अनकही बातें
एक वादा — भाग 2
अस्पताल के उस कमरे में कुछ देर तक गहरी ख़ामोशी छाई रही।
नैना की नज़र समीर पर थी।
उसके मन में अब भी वही सवाल था—
"तुमने यह सब मुझसे क्यों छुपाया?"
समीर ने धीरे से उसकी ओर देखा।
"क्योंकि मुझे डर था कि तुम मुझे कभी समझोगी नहीं।"
नैना की आँखें भर आईं।
"तुमने मुझे समझने का मौका ही कब दिया, समीर? अगर तुमने मुझे पहले ही सब बता दिया होता, तो शायद मैं तुम्हें गलत नहीं समझती।"
समीर ने सिर झुका लिया।
"मैंने बहुत बार कोशिश की थी। लेकिन हर बार लगा कि बात कहूँगा तो तुम्हें लगेगा कि मैं तुम्हें धोखा दे रहा हूँ। और फिर... मैं तुम्हें उस औरत की बीमारी और उसके बेटे की जिम्मेदारी के बोझ में भी नहीं डालना चाहता था।"
नैना कुछ नहीं बोली।
बिस्तर पर लेटी वह महिला सब सुन रही थी।
उसने कमजोर आवाज़ में कहा,
"नैना... इसमें समीर की गलती नहीं है। मैंने ही उनसे कहा था कि वह आपको कुछ न बताएँ।"
नैना ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"आपने?"
महिला ने धीरे से सिर हिलाया।
"मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण आपके घर में कोई परेशानी हो। समीर मेरे लिए मेरे भाई जैसे हैं। मेरे पति के जाने के बाद उन्होंने जिस तरह मेरा साथ दिया, उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती।"
उसने कुछ पल रुककर कहा,
"लेकिन अब मेरे पास ज्यादा समय नहीं है।"
नैना का दिल बैठ गया।
महिला ने समीर की ओर देखा।
"भैया... मेरा बेटा।"
समीर की आँखें भर आईं।
"तुम चिंता मत करो।"
"नहीं," उसने धीमे से कहा, "अब मैं आप दोनों से कहना चाहती हूँ।"
उसकी नज़र नैना पर टिक गई।
"क्या आप मेरे बेटे को अपना पाएँगी?"
नैना के पास कोई जवाब नहीं था।
यह फैसला इतना बड़ा था कि वह उसे कुछ मिनटों में नहीं ले सकती थी।
वह माँ बनने की उम्र में थी, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि माँ बनने का रास्ता उसके सामने इस तरह आएगा।
उसने समीर की ओर देखा।
समीर भी उसकी आँखों में जवाब ढूँढ़ रहा था।
नैना ने उस महिला का हाथ पकड़ लिया।
"मैं आपसे कोई वादा अभी नहीं कर सकती। लेकिन मैं आपके बेटे को अकेला नहीं छोड़ूँगी।"
महिला की आँखों में आँसू आ गए।
शायद उसे अपने सवाल का जवाब मिल गया था।
कुछ ही दिनों बाद वह इस दुनिया से चली गई।
उसके अंतिम संस्कार में नैना और समीर दोनों मौजूद थे।
दोनों एक छोटे से बच्चे को देख रहे थे।
वह सिर्फ़ दो साल का था।
उसे शायद यह भी समझ नहीं था कि उसकी माँ अब कभी वापस नहीं आएगी।
वह बस समीर की उँगली पकड़े खड़ा था।
नैना उसके पास गई।
बच्चे ने मासूमियत से उसकी ओर देखा।
नैना ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
बच्चे ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने पहली बार महसूस किया...
शायद इस बच्चे को माँ की जरूरत है।
और शायद उसे भी इस बच्चे की।
उस दिन नैना और समीर ने फैसला किया कि वे बच्चे को अपने पास रखेंगे।
लेकिन उन्होंने एक बात तय की—
उसे उसके असली माता-पिता के बारे में अभी कुछ नहीं बताया जाएगा।
वह बहुत छोटा था।
उसे यह समझाना कि उसके असली माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, उसके नन्हे मन पर बहुत गहरा असर डाल सकता था।
समीर ने कहा,
"जब वह इतना बड़ा हो जाए कि सच को समझ सके, तब हम उसे सब कुछ बता देंगे।"
नैना ने सहमति में सिर हिला दिया।
"लेकिन उससे पहले... हम उसे कभी यह महसूस नहीं होने देंगे कि वह हमसे अलग है।"
और सचमुच...
