तेरी मेरी कहानी/ एक अधूरी दास्तान for book



बेला पुनीवाला एक ऐसी लेखिका हैं जो आम ज़िंदगी के खास लम्हों को शब्दों में कैद कर लेती हैं। मुंबई में रहनेवाली बेला को रिश्तों की गर्माहट और घर की छोटी-छोटी बातों में कहानियां दिखती हैं।
' मैं कौन हूँ ? ' और ' इम्तिहान' की लेखिका बेला सरल शब्दों में ज़िंदगी के गहरे एहसास बयां करती हैं। उनका मानना है कि सबसे खूबसूरत कहानियां हमारे घरों की चार दिवारी में ही लिखी जाती हैं। 

'कहानी घर घर की, कहानी हर घर की यह उनकी तीसरी किताब है जो हर परिवार के दिल को छुएगी।

लेखन सफर: -' मैं कौन हूँ ?' से शुरुआत करके 'इम्तिहान' तक, बेला पुनीवाला की कलम ने हजारों दिलों को छुआ है। अब 'कहानी घर घर की, कहानी हर घर" की किताब के जरिए वह हर घर में बसे जज्बातों को आवाज दे रही हैं और हर घर के दिलों पर राज करेगी।

लेखन शैली: - सरल भाषा, गहरे एहसास। 

विश्वास: "हर घर की अपनी एक कहानी होती है। बस उसे सुनने वाला चाहिए।
नाम - Bela Puniwala
शहर - मुंबई, भारत
विधा - पारिवारिक कहानियां, भावनात्मक लेखन
प्रकाशित पुस्तकें -1. मैं कौन हु ? 2. इम्तिहान 3. कहानी घर घर की, कहानी हर घर की।
भाषा - हिंदी
पहचान - सरल शब्दों में गहरी बात कहना


लिखने के पीछे मोटो

"मैं लिखती हूँ ताकि भूले-बिसरे रिश्तों को फिर से महसूस किया जा सके।" जो बातें हम कह नहीं सकते वह, हम लिख के अपनों और लोगों तक पहुँचा सके।

"सरल शब्दों में गहरी बात लिखे, जो सब की समझ में आसानी से आ जाए, क्योंकि जिंदगी भी तो ऐसी ही है।"
और "सबसे खूबसूरत कहानियां हमारे घरों में ही लिखी जाती हैं"

"मेरा मोटो है उन कहानियों को आवाज देना जो हमारे घरों की दीवारों में कैद हैं। मां की ममता, पापा की फिक्र, दादी के किस्से - ये सब लिखे जाने चाहिए। क्योंकि जब हम इन्हें पढ़ते हैं, तो अपने घर वापस लौट आते हैं।" 
 
 "रिश्तों को शब्दों में पिरोना ही मेरा काम है।"
 "हर घर में एक लेखक होता है, मैं बस कलम हूं।"


"मैं लिखती हूँ ताकि भूले-बिसरे रिश्तों को फिर से महसूस किया जा सके।"_


एक अधूरी दास्तान 
तेरी मेरी प्रेम कहानी 

एक प्रेम कहानी, 
जो शुरू होने से पहले,
 ही खत्म हो गई...
 
दो दिल थे,
 जो एक दूसरे के लिए धड़कते थे,
 आँखों ही आँखों में सारी बातें हो जाती थीं, 
पर लबों तक इकरार कभी आ ना सका।

 लड़की मजबूर थी, लड़का नासमझ था। 
जब तक एहसास को अल्फाज़ मिले,
 ज़िंदगी हाथों से रेत की तरह,
 फिसल चुकी थी, 
इज़हार ए इश्क़ का,
 वक़्त भी निकल चुका था,
मगर फ़िर भी अब भी,
दिल में एक आशा की
 किरण बची हुई थी, कि 
शायद वह मिल जाए, 
और हम तुम एक हो जाए,
मगर यह हो ना सका, 
वक़्त को शायद इस जन्म,
हमारा साथ होना,
मंज़ूर नहीं था, 
या इस जन्म हमारा साथ,
लिखा ही नहीं था, 
ऐसा सोचकर,
 इस दिल को सिर्फ मना रहे है,
इस जन्म नहीं, तो उस जन्म
हमें तुम्हारा इंतजार रहेगा,
हर जन्म।

ये कहानी है हर उस शख्स की,
जिसने मोहब्बत को महसूस तो किया, 
पर सही वक़्त पर कह नहीं पाए।

" मिले थे हम, पर मिल ना सके,  
चाहा था तुमको, पर कह ना सके।
वो नज़रें जो सब कह देती थीं, 
वो खामोशी जो सब समझ लेती थी। 
पर 'मोहब्बत' का एक लफ्ज़,
जुबां पर आ ना सका,
वो मजबूर थी, मैं नासमझ था, 
और जब समझ आया... 
तब तक बहुत देर हो चुकी थी,
'इज़हार से पहले' - 
एक ऐसी दास्तान,
जो हर टूटे दिल की होती है।"

 *बेला पुनीवाला* रिश्तों के एहसासों को शब्द देने में माहिर हैं। 'इम्तिहान', 'मैं कौन हूँ?' और 'कहानी घर घर की, कहानी हर घर की ' के बाद अब वो 'अधूरी मोहब्बत' की दास्तान लेकर आई हैं। उनका मानना है कि कुछ कहानियां मुकम्मल नहीं होतीं, पर हमेशा याद रहती हैं।

 ...अधूरी मोहब्बत की दास्तान...

