समझौता अपने आप से या ज़िंदगी से भाग 9



*Episode 9: "मौत की भविष्यवाणी - अंतिम अध्याय"*  
*लेखिका: बेला पुनीवाला | शब्द: 1061*

3 साल बीत गए। अजय जेल में था। उम्रकैद। कविता अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी और दिल्ली में एक स्कूल में टीचर थी। राघव ने "मौत की भविष्यवाणी" पर एक किताब लिख दी थी - बेस्टसेलर बन गयी थी। सब कुछ सामान्य लग रहा था... जब तक उस दिन पोस्टमैन नहीं आया।

राघव के नाम एक रजिस्टर्ड पोस्ट थी। भेजने वाले का नाम नहीं। उसने लिफाफा खोला। अंदर एक पुरानी फोटो थी - हॉस्टल की छत की। उसी रात की, जब सुरेश मरा था। फोटो में 5 लोग साफ दिख रहे थे - राघव, शर्मा, विक्रम, सुरेश... और पीछे अँधेरे में एक और साया। पर इस बार फोटो के पीछे कुछ लिखा था, लाल स्याही से:

*"कहानी अभी खत्म नहीं हुई राघव। असली कातिल अभी आज़ाद है। 7 दिन... अंतिम बार।"*

राघव के हाथ से फोटो गिर गयी। अजय तो जेल में है। फिर ये किसने भेजा? और "असली कातिल" का क्या मतलब? क्या अजय ने सुरेश को नहीं मारा था? 

उसने तुरंत विक्रम और इंस्पेक्टर राठौड़ को बुलाया। राठौड़ रिटायर हो चुके थे, पर केस सुनते ही दौड़े चले आये। तीनों ने फोटो को मेज पर रखकर घूरा। 
"ये साया कौन है?" राठौड़ ने फोटो पर उंगली रखी। 
"सर, ये तो..." विक्रम का चेहरा सफेद पड़ गया। "ये तो हॉस्टल का चौकीदार है... राम सिंह।" 
"राम सिंह? वो तो..." राघव को याद आया। "सुरेश की मौत के 1 हफ्ते बाद उसकी लाश रेल की पटरी पर मिली थी। पुलिस ने आत्महत्या कहा था।" 
"आत्महत्या नहीं थी राघव," राठौड़ की आवाज़ भारी हो गयी। "मैं उस केस का इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर था। राम सिंह की लाश पर संघर्ष के निशान थे। किसी ने उसे रेल के आगे फेंका था। पर ऊपर से दबाव आया... केस बंद कर दिया।" 

कमरे में सन्नाटा छा गया। मतलब उस रात 5 नहीं, 6 लोग थे। और राम सिंह भी मारा गया था। पर क्यों?

राघव को अचानक याद आया। "रुको! सुरेश के पास एक डायरी थी। लाल कवर वाली। पुलिस ने कहा था वो नहीं मिली। क्या वो..." 
"हाँ," विक्रम बोला। "सुरेश हमेशा उसमें लिखता था। कहता था 'इसमें मेरे सारे राज़ हैं'।" 

तीनों उसी रात पुराने हॉस्टल गए। अब वो खंडहर बन चुका था। छत पर पहुँचकर राघव को वो जगह याद आ गयी जहाँ सुरेश गिरा था। वहीं पास में एक टूटी हुई ईंट थी। विक्रम ने ईंट हटायी। नीचे एक छोटा सा डिब्बा था, जंग खाया हुआ। डिब्बे में वही लाल डायरी थी। 

डायरी के आखिरी पन्ने पर सुरेश ने लिखा था: 
_"15 अगस्त 2001, रात 11:30 बजे। मैंने राम सिंह को वार्डन के कमरे से पैसे चुराते देख लिया। उसने मुझे देख लिया। कह रहा था 'मुँह बंद रखेगा तो ज़िंदा रहेगा'। मैं डर गया हूँ। कविता को बता दूँ? या राघव को? अगर मुझे कुछ हो गया तो समझ लेना राम सिंह ने..."_ 
आगे के पन्ने फटे हुए थे। 

"तो सुरेश को राम सिंह ने धक्का दिया?" राघव बुदबुदाया। 
"नहीं," राठौड़ ने डायरी बंद की। "राम सिंह ने धक्का नहीं दिया। उसे फंसाया गया। असली कातिल वो है जो चाहता था कि सुरेश भी मरे... और राम सिंह भी। ताकि राज़ राज़ ही रहे।" 
"पर कौन?" विक्रम चीखा। "अजय तो कबूल कर चुका है!" 
"अजय को लगा उसने धक्का दिया," राठौड़ ने ठंडी साँस ली। "पर अंधेरे में उसने सिर्फ धक्का देने की कोशिश की। सुरेश फिसला, पर गिरा नहीं। उसे किसी और ने... पीछे से धक्का देकर गिराया। और वो कोई..." 