उन्होंने उसे कभी अलग महसूस नहीं होने दिया।
नैना उसके लिए माँ बन गई।
समीर उसके लिए पिता।
बच्चे ने धीरे-धीरे नैना को माँ कहना शुरू कर दिया।
समीर को पापा।
समय बीतता गया।
बच्चा बड़ा होता गया।
नैना और समीर के अपने कोई बच्चे नहीं हुए।
शुरुआत में नैना को कभी-कभी इस बात का दुख होता था, लेकिन जब वह अपने बेटे को देखती तो उसका सारा खालीपन भर जाता।
एक दिन उसने समीर से कहा,
"शायद भगवान ने मुझे माँ बनने के लिए इसी बच्चे को भेजा था।"
समीर ने मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ लिया।
"और मुझे लगता है, उसके पिता ने मुझसे जो वादा लिया था... उसे पूरा करने के लिए ही तुम्हें मेरी जिंदगी में भेजा था।"
नैना मुस्कुरा दी।
उन दोनों ने कभी उस बच्चे को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उनका अपना नहीं है।
उसका बचपन उनकी आँखों के सामने बीता।
पहला स्कूल...
पहली परीक्षा...
पहली साइकिल...
हर छोटी-बड़ी खुशी में नैना और समीर उसके साथ खड़े रहे।
बच्चा भी उन्हें अपना ही माँ-बाप समझता रहा।
लेकिन नैना के मन में एक बात हमेशा चुभती थी।
उसे डर लगता था कि जब कभी उसे सच पता चलेगा, तो कहीं वह उनसे नफ़रत न करने लगे।
कहीं वह यह न सोचे कि उन्होंने उससे इतने सालों तक झूठ बोला।
समीर उसे समझाता,
"जब समय आएगा, हम उसे सब सच बता देंगे।"
नैना चुप हो जाती।
वर्ष बीतते गए।
वह बच्चा अब जवान हो चुका था।
उसकी ज़िंदगी में पढ़ाई, नौकरी और फिर अपने सपनों की दुनिया आ गई थी।
नैना और समीर अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके थे, जहाँ उनका बेटा ही उनकी पूरी दुनिया था।
एक दिन समीर अपनी पुरानी फाइलें व्यवस्थित कर रहा था।
उसे एक जरूरी कागज़ ढूँढ़ना था।
नैना रसोई में थी।
तभी उनका बेटा भी कमरे में आ गया।
"पापा, क्या ढूँढ़ रहे हो?"
"एक पुरानी फाइल है बेटा। शायद इस अलमारी में रखी है।"
बेटे ने अलमारी खोलकर फाइलें निकालनी शुरू कर दीं।
अचानक एक पुरानी तस्वीर फाइल से नीचे गिर गई।
उसने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में एक युवा दंपती थे।
एक छोटी-सी बच्ची उनकी गोद में थी।
वह तस्वीर को कुछ देर तक देखता रहा।
फिर तस्वीर पलट दी।
पीछे कुछ लिखा था।
उसकी आँखें उस लिखावट पर टिक गईं।
"हमारे बेटे के लिए..."
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
वह तस्वीर लेकर नैना और समीर के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"माँ..."
नैना ने उसकी तरफ देखा।
उसने तस्वीर आगे कर दी।
"यह कौन हैं?"
नैना के हाथ काँपने लगे।
समीर की आँखें झुक गईं।
बेटे ने दोनों को बारी-बारी से देखा।
अब उसके चेहरे पर सवाल था।
"मुझे सच बताइए।"
कमरे में एक लंबी ख़ामोशी छा गई।
वह सच...
जिसे नैना और समीर ने इतने वर्षों से अपने सीने में छुपाकर रखा था,
आज उनके सामने खड़ा था।
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
उसने समीर की तरफ देखा।
समीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
अब...
उनका वादा पूरा करने का समय आ गया था।
और अब पहली बार...
उस बच्चे को पता चलने वाला था कि उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी अनकही बात क्या थी।
क्रमशः...
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