तेरी मेरी कहानी





*तेरी मेरी कहानी Part-1

मुंबई के उस चौराहे पर 3 चीज़ें कभी नहीं रुकती थीं -  
बारिश, रामुकाका की केतली से उठता धुआं,  
और अभिषेक का इंतज़ार।

कहते हैं मुंबई शहर कभी सोता नहीं।  
पर इस शहर में एक टपरी ऐसी भी थी, जहाँ रोज़ शाम को वक़्त थम जाता था।

*रोज़ शाम 6:15 बजे।*  
एक प्याली चाय, एक प्लेट समोसा।  
और सामने खड़ी वो - नीले दुपट्टे वाली।

नाम नहीं पता था। आवाज़ नहीं सुनी थी।  
वो रोज़ 6:10 पे आती, वो 6:15 पे Black Umbrella लेकर पहुँचता।  
बीच में सिर्फ 5 मिनट का फासला... और एक पूरी ज़िंदगी की खामोशी।

*6 महीने। 180 शामें। 180 मुस्कानें।*  
ना उसने कभी नाम पूछा, ना उसने कभी बताया।  
लोग कहते थे रामुकाका की चाय में जादू है।  
शायद था भी... तभी तो दो अनजान आंखें रोज़ बिना बोले पूरी बात कर लेती थीं।

जैसे मुंबई की बारिश, चाय की प्याली और वो दोनों - दुनिया से बेगाने।  
रोज़ मिलते, मुस्कुराते, और अपने-अपने रास्ते चल देते।  
जैसे आँखों ही आँखों में कोई वादा हो गया हो।

*पर 181वीं शाम को जादू टूट गया।*

आज 6:15 बज चुके थे। चाय ठंडी हो रही थी। समोसा पड़ा-पड़ा सील रहा था।  
आज बारिश भी नहीं थी, रामुकाका की चाय भी फीकी लग रही थी,  
और वो जगह... वो जगह खाली थी।

पहली बार 6 महीने में। पहली बार बिना बताए।  
पहली बार अभिषेक को समझ आया -  
*कि कुछ लोगों की गैर-मौजूदगी, मौजूदगी से ज़्यादा शोर करती है।*

बार-बार घड़ी देखता, सामने देखता... जहाँ रोज़ वो नीला दुपट्टा लहराता था।  
मन ही मन सोचता - _ज़रूर कोई बात हुई होगी, तभी आज वो नज़र नहीं आई।_

उस रात अभिषेक को नींद नहीं आई।  
पहली बार उसने उसके बारे में सोचा - उसकी वो शरमाई हुई झुकी पलकें,  
चेहरे पे आते रेशम से मुलायम काले-घने बाल, वो प्यारी सी मदहोश कर देने वाली मुस्कान,  
बारिश में भीगा हुआ वो नीला दुपट्टा...  
आज सब आंखों के सामने नाच रहा था।

सुबह से बेचैन था। कब शाम हो और वो चौराहे पे जाए।  
दौड़ा-दौड़ा गया। रामुकाका ने चाय थमा दी, पर उसे होश कहाँ था।  
उसकी जगह खाली थी, मगर आस बाकी थी।

*वो नहीं आई।*  
ना उस दिन, ना उसके अगले दिन, ना उसके बाद वाले दिन।

फिर भी अभिषेक ने इंतज़ार ना छोड़ा।  
रोज़ शाम को चाय और समोसा लेकर जाता, इंतज़ार करता,  
और उसके ना आने पर मायूस होकर पास खड़े उस गरीब लड़के को दे देता।  
वो लड़का खुश हो जाता, और अब रोज़ उसी वक़्त आने लगा था।

दिन बदले, मौसम बदले, मुंबई की बारिशें आईं और गईं...  
*मगर अभिषेक और उसका इंतज़ार ना बदला।*

पर अभिषेक नहीं जानता था...  
कि इशिका के ना आने की वजह, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा *इम्तिहान* बनने वाली थी।  

और जिस गरीब लड़के के हाथ में वो रोज़ समोसा थमाता था...  
*वही लड़का Part-2 में उसकी कहानी बदलने वाला था।*

क्या इशिका वापस आएगी?  
या अभिषेक की चाय हमेशा के लिए ठंडी रह जाएगी?  
और उस लड़के का इस कहानी से क्या रिश्ता है?

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