अपराधबोध भाग 2

अनकही बातें

अपराधबोध – भाग 2

घर छोड़ने के बाद हेतवी सीधे अपनी बचपन की सहेली हर्षी के घर पहुँची। हर्षी को पहले से ही उसकी ज़िंदगी का सच मालूम था। दरवाज़ा खुलते ही उसने हेतवी को सामने देखा तो पलभर के लिए हैरान रह गई, लेकिन अगले ही पल उसे अपने गले से लगा लिया।

"अरे! आज मेरी याद कैसे आ गई? बहुत दिनों के बाद आई हो। अच्छा हुआ, तुम आ गई, मुझे भी तुझसे मिलने का मन था। पहले बता, क्या पिएगी? और हमारे आरव के लिए क्या बनाऊँ? बोर्नविटा, बिस्किट, मैगी या नाचोज़? और हमारे लिए वही कम शक्कर वाली चाय... साथ में गरमा-गरम पकौड़े?"

इतना सुनते ही हेतवी की आँखें भर आईं। वह कुछ बोल न सकी और हर्षी के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।

हर्षी सब समझ गई थी, लेकिन वह चाहती थी कि हेतवी अपने मन का बोझ खुद उतारे। उसने आरव को अंदर के कमरें में खेलने भेज दिया और प्यार से हेतवी को पूछा, "अब बता... क्या हुआ?"

हेतवी ने घर में जो कुछ हुआ था, एक-एक बात सच-सच बता दी।

सब सुनने के बाद हर्षी ने गहरी साँस ली और बोली, "मुझे डर तो पहले से था कि एक दिन ऐसा होगा। कोई भी पति अपनी पत्नी का ऐसा अतीत आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, लेकिन अब तू अकेली नहीं है। मैं हूँ ना तेरे साथ।"

हेतवी ने धीमे स्वर में कहा, "मैं अपने मायके भी नहीं जा सकती। माँ-पापा को पता चला तो शायद वे भी मुझे ही गलत समझेंगे। इसलिए सबसे पहले तेरी ही याद आई। लेकिन तू चिंता मत कर। मैं और आरव तुझ पर बोझ नहीं बनेंगे। कुछ पैसे मैंने बचा के रखे थे, वह में लेकर आई हूँ, कुछ दिनों में नौकरी और रहने के लिए जगह ढूँढ़ लूँगी, फिर यहाँ से चली जाऊँगी।"

हर्षी मुस्कुरा दी।

"बस, यही सुनना बाकी रह गया था। बचपन की दोस्त होकर ऐसी बातें करती है? कहीं नहीं जाएगी तू। हाँ, अगर तुझे अपने मन की तसल्ली चाहिए तो मेरे घर का एक कमरा किराए पर ले लेना। मुझे भी किरायेदार ढूँढ़ना था। तुझे भी संकोच नहीं रहेगा और मुझे भी सहारा मिल जाएगा। नौकरी की चिंता भी मत कर, वह भी मिल जाएगी।"

दोनों सहेलियाँ देर तक बातें करती रहीं। कई दिनों बाद हेतवी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लौटी।

उधर हिरेन अपने ही घर में बिल्कुल अकेला पड़ गया था। पूरे दिन "पापा... पापा..." कहते हुए पीछे दौड़ने वाला आरव अब घर में नहीं था। हेतवी की आवाज़, उसकी हँसी, सुबह की चाय, टिफ़िन, घर की सफ़ाई, दूधवाले से लेकर कामवाली तक सबका हिसाब रखने वाली वह औरत... उसके बिना घर जैसे घर ही नहीं रहा था।

कुछ ही दिनों में सारा घर बिखर गया। रसोई में बर्तन फैले रहते, ड्रॉइंग रूम में अख़बार, फाइलें, चाबियाँ और कपड़े इधर-उधर पड़े रहते।

एक सुबह हिरेन बालकनी में चाय पी रहा था। तभी उसे लगा जैसे पीछे से आरव की आवाज़ आई—

"पापा...पापा!"

वह घबराकर पूरे घर में दौड़ पड़ा।

"आरव... बेटा... कहाँ हो?"

लेकिन अब हिरेन के घर में चार दीवारों के अलावा और कुछ नहीं था, वहाँ सिर्फ़ सन्नाटा था।

थका हुआ हिरेन आईने के सामने आकर खड़ा हो गया। खुद को देखते हुए उसके मुँह से बस इतना निकला—

"गलती सिर्फ़ हेतवी की नहीं थी... मेरी भी तो थी, जब उसे सब से ज़्यादा मेरी ज़रूरत थी, तब मैं ही अपने कामों में उलझा रहा, उसे अपना वक़्त ही ना दे पाया, उसकी बात भी तो सही है, उसकी जगह अगर मैं होता, तो मुझ से भी गलती हो सकती थी। तो फिर सज़ा उसी को ही क्यों ? मुझे लगता है, उस बात की सज़ा आज मैं भी अकेलेपन के साथ काट रहा हूँ।"

उसी दिन से उसने हेतवी और आरव को ढूँढ़ना शुरू कर दिया, लेकिन दोनों कहीं नहीं मिले।

कुछ दिनों बाद हिरेन शॉपिंग मॉल में कुछ सामान लेने जाता है, उसी समय अचानक पीछे से पाप...पापा की आवाज सुनाई दी, हिरेन को लगा, यह आरव की ही आवाज है। 

आरव दौड़कर हिरेन से लिपट गया।

और अपने पापा को प्यार करते हुए कहने लगा, "आप हमारे साथ क्यों नहीं रहते ? मुझे आपकी बहुत याद आती है।"

हिरेन की आँखें भर आईं।

हिरेन ने कहा, "तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं?"

