अनकही बातें
ख़ामोशी की हद — भाग 2
उस रात नंदिनी ठीक से सो नहीं पाई।
बार-बार उसके सामने ऑफिस का वही दृश्य आ रहा था।
वह थप्पड़...
सबके सामने उसकी कही हुई बातें...
और उस लड़के का गुस्से से भरा चेहरा।
नंदिनी को डर लग रहा था।
उसे पता था कि अगले दिन ऑफिस में क्या होगा, वह नहीं जानती थी।
लेकिन एक बात तय थी...
अब वह पहले जैसी नंदिनी नहीं रही थी।
सुबह माँ ने पूछा,
"बेटा, आज ऑफिस नहीं जाना क्या?"
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"जाऊँगी माँ।"
माँ ने उसके चेहरे की तरफ़ देखा।
"सब ठीक है ना?"
नंदिनी ने हमेशा की तरह मुस्कुराने की कोशिश की।
"हाँ माँ... सब ठीक है।"
लेकिन आज उसकी मुस्कान में पहले जैसी मजबूरी नहीं थी।
वह ऑफिस पहुँची तो उसकी धड़कनें तेज़ थीं।
जैसे ही वह अंदर गई, उसे महसूस हुआ कि कई लोगों की निगाहें उसी पर थीं।
कुछ लोग उसे देखकर चुप हो गए।
कुछ आपस में धीमी आवाज़ में बातें करने लगे।
नंदिनी ने किसी की तरफ़ ध्यान नहीं दिया और चुपचाप अपनी सीट पर जाकर बैठ गई।
कुछ ही देर बाद उसके पास एक मैसेज आया।
"मैडम, आपको मैनेजर के केबिन में बुलाया है।"
नंदिनी का दिल बैठ गया।
वह धीरे-धीरे उठी और मैनेजर के केबिन की तरफ़ चल पड़ी।
दरवाज़े के बाहर पहुँचकर उसने एक गहरी साँस ली और अंदर चली गई।
मैनेजर के सामने वही लड़का बैठा था।
उसके साथ कंपनी का एचआर भी मौजूद था।
नंदिनी को देखते ही वह लड़का गुस्से से बोला,
"सर, कल इस लड़की ने बिना किसी वजह के मुझे सबके सामने थप्पड़ मारा है। मैं इतने साल से इस कंपनी में काम कर रहा हूँ। अगर आज इसे नहीं रोका गया, तो कल कोई भी मेरे साथ कुछ भी करेगा।"
नंदिनी चुपचाप खड़ी रही।
मैनेजर ने उसकी तरफ़ देखा।
"नंदिनी, क्या यह सच है कि तुमने इन्हें थप्पड़ मारा?"
नंदिनी ने धीमे स्वर में कहा,
"जी।"
"क्यों?"
नंदिनी ने एक पल के लिए आँखें बंद की।
फिर बोली,
"क्योंकि उन्होंने मेरी इजाज़त के बिना मुझे छुआ था।"
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
वह लड़का तुरंत बोल पड़ा,
"सर, ये झूठ बोल रही है! मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।"
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
आज उसके भीतर पहले जैसा डर नहीं था।
"मैं झूठ बोल रही हूँ?"
उसने मैनेजर की ओर देखते हुए कहा,
"सर, अगर मुझे अपनी नौकरी बचाने के लिए झूठ बोलना होता, तो मैं पिछले कई महीनों से चुप क्यों रहती?"
मैनेजर ने कुछ नहीं कहा।
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
"मैंने कई बार इन्हें मना किया था। कई बार कहा था कि मेरे करीब मत आइए। लेकिन ये हर बार मेरी बात को मज़ाक कहकर टाल देते थे। मैं चुप रही क्योंकि मुझे इस नौकरी की ज़रूरत थी।"
वह थोड़ा रुकी।
"मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरी माँ बीमार रहती हैं और मेरा छोटा भाई पढ़ रहा है। घर की पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर है। मुझे डर था कि अगर मैंने शिकायत की और मेरी नौकरी चली गई, तो मेरे परिवार का क्या होगा?"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"लेकिन कल... जब इन्होंने फिर से मेरी सीमा पार की, तो मैं खुद को रोक नहीं पाई।"
वह लड़का अब भी अपनी सफाई देने की कोशिश कर रहा था।
तभी एचआर ने अपना लैपटॉप खोला और कहा,
"सर, नंदिनी की बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमने ऑफिस के सीसीटीवी फुटेज देखे हैं।"
वह लड़का अचानक चुप हो गया।
एचआर ने आगे कहा,
"पिछले कुछ दिनों की रिकॉर्डिंग में कई बार साफ़ दिखाई दे रहा है कि आप नंदिनी के बेहद करीब जाकर उसे असहज कर रहे थे। एक फुटेज में नंदिनी आपको पीछे हटने के लिए कहती हुई भी दिखाई दे रही है।"
नंदिनी ने हैरानी से एचआर की तरफ़ देखा।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बात पर किसी ने विश्वास किया है।
मैनेजर ने उस लड़के की ओर सख्ती से देखते हुए कहा,
"कंपनी में किसी भी कर्मचारी के साथ इस तरह का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाएगा।"
वह लड़का कुछ बोलने ही वाला था कि मैनेजर ने उसे रोक दिया।
"आप आज से निलंबित हैं। आगे की कार्रवाई एचआर टीम करेगी।"
वह लड़का गुस्से में कुर्सी से उठा और बाहर चला गया।
नंदिनी अब भी वहीं खड़ी थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।
मैनेजर ने उसकी ओर देखा।
"नंदिनी, कल जो हुआ, उसमें तुम्हारा किसी को थप्पड़ मारना सही तरीका नहीं था। लेकिन तुम्हारे साथ जो हुआ, उसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। तुम्हें पहले ही शिकायत करनी चाहिए थी।"
नंदिनी ने सिर झुका लिया।
"जी सर... मुझे डर लगता था।"
मैनेजर की आवाज़ इस बार थोड़ी नरम थी।
"डरना मत। किसी भी लड़की को अपने सम्मान के लिए आवाज़ उठाने से डरना नहीं चाहिए। और आगे से अगर ऑफिस में तुम्हें या किसी और को ऐसी परेशानी हो, तो चुप मत रहना।"
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन ये आँसू इस बार दर्द के नहीं थे।
ये राहत के आँसू थे।
वह केबिन से बाहर निकली।
आज ऑफिस वही था...
