माफ़ी जो कभी मांगी नहीं गई भाग 1

अनकही बातें

माफ़ी जो कभी माँगी नहीं गई

भाग 1

कभी-कभी रिश्ते किसी बड़ी गलती से नहीं टूटते।

बस... छोटी-छोटी बातें मन में जमा होती रहती हैं।

एक शिकायत...

फिर दूसरी शिकायत...

और धीरे-धीरे उन बातों की जगह ख़ामोशी ले लेती है।

कुणाल और काव्या की शादी को पंद्रह साल हो चुके थे।

उनके दो बच्चे थे—बड़ी बेटी अनाया और छोटा बेटा अर्णव

शादी के शुरुआती साल बहुत खूबसूरत थे।

कुणाल और काव्या एक-दूसरे के बहुत करीब थे। कुणाल ऑफिस से लौटकर पूरे दिन की बातें काव्या को बताता और काव्या भी अपनी हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती।

दोनों के बीच शायद ही कोई ऐसी बात होती, जो एक-दूसरे से छिपी रहती।

लेकिन समय के साथ उनके बच्चे बड़े होने लगे और काव्या की दुनिया धीरे-धीरे बच्चों के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई।

अनाया स्कूल से लौटते ही माँ के पास बैठ जाती।

"मम्मी, आज स्कूल में पता है क्या हुआ?"

अर्णव भी अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी सबसे पहले काव्या को बताता।

स्कूल में किसी दोस्त से झगड़ा हुआ हो...

किसी शिक्षक ने डाँटा हो...

किसी बात का डर हो...

या फिर कोई ऐसी गलती, जिसे वह पापा से बताने में झिझकता हो...

बच्चे अपनी हर बात माँ से कह देते थे।

काव्या उनकी बातें सुनती, उन्हें समझाती और जरूरत पड़ने पर डाँटती भी।

लेकिन बच्चों को  अपनी माँ के पास एक अलग तरह की सुरक्षा महसूस होती थी।

धीरे-धीरे काव्या उनके लिए सिर्फ़ माँ नहीं रही।

वह उनकी सबसे भरोसेमंद दोस्त बन गई।

कुणाल यह सब देखता था।

शुरुआत में उसे अच्छा लगता था कि उसके बच्चे अपनी माँ के इतने करीब हैं।

लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में एक सवाल उठने लगा—

"बच्चे अपनी हर बात काव्या को बताते हैं... मुझे क्यों नहीं?"

एक दिन अर्णव स्कूल से घर आया।

कुणाल ने उससे पूछा,

"बेटा, आज स्कूल कैसा था?"

अर्णव ने मुस्कुराकर कहा,

"अच्छा था, पापा।"

और वह अपने कमरे में चला गया।

कुणाल ने देखा कि कुछ देर बाद अर्णव अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया।

दोनों धीमी आवाज़ में बातें करने लगे।

कुणाल दूर से उन्हें देखता रहा।

उसके मन में एक टीस उठी।

"मेरे बच्चे मुझसे अपनी बातें क्यों नहीं करते?"

रात को उसने काव्या से पूछा,

"अर्णव आज कुछ परेशान था क्या?"

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

"हाँ... स्कूल में किसी दोस्त से उसका झगड़ा हो गया था।"

कुणाल ने पूछा,

"उसने मुझे क्यों नहीं बताया?"

काव्या कुछ पल चुप रही।

फिर बोली,

"शायद उसे लगा होगा कि मैं उसकी बात पहले समझूँगी।"

कुणाल को यह बात अच्छी नहीं लगी।

"मैं भी तो उसका पिता हूँ।"

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन चुप रह गई।

कुणाल बच्चों से बहुत प्यार करता था, लेकिन उसका स्वभाव थोड़ा सख्त था। वह चाहता था कि बच्चे जीवन की मुश्किलों का सामना करना सीखें।

काव्या को लगता था कि कुणाल कभी-कभी बच्चों की भावनाओं को समझने से पहले उन्हें डाँट देते हैं।

इसीलिए बच्चे अपनी कई बातें उससे छिपाकर पहले माँ को बताते थे।

काव्या को डर था कि अगर उसने बच्चों की हर बात कुणाल को बता दी, तो शायद बच्चे उससे भी अपनी बातें कहना बंद कर देंगे।

लेकिन वह यह बात कुणाल को समझा नहीं पाई।

और कुणाल ने अपनी तरफ से एक अर्थ निकाल लिया।

उसे लगने लगा कि काव्या जानबूझकर बच्चों को उससे दूर रख रही है।

कुछ दिनों बाद अनाया एक शाम बहुत परेशान होकर काव्या के पास आई।

"मम्मी... आप पापा को मत बताना।"

काव्या ने उसे अपने पास बैठाया।

"क्या हुआ?"