⭐ "कभी लिखते-लिखते, तो कभी पढ़ते-पढ़ते आँखें नम हो ही जाती है।" 
   Bela...



तेरी मेरी कहानी
एक अधूरी दास्तान 
भाग -1

मुंबई के उस चौराहे पर 3 चीज़ें कभी नहीं रुकती थीं -  
बारिश, रामुकाका की केतली से उठता धुआं,  
और अभिषेक का इंतज़ार।

कहते हैं मुंबई शहर कभी सोता नहीं।  
पर इस शहर में एक टपरी ऐसी भी थी, जहाँ रोज़ शाम को वक़्त थम जाता था।

*रोज़ शाम 6:15 बजे।*  
एक प्याली चाय, एक प्लेट समोसा।  
और सामने खड़ी वो - नीले दुपट्टे वाली।

नाम नहीं पता था। आवाज़ नहीं सुनी थी। 
कुछ दिन आँखों ही आँखों में ऐसे ही बीत गए,
ना उसने कभी नाम पूछा, ना उसने कभी बताया।  
लोग कहते थे रामुकाका की चाय में जादू है।  
शायद था भी... तभी तो दो अनजान आँखें रोज़ बिना बोले पूरी बात कर लेती थीं।

जैसे मुंबई की बारिश, चाय की प्याली और वो दोनों - दुनिया से बेगाने।  
रोज़ मिलते, मुस्कुराते, और अपने-अपने रास्ते चल देते।  
जैसे आँखों ही आँखों में कोई वादा हो गया हो।

आज 6:15 बज चुके थे। चाय ठंडी हो रही थी। समोसा पड़ा-पड़ा सील रहा था।  
आज बारिश भी नहीं थी, रामुकाका की चाय भी फीकी लग रही थी,  
और वो जगह... वो जगह खाली थी। क्योंकि आज इतने दिनों में पहली बार वह नीले दुपट्टे वाली लड़की नज़र नहीं आ रही थी।
पहली बार अभिषेक को समझ आया -  
कि " कुछ लोगों की गैर-मौजूदगी, मौजूदगी से ज़्यादा शोर करती है। "

बार-बार घड़ी देखता, सामने देखता... जहाँ रोज़ वो नीला दुपट्टा लहराता था।  
मन ही मन सोचता - ज़रूर कोई बात हुई होगी, तभी आज वो नज़र नहीं आई।

उस रात अभिषेक को नींद नहीं आई।  
पहली बार उसने उसके बारे में सोचा - उसकी वो शरमाई हुई झुकी पलकें,  
चेहरे पे आते रेशम से मुलायम काले-घने बाल, वो प्यारी सी मदहोश कर देने वाली मुस्कान,  
बारिश में भीगा हुआ वो नीला दुपट्टा...  
आज सब आंखों के सामने जैसे नाच रहा था।
मगर वह नहीं आई।

अभिषेक आज सुबह से बेचैन था, कब शाम हो और वो चौराहे पे जाए। अपना सारा काम निपटाकर अभिषेक दौड़ा-दौड़ा चौराहे पर पहुंच गया। अभिषेक के देखते ही रामुकाका ने अभिषेक के हाथों में चाय थमा दी, पर उसे होश कहाँ था।  
उस नीले दुपट्टे वाली लड़की को जगह खाली थी, मगर अभिषेक के दिल में आस अभी भी बाकी थी।

काफ़ी इंतज़ार करने के बाद भी वो नहीं आई।*  
ना उस दिन, ना उसके अगले दिन, ना उसके बाद वाले दिन।

फिर भी अभिषेक ने इंतज़ार ना छोड़ा।  
रोज़ शाम को चाय और समोसा लेकर जाता, इंतज़ार करता,  
और उसके ना आने पर मायूस होकर पास खड़े उस गरीब लड़के को अपनी चाय और समोसा दे देता।  
वो लड़का खुश हो जाता, और अब रोज़ उसी वक़्त आने लगा था।

दिन बदले, मौसम बदले, मुंबई की बारिशें आईं और गईं...  
मगर अभिषेक और उसका इंतज़ार ना बदला।

पर अभिषेक नहीं जानता था...  
कि इशिका के ना आने की वजह, उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा *इम्तिहान* बनने वाली थी।  

और जिस गरीब लड़के के हाथ में वो रोज़ समोसा थमाता था... 

          तो दोस्तों, क्या इशिका वापस आएगी?  
या अभिषेक की चाय हमेशा के लिए ठंडी रह जाएगी?  
और उस लड़के का इस कहानी से क्या रिश्ता है?

