यह लंबा सफ़र
आज पहली बार
ऐसा लग रहा है,
जैसे ट्रेन का यह लंबा सफ़र
कभी ख़त्म ही न हो।
खिड़की से दिखती
नदियाँ, पहाड़, पेड़
और दूर तक फैले खेत,
जैसे मेरे साथ-साथ चल रहे हों,
मुझे अपने संग
कहीं दूर ले जाना चाहते हों।
इसलिए आज ना जाने क्यों
मेरा मन कहता है,
जहाँ मेरी मंज़िल है,
जहाँ मुझे पहुँचना है,
वो घर कभी आए ही नहीं,
और
अब मुझे वहाँ जाना ही नहीं।
वो अपने,
जो कभी सिर्फ़ मेरे थे,
आज अपने लगते ही नहीं।
सारे रिश्ते अब
बंधन-से लगने लगे हैं,
सारे अपने
पराए-से लगने लगे हैं।
जिसे दिल से
अपना कह सकूँ,
जिसके सामने
अपने दर्द भी रख सकूँ,
शायद अब
ऐसा इस दुनिया में
कोई है ही नहीं।
अब तो बस
यही दिल कहता है,
मेरी ज़िंदगी का
यह लंबा सफ़र
यूँ ही चलता रहे,
और यह ट्रेन
मेरी मंज़िल तक
कभी पहुँचे ही नहीं...
Bela...
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