माफ़ी जो कभी मांगी नहीं गई भाग 2

  अनकही बातें

माफ़ी जो कभी माँगी नहीं गई

भाग 2

समय अपनी गति से चलता रहा।

बच्चे बड़े होते गए।

अनाया पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चली गई।

कुछ साल बाद अर्णव भी उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर चला गया।

जिस घर में कभी बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं...

जहाँ सुबह स्कूल जाने की जल्दी होती थी...

जहाँ शाम को बच्चों के लौटने का इंतज़ार रहता था...

वहाँ अब एक अजीब-सी ख़ामोशी थी।

अब घर में सिर्फ़ कुणाल और काव्या थे।

दोनों के पास एक-दूसरे के लिए पूरा समय था।

लेकिन शायद...

एक-दूसरे से कहने के लिए कुछ बचा नहीं था।

या यूँ कहें कि बहुत कुछ था...

लेकिन उसे कहने की आदत छूट चुकी थी।

एक शाम कुणाल ऑफिस से घर आया।

काव्या हमेशा की तरह चाय बनाकर ले आई।

कुणाल ने कप हाथ में लिया।

"अनाया का फोन आया था?"

काव्या ने कहा,

"हाँ।"

"क्या कह रही थी?"

"बस... ठीक है। पढ़ाई अच्छी चल रही है।"

कुणाल ने सिर हिला दिया।

कुछ पल दोनों चुप बैठे रहे।

फिर काव्या ने पूछा,

"अर्णव का फोन आया?"

"नहीं।"

बस...

बात खत्म हो गई।

कभी जिन दोनों के बीच घंटों बातें होती थीं...

आज उनके पास एक-दूसरे से कहने के लिए कुछ मिनट भी नहीं थे।

उस रात काव्या देर तक सो नहीं पाई।

वह सोचती रही—

"हमारे बीच ऐसा कब हो गया?"

उसे याद आया...

कभी कुणाल घर लौटकर उसे पूरे दिन की बातें बताया करते थे।

कभी वह भी अपनी छोटी-छोटी परेशानियाँ उनसे साझा करती थी।

कब दोनों ने एक-दूसरे से बातें करना बंद कर दिया?

उसे याद नहीं था।

लेकिन एक बात उसे जरूर याद थी।

वह दिन...

जब कुणाल ने उससे पूछा था—

"तुम मुझसे बच्चों की बातें क्यों छिपाती हो?"

उस दिन के बाद शायद दोनों के बीच कुछ बदल गया था।

उधर कुणाल भी अपने कमरे में अकेला बैठा था।

उसके मन में भी वही सवाल था।

"काव्या मुझसे इतनी दूर कब हो गई?"

उसे अचानक अपने बच्चों की याद आई।

उसे याद आया कि बचपन में वे अपनी हर परेशानी लेकर काव्या के पास जाते थे।

उसे याद आया कि वह कितनी बार यह सोचकर नाराज़ हुआ था कि उसके बच्चे अपनी बातें उससे क्यों नहीं कहते।

उस समय उसे लगता था कि काव्या उसे बच्चों से दूर रखती है।

लेकिन आज...

जब बच्चे दोनों से दूर थे...

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसने इतने साल काव्या से यह बात खुलकर क्यों नहीं कही।

अगली सुबह भी दोनों रोज़ की तरह अपने काम में लग गए।

लेकिन उस दिन कुणाल के मन में कुछ था।

शाम को जब दोनों साथ बैठे, तो कुणाल ने अचानक कहा,

"काव्या..."

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

"हाँ?"

कुणाल कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने पूछा,

"क्या तुम मुझसे नाराज़ हो?"

काव्या ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

"नहीं तो।"

"शायद तुम हो... बस बताती नहीं हो।"

काव्या कुछ पल उसे देखती रही।

"और शायद तुम भी मुझसे नाराज़ थे... लेकिन तुमने भी कभी बताया नहीं।"

दोनों कुछ देर चुप रहे।

फिर कुणाल ने धीरे से कहा,

"काव्या... मुझे हमेशा लगता रहा कि तुम बच्चों को मुझसे दूर रखती हो।"

"और मुझे हमेशा लगता रहा कि तुम बच्चों की बात समझना ही नहीं चाहते।"

काव्या ने कहा,

"बच्चे मुझसे अपनी बातें इसलिए कहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं उन्हें पहले सुनूँगी... समझूँगी। मुझे डर लगता था कि अगर मैं उनकी हर बात तुम्हें बता दूँगी, तो तुम उन्हें डाँट दोगे और वे फिर मुझसे भी अपनी बातें छिपाने लगेंगे।"

कुणाल ने धीरे से कहा,

"लेकिन तुमने मुझे कभी यह बताया ही नहीं।"

"मुझे डर था कि तुम मेरी बात समझोगे नहीं।"

"और मुझे डर था कि तुम मेरी बात सुनोगी नहीं।"

दोनों कुछ पल तक चुप रहे।

फिर कुणाल ने काव्या का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

"काव्या... मुझे माफ़ कर दो।"

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

"किस बात के लिए?"