           जानने के लिए पढ़ते रहिए

                       भाग -2 

          तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, कि अभिषेक और इशिका रोज़ शाम को चाय की टपरी पे एक ही वक़्त पे आते थे, मगर दोनों के बिच कभी बातें नहीं हुई। अचनाक से कुछ दिनों से इशिका ने चाय की टपरी पे आना बंद कर दिया था, तब अभिषेक को एहसास हुआ, की वह सच में उस बेनाम सी लड़की से प्यार करता था। मगर उसे लगता था, कि वो एक ना एक दिन फ़िर से इसी चाय की टपरी पर जरूर आएगी, अब आगे... 

          दिल में लिए उम्मीद, आँखों में लिए सपना, अभिषेक रोज़ वहाँ  जाता था। उसे पता था की एक ना एक दिन वो उस चौराहें पे  फिर से आएगी और वो अपने दिल की बात उस से ज़रूर करेगा। वक़्त बदला, दिन बदला, नहीं  बदला तो  सिर्फ अभिषेक का इंतज़ार और पीछे से एक दिन किसी लड़की की आवाज़ सुनाई दी।  

इशिका : जी सुनिए।

        ( अभिषेक ने तुरंत पीछे मुड़ के देखा तो वो लड़की ( इशिका ) ही थी। दो पल के लिए जैसे उसके दिल  की धड़कन रुक सी गइ हो, वो एक नज़र से इशिका को देखे जा रहा था,  जैसे की उसकी तस्वीर वो अपनी आँखों में उतार रहा हो, और केह रहा हो, जैसे )

        (" ऐ वक़्त पल दो पल यही थम जा ज़रा, आज मेरा यार मुझसे कुछ कह रहा है, ऐ वक़्त, पल दो पल यही थम जा ज़रा ।")

अभिषेक : ( ज़रा अपने आप को सँभालते हुए ) 

        जी फरमाइए। वैसे तो अभिषेक के मन में बहुत से सवाल थे और कहने को तो बहुत सी बातें। मगर इशिका को देखते ही एक चूपी सी छा जाती थी लबो पे। आज वो सिर्फ उसे सुनना चाहता था। 


इशिका : क्या आप मेरी एक मदद कर सकते हो ? मैं बहुत दिनों से काम ढूंँढ रही हूँ, पहले मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी मगर  कुछ दिन पहले मेरी माँ बहुत बीमार थी, इसलिए उसे अस्पताल दाखिल किया था, तो उसकी देखभाल में मुझे यहाँ बच्चों को पढ़ाने आने का वक़्त नहीं मिला, तो उन्होंने किसी और टीचर को रख लिया है, वैसे भी कोई कितने दिन इंतज़ार कर सकता है। मैं  कई दिनों से तलाश में हूँ की कोई काम मिल जाऐ, पढ़ने के आलावा में बच्चों  को डांस भी सीखा सकती हूँ। अगर मेरे लायक कुछ काम हो  तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। 

अभिषेक : ( अभिषेक उसकी बाते सुनता ही रह गया और अपने आप को सँभालते हुए  )  

   जी ज़रूर, क्यों नहीं।

  (अभिषेक आगे कुछ बोले उसका नाम पता पूछे उतनी देर में तो ) 

इशिका : अच्छा ठीक है मैं चलती हूँ,  मेरे लायक अगर कुछ काम हो तो ज़रूर बता देना।   

अभिषेक  : अरे मगर आपका नाम पता तो... 

         ( इस के आगे वो कुछ बोले इस से पहले वो हवा के तेज़ झोके की तरह  वहाँ से चली गई  और अभिषेक उसको देखता ही रह गया।  जैसे उसे कही जाने की बहुत जल्दी थी।) 

       आज अभिषेक को उसे कुछ बताना था, मगर यहाँ तो उल्टा ही हो गया, इशिका ही उसे बहुत कुछ कह के चली गई। अभिषेक के पास अब उस से बाते करने का बहाना तो मिल गया था। उसने सोचा की चलो इसी बहाने बाते तो शुरु होंगी।  मगर  शायद अभिषेक को पता नहीं था की वो सच में कितनी बड़ी तकलीफ से गुज़र रही थी। दूसरे दिन वो फ़िर चौराहें पे जाकर उसका इंतज़ार करता है, मगर वो नहीं दिखी। 

अभिषेक : ( मन ही मन )

       शायद कोई ज़रूरी काम होगा तभी वो ना आ पाई, ये सोचकर अभिषेक वापस चला जाता है। 

           तो दोस्तों, क्या आप बता सकते हो के, इशिका सच में अभिषेक से नौकरी की ही बात करने आई थी या कुछ और चल रहा था उसके मन में ? 

