समझौता अपने आप से या ज़िंदगी से भाग - 8



*Episode 8: "मौत की भविष्यवाणी - कविता की वापसी"*  
*लेखिका: बेला पुनीवाला 

6 महीने बीत चुके थे। राघव की ज़िंदगी पटरी पर लौट आयी थी। नेहा और परी के साथ वो दिल्ली शिफ्ट हो गया था। "मौत की भविष्यवाणी" वाले काले दिन अब एक बुरे सपने जैसे लगते थे। कविता को पुलिस ने मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया था। डॉक्टर का कहना था - "गहरा सदमा, सालों लगेंगे ठीक होने में।"

पर उस रात... फिर वही हुआ।

रात के 1 बजे राघव की नींद टूटी। तकिये के नीचे कुछ चुभ रहा था। उसने हाथ डाला तो एक पीला लिफाफा निकला। वही टेढ़े-मेढ़े अक्षर, वही पुरानी स्याही। राघव के हाथ काँप गए। उसने लिफाफा खोला। अंदर सिर्फ 3 शब्द थे: 

*"मैं वापस आ गयी।"*

राघव के माथे पर पसीना आ गया। कविता? मेंटल हॉस्पिटल से? असंभव! उसने तुरंत इंस्पेक्टर राठौड़ को फोन किया। 
"सर, कविता भाग गयी क्या?" 
"नहीं राघव। वो अभी भी हॉस्पिटल में है। हाई सिक्योरिटी वार्ड में। कल ही डॉक्टर से बात हुई थी। क्यों, क्या हुआ?" 
राघव ने फोन काट दिया। अगर कविता हॉस्पिटल में है, तो ये खत किसने रखा? 

उसने नेहा को देखा। वो गहरी नींद में थी। परी अपने कमरे में सो रही थी। राघव ने पूरा घर छान मारा। खिड़कियाँ बंद, दरवाज़े लॉक। कोई अंदर नहीं आया था। तो फिर ये लिफाफा तकिये के नीचे कैसे पहुँचा? 

अगली सुबह राघव सीधा विक्रम के पास गया। विक्रम ने लिफाफा देखा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया। 
"राघव, ये कविता की हैंडराइटिंग नहीं है।" 
"क्या मतलब?" 
"मतलब ये कि कविता ने ये खत नहीं लिखा। किसी और ने लिखा है... किसी ने जो कविता की हैंडराइटिंग कॉपी कर रहा है।" 
"पर क्यों? कविता तो बंद है।" 
विक्रम ने गहरी साँस ली। "राघव, 20 साल पहले सुरेश की मौत वाले दिन... छत पर 4 लोग नहीं, 5 लोग थे।"

राघव उछल पड़ा। "क्या बकवास है? हम 4 ही थे!" 
"नहीं। एक और था। सुरेश का रूममेट। अजय। बहुत शांत लड़का। हमेशा किताबों में घुसा रहता था। सुरेश की मौत के बाद वो गायब हो गया। सबने सोचा घर चला गया। पर वो गया नहीं था राघव... वो छुप गया था।"

राघव के दिमाग में धमाका हुआ। अजय! हाँ, वो था। चश्मे वाला, दुबला-पतला। हमेशा लाइब्रेरी में मिलता था। सुरेश की मौत के बाद वो दिखा ही नहीं। 
"अजय का क्या रोल है इसमें?" 
"सुन। अजय, सुरेश से जलता था। सुरेश टॉपर था, पॉपुलर था। अजय... अजय को लगता था सुरेश की वजह से उसे कोई नहीं पूछता। और सबसे बड़ी बात - अजय को कविता से प्यार था। एकतरफा। पागलों वाला प्यार।" 

राघव की साँस रुक गयी। "तो सुरेश को..." 
"हाँ। अजय ने धक्का दिया था सुरेश को। तुम तीनों तो बस बहस कर रहे थे। धक्का अजय ने दिया, और भाग गया। और फिर 20 साल तक गायब रहा। पर जब उसे पता चला कि कविता ने तुम लोगों को खत भेजे, तो वो डर गया। उसे लगा कहीं कविता पकड़ी गयी तो उसका राज़ खुल जाएगा। इसीलिए... इसीलिए उसने कविता बनकर तुम्हें खत भेजने शुरू किये। शर्मा को भी उसी ने मारा, कविता बनकर।" 

