अनकही बातें
आईने के उस पार
भाग 1 — वह जो खुद को बदलती रही
उसका नाम सुमित्रा था,
या शायद देविका।
या शायद कोई और...
क्योंकि यह सिर्फ एक,
औरत की कहानी नहीं है।
यह उन तमाम औरतों की कहानी है, जो पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीते-जीते एक दिन अचानक खुद को ही भूल जाती है।
मेरी इस कहानी की शुरुआत एक सुमित्रा नाम की औरत से होती है, जिसका बस एक छोटा-सा सपना था। जैसे हर औरत का होता है, कि
"उसे ऐसा पति मिले, जो उसे बहुत प्यार करे। उसकी छोटी-से-छोटी खुशी का ध्यान रखे और उसकी आँखों में छिपी खुशी और उदासी को बिना कहे समझ जाए। "
जब सुमित्रा की शादी हुई, तो उसे लगा था, कि उसका सपना सच हो गया और यही से उसकी ज़िंदगी का नया सफ़र शुरू होता है। एक गृहिणी बनकर, हा, सुमित्रा एक गृहिणी थी। इसलिए सुबह सबसे पहले उठना, पूरे घर के लिए लोगों के लिए सब की पसंद का नाश्ता बनाना, सास-ससुर का ध्यान रखना, पति की पसंद का खाना बनाना और घर की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखना—यही उसकी ज़िंदगी बन गई थी और शायद बचपन से उसे यही सब सिखाया भी गया था, जैसे हर लड़की को अपने घर में बचपन से सिखाया जाता है।
समय बीतता गया, फिर बच्चे हुए।
एक बेटा और एक बेटी।
अब उसकी दुनिया पति और बच्चों तक सिमट गई। परिवार की खुशी में ही वह अपनी खुशी ढूँढ़ने लगी। पति और बच्चों को जो पसंद, वही बनाती। सास को जो अच्छा न लगे, वह काम छोड़ देती। बच्चों को जो चाहिए, अपनी जरूरत भूलकर भी उनके लिए वह चीज़ ले आती।
धीरे-धीरे उसे खुद भी पता नहीं चला, कि कब उसने अपनी पसंद और इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया। जैसे उसकी अपनी कोई पसंद और इच्छा बची ही नहीं थी।
सुमित्रा को क्या पसंद है?
वह क्या करना चाहती है?
किस चीज़ से उसे खुशी मिलती है?
इन सब के बारे में सुमित्रा ने कभी सोचा भी नहीं।
सुमित्रा हमेशा यही सोचती थी—
"मेरे परिवार के लिए जो अच्छा है, वही मेरे लिए भी अच्छा है।"
समय बीतता गया।
बच्चे बड़े हो गए।
अब बच्चे भी उसे समझाने लगे।
"माँ, आपको थोड़ा बदलना चाहिए।"
"अब जमाना बदल गया है।"
"आपको थोड़ा मॉडर्न होना चाहिए।"
सुमित्रा मुस्कुरा देती।
वह कोशिश करती।
कभी नए कपड़े पहनती।
कभी अपनी पुरानी आदतें बदलने की कोशिश करती। कभी कुछ नया सीखती। कभी कभी वह सच में बदलना चाहती थी। लेकिन हर बार जब वह खुद को किसी और जैसा बनने की कोशिश करती, उसके भीतर कुछ बेचैन हो जाता।
उसे लगता...
वह बदल नहीं रही थी।
वह खुद से दूर जा रही थी।
एक दिन उसने नए कपड़े पहनकर आईने के सामने खुद को देखा।
कुछ पल तक वह चुपचाप खड़ी रही।
फिर आईने से बोली—
"बताओ... कैसी लग रही हूँ?"
आईना चुप रहा।
सुमित्रा हल्का-सा मुस्कुराई।
"अच्छी नहीं लग रही ना?"
आईना फिर भी चुप रहा।
"मुझे भी नहीं लग रही।"
वह खुद ही हँस पड़ी।
फिर अचानक उसकी आँखें भर आईं।
"लेकिन क्यों?"
वह आईने के और करीब चली गई।
"क्या इसलिए कि ये कपड़े मुझे पसंद नहीं हैं?"
"या इसलिए कि मैं खुद को इनमें पहचान नहीं पा रही?"
उसने अपने चेहरे को ध्यान से देखा।
"क्या मुझे सच में बदलना है?"
कुछ देर बाद उसने खुद ही जवाब दिया—
"हाँ... शायद थोड़ा।"
फिर उसके भीतर से एक और आवाज़ आई—
"लेकिन कितना?"
सुमित्रा चुप हो गई।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद बदलाव और खुद को खो देने के बीच बहुत महीन-सी रेखा होती है।
वह बदलना चाहती थी।
लेकिन खुद को खोकर नहीं।
उसे अपने पति से प्यार था।
अपने बच्चों से प्यार था।
अपने परिवार से भी।
लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में एक खालीपन बढ़ता जा रहा था।
उसे लगता था कि वह सबकी जरूरत समझती है... लेकिन कोई उसकी जरूरत नहीं समझता।
और फिर एक दिन उसकी ज़िंदगी में ऐसा सच आया, जिसने उसके भीतर की आख़िरी उम्मीद भी तोड़ दी।
सुमित्रा को पता चला, कि उसका पति दूसरी महिलाओं में रुचि रखता है। कुछ बातें उसने दूसरों से सुनीं। कुछ उसने खुद महसूस की और कुछ संदेशों और फोन कॉल्स ने उसके शक को सच में बदल दिया। जिस आदमी को उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दे दी थी...जिसके परिवार को उसने अपना परिवार समझकर निभाया था.. आज वही आदमी अपनी खुशियाँ कहीं और तलाश रहा था।
सुमित्रा टूट गई।
लेकिन उसने किसी से सवाल नहीं किया।
हंगामा नहीं किया।
किसी से कोई शिकायत भी नहीं की।
उसने उल्टा खुद को ही दोष देना शुरू कर दिया।
"शायद मुझमें ही कोई कमी होगी।"
और फिर वह खुद को और बदलने लगी।
उसे लगा शायद वह पर्याप्त सुंदर नहीं है।
शायद वह बहुत साधारण है।
शायद वह बहुत पुराने विचारों वाली है।
शायद उसे और आधुनिक होना चाहिए।
वह अपने कपड़े बदलने लगी।
अपनी आदतें बदलने लगी।
अपने बोलने का तरीका बदलने लगी।
लेकिन जितना वह खुद को बदलती...