              जानने के लिए पढ़ते रहिए

                         भाग -3  

          तो दोस्तों, अब तक आप सब ने पढ़ा, कि एक दिन अचनाक इशिका चाय की टपरी पे आती है और अभिषेक से अपने लिए कोई नौकरी हो तो बताए, ऐसा कह के चली जाती है, अभिषेक को अब तक पता नहीं था, की शायद इशिका कोई मुसीबत में होगी और क्या इशिका उसे  यही बताने आई थी, या कुछ ? और अब आगे... 

       ( इशिका के जाने के बाद से अभिषेक हर पल सोचता ही रह गया की, इशिका को काम की कितनी ज़रूरत थी। तो फ़िर वो दुबारा मिलने क्यों नहीं आई ? आख़िर में उसने अपना नाम पता भी तो नहीं बताया था। अभिषेक आज भी उसी के इंतज़ार में था। आज ना जाने क्यों  उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था और अचानक से तेज़ चलती हवा और बिन मौसम बरसात जैसे इशारा कर रही हो उनके आने का। अभिषेक मन ही मन सोचता, )

      ( " ऐ वक़्त,पल दो पल थम जा ज़रा, मेरा यार आ रहा है, ऐ धरती, लाल चुनर ओढ़े सज जा ज़रा, मेरा यार आ रहा है।" )

          तभी पीछे से आवाज़ सुनाई देती है। 

दादाजी : अभिषेक ज़रा मेरे लिए चाय लाना तो बेटा।

 ( अभिषेक जैसे चाय बनाते-बनाते होश में आया हो )

अभिषेक :  अभी आया दादाजी। ( दादाजी के कमरे में जाते हुए ) ये रही आपकी चाय दादाजी। 

दादाजी : जब तक तेरे हाथ की चाय नहीं पी लेता मेरा दिन नहीं बनता। मेर पास आकर बैठ तो ज़रा !! मुझे कुछ दिनों से तुझ से एक बात पूछनी थी  बेटा। 

अभिषेक : वो क्या दादाजी ? पूछो ना !! 

दादाजी : मैं बहुत दिनों से तुझे देख रहा हूँ, कि तू हर वक़्त कहीं खोया-खोया सा रहता है और थोड़ा मायूस भी लगता है, क्या हुआ है तुझे ? पहले की तरह तू खुश क्यों  नहीं दीख रहा है ? 

अभिषेक : नहीं तो, कुछ भी तो नहीं। आप भी क्या दादाजी ! लीजिऐ आपकी दवाई का वक़्त हो गया है।  

      ( अभिषेक दादाजी को दवाई देता है और वहाँ  से बाहर चला जाता है। ) 

      ( तो दोस्तों, आप सोच रहे होंगे की अभिषेक बड़े जमींदार का बेटा होगा। मगर यहाँ कहानी कुछ और ही है। तो सुनिए ) 

       अरे नहीं, अभिषेक दादाजी का बेटा नहीं मगर उनके यहाँ काम करता है। अभिषेक के बाबा कुछ काम नहीं करते थे, और कई लोगों का क़र्ज़ उनके ऊपर था। अब उसे चुकाना तो पड़ेगा। मगर कैसे ? कुछ कमाएँगे या तो बचेगा तो चुकाएंँगे ना ! इसीलिए अभिषेक जमींदार प्रेमचंद के यहाँ काम करता था और वही पे रहता था। वो पढ़ा लिखा था, इसलिए उसे ज़मींदारी का हिसाब रखने को कहा था और साथ-साथ दादाजी का भी ख्याल उसे ही रखना पड़ता था और जो भी उस में से पगार  का पैसा आता था, उस में से आधा पैसा बाबा का क़र्ज़  चुकाने में जाता था और आधा वो अपनी माँ और छोटे भाई के लिए भेजता था। उसके बाबा वसीयत में अभिषेक को  सिर्फ अपना क़र्ज़  देके गए थे, जो उसे चुकाना  था । अभिषेक अपने बाबा जैसा बिलकुल नहीं था, वो  बड़ा सीधा सादा, महेनती और ईमानदार भी था। तभी तो जमींदार साहब ने ज़मींदारी के सारे हिसाब किताब उसे दे रखे थे। दादाजी कई सालो से बीमार रेहते थे। अपने बाबा का क़र्ज़ वो जल्दी  चूका सके इसीलिए वो दुगना काम करने को भी राज़ी था। मगर गरीब की किस्मत शायद गरीब ही  रहती  है। उसकी पूरी उम्र भी गुज़र जाऐ तो भी वो शायद ये क़र्ज़ न चूका सके, इतना क़र्ज़ था उसके बाबा का। मगर वो हिम्मत हारनेवालों में से नहीं था। वो बड़ी ईमानदारी से अपना काम करता रहा।  प्रेमचंद की कोई औलाद नहीं थी। दादाजी थे जो बीमार रहते थे और उनके  भाई और उसका परिवार विदेश में रेहते थे। तो वैसे भी कोई बड़ा परिवार तो था नहीं। अभिषेक ने  प्रेमचंद और दादाजी को वचन दिया था की जब तक वो अपना क़र्ज़ नहीं चुकाएगा, तब तक वो वहाँ  से नहीं जाऐगा। वैसे भी प्रेमचंद और दादाजी को भी उस से बड़ी मदद मिल जाती थी, इसलिए उन्होंने अभिषेक को अपने पास रोके रखा। मगर कभी जताया नहीं की वो लोग भी यही चाहते है। ताकि वो ईमानदारी से अपना काम करता  रहे।

