*Episode Title:* `Sweetu Ka Raaz`
सुषमा स्वीटू को अपने गले लगाए खड़ी थी। बच्ची की आँखों में न डर था, न हिचक। जैसे सुषमा को बरसों से जानती हो। उसके छोटे-छोटे हाथ सुषमा की पीठ को थपथपा रहे थे, ठीक वैसे जैसे कोई माँ अपने बच्चे को दिलासा देती है।
"माँ... तू रो क्यों रही है?" स्वीटू ने अपनी नन्ही उँगलियों से सुषमा के आँसू पोंछ दिए।
सुषमा का गला भर आया। एक अजनबी बच्ची के मुँह से 'माँ' सुनकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "बेटा, तू मुझे माँ क्यों कह रही है? मैं तो... मैं तो तुझे जानती भी नहीं।"
स्वीटू मासूमियत से हँस पड़ी। "बड़े पापा ने कहा था कि नई माँ आएगी। जो मुझे बहुत प्यार करेगी। आप ही तो हो मेरी छोटी माँ।" कहते हुए उसने सुषमा की साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया।
तभी नीचे से माजी की आवाज़ गूँजी। "बहुरानी! मुँह दिखाई की रस्म शुरू हो गई। जल्दी आओ, सारी पड़ोसनें इंतज़ार कर रही हैं। कितनी देर लगा दी तैयार होने में?"
स्वीटू सुषमा का हाथ छोड़ कर सीढ़ियों की तरफ भाग गई। "मैं माजी को बता देती हूँ कि छोटी माँ आ रही है!" उसकी चोटी उछल रही थी।
सुषमा वहीं खड़ी रह गई। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया था। कल रात सुमीत का ख़त, और आज सुबह ये बच्ची... ये कैसा मज़ाक है उसकी ज़िंदगी के साथ? उसने खुद को आईने में देखा। लाल बनारसी साड़ी, सोने के गहने, हाथों में चूड़ियाँ। बाहर से दुल्हन, और अंदर से? अंदर से तो वो बस एक सवाल थी - मैं यहाँ क्यों हूँ?
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रही थी कि उसने देखा - सुमीत मुख्य दरवाज़े पर खड़ा है। सफेद कुर्ता-पायजामा, पैरों में कोल्हापुरी चप्पल, हाथ में कार की चाबी। सुबह की धूप में उसका गोरा रंग और निखर रहा था।
सुमीत की नज़र सुषमा पर पड़ी। बस एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ बदला। कोई पहचान, कोई पछतावा, या शायद कोई मजबूरी। पर अगले ही पल उसने अपना चेहरा पत्थर की तरह सख्त कर लिया।
"माजी, मैं ऑफिस के लिए निकल रहा हूँ। एक ज़रूरी मीटिंग है। दोपहर दो बजे तक वापस आ जाऊँगा।" सुमीत की आवाज़ में कोई भाव नहीं था। उसने सुषमा की तरफ देखा तक नहीं, और दरवाज़े से बाहर निकल गया।
सुमीत के जाते ही हॉल में बैठी औरतों की फुसफुसाहट तेज़ हो गई। "देखा? सुहागरात के अगले दिन ही काम पर निकल गया। कुछ तो गड़बड़ है।"
"अरे नई-नवेली दुल्हन को छोड़कर कौन जाता है भला?"
माजी ने सबको चुप कराया और बनावटी हँसी हँसते हुए सुषमा के पास आईं। पर उनकी आँखें हँस नहीं रही थीं। उन्होंने सुषमा की कलाई पकड़ी और धीरे से बोलीं, "बहुरानी, स्वीटू की बातों का बुरा मत मानना। वो अभी बच्ची है। उसे दुनिया की समझ नहीं।"
सुषमा ने माजी की आँखों में सीधा देखा। अब डर नहीं था, बस सवाल थे। "माजी, मैं बुरा नहीं मान रही। मैं बस सच जानना चाहती हूँ। ये स्वीटू कौन है? अगर सुमीत जी की बेटी है तो इसकी माँ, शर्मिला जी कहाँ हैं? और अगर वो नहीं हैं तो..."
