*Episode 7: "मौत की भविष्यवाणी - दूसरा खत"*
*लेखिका: बेला पुनीवाला
रात के 2 बज रहे थे। शहर सो रहा था, पर राघव की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसके हाथों में वो पीला पड़ चुका लिफाफा काँप रहा था। लिफाफे पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी, वही पुरानी स्याही से, वही टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में:
*"तुम्हारी मौत 7 दिन में। तैयार रहना।"*
ये दूसरा खत था। पहला खत उसके पड़ोसी शर्मा जी को आया था... और ठीक 7 दिन बाद शर्मा जी की लाश उनके ही कमरे में पंखे से लटकती मिली थी। पुलिस ने उसे "आत्महत्या" कह कर फाइल बंद कर दी थी। पर राघव जानता था... वो आत्महत्या नहीं थी। वो खत... वो भविष्यवाणी... सच हुई थी।
राघव ने लिफाफा मेज पर पटक दिया। उसका गला सूख रहा था। उसने अपनी पत्नी नेहा को देखा, जो बेड पर चैन की नींद सो रही थी। उनकी 6 साल की बेटी परी, नेहा से चिपक कर सोयी थी। "अगर मुझे कुछ हो गया तो इनका क्या होगा?" राघव के दिमाग में यही सवाल हथौड़ा मार रहा था।
अचानक उसके फोन पर मैसेज आया। अनजान नंबर। उसने काँपते हाथों से फोन उठाया। मैसेज में सिर्फ एक फोटो थी - उसी लिफाफे की, जो अभी उसके सामने मेज पर पड़ा था। और उसके नीचे लिखा था:
*"भागना मत राघव। मौत से कोई नहीं भाग सका। शर्मा से पूछ लेना... ऊपर।"*
राघव के पैरों तले जमीन खिसक गयी। कोई उसके घर के अंदर की खबर रख रहा था। कोई जो जानता था कि खत उसके हाथ में है। पर कौन?
अगली सुबह राघव सीधा पुलिस स्टेशन गया। इंस्पेक्टर राठौड़ ने खत को उल्टा-पुल्टा करके देखा और हँस दिया। "राघव जी, आप राइटर हैं, मानता हूँ। पर ये क्या बचकानी हरकत है? कोई आपको डरा रहा है। आप घर जाइये, आराम कीजिये।"
"पर शर्मा जी?" राघव चीखा।
"शर्मा जी ने लोन लिया था। कर्ज में डूबे थे। उन्होंने जान दे दी। इस खत का उनसे कोई लेना-देना नहीं," राठौड़ ने फाइल बंद करते हुए कहा।
राघव समझ गया, पुलिस से उम्मीद करना बेकार है। उसे खुद ही पता लगाना होगा। उसने शर्मा जी के घर का चक्कर लगाया। घर पर ताला लगा था। उनका बेटा राहुल, मुंबई में जॉब करता था। राघव ने उसे फोन किया।
"राहुल, तुम्हारे पापा को कोई खत मिला था क्या मरने से पहले?"
दूसरी तरफ लंबे सन्नाटे के बाद राहुल की आवाज़ आयी, "हाँ राघव अंकल... एक पीला लिफाफा। पापा ने मुझे दिखाया था। मैं मज़ाक समझ कर हँस पड़ा था। कहा था 'पापा, कोई आप से प्रैंक कर रहा है'... काश मैं सीरियस ले लेता।" राहुल की आवाज़ भर आ गयी।
राघव के पास अब 6 दिन बचे थे। उसने अपना पुराना दोस्त, एक प्राइवेट डिटेक्टिव, विक्रम को बुलाया। विक्रम ने खत को फोरेंसिक लैब में भेजा। रिपोर्ट अगले दिन आयी - *खत पर कोई फिंगरप्रिंट नहीं था। स्याही 20 साल पुरानी थी। और कागज़... कागज़ भी उसी मिल का था जो 2001 में बंद हो चुकी थी।*
"ये काम किसी पुराने दुश्मन का है राघव। सोचो, 20 साल पहले तुमने किसका दिल दुखाया था?" विक्रम ने पूछा।
राघव का दिमाग 20 साल पीछे चला गया। कॉलेज के दिन। वही हॉस्टल। वही 4 दोस्त - राघव, शर्मा, विक्रम... और सुरेश। सुरेश... जो एक रात हॉस्टल की छत से गिर कर मर गया था। पुलिस ने उसे "एक्सीडेंट" कहा था, पर हॉस्टल में अफवाह थी कि सुरेश को किसी ने धक्का दिया था। उस रात छत पर राघव और शर्मा भी थे। क्या सुरेश लौट आया है? बदला लेने?