         तो दोस्तों, ये थी अभिषेक की कहानी। तो क्या अभिषेक अपने बाबा का क़र्ज़ चूका पाएगा कभी ? या फ़िर  वो अपनी सारी  ज़िंदगी  प्रेमचंद और दादाजी की सेवा ही करता रहेगा ? और क्या वो इशिका की मदद कर  भी  पाऐगा  या नहीं ?                                                   

             जानने के लिए पढ़ते रहिए 

                    भाग - 4

        तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, कि इशिका को काम की जरूरत थी, इशिकाने अभिषेक से मदद भी मांँगी, मगर अभिषेक उसे कुछ कहता उस से पहले तो इशिका अपना नाम पता देने से पहले ही वहाँ से चली गई और नाहीं इशिका फ़िर से चाय की टपरी पे आती है। उस तरफ़ अभिषेक के बाबा प्रेमचंद के वहांँ  से बहुत सारा क़र्ज़ लेकर चल बेस थे, अब सारा कर्ज़ा अभिषेक के सिर आ गया था। अभिषेक अपने बाबा का कर्ज़ा चुकाने के लिए प्रेमचंद के यहाँ ही काम करता और दादाजी का ख़याल भी रख़ता था, अब आगे... 

     ( एक तरफ इशिका सोच रही थी की, )

इशिका : शायद उन्होंने मेरे लिए कुछ काम ढूंँढ ही लिया होगा और मेरा भी तो मन है उनसे ( अभिषेक ) मिलने का, उनसे बाते करने का। मगर उनसे मिलने कैसे जाऊँ  ? माँ के जाने के बाद तो बाबा ने काम करना  जैसे बिलकुल ही बंद कर दिया था, दिन भर नशे में रहते और अगर दारू का पैसा ना मिले तो मार भी पड़ती सो अलग, बाबा हर वक़्त घर पे ही तो रहते है, भैया को लेकर किसी बहाने से जाना पड़ेगा तभी बात बनेगी। 

                 ( पीछे से आवाज़ आती है, )

बाबा : इशिका खाना लाओ जल्दी, भूख़ के मारे मेरी जान जा रही है, क्या कर रही हो इतनी देर से रसोई में, न जाने कहाँ ध्यान रहता है आज कल तुम्हारा। 

इशिका : ( अपने आप को सँभालते हुए ) जी अभी आई, बाबा। ( वो बाबा को खाना परोसने लगी। खाना देखते ही बाबा ने थाली को धक्का दे दिया।  ) 

बाबा : ये क्या खाना हुआ रूखी सुखी दाल और रोटी ? 

                    ( इशिका गभरा गई। )

 इशिका : जी बाबा, वो घर में कुछ खास पैसे नहीं है और जो थे वो भी कल रात को आप शराब  के लिए लेकर चले गए थे, अभी मेरे पास कुछ भी नहीं की मैं बाजार जाकर कुछ ला सकू। 

बाबा : हर बार बात मेरे शराब पे आके ही अटक जाती है, तेरा वो निकम्मा भाई दिन रात पढता रहता है, उसे भी बोलों कि कुछ काम भी किया करे, ऐसे पढाई से थोड़े ही घर में पैसे आनेवाले है, हममम !!! अब मुझे ही कुछ न कुछ इंतेज़ाम करना पड़ेगा ताकि ये रोज़-रोज़ का पैसो का तमाशा ही बंद हो जाएंँ। ऐसा बोलते हुए नाराज़ होकर इशिका के बाबा खाना खाऐ बगैर ही घर से चले गए, इशिका फ़िर से अपनी किस्मत पे रो पड़ी। इशिका के रोने की आवाज़ सुनते ही अंदर से उसका भाई दौड़ा चला आया उसके पास और उसको चुप कराते हुए बोला की क्या हुआ दीदी ?

       इशिका ने अपने भाई को सब बता दिया। 

  भाई : ( हस्ता हुआ ) बस इतनी सी बात ! ये तो रोज़ का तमाशा है, उसमें क्या रोना दीदी आप भी ना !!! बाबा रोज़ की तरह रात को वापस आ जाएंँगे। ऐसा करते है दीदी, आज हम दोनों चाय और समोसा खाने चलते है, मेरे पास कुछ पैसे है जो मैंने बचा के रखे थे, वैसे आज मौसम भी बहुत अच्छा है, दीदी। बारिश भी हो रही है, ऐसे में चाय और समोसे खाने का मज़ा ही कुछ और है।  लेकिन बाबा को मत बताना, चल हस दे ज़रा अब, मेरी प्यारी  बेहना।