तभी सामने से हेतवी आती दिखाई दी। उसने हिरेन को देखा, पलभर के लिए ठिठक गई और फिर आरव का हाथ पकड़कर आगे बढ़ने लगी।

हिरेन ने हिम्मत करके हेतवी का हाथ पकड़कर उसे एक बार रोकने की कोशिश की।

"हेतवी... क्या मुझसे एक पल बात करोगी?"

हेतवी रुक तो गई, लेकिन उसकी नज़रें अब भी झुकी हुई थीं।

हिरेन भर्राए हुए स्वर में बोला,

"उस दिन मैंने तुम्हारी हर बात सुनी थी... लेकिन मेरा गुस्सा और मेरा अहंकार मेरे प्यार से बड़ा हो गया था। मैं उस वक़्त तुम्हें माफ़ नहीं कर पाया। शायद तब मैं सिर्फ़ अपने दर्द के बारे में सोच रहा था, तुम्हारे दर्द के बारे में नहीं।"

हिरेन ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा,

"तुम्हारे जाने के बाद समझ आया कि सज़ा सिर्फ़ तुम्हें नहीं मिली... मैं भी हर दिन टूटता रहा। जिस घर को मैंने गुस्से में आकर तोड़ दिया था, वही घर तुम्हारे और आरव के बिना वीरान हो गया। आज एहसास होता है कि इंसान से गलती हो सकती है, लेकिन रिश्ते को दूसरा मौका मिलना चाहिए।"

"अगर हो सके... तो मुझे माफ़ कर दो। मैं बीते हुए कल को बदल नहीं सकता, लेकिन आने वाले हर कल को बेहतर बनाने की पूरी कोशिश करूँगा।"

इसके बाद आरव ने दोनों  का हाथ पकड़ते हुए कहा, "चलो ना मम्मी... पापा बुला रहे हैं..."मुझे आप दोनों साथ चाहिए।"

अपने बेटे की मासूम आवाज़ सुनकर हेतवी का सारा गुस्सा जैसे एक पल के लिए पिघल गया। उसने आरव की ओर देखा। उसकी आँखों में अपने मम्मी-पापा को फिर से साथ देखने की जो खुशी थी, उसे देखकर हेतवी कुछ कह नहीं पाई।

कुछ पल बाद उसने धीरे से हिरेन की ओर देखा और बोली,

"ठीक है... मुझे अभी कुछ काम है। वह काम निपटाकर दो दिन में हम घर लौट आएँगे।"

आरव खुशी से उछल पड़ा।

"सच में मम्मी? हम पापा के साथ रहेंगे?"

वह खुशी से हिरेन का हाथ पकड़कर नाचने लगा।

"हम घर जाएँगे... पापा के घर जाएँगे... और पापा के साथ ही रहेंगे। बड़ा मज़ा आएगा!"

आरव की खुशी देखकर हिरेन के चेहरे पर भी बरसों बाद सच्ची मुस्कान आ गई।

घर लौटकर हेतवी ने हर्षी को सारी बात बताई।

"सच कहूँ हर्षी, मेरा वापस उस घर में जाने का बिल्कुल मन नहीं है। जो कुछ हुआ, उसे मैं भूल नहीं सकती। लेकिन आरव की क्या गलती है? वह क्यों अपने पापा के प्यार से वंचित रहे? उसके मन में भी तो यही सवाल होगा कि उसे मम्मी और पापा दोनों का प्यार एक साथ क्यों नहीं मिल सकता?"

हर्षी ने हेतवी का हाथ थामते हुए कहा,

"तूने बिल्कुल सही फैसला लिया है। लेकिन एक बात याद रखना... घर लौटना और रिश्ते को पहले जैसा बना लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। वापस जा, मगर खुद को मत खोना। जो हुआ उसे भूलने की कोशिश मत कर, बस धीरे-धीरे उस दर्द के साथ जीना सीखना। और हिरेन को भी यह समझना होगा कि टूटे हुए विश्वास को दोबारा बनाने में वक्त लगता है।"

हेतवी ने हर्षी की बात चुपचाप सुन ली।

दो दिन बाद वह आरव को लेकर वापस अपने घर लौट आई।

घर वही था...

कमरे वही थे...

दीवारों पर वही तस्वीरें थीं...

लेकिन रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे थे।

हेतवी के मन में अब भी बहुत कुछ टूटा हुआ था और हिरेन के भीतर भी अपराधबोध था। दोनों जानते थे कि सिर्फ़ एक-दूसरे को माफ़ कर देने से सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाएगा।

इसलिए इस बार उन्होंने जल्दबाज़ी नहीं की।

दोनों ने एक-दूसरे को फिर से समझना शुरू किया।

जहाँ पहले शिकायतें थीं, वहाँ धीरे-धीरे बातचीत होने लगी।

जहाँ चुप्पियाँ थीं, वहाँ एक-दूसरे की बात सुनने की कोशिश होने लगी।

विश्वास टूटने के बाद उसे दोबारा जुड़ने में समय लगता है... 

समय बीतता गया।

आरव बड़ा होता गया।

और हिरेन और हेतवी ने भी अपने बीते हुए कल को बदलने की कोशिश करने के बजाय, अपने आज को बेहतर बनाना सीख लिया।

क्योंकि कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ी गलती किसी से भूल हो जाना नहीं होती... बल्कि अपनी गलती को स्वीकार न करना होती हैं।

बल्कि यह है कि जब हमें अपनी गलती का एहसास हो, तब अपने अहंकार को पीछे छोड़कर उस रिश्ते को एक और मौका देने की हिम्मत करें।

उस दिन के बाद उनके घर में फिर से आरव की हँसी गूँजने लगी।

क्योंकि आखिरकार...

अपराधबोध ने अहंकार को हरा दिया था।

Bela...








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