खामोशी

मजबूर 

मजबूर थे हम, इसलिए ख़ामोश रहे,
वरना मोहब्बत में शोर बहुत करते हैं।
तुम समझे हमें बेवफ़ा,
हम हाल-ए-दिल किसे कहते हैं।

मजबूरियाँ पूछती नहीं मर्ज़ी दिल की, 
वक़्त के आगे सबको झुकना पड़ता है।
चाह कर भी रोक ना सके तुम्हें, 
कभी-कभी हार कर भी मुस्कुराना पड़ता है।

तुमने तो बस मेरे जाने को देखा,
मेरे रुकने की वजह ना पूछी।
मजबूर था मैं, टूट कर भी हँसा, 
तुमने मेरी आँखों की नमी ना देखी।

इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई सर-आँखों पर, 
पर सच तो ये है ऐ सनम,
तुझे पाने की दुआ के साथ,
तुझे खोने की मजबूरी भी लिखी थी क़िस्मत में।

Bela...


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