       और वो दोनों उसी चौराहें पे जाते है जहाँ अभिषेक और इशिका  दोनों रोज़ आमने-सामने हुआ करते थे। उस दिन इशिका अपने भाई के साथ बड़ी खुश थी और दोनों मस्ती भी कर रहे थे। दूर से खड़ा अभिषेक ये सब देख रहा था, उसे लगा की इशिका के साथ जो लड़का है वो उसका दोस्त होगा या तो वो दोनों एकदूसरे से प्रेम करते  होंगे, क्योंकि  दोनों उस दिन बड़े खुश दिखाई दे रहे थे। 

     अभिषेक मन ही मन " ऐ बारिश तुझे कैसे पता चला, की आज मेरा मन भी जी भर के रोने को है, तूने इस कदर मुझे भिगो दिया है, की मुझे अपने आंँसू छुपाने की भी जरूरत नहीं। " 

    उस तरफ़ इशिका का भाई उसे खुश रखना चाहता था, क्योंकि माँ के जाने के बाद वैसे भी वो अकेली हो  गई  थी।  इशिका को मालूम ही नहीं था की अभिषेक भी वहांँ  था और उसे दूर से देख़  रहा था। अभिषेक इशिका को मन ही मन बहुत प्यार करने लगा था, इसलिए उस से ये सब देखा नहीं गया और अभिषेक वहाँ से चला गया।  इस बात से अनजान इशिका और उसका भाई अभी भी दोनों अपनी मस्ती में ही थे, वक़्त कहाँ गुज़र गया पता ही नहीं चला। फ़िर वो दोनों भी घर चले गए। घर जाके देखा तो आज बाबा घर जल्दी वापस आ गए थे और दोनों का इंतज़ार ही कर रहे थे। दोनों को देखते ही  

बाबा : ( पेहले तो भड़क गए, फ़िर कुछ सोचते हुए ) 

     चलो अब सो जाओ, रात बहुत हो गई है और   इशिका  कल तू अच्छे से तैयार हो जाना तेरे लिए एक नौकरी मैंने ढूंँढ ली है, अब से तू वही रहेगी, अपना कुछ सामान भी साथ बांध लेना, समझ गई  ? 

        ( बाबा की ऐसी  बात सुनकर दोनों को बड़ा अजीब लगा क्योंकि बाबा ने कभी भी हमारे साथ ऐसे शांति से बिना मारे बात नहीं की थी। 

 भाई :  कहाँ नौकरी लगी है दीदी की ?

बाबा :  तू चुप चाप बैठ तेरे से तो कुछ होता नहीं

        ( ये कह कर इशिका के बाबाने उसे चुप करा दिया और इशिका के बाबा सोने चले गए और थोड़ी देर बाद इशिका और उसका भाई  दोनों भी सो गए।  सुबह उठते ही बाबा एक ही रट लगाए जा रहे थे।  ) 

बाबा : इशिका जल्दी करो, अपना सामान बांध लो, कहीं बस न छूट जाए ?

भाई : दीदी को कहाँ लेकर जा रहे हो, इतना तो बताइऐ बाबा। 

बाबा : तू चल पीछे हठ, देर हो रही है, आने के बाद सब बता दूंँगा। ( केहते हुए बाबा इशिका का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे घर से लेकर चले गए।)  

भाई : अपना ख्याल रखना दीदी।

इशिका : तू भी अपना ख्याल रखना भैया और अपनी पढाई मत छोड़ना।

          जैसे दोनों को लगता था की कुछ तो बुरा करने जा रहे है बाबा। न जाने अब मिलना होगा भी या नहीं ? सोच के भी डर लगता है।  ऊपर भगवान से हाथ जोड़ते हुए कहता है, " है भगवान, मेरी दीदी के साथ कुछ बुरा मत होने देना। " 

          तो दोस्तों,  इशिका के बाबा उसे नौकरी के लिए किसके पास लेकर गए होंगे ? 

             जानने के लिए पढ़ते रहिए

                     भाग - 5 

          तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, की इशिका के बाबा  कुछ काम तो करते नहीं, इशिका और उस के भाई को बात-बात पे मारा करते थे और दूसरी तरफ़ अभिषेकने इशिका और उसके भाई दोनों को साथ में हस्ते हुए देख अभिषेकने ऐसा सोच लिया, कि जैसे वो दोनों एक दूसरे से प्यार करते होंगे, थोड़ी देर बाद  अभिषेक बिना कुछ कहे वहाँ से अपने घर वापस चला जाता है। उस तरफ़ इशिका के बाबा " इशिका को नौकरी मिल गईं है और अब उसे वहांँ ही रहना पड़ेगा," ऐसा कहते हुए इशिका का हाथ पकड़कर उसे वहाँ से ले जाते है। अब आगे...