माजी का चेहरा एकदम सख्त हो गया। उन्होंने आसपास देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा। फिर सुषमा को खींचकर एक तरफ ले गईं। "बेटा, कुछ सवालों के जवाब वक़्त देता है, हम नहीं। मैं बस इतना कहूँगी कि इस घर को एक औरत की ज़रूरत थी। एक माँ की ज़रूरत थी। शारदा देवी ने तुम्हें इसलिए चुना क्योंकि तुम मज़बूत हो। टूटकर भी जुड़ सकती हो।"
"पर मेरा क्या फ़र्ज़ है माजी? एक ऐसे आदमी का साथ निभाना जिसे मैं जानती तक नहीं? जिसके दिल के दरवाज़े पर किसी और का नाम लिखा है? ये शादी नहीं, समझौता है... और वो भी सिर्फ आपका, मेरा नहीं।" सुषमा की आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें अब विद्रोह था।
माजी ने एक लंबी, थकी हुई साँस ली। उनकी आँखों में पहली बार दर्द दिखा। "देखो बहुरानी, ज़िंदगी हमेशा हमारी मर्ज़ी की कहानी नहीं लिखती। कभी-कभी हमें कलम खुद उठानी पड़ती है। कभी-कभी हमें समझौता करना पड़ता है... अपने आप से। जाओ, मुँह दिखाई की रस्म पूरी करो। घर की बहू की पहली जिम्मेदारी यही होती है।"
तभी स्वीटू भागती हुई आई और सुषमा की साड़ी का पल्लू पकड़ कर खींचने लगी। "छोटी माँ, चलो न! सब आंटियाँ आपको देखना चाहती हैं। सब कह रही हैं कि आप चाँद जैसी सुंदर लग रही हो लाल साड़ी में। आप चलोगी तो मैं भी आपके साथ बैठूँगी।"
सुषमा ने मजबूर होकर सिर हिलाया। रस्म शुरू हुई। औरतों ने गीत गाए, सुषमा का घूँघट उठाया, उसे शगुन दिए। "जुग-जुग जियो बहुरानी! शारदा जी, बहुत भाग्यशाली हो जो ऐसी लक्ष्मी जैसी बहू मिली।" हर आशीर्वाद सुषमा के ज़ख्मों पर नमक सा लग रहा था।
उसकी नज़र बार-बार दरवाज़े पर जा रही थी। क्या सुमीत सच में वापस आएगा? या वो भी उसकी ज़िंदगी से वैसे ही चला गया जैसे शर्मिला...
रस्म के बाद सुषमा बहाना बनाकर ऊपर अपने कमरे में भाग आई। दरवाज़ा बंद करते ही वो बिस्तर पर गिर पड़ी। तकिया मुँह में दबाकर वो फूट-फूटकर रोई। पाँच मिनट, दस मिनट... फिर उसने आँसू पोंछे। रोने से कुछ नहीं होगा।
उसने अलमारी खोली और सबसे नीचे दबा हुआ सुमीत का ख़त निकाला। काँपते हाथों से उसने उसे खोला। कल रात डर के मारे पूरा पढ़ नहीं पाई थी।
_"सुषमा,
मुझे माफ़ कर देना। मैं जानता हूँ कि ये शादी तुम्हारे साथ अन्याय है। पर मैं मज़बूर हूँ। मेरी माँ की कसम और स्वीटू की मासूमियत... इन दोनों ने मुझे बाँध रखा है।
शर्मिला मेरी दुनिया थी। उसके जाने के बाद मेरे लिए सब खत्म हो गया था। मैं जी रहा हूँ, बस साँस ले रहा हूँ।
तुमसे मेरी कोई उम्मीद नहीं है। न प्यार की, न रिश्ते की। मैं बस तुमसे एक भीख माँगता हूँ। स्वीटू को माँ का प्यार दे दो। वो हर रात अपनी मम्मी को याद करके रोती है। जब वो तुम्हें 'माँ' बुलाए, तो उसे दुत्कारना मत।
अगर तुम ये कर सको, तो समझ लेना कि तुमने एक मर चुके इंसान को ज़िंदगी दे दी।
तुम्हारा कर्ज़दार,
सुमीत"_
ख़त के आखिर में स्याही फैली हुई थी। शायद सुमीत के आँसू गिरे थे वहाँ। सुषमा के हाथ से ख़त फिसल गया। तो ये बात है। सुमीत उससे प्यार नहीं करता, न कभी करेगा। उसे बस स्वीटू के लिए एक आया चाहिए थी। एक ऐसी औरत जो माँ बन सके, पत्नी नहीं।
शाम के सात बजे सुमीत वापस आया। उसके हाथ में एक बड़ा सा टेडी बियर और खिलौने का डिब्बा था। स्वीटू "बड़े पापा! बड़े पापा!" चिल्लाती हुई उससे लिपट गई।
सुमीत ने स्वीटू को गोद में उठाया और उसके माथे को चूमा। फिर उसकी नज़र सुषमा पर पड़ी जो दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने स्वीटू को नीचे उतारा और धीरे से कहा, "जाओ बेटा, ये खिलौने अपने कमरे में रख दो। और हाँ, छोटी माँ को तंग मत करना। वो थक गई होंगी।"
"नहीं करूँगी बड़े पापा! छोटी माँ अच्छी हैं। उन्होंने मुझे सुबह गले लगाया था!" स्वीटू खिलखिलाते हुए अपने कमरे में भाग गई।
अब कमरे में बस सुमीत और सुषमा थे। एक अजीब सी खामोशी। सुमीत ने सूटकेस खोला और कपड़े निकालने लगा।
"आपसे कुछ बात करनी थी।" सुषमा की आवाज़ कमरे में गूँजी।
सुमीत रुका नहीं। "कहो।"
"स्वीटू की माँ... शर्मिला जी... वो कहाँ हैं? क्या हुआ था उनके साथ?"
