समझौता अपने आप से या ज़िंदगी से
*Episode Title:* `शर्मिला का साया`
स्वीटू की चीख "माँ... माँ... मुझे छोड़कर मत जाओ माँ!" सुनकर सुषमा सीढ़ियों से नीचे भागी। उसका दिल धक-धक कर रहा था। पीछे-पीछे सुमीत भी आ गया।
स्वीटू का कमरा हॉल के कोने में था। गुलाबी दीवारें, टेडी बियर, और एक छोटी सी स्टडी टेबल। स्वीटू बिस्तर पर बैठी थी, आँखें बंद, पर लगातार रो रही थी। "मम्मी, आप कहाँ हो? मुझे डर लगता है। बड़े पापा कहते हैं आप तारों में हो, पर मैं आपको देख नहीं पाती।"
सुषमा भागकर स्वीटू के पास गई और उसे गले से लगा लिया। "मैं हूँ न बेटा। तेरी छोटी माँ। डर मत।" सुषमा ने उसका माथा सहलाया। स्वीटू का बदन बुखार से तप रहा था।
सुमीत दरवाजे पर खड़ा देख रहा था। उसकी आँखों में दर्द और लाचारी साफ दिख रही थी। वो धीरे से बोला, "इसे अक्सर ऐसे सपने आते हैं। जिस दिन शर्मिला... जिस दिन हादसा हुआ था, उस दिन से। डॉक्टर ने कहा है पोस्ट ट्रॉमा है। समय लगेगा।"
सुषमा ने स्वीटू को पानी पिलाया और लिटा दिया। "आप चिंता मत कीजिए। मैं इसके पास बैठती हूँ।" सुषमा ने सुमीत की तरफ बिना देखे कहा।
सुमीत कुछ पल खड़ा रहा, फिर धीरे से चला गया। उसके जाने के बाद सुषमा ने स्वीटू के माथे पर पट्टी रखी। स्वीटू नींद में भी सुषमा का हाथ पकड़े हुई थी। "छोटी माँ, आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी न? बड़ी माँ की तरह?"
सुषमा का गला रुंध गया। उसने स्वीटू के बालों में उँगलियाँ फेरीं। "नहीं बेटा। मैं कहीं नहीं जाऊँगी। वादा।"
सुबह पाँच बजे का अलार्म बजा। सुषमा चौंक कर उठी। वो रात भर स्वीटू के बिस्तर के पास ही सो गई थी। स्वीटू अब आराम से सो रही थी, बुखार उतर गया था। सुषमा ने धीरे से उसका हाथ छुड़ाया और अपने कमरे में आ गई।
सुमीत पहले से ही तैयार था। आज उसने काली पैंट और नेवी ब्लू शर्ट पहनी थी। हाथ में टिफिन था। सुषमा को देखकर वो थोड़ा रुका।
"रात भर जागी हो तुम। थक गई होगी। आज घर पर आराम करो। माजी से कह दूँगा।" सुमीत की आवाज़ में पहली बार फिक्र थी।
"नहीं। मैं ठीक हूँ। वैसे भी आज मुझे आपके बारे में, शर्मिला जी के बारे में और जानना है।" सुषमा ने सीधे सुमीत की आँखों में देखा।
सुमीत ने लंबी साँस ली। "सुषमा, मैंने कल रात कहा था न, कुछ जख्म कुरेदने से हरे हो जाते हैं। शर्मिला मेरी ज़िंदगी थी। उसके बिना मैं सिर्फ एक ज़िंदा लाश हूँ। तुम ये सब जानकर क्या करोगी?"
