अनकही बातें
भाग 2 — आईने के उस पार
फिर आइने में देखते हुए सुमित्रा धीरे से बोली—
"तुम कौन हो, सुमित्रा?"
कोई जवाब नहीं।
"तुम्हें क्या पसंद है?"
खामोशी।
"तुम क्या करना चाहती हो?"
फिर खामोशी।
उसने आँखें बंद कर लीं।
फिर अचानक उसके भीतर से आवाज़ आई—
"मैं बस... थक गई हूँ।"
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"मैं सबको खुश करते-करते अब थक गई हूँ।"
"हर किसी की पसंद का ख्याल रखते-रखते अब मैं थक गई हूँ।"
"हर बात पर खुद को सही साबित करते-करते अब मैं थक गई हूँ।"
फिर उसका स्वर बदल गया।
उसमें गुस्सा था।
"और हाँ... मुझे गुस्सा भी आता है!"
"मुझे भी बुरा लगता है!"
"मुझे भी दुख होता है!"
और पहली बार उसने खुद से कहा—
"शायद मुझे बदलने की जरूरत नहीं है।"
"शायद मुझे सिर्फ़ खुद को समझने की जरूरत है।"
उस दिन सुमित्रा ने कोई बड़ा फैसला नहीं लिया।
न घर छोड़ा।
न किसी से बदला लिया।
न अपनी ज़िंदगी उलट-पुलट की।
बस...
उसने खुद को स्वीकार करने की शुरुआत की।
उसे समझ आया कि वह जैसी है, वैसी होना भी गलत नहीं है।
उसे सादगी पसंद है तो ठीक है।
उसे घर संभालना अच्छा लगता है तो ठीक है।
उसे पुराने गीत पसंद हैं तो ठीक है।
उसे हर किसी की तरह बनने की जरूरत नहीं।
क्योंकि वह जैसी है... वैसी भी पूरी है।
और शायद...
यही समझ उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव था।
सुमित्रा ने अपनी जिंदगी के बहुत सारे साल यूंही चुपचाप गुज़ार दिए थे।
समय इसी तरह बीतता गया।
कब उसके बालों में सफेदी उतर आई…
कब उसके चेहरे पर झुर्रियाँ आ गईं…
कब उसके बच्चे बड़े हो गए…
कब घर की ज़िम्मेदारियाँ बदल गईं…
उसे पता ही नहीं चला।
आज सुमित्रा पैंसठ साल की हो चुकी थी।
उसे कभी-कभी लगता था—
"ज़िंदगी इतनी जल्दी कैसे बीत गई?"
उस दिन घर में एक अजीब-सा सन्नाटा था।
सुमित्रा के सास-ससुर मंदिर गए थे।
पति और बेटा-बहू अपने-अपने काम पर निकल चुके थे। कामवाली बाई भी अपना काम करके जा चुकी थी।
घर में पहली बार जैसे सब कुछ रुक गया था।
सुमित्रा अकेली थी।
वह घर का सारा काम निपटाकर अपने कमरें में गई और वहां भी सफ़ाई शुरू कर दी। फ़िर अचानक वह आईने के सामने खड़ी हो गई।
पहले उसने आइने को साफ़ किया फ़िर
काफी देर तक वह खुद को उसी आइने में देखती रही।
शायद बहुत सालों बाद।
उसने अपने हाथों को देखा।
बर्तन धोते-धोते हाथों की त्वचा सख़्त हो गई थी।
उसने अपने चेहरे को देखा।
आँखों के नीचे काले घेरे थे।
चेहरे पर झुर्रियाँ थीं।
बाल बिखरे हुए थे और उनमें सफेदी उतर चुकी थी।
आँखों पर लगा चश्मा उसने उतारकर मेज़ पर रख दिया।
अब आईने में उसे अपना चेहरा थोड़ा धुँधला दिखाई दे रहा था।
सुमित्रा हल्के से मुस्कुराई।
"शायद अच्छा ही है… कम दिखाई देगा तो उम्र भी कम दिखाई देगी।"
लेकिन उसकी वह मुस्कान अगले ही पल गायब हो गई।
उसे अचानक अपनी बहू की कही हुई एक बात याद आ गई।
एक दिन बहू ने बहुत प्यार से कहा था—
"माँ, आप भी अब अपने हिसाब से ज़िंदगी जी सकती हैं। आपको जो अच्छा लगता है, आप वही कीजिए। हमेशा हमारे बारे में ही मत सोचिए।"
बेटा भी कई बार कह चुका था—
"माँ, आपको जो करना है, कीजिए। अब आपको किसी चीज़ की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"
लेकिन सुमित्रा ने कभी अपने बारे में सोचा ही कहाँ था?