सुमीत के हाथ रुक गए। उसने बहुत धीरे से सूटकेस बंद किया। बिना पलटे बोला, "कुछ बातें दफ़न रहें तो बेहतर है सुषमा। कुरेदोगी तो सिर्फ दर्द मिलेगा।"
"मुझे दर्द की आदत है सुमीत जी। सच बता दीजिए। मैं इस घर में एक कैदी की तरह नहीं रह सकती।" सुषमा अब सीधे सुमीत के सामने आकर खड़ी हो गई।
सुमीत ने पहली बार सुषमा की आँखों में आँखें डालीं। उन आँखों में इतना दर्द, इतनी तन्हाई थी कि सुषमा एक पल के लिए काँप गई।
"शर्मिला अब इस दुनिया में नहीं है।" सुमीत की आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे कब्र से आ रही हो। "दो साल हो गए। एक कार एक्सीडेंट... वो स्वीटू को स्कूल से लेकर आ रही थी। स्वीटू बच गई। पर शर्मिला..."
कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर कहीं कुत्ता रोया।
"तो आपने मुझसे शादी क्यों की?" सुषमा फुसफुसाई। "आप तो मुझसे नफ़रत करते हैं।"
सुमीत खिड़की के पास चला गया। बाहर अंधेरा हो चुका था। "नफ़रत नहीं सुषमा। मैं किसी से कोई रिश्ता ही नहीं रखना चाहता था। पर माँ... माँ स्वीटू को तड़पते नहीं देख सकती थी। वो हर रात 'मम्मी-मम्मी' कहकर रोती थी। माँ ने कहा कि घर को एक औरत चाहिए। मैंने मना कर दिया। तब माँ ने अपनी कसम दे दी। कहा कि अगर तू शादी नहीं करेगा तो मैं अन्न-जल त्याग दूँगी।"
सुमीत पलटा। उसकी आँखें लाल थीं। "मैंने माँ की कसम के लिए हाँ की। और तुम्हें इसलिए चुना क्योंकि... क्योंकि तुम्हारी आँखों में भी वही तन्हाई थी जो मेरी आँखों में है। मुझे लगा शायद तुम समझोगी।"
सुषमा के पास कोई जवाब नहीं था। दो टूटे हुए लोग, एक मजबूर रिश्ता।
रात के ग्यारह बजे। सारा घर सो चुका था। पर सुषमा की आँखों में नींद नहीं थी। वो चुपचाप छत पर चली गई। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। तारों भरा आसमान। उसने सोचा, क्या शर्मिला भी यहीं कहीं से देख रही होगी? क्या वो नाराज़ होगी कि कोई और उसकी जगह ले रहा है?
"नींद नहीं आ रही?" पीछे से आवाज़ आई।
सुषमा चौंकी नहीं। उसे पता था सुमीत आएगा। वो भी तो सो नहीं पाता होगा। सुमीत उसके पास आकर रेलिंग पर कोहनी टेककर खड़ा हो गया। उसके हाथ में दो कॉफी के मग थे।
"लो। रात को नींद न आए तो अदरक वाली कॉफी पी लेना। शर्मिला को भी पसंद थी।" कहते-कहते सुमीत रुक गया। शायद उसे एहसास हुआ कि उसने क्या कह दिया।
सुषमा ने मग ले लिया। गर्माहट अच्छी लगी। "सुमीत जी, एक बात पूछूँ? आप मुझसे कभी प्यार कर पाओगे?"
सुमीत ने आसमान की तरफ देखा। "पता नहीं सुषमा। मेरा दिल कब्र बन चुका है। वहाँ अब सिर्फ यादें दफ़न हैं। मैंने तुम्हें पहले ही कह दिया था। मुझसे उम्मीद मत रखना।"
"मैं उम्मीद नहीं रख रही।" सुषमा ने कॉफी का घूँट भरा। "मैं बस जानना चाहती हूँ कि क्या इस समझौते में हम दोस्त भी नहीं बन सकते? स्वीटू के लिए ही सही?"
सुमीत ने पहली बार हल्का सा मुस्कुराया। बहुत धीमी, बहुत दर्दभरी मुस्कान। "कोशिश कर सकते हैं।"
वो दोनों वहीं खड़े रहे। दो अजनबी, एक छत, और बीच में एक बच्ची की किस्मत।
तभी नीचे से स्वीटू की तेज़ आवाज़ आई। वो नींद में बड़बड़ा रही थी। *"माँ... माँ... मुझे छोड़कर मत जाओ माँ... वापस आ जाओ!"*
सुषमा और सुमीत दोनों एक साथ चौंके। सुषमा बिना सोचे सीढ़ियों की तरफ भागी।
पर स्वीटू किस 'माँ' को बुला रही थी? सुषमा को? या अपनी मरी हुई माँ शर्मिला को? और अगर शर्मिला मर चुकी है... तो स्वीटू को 'माँ' वापस आने की उम्मीद क्यों है?
_तो दोस्तों, क्या शर्मिला सच में मर चुकी है या ये सुमीत का कोई और झूठ है? स्वीटू के सपने का राज़ क्या है? जानने के लिए सुनिए Episode 5... और Story को Follow करके Bell Icon ज़रूर दबाएँ ताकि अगला एपिसोड मिस न हो।_
Bela....
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