उतना ही उसे लगता कि वह अपने ही भीतर कहीं खोती जा रही है।
एक दिन सुमित्रा आइने के सामने खड़ी हुई, गौर से अपने आप को देखा और अपने में किए बदलाव को उसने महसूस किया और आइने से कहा, कि " तुम्हें क्या लगता है, कोई भी या किसी का भी पति किसी और औरत के पास जाए, उस में हर बार ग़लती उसकी पत्नी की ही होती है ? क्या पति को कभी पत्नी को समझने की ज़रूरत नहीं ? क्या पति को कभी अपनी पत्नी के ढांचे में ढलने की जरूरत नहीं ?
सुमित्रा आइने से सवाल कर के बस खड़ी रही, लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं मिला।
फ़िर पलटकर सुमित्रा ने आइने से कहा, मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा, कहते हुए सुमित्रा अपने काम में जुड़ गई।
एक दिन सुमित्रा की पुरानी सहेली ने उसे अपने घर बुलाया, तब सुमित्रा अपनी सहेली के घर गई।
बातों-बातों में उसके भीतर दबा हुआ दर्द बाहर आ गया।
सुमित्रा रोते हुए बोली—
"मैंने अपनी पूरी जिंदगी उनके लिए जी।"
"उनके परिवार को अपना परिवार समझा।"
"कभी उनसे कुछ नहीं माँगा।"
फिर वह कुछ पल चुप रही।
और धीमे से बोली—
"फिर भी... मैं उनके लिए काफी नहीं थी।"
सुमित्रा की सहेली ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“सुमित्रा, तुम्हारे पति का गलत होना तुम्हारी कमी नहीं है। तुम्हें खुद को दोष देने की कोई जरूरत नहीं। तुमने एक अजनबी को अपना पति बनाया, उसे तन-मन से प्यार किया, उसके माँ-पापा को अपने माँ-पापा की तरह अपनाया, उसके भाई-बहनों को अपना माना और उसके परिवार की हर रस्म और रिश्ते को पूरे दिल से निभाया। क्या यह सब इतना आसान होता है?”
वह कुछ पल रुकी, फिर बोली—
“एक लड़की जब अपना घर छोड़कर किसी दूसरे घर में जाती है, तो वह सिर्फ अपना घर नहीं छोड़ती... वह अपनी खिड़की, अपनी अलमारी, अपनी किताबें, अपनी पसंद के कपड़े, अपने बचपन की यादें और न जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियाँ पीछे छोड़ आती है। फिर एक अजनबी को अपना बनाती है और धीरे-धीरे उसके पूरे परिवार को अपना मान लेती है। लेकिन क्या कभी कोई पुरुष भी अपनी पत्नी के घर को उसी तरह अपना घर बना पाता है ? उसके माँ-पापा को अपने माँ-पापा और उसके भाई-बहनों को अपने भाई-बहन मान पाता है? शायद नहीं।”
सुमित्रा चुपचाप उसे सुनती रही।
सहेली ने धीरे से कहा, “और फिर भी, अगर पति अपनी खुशियाँ कहीं और तलाशने लगे, तो सबसे पहले सवाल पत्नी से ही किया जाता है—उसमें क्या कमी थी? वह कैसी थी? उसने क्या नहीं किया? लेकिन हर बार गलती पत्नी की ही हो, यह जरूरी तो नहीं।”
सुमित्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“लेकिन मैं अब क्या करूँ?”
सहेली के पास भी इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था। वह जानती थी कि सुमित्रा इतनी आसानी से अपना घर नहीं तोड़ेगी। इसलिए
उसने बस उसका हाथ थामकर कहा—
“अभी कुछ मत सोचो। समय को थोड़ा समय दो... शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाए।”
घर जाकर उस रात सुमित्रा देर तक सो नहीं पाई। उसे अपनी सहेली की बातें बार बार याद आ रही थी। उसने अपने जीवन के पिछले कई साल याद किए।
वह किसी की बेटी थी।
फिर किसी की पत्नी बनी।
किसी की बहू बनी।
फिर किसी की माँ।
लेकिन इन सब रिश्तों के बीच...
वह खुद कब सुमित्रा रही?
अगली सुबह उसने हमेशा की तरह घर का काम किया।
सबके लिए नाश्ता बनाया।
सबकी जरूरतें पूरी कीं।
सबको विदा किया।
फिर जब घर खाली हुआ, वह अपने कमरे में चली गई। और अपने कमरें की सफाई करते करते वह अपने वहीं आईने के सामने फ़िर खड़ी हो गई। वह देर तक खुद को आइने में देखती रही।
क्रमशः
Bela....
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