तभी छत के दरवाज़े से आवाज़ आयी। "और वो कोई मैं था।" 
तीनों ने चौंककर देखा। सामने वार्डन खड़ा था। 23 साल बाद। बूढ़ा हो चुका था, लाठी के सहारे। पर आँखों में वही वहशीपन। 
"हैरान हो? हाँ राघव, मैं ही हूँ। सुरेश ने राम सिंह को चोरी करते देख लिया था। राम सिंह मेरा आदमी था। हॉस्टल का सारा पैसा हम मिलकर खा रहे थे। अगर सुरेश बोल देता, तो मैं बर्बाद हो जाता। इसीलिए उस रात मैं भी छत पर था। अजय ने धक्का दिया, पर सुरेश रेलिंग पकड़कर बच गया। तब मैंने पीछे से... बस एक हल्का सा धक्का। वो गिर गया।" 
"और राम सिंह?" राठौड़ दहाड़ा। 
"उसे लगा मैं उसे बचा लूँगा। पर गवाह ज़िंदा नहीं छोड़ते राठौड़ साहब। एक हफ्ते बाद उसे भी रेल के आगे... समझ गए ना?" वार्डन हँसा। "और तुम तीनों को 23 साल तक नचाया। अजय को जेल भिजवाया, कविता को पागलखाने। मज़ा आया।" 

वार्डन ने कोट से रिवॉल्वर निकाली। "पर अब खेल खत्म। तुम तीनों बहुत जान गए हो। आज इस छत से तीन और लाशें गिरेंगी। पुलिस कहेगी 'पुराने दोस्त, नशे में गिर गए'। कहानी खत्म।" 

तभी सीढ़ियों से और पैरों की आहट आयी। कविता। उसके पीछे 2 पुलिसवाले। कविता के हाथ में एक टेप रिकॉर्डर था। 
"वार्डन साहब, कहानी खत्म नहीं हुई। अभी तो शुरू हुई है," कविता ने टेप रिकॉर्डर ऑन किया। उसमें वार्डन की पूरी कबूलनामे की आवाज़ गूँज रही थी। "मैं 3 साल से आपका पीछा कर रही थी अंकल। मुझे शक था। आज आपने खुद सब उगल दिया।" 

वार्डन का चेहरा फक पड़ गया। उसने रिवॉल्वर राघव पर तानी। "तो मरने से पहले एक को तो ले जाऊँगा!" 
गोली चलने से पहले ही राठौड़ ने लाठी मारकर वार्डन का हाथ उड़ा दिया। गोली हवा में चली गयी। पुलिसवालों ने वार्डन को दबोच लिया।

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*7 दिन बाद। कोर्ट रूम।* 
वार्डन को डबल उम्रकैद हुई। सुरेश और राम सिंह की हत्या का केस 23 साल बाद बंद हुआ। 

कोर्ट के बाहर राघव, कविता, विक्रम और राठौड़ खड़े थे। कविता की आँखों में आँसू थे, पर इस बार सुकून के। 
"भैया को सच में इंसाफ मिल गया राघव," वो बोली। 
"हाँ कविता," राघव ने आसमान की तरफ देखा। "अब कोई मौत की भविष्यवाणी नहीं आएगी। अब सिर्फ ज़िंदगी होगी।" 

राठौड़ ने राघव के कंधे पर हाथ रखा। "किताब का आखिरी चैप्टर लिख दो बेटा। नाम रखना - 'अंतिम अध्याय'। दुनिया को पता चलना चाहिए कि देर से ही सही, पर इंसाफ होता ज़रूर है।" 

राघव ने जेब से वही पीला लिफाफा निकाला, जो 3 साल पहले आया था। उसने उसके टुकड़े-टुकड़े किये और हवा में उड़ा दिए। कागज़ के टुकड़े उड़ते हुए धूप में चमक रहे थे। 

*मौत की भविष्यवाणी खत्म हुई थी। ज़िंदगी की नई इबारत शुरू हो चुकी थी।*

*[Series समाप्त]*

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