अनाया ने स्कूल की एक परेशानी माँ को बताई।

काव्या ने उसे समझाया और भरोसा दिलाया कि वह सब ठीक कर देगी।

अनाया ने फिर कहा,

"लेकिन पापा को मत बताना। प्लीज़।"

काव्या ने उसकी बात मान ली।

उसी रात कुणाल ने अनाया से पूछा,

"बेटा, आज तुम कुछ परेशान लग रही हो।"

अनाया ने मुस्कुराकर कहा,

"नहीं पापा, कुछ नहीं।"

कुणाल ने काव्या की तरफ देखा।

उसकी आँखों में एक सवाल था।

रात को उसने काव्या से पूछा,

"अनाया को क्या हुआ है?"

काव्या चुप रही।

कुणाल ने फिर पूछा,

"क्या तुमने उससे कुछ सुना है?"

काव्या ने धीरे से कहा,

"कुछ नहीं है।"

कुणाल को यह बात चुभ गई।

"काव्या, तुम मुझसे बच्चों की बातें क्यों छिपाती हो?"

काव्या ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

"मैं कुछ छिपाती नहीं हूँ।"

"तो फिर मुझे उनके बारे में बाद में क्यों पता चलता है?"

काव्या कुछ पल चुप रही।

वह कहना चाहती थी—

"क्योंकि बच्चे मुझसे अपनी बातें इसलिए कहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं उन्हें बिना डाँटे सुनूँगी।"

लेकिन वह कह नहीं पाई।

और कुणाल भी अपनी असली बात नहीं कह पाया।

वह कहना चाहता था—

"मुझे बच्चों से दूर होने का डर लगता है। मुझे लगता है कि तुम उनके और मेरे बीच एक दीवार बनती जा रही हो।"

लेकिन उसने भी कुछ नहीं कहा।

उस रात दोनों अलग-अलग करवट लेकर सो गए।

कुणाल के मन में एक सवाल था—

"क्या काव्या सच में मुझे बच्चों से दूर कर रही है?"

और काव्या के मन में दूसरा—

"क्या कुणाल कभी समझ पाएँगे कि मैं बच्चों की बातें उनसे क्यों नहीं कह पाती?"

दोनों के पास अपने-अपने सवाल थे।

लेकिन...

किसी के पास जवाब सुनने की हिम्मत नहीं थी।

उस रात के बाद उनके बीच बातें पहले से थोड़ी कम हो गईं।

अब कुणाल घर आकर काव्या से यह नहीं पूछता था—

"आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?"

वह सिर्फ़ पूछता—

"बच्चों ने खाना खाया?"

काव्या भी अब यह नहीं पूछती थी—

"ऑफिस में आज क्या हुआ?"

वह सिर्फ़ कहती—

"कल अनाया को स्कूल से ले आना।"

धीरे-धीरे उनकी बातचीत बच्चों, घर और जरूरत की चीज़ों तक सिमट गई।

जो बातें कभी घंटों चलती थीं...

अब दो मिनट में खत्म हो जाती थीं।

कभी-कभी दोनों एक ही कमरे में बैठे रहते।

लेकिन उनके बीच कोई बातचीत नहीं होती।

कुणाल कई बार काव्या से बात करना चाहता।

वह कहना चाहता—

"मुझे बच्चों से दूर मत करो।"

लेकिन उसे डर था कि काव्या उसकी बात को गलत समझेगी।

काव्या भी कई बार कुणाल से कहना चाहती—

"मैं तुम्हें बच्चों से दूर नहीं कर रही हूँ। मैं सिर्फ़ उनकी बातें इसलिए सुनती हूँ क्योंकि वे मुझ पर भरोसा करते हैं।"

लेकिन उसे भी डर था कि कुणाल उसकी बात समझेंगे नहीं।

और इस डर ने दोनों को चुप कर दिया।

समय बीतता गया।

बच्चे बड़े होते गए।

और कुणाल और काव्या...

एक ही घर में रहते हुए भी धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होते गए।

कभी-कभी रिश्तों में दूरी अचानक नहीं आती।

पहले बातें कम होती हैं...

फिर सवाल कम होते हैं...

और एक दिन ख़ामोशी ही दोनों के बीच सबसे बड़ी बातचीत बन जाती है।

क्रमशः...

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