"तो कविता बेकसूर है?" राघव फुसफुसाया। 
"पूरी तरह। उसे सच में लगता था कि तुम लोगों ने सुरेश को मारा। अजय ने ही उसे सालों तक ये झूठ फीड किया था। वो हॉस्पिटल में इसलिए है क्योंकि अजय ने उसके दिमाग से खेला।"

उसी रात राघव के घर की बत्ती फिर गयी। अँधेरे में फिर वही पैरों की आहट। इस बार आवाज़ सीढ़ियों से नहीं, परी के कमरे से आ रही थी। राघव का खून जम गया। वो भागकर परी के कमरे की तरफ लपका। दरवाज़ा खोलते ही वो जड़ हो गया। 

कमरे में अजय खड़ा था। 20 साल बाद। बूढ़ा हो चुका था, पर वो चश्मा... वही चश्मा। उसके एक हाथ में चाकू था, और दूसरा हाथ परी के मुँह पर था। परी की आँखें डर से फैली हुई थीं। 
"हिलो मत राघव," अजय फुसफुसाया। "वरना ये भी अपने पापा के पास चली जाएगी... जैसे सुरेश गया था।" 
"अजय, छोड़ दो उसे। तुम्हारी दुश्मनी मुझसे है।" 
"दुश्मनी? नहीं राघव। ये इंसाफ है। सुरेश ने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की। कविता सिर्फ उसे देखती थी। और तुम तीनों... तुम तीनों ने मिलकर मुझे ज़ीरो बना दिया। अब मैं तुम सबको ज़ीरो बना दूँगा।" 

तभी पीछे से आवाज़ आयी। "अजय, बस कर।" 
दरवाज़े पर इंस्पेक्टर राठौड़ और विक्रम खड़े थे। राठौड़ की रिवॉल्वर अजय पर तनी थी। 
"कैसे... कैसे पता चला?" अजय हकलाया। 
"तुम्हारी गलती," विक्रम बोला। "तुमने 20 साल पुराना कागज़ इस्तेमाल किया खत के लिए। वो कागज़ सिर्फ हॉस्टल के लाइब्रेरियन के पास था। और लाइब्रेरियन का बेटा... मैं हूँ। पापा ने मरने से पहले बताया था कि अजय ने उनसे वो कागज़ चुराए थे। हम 6 महीने से तुम्हें ढूँढ रहे थे अजय।" 

अजय ने परी को और कस के पकड़ लिया। "एक कदम और... और मैं..." 
तभी परी ने अजय के पैर पर ज़ोर से काट लिया। अजय चीखकर पीछे हटा, और उसी पल राठौड़ ने गोली चला दी। गोली अजय के कंधे में लगी। चाकू छूटकर गिर गया। राघव ने लपककर परी को अपनी बाँहों में भर लिया।

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*एक हफ्ते बाद। मेंटल हॉस्पिटल।* 
राघव कविता के सामने बैठा था। कविता अब होश में थी। डॉक्टर ने बताया था कि अजय के पकड़े जाने के बाद उसकी दवाइयों का असर होने लगा है। 
"मुझे माफ कर दो राघव," कविता की आँखों में आँसू थे। "मैंने तुम पर शक किया। मैंने..." 
"शशश," राघव ने उसका हाथ थाम लिया। "तुम्हारी कोई गलती नहीं कविता। तुम भी अजय की शिकार थी। 20 साल... उसने हम सबकी ज़िंदगी नर्क बना दी।" 
"भैया..." कविता फूट-फूट कर रो पड़ी। "भैया को इंसाफ मिला?" 
"हाँ कविता। सुरेश को इंसाफ मिल गया। और तुम्हें भी।" 

राघव ने जेब से एक फोटो निकाली - सुरेश की वही मुस्कुराती हुई फोटो। पीछे लिखा था: *"मेरी कविता, मेरी ज़िंदगी। हमेशा खुश रहना।"* 
उसने फोटो कविता के हाथ में रख दी। "ये तुम्हारे भैया की आखिरी निशानी। अब आगे देखो।" 

खिड़की से सूरज की रोशनी अंदर आ रही थी। 20 साल बाद पहली बार कविता के चेहरे पर सच्ची मुस्कान थी। मौत की भविष्यवाणी का दौर खत्म हो चुका था। अब ज़िंदगी की नई शुरुआत थी।

Bela...

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