तीसरे दिन रात को राघव के दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा खोला तो सामने कोई नहीं था। ज़मीन पर एक और लिफाफा पड़ा था। इस बार उसमें खत नहीं, एक फोटो थी। फोटो में राघव, शर्मा, और विक्रम... तीनों हॉस्टल की छत पर खड़े थे, और नीचे सुरेश की लाश पड़ी थी। फोटो के पीछे लिखा था: *"तुम तीनों ने मुझे धक्का दिया था। अब मेरी बारी। 4 दिन बाकी।"*
राघव का खून जम गया। उस रात वो तीनों छत पर थे, पर उन्होंने धक्का नहीं दिया था। सुरेश नशे में था, पाँव फिसल गया था। पर ये फोटो किसने ली? उस रात तो छत पर कोई चौथा नहीं था... या था?
राघव ने विक्रम को फोन किया। "विक्रम, सुरेश की कोई बहन या भाई था क्या?"
"बहन... हाँ। कविता। पर वो तो सुरेश के मरने के 1 साल बाद गाँव चली गयी थी। कहती थी 'ये शहर मेरे भाई का खूनी है'।"
कविता। राघव के दिमाग में बिजली कौंधी। कविता सुरेश से 2 साल छोटी थी। बहुत शांत, बहुत चुप रहने वाली। सुरेश की मौत के बाद उसने कॉलेज छोड़ दिया था। क्या वो लौट आयी है? बदला लेने?
पाँचवे दिन राघव ने नेहा और परी को नेहा के मायके भेज दिया। "तुम लोग सेफ रहो। मैं 2 दिन में आ जाऊँगा।" नेहा ने बहुत पूछा, पर राघव ने सच नहीं बताया।
रात के 12 बजे राघव अपने कमरे में अकेला था। अचानक लाइट चली गयी। पूरा घर अँधेरे में डूब गया। उसी अँधेरे में उसे पैरों की आहट सुनाई दी। सीढ़ियों पर... उसके कमरे की तरफ बढ़ती हुई। राघव ने ड्रॉअर से पापा की पुरानी रिवॉल्वर निकाल ली।
"कौन है?" उसने चीख कर पूछा।
जवाब में सिर्फ एक औरत की हँसी गूँजी। ठंडी, रूह कँपा देने वाली हँसी।
"राघव... 2 दिन बाकी हैं। डर लग रहा है ना? सुरेश को भी लगा था... जब तुम तीनों ने उसे छत से फेंका था।"
"हमने नहीं फेंका कविता! वो गिर गया था!" राघव चिल्लाया।
"झूठ!" आवाज़ अब कमरे के अंदर थी। "मेरे पास सबूत है। तुम तीनों ने मिलकर मेरे भाई को मारा। अब तुम तीनों मरोगे। शर्मा जा चुका है। अब तुम्हारी बारी... और उसके बाद विक्रम की।"
तभी बिजली आ गयी। कमरा रोशनी से भर गया। सामने कोई नहीं था। खिड़की खुली थी, और हवा से पर्दा हिल रहा था। मेज पर एक तीसरा खत पड़ा था। राघव ने काँपते हाथों से उठाया। उसमें लिखा था:
*"कल रात 12 बजे। हॉस्टल की छत। अकेले आना। अगर पुलिस या विक्रम को बताया, तो नेहा और परी... समझ गए ना? अंतिम इच्छा हो तो लिख लेना। तुम्हारा, सुरेश की बहन।"*
छठे दिन राघव ने विक्रम को सब बता दिया। दोनों ने प्लान बनाया। पुलिस को बताना खतरे से खाली नहीं था। विक्रम छुप कर राघव के पीछे हॉस्टल जाएगा।