        उस तरफ इशिका को किसी और के साथ देखने के बाद अभिषेक का तो दिल ही टूट गया था, उसे लगा की वो किसी और की हो गई, अब वो उसे कभी नहीं मिलेगी। वो अपनी बेवकूफी पे पछता रहा था की शायद उस दिन उस लड़की  ( इशिका ) को थोड़ी देर रोक कर उस से बातें की होती तो आज वो शायद मेरे साथ होती।

        मगर " कांँच के टुकड़े जैसे कभी जुड़ नहीं सकते वैसे ही टुटा हुआ दिल भी कभी जोड़ा नहीं जाता।" 

      उसके बाद से अभिषेक दीवानों सा हो गया था। उसे अपना होश ही नहीं था। ऐसे में प्रेमचंद जी को अचानक से हार्ट अटैक आ जाता है और  वो चल बसे। मगर जाने से पेहले वो अपनी सारी  ज़मीन जायदाद अभिषेक के नाम कर गए थे, क्योंकि उसके अलावा उनका यहाँ और कोई था भी तो नहीं ! वो ईमानदार भी था और वो दादाजी का ख़याल भी रखता था। मगर अब अभिषेक को पैसो से कुछ लेना देना नहीं था, उसका मन तो अभी भी इशिका के ख़यालो में ही गुम था। उसने उन पैसो से अपना सारा क़र्ज़ चूका दिया था और वही दादा जी की देखभाल करता रहता था। मगर दिल अब भी उसका जैसे कुछ ढूंँढ रहा था, शराब  के नशे में वो चौराहें पे चाय की टपरी पे गया। तो वहांँ इशिका का भाई खड़ा था, अभिषेक उसे पहचान गया। अभिषेक उसके पास गया।  ( वो भी बड़ा परेशान और मायूस लग रहा था। अभिषेक ने उस से बात करने की कोशिश की। )  

अभिषेक :   तुम इतने परेशान क्यों लग रहे हो ? 

भाई : क्या में आपको जानता हूँ ?

अभिषेक : ह ह म म... नहीं,  तुम मुझे नहीं जानते मगर शायद मैं तुम्हें ज़रुर जानता हूँ। कुछ दिन पहले मैंने तुम्हें एक लड़की के साथ इसी जगह पे देखा था। तुम दोनों चाय, नास्ता कर रहे थे और बड़े खुश भी नज़र आ रहे थे। मैं  दूर खड़ा वहाँ से तुम दोनों को देख रहा था। 

भाई : ह ह म म... 

अभिषेक : उस दिन तुम्हारे साथ जो लड़की थी, आज वो तुम्हारे साथ क्यों नहीं आई  ? कहाँ है वो ? वो ठीक तो है ना ?  तुम उसके क्या लगते हो ?

भाई : ( ऑंखें भर आती है। )  जी मैं  राघव और  वो मेरी दीदी इशिका है। मेरे बाबा ने उसे कही नौकरी पे लगा दिया है, मगर पता नहीं कहाँ। मेरे पूछने पर बाबा मुझे कुछ भी बताते नहीं,  उल्टा मुझ पे चिल्लाते रहते है। मुझे अपनी दीदी की बहुत चिंता हो रही है। न जाने वो कहाँ होगी,  किस हाल में होगी ? मगर आप मुझे क्यों पूछ रहे हो, क्या मेरी दीदी आपको जानती थी ? आपकी उस से कभी कुछ बात हुई  है क्या ? उसने आपको कभी कुछ बताया है क्या ?

अभिषेक : ह ह म म म... नहीं... मतलब हा...  हम लोग यहाँ एक ही वक़्त पे रोज़ चाय पिने आते थे तो एक दिन उसने मुझे अपनी नौकरी के बारे में पूछा था, मैं  उसे कुछ बताऊँ  या पुछू  इस से पेहले तो वो चली भी गई। उसने  अपना नाम और पता भी नहीं बताया मुझे। अब मैं उसे कैसे ढूंँढता। इसीलिए मैंने तुमको पूछा और तो कोई बात नहीं।(बात को आगे बढ़ाते हुए अभिषेक राघव से) अच्छा, तो तुम्हारे बाबा उसे कहा लेकर गए थे ये भी तुम्हे नहीं पता ?

राघव  : जी नही... हा...  लेकिन याद आया कुछ दिन पहले बाबा की  जेब से कलकत्ता की टिकट निकली थी।  तो शायद... और कलकत्ता बहुत दूर है और वहांँ जाने के लिए मेरे पास उतने  पैसे भी तो नहीं है। इतने बड़े शहर में मैं अकेला उसे कैसे ढूंँढूगा भला। इसलिए  दिल में एक आस  लिए यहाँ चला आता हूँ की शायद एक दिन मेरी दीदी मुझे यही पे मिल जाए । 

अभिषेक : ( थोड़ी देर  के बाद ) अच्छा !!!  तो तुम ऐसा करो की अपने बाबा से बातों-बातों में जानने की कोशिश करो की वो कहा होगी। मैं  कुछ सोचता हूँ। दो दिन बाद हम यही मिलेंगे।   

राघव : जी ज़रुर, अपनी दीदी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। 

        कहते हुए राघव अपने घर की और चला।  अभिषेक राघव को जाते देख रहा, मन ही मन सोचता की कहा होगी वो ? कलकत्ता में मेरा एक दोस्त है उसे पूछता हूँ, शायद कुछ पता चल जाए। थोड़ी देर रुकने के बाद अभिषेक भी घर की ओर चला। एक लम्बी साँस लेते हुए। 