उसे तो हमेशा यही लगा कि पहले घर।
पहले परिवार।
पहले सबकी ज़रूरतें।
और फिर…
अगर समय बचा, तो शायद वह।
लेकिन वह "फ़िर" कभी आया ही नहीं।
आज न जाने क्यों उसके मन में बहुत सारे सवाल उठने लगे।
उसने आईने में खुद को देखा और पहली बार खुद से पूछा—
"सुमित्रा… तुम कौन हो?"
वह चुप रही।
फिर उसने धीरे से पूछा—
"तुम्हारी अपनी कोई पसंद है?"
खामोशी।
"तुम्हारा अपना कोई सपना है?"
फिर खामोशी।
"तुम्हारा कोई ऐसा दोस्त है, जिससे तुम अपने दिल की हर बात कह सको?"
सुमित्रा की आँखें भर आईं।
उसने खुद से आख़िरी सवाल किया—
"क्या तुम्हारी अपनी कोई ज़िंदगी है?"
इस बार उसके पास कोई जवाब नहीं था।
वह आईने के बिल्कुल करीब चली गई।
"क्या मैं बदल सकती हूँ?"
उसने खुद से पूछा।
फिर खुद ही जवाब दिया—
"क्या मुझे बदलना चाहिए?"
कुछ पल बाद उसके भीतर से एक और आवाज़ आई—
"हाँ… शायद मुझे भी अपने लिए जीना चाहिए। मुझे भी अपने सपने पूरे करने का अधिकार है।"
लेकिन अगले ही पल वह उदास होकर मुस्कुरा दी।
"सपने?"
उसने आईने में खुद को देखा।
"कौन-सा सपना?"
वह सोचने लगी।
उसका कोई सपना था भी तो क्या?
कभी था?
या उसने अपने सारे सपने परिवार की ज़रूरतों के नीचे दबा दिए थे?
वह घर की चार दीवारों में बंद नहीं थी।
दरवाज़ा तो हमेशा खुला था।
लेकिन शायद इतने सालों में उसने खुद ही अपने चारों तरफ़ एक ऐसी दीवार बना ली थी, जिसके बाहर निकलने का रास्ता अब उसे दिखाई नहीं देता था।
उसे घर में प्यार मिलता था।
उसकी कद्र भी थी।
लोग उसके हाथ के खाने की तारीफ़ करते थे।
जब कोई कहता—
"सुमित्रा के हाथ जैसा खाना कहीं नहीं मिलता।"
तो उसका दिल खुशी से भर जाता।
लेकिन कभी-कभी पति की नाराज़गी में कहे गए कुछ कड़वे शब्द उसके दिल में गहरे उतर जाते।
वह कड़वे शब्द कहकर भूल जाते।
लेकिन सुमित्रा…
वह शब्द भूल नहीं पाती थी।
छोटी-छोटी बातें उसके दिल के किसी कोने में जाकर बैठ जातीं।
और जब कभी वे बातें याद आतीं, तो दिल में हल्का-सा दर्द होने लगता।
शायद उसे दर्द सहने की आदत हो गई थी।
और सबसे बड़ी बात—
उसे अपनी तकलीफ़ किसी को बताने की आदत नहीं थी।
आज आईने के सामने खड़ी-खड़ी सुमित्रा की आँखों से अचानक आँसू बहने लगे।
वह खुद भी हैरान थी।
"ये आँसू आज रुक क्यों नहीं रहे?"
"आज मुझे क्या हो गया है?"
"मैं ये सब क्यों सोच रही हूँ?"
"मेरे मन में ये सारी बातें आज ही क्यों आ रही हैं?"
वह देर तक खुद को देखती रही।
फिर अचानक उसे लगा कि उसकी सारी उदासी की वजह यही आईना है।
यही आईना…
जो आज उसे उसके चेहरे के पीछे छिपी एक ऐसी औरत दिखा रहा था, जिसे उसने खुद भी कभी ठीक से देखने की कोशिश नहीं की थी।
एक ऐसी औरत…
जो थक चुकी थी।
जो टूट चुकी थी।
जो सबके लिए जीते-जीते खुद से बहुत दूर चली गई थी।
सुमित्रा का गुस्सा अचानक फूट पड़ा।
उसने मेज़ पर रखा फूलदान उठाया और पूरी ताकत से आईने पर दे मारा।
छन्न्न्न…!