"मैं जानना चाहती हूँ कि मैं किसकी जगह पर हूँ। क्या मैं सिर्फ स्वीटू की आया हूँ, या इस घर की बहू भी?" सुषमा अब पीछे हटने वाली नहीं थी।
सुमीत ने दीवार पर टंगी एक तस्वीर की तरफ देखा। उसमें सुमीत, शर्मिला और दो साल की स्वीटू थे। शर्मिला हँस रही थी, सुमीत ने उसे बाँहों में भरा था।
"उस दिन बारिश हो रही थी।" सुमीत धीरे से शुरू हुआ, जैसे खुद से बात कर रहा हो। "शर्मिला स्वीटू को स्कूल से पिक करके आ रही थी। मैंने कहा था ड्राइवर को भेज देता हूँ, पर वो ज़िद्दी थी। कहती थी बेटी को खुद लेने जाऊँगी। स्कूल से निकलते ही एक ट्रक ने टक्कर मार दी। ड्राइवर नशे में था।"
सुमीत की मुट्ठियाँ भिंच गईं। "शर्मिला ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। स्वीटू को हल्की चोटें आईं। पर उसकी आँखों के सामने... उसकी माँ..." सुमीत की आवाज़ भर्रा गई। उसने बात अधूरी छोड़ दी।
सुषमा के रोंगटे खड़े हो गए। वो कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द नहीं मिले।
"उसके बाद से स्वीटू रात को सोते हुए चिल्लाती है। उसे लगता है उसकी माँ वापस आएगी। और मैं..." सुमीत पलटा। उसकी आँखें लाल थीं, पर आँसू नहीं थे। शायद आँसू सूख चुके थे। "मैं हर रोज़ मरता हूँ सुषमा। हर रोज़। माँ ने जब तुम्हारा रिश्ता लाया, तो मैंने मना कर दिया था। मैंने कहा था मैं दूसरी शादी नहीं करूँगा। पर माँ ने खाना-पीना छोड़ दिया। डॉक्टर ने कहा स्ट्रेस से हार्ट अटैक आ सकता है। मैं क्या करता?"
सुषमा अब समझ रही थी। ये शादी प्यार की नहीं, मजबूरी की थी। दो मजबूर लोगों का समझौता।
"तो आपने मुझसे शादी सिर्फ अपनी माँ के लिए की? स्वीटू के लिए की?" सुषमा ने पूछा, हालाँकि जवाब जानती थी।
"हाँ।" सुमीत ने नज़रें नहीं चुराईं। "मैंने तुम्हें पहले दिन ही सच बता दिया था। मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। मैं तुमसे प्यार नहीं कर सकता सुषमा। मेरा दिल शर्मिला के साथ दफ़न हो चुका है। पर मैं तुम्हारी इज़्ज़त करूँगा। इस घर में तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होगी। बस... बस मुझसे उम्मीद मत रखना।"
सुषमा ने खिड़की से बाहर देखा। माली पौधों में पानी दे रहा था। दुनिया चल रही थी। सिर्फ उसकी ज़िंदगी रुक गई थी।
"ठीक है।" सुषमा ने बहुत धीरे से कहा। "मैं आपसे प्यार की उम्मीद नहीं रखूँगी। पर मैं स्वीटू को माँ का प्यार ज़रूर दूँगी। वो बच्ची है। उसकी कोई गलती नहीं। और एक बात..."
सुषमा पलटी। "आज के बाद आप मुझसे झूठ नहीं बोलोगे। अगर आपके दिल में कोई बात होगी, तो मुझे बताओगे। हम पति-पत्नी न सही, दोस्त तो बन सकते हैं?"
सुमीत कुछ देर सुषमा को देखता रहा। फिर हल्का सा सिर हिलाया। "कोशिश करूँगा।" कहकर वो ऑफिस के लिए निकल गया।
सुषमा तैयार होकर नीचे आई। माजी पूजा कर रही थीं। सुषमा को देखते ही बोलीं, "आ गई बहुरानी? रात को स्वीटू की तबीयत खराब थी न? सुमीत बता रहा था। तुमने बहुत अच्छा किया उसके पास बैठकर। भगवान तुम्हें खुश रखे।"
सुषमा ने माजी के पैर छुए। "माजी, मुझे आपसे कुछ पूछना है। शर्मिला जी के बारे में।"
माजी का हाथ आरती की थाली पर रुक गया। उन्होंने सुषमा को ऊपर से नीचे तक देखा। "क्या जानना है तुम्हें?"
"वो कैसी थीं? स्वीटू को क्या पसंद था? उनका कोई खास खाना, कोई खास गाना?" सुषमा जानती थी कि अतीत से लड़कर वो जीत नहीं सकती। तो क्यों न अतीत को अपना लिया जाए?