लोग वही थे...
उसकी कुर्सी भी वही थी...
लेकिन नंदिनी के भीतर कुछ बदल चुका था।
दोपहर में उसके फोन पर माँ का कॉल आया।
"बेटा, आज जल्दी घर आना।"
नंदिनी ने मुस्कुराकर पूछा,
"क्यों माँ?"
माँ ने कहा,
"बस, आज तेरे लिए तेरी पसंद की खिचड़ी बनाऊँगी।"
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
वह बोली,
"माँ... आज मैं बहुत खुश हूँ।"
माँ ने हँसते हुए पूछा,
"क्यों?"
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
"क्योंकि आज मुझे लगा कि मेरी आवाज़ की भी कोई कीमत है।"
उस शाम घर पहुँचकर नंदिनी ने माँ को गले लगा लिया।
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,
"अब बता भी दे, हुआ क्या था?"
नंदिनी ने पहली बार अपनी माँ से सब कुछ कह दिया।
उसने अपनी मजबूरी...
अपना डर...
अपना अपमान...
और पिछले कई महीनों की सारी बातें माँ को बता दीं।
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने नंदिनी का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और कहा,
"बेटा, तूने मुझसे यह सब पहले क्यों नहीं कहा?"
नंदिनी रोते हुए बोली,
"मुझे डर था माँ... कि मेरी नौकरी चली जाएगी।"
माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
"नौकरी की चिंता मत कर। हम मुश्किल में रह लेंगे, कम खा लेंगे, लेकिन तू अपने मन में इतना बड़ा दर्द लेकर अकेली मत रहना।"
नंदिनी माँ से लिपटकर रोती रही।
उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि शायद वह इतने दिनों से अपने परिवार को बचाने के लिए खुद को ही अंदर से तोड़ रही थी।
लेकिन अब वह चुप नहीं रहेगी।
अगले कुछ दिनों में ऑफिस में एक नई व्यवस्था बनाई गई, जहाँ कर्मचारी बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज कर सकते थे।
नंदिनी ने भी तय किया कि अब अगर ऑफिस में किसी दूसरी लड़की के साथ ऐसा कुछ होगा, तो वह उसकी आवाज़ बनेगी।
कुछ दिनों बाद ऑफिस में एक नई लड़की आई।
एक दिन वह लड़की नंदिनी के पास आई और बोली,
"मैम, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ।"
नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,
"हाँ, बोलो।"
वह लड़की थोड़ी झिझकी।
"आपको देखकर मुझे हिम्मत मिलती है।"
नंदिनी कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसने उसका हाथ पकड़कर कहा,
" जो बात तुम्हें परेशान करे, उसे अपने अंदर मत रखना। समय रहते आवाज़ उठाना।"
वह लड़की मुस्कुराई।
नंदिनी ने भी मुस्कुराकर उसे देखा।
उस दिन नंदिनी को समझ आया कि उसकी लड़ाई सिर्फ़ उसकी अपनी नहीं थी।
उसकी आवाज़ शायद किसी और लड़की की ख़ामोशी भी तोड़ सकती थी।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
कभी-कभी हम अपनी मजबूरियों के कारण चुप रहते हैं।
लेकिन हमारी ख़ामोशी को हमारी कमजोरी समझने वालों को यह याद रखना चाहिए कि सहने वाले इंसान की भी एक हद होती है।
और जब वह हद पार हो जाती है, तो एक आवाज़... कई ख़ामोश आवाज़ों को जन्म दे सकती है।
नंदिनी ने उस दिन अपनी आवाज़ उठाई थी...
और उस आवाज़ ने सिर्फ़ उसकी ज़िंदगी नहीं बदली थी।
शायद किसी और लड़की को अपनी ख़ामोशी तोड़ने की हिम्मत भी दे दी थी।
Bela...
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