आईना टूट गया।
उसके टुकड़े ज़मीन पर बिखर गए।
सुमित्रा कुछ पल तक उन टुकड़ों को देखती रही।
फिर उसकी नज़र उन टूटे हुए शीशों में अपने ही चेहरे पर पड़ी।
एक आईने में उसका चेहरा था।
दूसरे में उसका आधा चेहरा।
कहीं सिर्फ़ उसकी आँखें दिखाई दे रही थीं।
कहीं होंठ।
कहीं माथा।
सुमित्रा को लगा जैसे वह खुद भी उन्हीं टुकड़ों की तरह टूटकर बिखर गई है।
उसने धीरे से कहा—
"हाँ… शायद मैं भी तो ऐसी ही हूँ।"
"हर किसी के लिए थोड़ा-थोड़ा टूटती रही… और आज खुद को ही पूरा नहीं देख पा रही।"
उसकी आँखों के सामने सब कुछ घूमने लगा।
और अगले ही पल वह वहीं ज़मीन पर गिर पड़ी।
कुछ देर के लिए उसकी आँखें बंद हो गईं।
पता नहीं कितनी देर बीत गई।
फिर उसे कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं।
"सुमित्रा…"
"माँ…"
"मम्मी जी…"
"दादी…"
उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलने की कोशिश की।
धुँधली आँखों से उसने देखा—
उसका पूरा परिवार उसके आसपास खड़ा था।
सबके चेहरों पर डर था।
चिंता थी।
परेशानी थी।
सुमित्रा ने कुछ पल के लिए फ़िर आँखें बंद कर लीं।
शायद वह उस पल को महसूस करना चाहती थी।
वह पहली बार देख रही थी कि उसके गिर जाने से इतने सारे लोग डर गए थे।
उसे पहली बार महसूस हुआ—
"शायद मैं सचमुच इस घर के लिए बहुत ज़रूरी हूँ।"
उसने धीरे से हाथ उठाया और सबको इशारा किया—
"मैं ठीक हूँ।"
पति ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"क्या हो गया तुम्हें ? तुम गिर कैसे गई ? और यह शीशा टूट कैसे गया ? हम अभी अस्पताल चलेंगे।"
सुमित्रा ने मना करना चाहा, लेकिन इस बार उसके पति ने उसकी एक नहीं सुनी।
वह उसे अस्पताल ले गए।
जाँच हुई।
डॉक्टर ने कहा कि शायद कमजोरी और तनाव की वजह से उसे चक्कर आया था।
सुमित्रा के पति ने कहा, बस अब बहुत हुआ, आज से घर के सारे काम की जिम्मेदारी अब सिर्फ तुम्हारी नहीं? तुम्हें कितनी बार कहा, इतना कम मत किया करो, थोड़ा अपने लिए भी वक्त निकालो, आराम करो, हर वक़्त काम, काम,काम, आज से सब कुछ बंद, अपना ख्याल रखो।
आज सुमित्रा के पति की आवाज में
बस थोड़ा-सा साथ था।
थोड़ी-सी चिंता थी।
थोड़ा-सा प्यार था।
लेकिन उस दिन उसके लिए इतना ही बहुत था।
उसने अपने पति की ओर देखा और धीमे से पूछा—
"आप मेरे साथ हैं ना?"
पति ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"आज ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों कर रही हो? भला मैं तुम्हें क्यों छोड़ूँगा?"