माजी की आँखें भर आईं। "बैठो बेटा।" उन्होंने सुषमा को अपने पास बिठाया। "शर्मिला... शर्मिला साक्षात लक्ष्मी थी। बहुत हँसमुख। उसे गुलाब जामुन बहुत पसंद थे। और वो लता मंगेशकर के गाने गुनगुनाती रहती थी। खासकर 'लग जा गले'। स्वीटू को सुलाते वक्त हमेशा यही गाती थी।"
सुषमा सुन रही थी। हर बात गाँठ बाँध रही थी।
"और एक बात," माजी ने सुषमा का हाथ पकड़ा। "उसकी आखिरी निशानी, उसकी डायरी, सुमीत ने संभालकर रखी है। शायद स्टडी रूम में। पर उसने आज तक खोलकर नहीं देखी। कहता है हिम्मत नहीं होती।"
दोपहर को जब स्वीटू स्कूल से आई, तो सुषमा ने उसे गुलाब जामुन दिए। स्वीटू की आँखें चमक उठीं। "छोटी माँ! आपको कैसे पता मुझे गुलाब जामुन पसंद हैं? बड़ी माँ भी बनाती थीं!"
सुषमा ने मुस्कुराकर स्वीटू को गले लगा लिया। रात को जब स्वीटू को सुलाने लगी, तो धीरे से गुनगुनाया, "लग जा गले कि फिर ये हसीन रात हो न हो..."
स्वीटू चौंक कर उठ बैठी। "ये गाना! बड़ी माँ गाती थीं! आपको कैसे पता?" उसकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर हँसी। वो सुषमा से लिपट गई। "छोटी माँ, आप बहुत अच्छी हो।"
सुषमा की आँखें भी भीग गईं। शायद यही उसका समझौता था। अपने आप से। प्यार नहीं, तो ममता ही सही।
रात को सुमीत घर आया तो स्वीटू दौड़कर उसके पास गई। "बड़े पापा! आज छोटी माँ ने गुलाब जामुन बनाए! और वही गाना गाया जो बड़ी माँ गाती थीं! अब मुझे डर नहीं लगेगा!"
सुमीत ठिठक गया। उसने सुषमा की तरफ देखा। सुषमा किचन में खड़ी थी। दोनों की नज़रें मिलीं। सुमीत की आँखों में पहली बार... शायद... शुक्रिया था। वो कुछ बोला नहीं, बस हल्का सा सिर हिलाकर अपने कमरे में चला गया।
आधी रात को सुषमा की नींद खुली। उसे प्यास लगी थी। वो पानी लेने किचन में जा रही थी कि उसने स्टडी रूम से हल्की रोशनी आती देखी। दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
उसने अंदर झाँका। सुमीत मेज़ पर सिर झुकाए बैठा था। सामने एक गुलाबी डायरी खुली थी। शर्मिला की डायरी। सुमीत का कंधा हिल रहा था। वो रो रहा था। बिना आवाज़ के, पर टूटकर।
सुषमा का दिल करुणा से भर गया। वो वापस मुड़ने लगी कि तभी उसकी नज़र डायरी के एक पन्ने पर पड़ी जो हवा से पलट गया था।
उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था: _"अगर मुझे कुछ हो जाए तो सुमीत, तुम दूसरी शादी कर लेना। पर किसी ऐसी लड़की से जो स्वीटू को अपनी बेटी माने। मैं नहीं चाहती मेरी बच्ची माँ के प्यार के लिए तरसे। ये मेरा वादा है तुमसे।"_
_नीचे तारीख थी - एक्सीडेंट से ठीक एक हफ्ते पहले की।_
सुषमा के पैर वहीं जम गए। तो क्या शर्मिला को अपनी मौत का अंदेशा था? या ये सिर्फ एक संयोग था?
तभी सुमीत ने सिर उठाया। उसकी नज़र सीधे सुषमा पर पड़ी। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। डायरी, आँसू, और एक अनकहा सच... कमरे में तैर रहा था।
*[समाप्त]*
_तो दोस्तों, क्या शर्मिला ने अपनी मौत से पहले ही सुमीत की दूसरी शादी की इजाज़त दे दी थी? डायरी का ये राज़ सुमीत ने अब तक क्यों छुपाया? और सुषमा अब क्या करेगी? जानने के लिए सुनिए Episode 6... Story को Like और Follow करना न भूलें, वरना अगला ट्विस्ट मिस हो जाएगा।
Bela...
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