रात के 12 बजे। हॉस्टल की छत। 20 साल बाद राघव फिर वहाँ खड़ा था। नीचे वही ज़मीन, जहाँ सुरेश की लाश गिरी थी। ठंडी हवा में एक साया उभरा।
"आ गए राघव? बहुत अच्छा। अब हिसाब होगा।"
सामने कविता खड़ी थी। 20 साल पहले वाली दुबली-पतली लड़की नहीं, एक मज़बूत, नफरत से भरी औरत। उसके हाथ में पुरानी रिवॉल्वर थी - बिलकुल राघव के पापा वाली।
"तुमने मेरे भाई को मारा। अब तुम मरोगे।"
"रुको कविता!" राघव चीखा। "सुरेश को हमने नहीं धक्का दिया। उस दिन... उस दिन छत पर चौथा इंसान भी था।"
"झूठ!"
"नहीं! सुरेश के हाथ में उस दिन एक फोटो थी। तुम्हारी फोटो। वो कह रहा था 'मैं कविता से शादी करूँगा, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए'। शर्मा ने उसका मज़ाक उड़ाया। कहा 'तेरी बहन है वो'। सुरेश गुस्से में शर्मा की तरफ लपका, पाँव फिसला, और..."
कविता का हाथ काँप गया। "फोटो? कौनसी फोटो?"
"जो उसके जेब से मिली थी। पुलिस ने हमें दी थी। उसके पीछे लिखा था 'मेरी कविता, मेरी ज़िंदगी'।"
तभी छत के दरवाज़े से विक्रम और इंस्पेक्टर राठौड़ अंदर आये। राठौड़ के हाथ में वही 20 साल पुरानी फाइल थी। "कविता, हम तुम्हें 20 साल से ढूँढ रहे थे। सुरेश की मौत एक्सीडेंट थी। पर तुमने उसके गम में अपना मानसिक संतुलन खो दिया। तुमने शर्मा को मारा, और अब राघव को मारना चाहती हो।"
कविता ने रिवॉल्वर अपनी कनपटी पर रखी। "नहीं! तुम सब झूठ बोल रहे हो! भैया ने मुझे बताया था... उसने खुद बताया था कि तुम तीनों..."
"कविता, सुरेश मर चुका है। वो तुमसे बात नहीं कर सकता। ये तुम्हारे दिमाग का वहम है," विक्रम ने धीरे से कहा।
कविता की आँखों से आँसू बह निकले। 20 साल की नफरत, 20 साल का वहम... एक पल में बिखर गया। उसने रिवॉल्वर नीचे गिरा दी।
*सातवें दिन सुबह।*
राघव ज़िंदा था। सूरज निकल रहा था। उसने नेहा और परी को फोन किया। "मैं आ रहा हूँ। सब ठीक है।"
नीचे पुलिस की गाड़ी में कविता बैठी थी, खाली आँखों से आसमान को देख रही थी। उसके हाथ में वही पीला लिफाफा था। पर इस बार उस लिफाफे में कोई "मौत की भविष्यवाणी" नहीं थी। उसमें सुरेश की एक मुस्कुराती हुई फोटो थी, और पीछे लिखा था: *"मेरी कविता, मेरी ज़िंदगी। हमेशा खुश रहना।"*
राघव ने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा, "माफ कर देना सुरेश... हम तुझे बचा नहीं पाये। पर तेरी बहन को बचा लिया।"
Bela...
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