"तुम्हें गलत समझने के लिए। तुम्हें यह महसूस कराने के लिए कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ। मुझे तुमसे पूछना चाहिए था कि तुम्हारे मन में क्या है। लेकिन मैंने अपने मन में ही एक कहानी बना ली... और उसी को सच मानता रहा।"

काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने कुणाल का हाथ पकड़ लिया।

"मुझे भी माफ़ कर दो।"

कुणाल ने उसकी तरफ देखा।

"मैंने भी तुमसे अपनी बात नहीं कही। मुझे तुम्हें समझाना चाहिए था कि मैं बच्चों को तुमसे दूर नहीं करना चाहता था। मैं सिर्फ़ यह चाहता था कि वे अपनी बातें मुझसे भी कहें।"

काव्या ने धीरे से कहा,

"शायद हम दोनों ने एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने मन में जवाब ढूँढ़ लिए।"

कुणाल ने उसकी बात पूरी की,

"और फिर उन जवाबों को सच मान लिया।"

दोनों की आँखों में आँसू थे।

काव्या ने धीमे से पूछा,

"कुणाल... क्या हमने बहुत देर कर दी?"

"शायद हाँ, कुछ साल हमने खो दिए। लेकिन हमारे पास अभी भी समय हैं।"

ऐसा लगा जैसे बहुत सालों बाद...

दोनों के बीच फिर से एक सच्ची बातचीत हो रही थी।

उस रात उन्होंने सिर्फ़ बच्चों की बातें नहीं कीं।

उन्होंने अपने बारे में बात की।

अपने डर के बारे में।

अपनी शिकायतों के बारे में।

उन सारी बातों के बारे में...

जो उन्होंने इतने सालों से अपने दिल में दबा रखी थीं।

कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें कहने में उन्हें पंद्रह साल लग गए।

लेकिन शायद...

कुछ रिश्तों में देर से कही गई बात भी बहुत मायने रखती है।

कुणाल ने धीरे से कहा,

"काव्या, एक बात कहूँ?"

"हाँ।"

"अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं तुम्हें नहीं समझ रहा हूँ... तो मुझसे कह देना। चुप मत रहना।"

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

"और अगर तुम्हें लगे कि मैं बच्चों को तुमसे दूर कर रही हूँ... तो मुझसे पूछ लेना। अपने मन में कोई बात मत रखना।"

कुणाल मुस्कुराया।

"पक्का।"

काव्या भी मुस्कुरा दी।

उस रात दोनों ने एक-दूसरे से सिर्फ़ माफ़ी नहीं माँगी।

उन्होंने अपने बीच की उन सारी गलतफ़हमियों को भी जाने दिया...

जो वर्षों से उनके रिश्ते पर बोझ बनी हुई थीं।

उन्होंने समझ लिया था कि कभी-कभी पति-पत्नी के बीच प्यार कम नहीं होता।

बस...

बातें कम हो जाती हैं।

और जब बातें कम होती हैं...

तो मन अपनी तरफ से कहानियाँ बनाने लगता है।

कुणाल और काव्या की कहानी में भी ऐसा ही हुआ था।

कुणाल ने अपनी एक कहानी बना ली थी—

"काव्या मुझे बच्चों से दूर कर रही है।"

और काव्या ने अपनी—

"कुणाल बच्चों की भावनाओं को नहीं समझते।"

दोनों ने एक-दूसरे से कभी पूछा ही नहीं कि सच क्या है।

और इसी वजह से...

एक छोटी-सी गलतफ़हमी ने उनके बीच कई सालों की दूरी बना दी।

कुणाल ने कहा, "तो कल से फिर शुरू करते हैं।"

काव्या ने पूछा,

"क्या?"

कुणाल मुस्कुराया।

"बातें।"

काव्या की आँखें नम हो गईं।

कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं होती।

बस...

एक सवाल पूछना होता है।

एक बात कहनी होती है।

एक-दूसरे को सुनना होता है।

और कभी-कभी...

सिर्फ़ इतना कहना होता है—

"मुझे माफ़ कर दो।"

क्योंकि कुछ माफ़ियाँ देर से माँगी जाएँ...

तो भी रिश्ते बच सकते हैं।

लेकिन अगर उन्हें हमेशा दिल में ही दबाकर रखा जाए...

तो एक दिन वही अनकही बातें...

दो लोगों के बीच सबसे बड़ी दूरी बन जाती हैं।

और शायद...

कुणाल और काव्या ने उस दिन यही सीखा था—

रिश्तों में सबसे बड़ी गलती हमेशा गलत होना नहीं होती...

कभी-कभी सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम अपनी बात कहने में इतनी देर कर देते हैं कि सामने वाला हमारी ख़ामोशी का अर्थ अपनी तरह से समझने लगता है।

कभी-कभी रिश्तों को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं होती। बस... एक सवाल पूछना होता है। एक बात कहनी होती है। एक-दूसरे को सुनना होता है। और कभी-कभी... सिर्फ़ इतना कहना होता है—"मुझे माफ़ कर दो।" क्योंकि कुछ माफ़ियाँ देर से माँगी जाएँ... तो भी रिश्ते बच सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें हमेशा दिल में ही दबाकर रखा जाए... तो एक दिन वही अनकही बातें... दो लोगों के बीच सबसे बड़ी दूरी बन जाती हैं।

समाप्त।

Bela...

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