जीते-जीते अब मैं थक गई हूँ।
"मैं क्या पहनूँ... किससे बात करूँ... कब बाहर जाऊँ... कब लौटूँ... किससे मिलूँ... क्या खाऊँ... हर बात पर रोक-टोक...सुबह थोड़ी देर ज़्यादा नींद आ जाए तो ताने..."
ऑफिस में बॉस के तानें सुनो, घर पे आप सब के, ये मत करो, वो मत करो, मैं क्या छोटी बच्ची हूँ? ध्यान करो, योग करो, मुझे इन सब से कोई फर्क ही नहीं पड़ता, तो मैं यह सब क्यों करू ? मेरा मन उस में लगता ही नहीं और जहां मेरा मन न लगे वह काम मैं क्यों करू ? खाना बनाना मुझे पसंद नहीं, फिर भी हर दूसरे दिन सुनना पड़ता है कि लड़की होकर यह भी नहीं आता...मुझे अभी शादी नहीं करनी... लेकिन फ़िर भी हर महीने कोई नया रिश्ता आ ही जाता है...मेरी कोई इच्छा, कोई पसंद... किसी को दिखाई ही नहीं देती।"
वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
"इतने साल मैं इसलिए चुप रही क्योंकि मुझ में हिम्मत ही नहीं थी, कुछ कहने की लगा, बड़ो के सामने कैसे बात करें ..."
"लेकिन अब नहीं..."
"या तो मैं इस घर में अपने तरीके से जीना चाहती हूँ... या फिर कहीं और चली जाऊँगी।"

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
इस बार किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
राधिका की हर बात जैसे दीवारों से टकराकर सबके दिलों में उतर रही थी।
राधिका के पिता ने पहली बार अपनी बेटी की आँखों में वह दर्द देखा... जो सालों से उनके सामने होते हुए भी उनसे छिपा रह गया था।

कुछ देर तक पूरे घर में कोई कुछ नहीं बोला।

उसके पिता कुर्सी पर बैठे थे। पहली बार उनके पास अपनी बेटी की बात काटने के लिए कोई शब्द नहीं थे।
कुछ देर बाद उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा,
"यह सब... कब से चल रहा है?"
राधिका ने आँसू पोंछते हुए कहा,
"जब से मुझे समझ आई है, पापा। बस मैं कभी बोल नहीं पाई।"
"मुझे लगा था, अगर मैंने कुछ कहा तो आप लोग यही कहेंगे कि मैं ज़्यादा बोलने लगी हूँ... या फिर मैं इस घर की और घर के लोगों की इज़्ज़त नहीं करती।"

राधिका ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"माँ... मुझे पता है। मैंने कभी आपके प्यार पर शक नहीं किया।"
"लेकिन प्यार अगर हर वक़्त डर के साथ मिले... तो धीरे-धीरे वह प्यार नहीं, घुटन लगने लगता है।"
"मैंने कभी आप लोगों से महँगे कपड़े नहीं माँगे... कभी घूमने की ज़िद नहीं की... मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए था कि कभी आप मुझसे भी पूछते..."
'राधिका... तू क्या चाहती है?'

राधिका के पिता को याद आने लगा...
उन्होंने कभी राधिका से नहीं पूछा था कि वह कौन-सी नौकरी करना चाहती है...
कभी नहीं पूछा कि उसे शादी कब करनी है, उसे कैसा लड़का पसंद है...
कभी नहीं पूछा कि उसे किस तरह की ज़िंदगी पसंद है...
उन्होंने हमेशा फैसले सुनाए...
राय कभी नहीं माँगी।

काफ़ी देर बाद उन्होंने गहरी साँस ली और उठकर राधिका के सामने आकर खड़े हो गए।
"बेटा..."
"आज पहली बार मुझे समझ आया कि मैं एक अच्छा पिता बनने की कोशिश में... तेरा दोस्त बनना ही भूल गया।"

राधिका के पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,
"आज से इस घर में कुछ नियम बदलेंगे।"
"अब तेरी शादी की बात तब तक नहीं होगी, जब तक तू खुद तैयार न हो।"
"तुझे जो नौकरी करनी है, कर। आगे पढ़ना है, पढ़।"
"और अगर कभी हमारी कोई बात तुझे बुरी लगे... तो चुप मत रहना। उसी वक़्त हमें रोक देना।"
"क्योंकि चुप्पी... रिश्तों को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाती है।"
इतना सुनते ही राधिका अपने पिता के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
पिता की आँखों से भी आँसू निकल पड़े।
माँ दोनों को देखकर मुस्कुरा रही थीं।
उस रात इस घर में पहली बार कोई बहस नहीं हुई...
पहली बार किसी ने किसी पर अपनी बात नहीं थोपी...
पहली बार एक बेटी की अनकही बातें सुनी गईं।
"उस रात राधिका अपने कमरे में गई। कमरा वही था... दीवारें वही थीं... लेकिन पहली बार उसे लगा कि वह किसी मकान में नहीं, अपने घर में रह रही है। क्योंकि घर तब बनता है, जब वहाँ किसी की बात सुनी जाए।"

"हर बेटी बगावत नहीं करती, कई बार वह सिर्फ़ सुने जाने की उम्मीद करती है। और जब उसकी चुप्पी टूटती है, तब तक उसके भीतर बहुत कुछ टूट चुका होता है।"

Bela...


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