यह लंबा सफ़र

आज पहली बार  
ऐसा लग रहा है,  
जैसे ट्रेन का यह लंबा  
सफ़र कभी ख़त्म ही ना हो।  

जहाँ मेरी मंज़िल है,  
जहाँ मुझे जाना है,  
वो घर कभी आए ही नहीं,  
वो घर जाना ही नहीं।  

वो अपने जो कभी मेरे थे,  
वो आज अपने हैं ही नहीं।  
सारे रिश्ते अब  
बंधन से लगने लगे हैं,  
सारे अपने  
पराए से लगने लगे हैं।  

जिसे हम दिल से  
अपना कह सकें,  
या मान सकें,  
वैसा अब इस  
मतलबी दुनिया में  
कोई है ही नहीं।  

Bela...

Comments