सुमित्रा की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं थे।
वह मुस्कुराई।
उसने पति का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"बस… अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
पति ने उसके सिर पर हाथ रखा।
सुमित्रा ने आँखें बंद कर लीं।
उस पल उसे समझ आया—
कभी-कभी हमें अपने जीवन को बदलने के लिए किसी बहुत बड़े चमत्कार की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी किसी का सिर्फ़ इतना कहना ही काफी होता है—
"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
कुछ दिन बाद सुमित्रा फिर उसी घर में थी।
वही घर।
वही रसोई।
वही परिवार।
वही ज़िम्मेदारियाँ।
लेकिन इस बार उसके भीतर कुछ बदल गया था।
वह पहले जैसी ही थी।
वह अब भी सबके लिए खाना बनाती थी।
सबकी पसंद का ध्यान रखती थी।
घर में कोई भूखा न सोए, इसका ख्याल रखती थी।
लेकिन अब एक छोटा-सा फर्क था।
उसने अपने लिए भी थोड़ा-सा समय निकालना शुरू कर दिया था।
कभी सुबह की धूप में कुछ देर बैठ जाती।
कभी अपनी पसंद का गीत सुनती।
कभी बिना किसी वजह के अकेले चाय पीती।
और कभी-कभी…
अपने टूटे हुए आईने के सामने खड़ी हो जाती।
एक दिन उसने आईने के टूटे हुए टुकड़ों को ठीक करवाकर फ़िर से दीवार पर लगवा दिया।
अब उसमें दरारें दिखाई देती थीं।
सुमित्रा ने उन दरारों को देखा और मुस्कुरा दी।
उसे लगा—
आईना टूटा था, सुमित्रा नहीं।
दरअसल, इतने सालों से वह खुद को आईने में सिर्फ़ अपना चेहरा समझकर देखती रही थी।
लेकिन उस दिन उसे आईने के उस पार छिपी हुई अपनी असली पहचान दिखाई दी थी।
वह सिर्फ़ एक पत्नी नहीं थी।
सिर्फ़ एक माँ नहीं थी।
सिर्फ़ एक बहू या सास नहीं थी।
वह एक इंसान थी।
जिसके अपने भी भाव थे।
अपनी भी इच्छाएँ थीं।
और शायद…
अपने लिए जीने का भी उतना ही अधिकार था, जितना उसने पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीने का निभाया था।
बस अब उसने यह सीख लिया था कि—
दूसरों को खुश रखते-रखते खुद को पूरी तरह खो देना भी ज़रूरी नहीं।
उसने अपने भीतर की उस स्त्री को भी थोड़ा-सा जीने दिया, जो वर्षों से चुप थी।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
क्योंकि हर औरत का अपने लिए जीने का तरीका अलग होता है।
कोई घर छोड़कर अपने सपने पूरे करती है।
कोई नौकरी शुरू करती है।
कोई अपने पुराने शौक को फिर से जीती है।
और कोई…
उसी घर में रहकर, उसी परिवार के बीच, अपने भीतर एक छोटी-सी जगह अपने लिए बना लेती है।
यही उस आईने का असली मतलब था।
आईना कभी हमें बदलने के लिए नहीं कहता।
वह सिर्फ़ हमें हमारा सच दिखाता है।
कभी चेहरा।
कभी उम्र।
कभी थकान।
और कभी…
वह औरत, जिसे हम दुनिया को खुश करते-करते खुद से छिपा देते हैं।
सुमित्रा ने उस दिन आईने को तोड़ा था।
लेकिन असल में…
उस दिन आईना नहीं टूटा था।
उस दिन उसके भीतर वर्षों से जमा एक भ्रम टूटा था—
कि उसकी अपनी कोई पहचान नहीं।
उसने टूटे हुए आईने के हर टुकड़े में खुद को अलग-अलग देखा।
और फिर पहली बार समझा—
वह टूटी हुई नहीं थी।
वह तो बस…
बहुत सालों से सबके लिए बँटी हुई थी।
आज भी सुमित्रा जब उस आईने के सामने खड़ी होती है, तो उसे अपनी झुर्रियाँ दिखाई देती हैं।
अपने सफेद बाल दिखाई देते हैं।
अपने सख़्त हाथ दिखाई देते हैं।
लेकिन अब वह उन सबके पीछे छिपी हुई उस औरत को भी देख पाती है—
जिसने पूरी ज़िंदगी सबको संभाला।
और अब…
जो खुद को भी संभालना सीख रही है।
शायद यही एक गृहिणी की सबसे अनकही कहानी है।
वह बहुत कुछ कह सकती है।
लेकिन कहती नहीं।
वह बहुत कुछ चाह सकती है।
लेकिन चाहती नहीं।
वह बहुत कुछ माँग सकती है।
लेकिन माँगती नहीं।
बस किसी दिन कोई उसके सिर पर हाथ रखकर इतना कह दे—
"तुमने बहुत किया है… अब थोड़ा अपने लिए भी जी लो।"
तो शायद…
उसके दिल को इससे बड़ी कोई तारीफ़ नहीं चाहिए।
और शायद यही सुमित्रा की कहानी है।
या फिर…
शायद यह सिर्फ़ सुमित्रा की कहानी नहीं है।
शायद यह हर एक औरत की कहानी है, जो एक गृहिणी है। या
शायद यह मेरी कहानी है।
एक ऐसी कहानी, जिसे मैंने बहुत सालों तक किसी से नहीं कहा।
जिसे मैंने अपने भीतर रखा।
चुपचाप जिया।
चुपचाप सहा।
और आज पहली बार…
आपसे कह दिया।
क्योंकि अनकही बातें की इन 28 कहानियों के बाद…
अब मेरी बारी थी।
अपनी कहानी कहने की।
Bela...
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