        राघव बातो-बातो में अपने बाबा से दीदी के बारे में पूछने की कोशिश करता रहा। की शायद कुछ पता चल जाए। 

       उस तरफ अभिषेक ने भी कलकत्ता में अपने दोस्त मोहन को फ़ोन लगा के सारी बात बताई। 

मोहन : यार दोस्त अभिषेक, तेरी बात सुनकर मुझे भी लगता तो है की राघव और उसकी दीदी की मदद करनी चाहीए । मैं कुछ करता हूँ,  वैसे तो यहाँ इतने बड़े कलकत्ता शहर में एक लड़की को ढूँढना मुश्किल तो है, पर हम भी यारों  के यार है, तू फिक्र मत कर, मैं एक आदमी को जानता हूँ,  जिसे कलकत्ता की हर गली, हर नुक्कड़ की खबर रहती है, मगर उसका मुँह बहुत बड़ा है, उस का  मुँह पैसो से भरना पड़ेगा, तभी वो अपना काम करेगा।  

अभिषेक : तू पैसो की फ़िक्र मत कर। पैसो का इंतेज़ाम मैं कर लूँगा। तू बस पता लगा की लड़की कहाँ  मिलेगी। मैं तुमको उस लड़की की फोटो  भेजता हूँ।  

मोहन : ठीक है, चल अब मैं फ़ोन रखता हूँ। फ़िर मिलते है।  

अभिषेक : ओके। 

         तो दोस्तों,  क्या आप बता सकते हो की इशिका कहाँ  मिलेगी ? और किस हाल में मिलेगी ?  

         जानने के लिए पढ़ते रहिए

                    भाग- 6 

                           भाग - 6 

        तो दोस्तों, अब तक आप सब ने पढ़ा, कि अभिषेक के पूछने पर राघव ने उसे बताया, कि इशिका के बाबा इशिका को शायद कलकत्ता छोड़ आए है, ऐसा राघव को लगता है।  मगर अकेले कलकत्ता जाकर अपनी बहन को ढूँढना राघव के लिए मुश्किल था। अभिषेक अपना दोस्त मोहन जो कलकत्ता में रहता है, उसे इशिका के बारे में पता लगाने को कहा, अभिषेक के दोस्त मोहन ने उसकी मदद करने को हाँ, तो कहा, मगर साथ में ये भी कहा, कि उसके लिए बहुत ज़्यादा पैसे लगेंगे, वो एक आदमी को जानता तो है, मगर वो बहुत पैसे लेता है, फ़िर भी अभिषेक ने इशिका के को ढूँढ ने को कह दिया, अब आगे... 

        इधर राघव चुपके से अपने बाबा को फ़ोन पे किसी से पैसों की बात करते हुए सुन लेता है और बाबा बिच-बिच में किसी रसीला बाई का नाम भी बोल रहे थे। राघव को लगा की ज़रूर बाबा दीदी के बारे में ही बात कर रहे होंगे। 

उधर अभिषेक भी पैसो का इंतेज़ाम कर कलकत्ता जाने की तैयारी में लगा था। 

अभिषेक : ( मन ही मन ) एक बार राघव से मिल लूँ । शायद उसे भी इशिका के बारे में कुछ पता चला हो। 

        वो चाय की टपरी पे जाके राघव का इंतज़ार करता है, तभी सामने से राघव भी आ जाता है। 

अभिषेक  : (जल्दी जल्दी में ) कुछ पता चला क्या तुम्हारी बहन इशिका के बारे में ?

राघव : हा, आज मेरे बाबा फ़ोन पे बाते कर रहे थे किसी से, तब मैंने चुपके से उनकी बाते सुनी, वो कुछ पैसों के बारे में बात कर रहे थे और बिच-बिच में किसी रसीला बाई का नाम भी ले रहे थे। 

अभिषेक : ह ह म म म... तो ये बात है, अभिषेक समझ गया, दाल में ज़रूर कुछ काला है। मैं एक ज़रूरी काम से अभी कलकत्ता जा रहा हूँ, तो तेरी दीदी के बारे में भी पता लगा लूँगा। 

राघव :( को मन ही मन शक हुआ ) मगर आप  मेरी दीदी के लिए इतना सब क्यों कर रहे हो ?  कभी कभी इस बेदर्द ज़माने में कोई अपनों की मदद भी नहीं करता, तो आप हम गरीब के लिए इतना क्यों कर रहे हो ? कही आप मेरी दीदी  से..... 

   ( राघव की बात को बिच में ही रोकते हुए ) 

अभिषेक : इंसानियत नाम की भी कोई चीज़ होती है, मेरे भाई, बस समजलो इसी नाते। चलो मुझे ट्रैन पकड़नी है, वरना मुझे देर हो जाएगी। मैं चलता हूँ। 

       राघव को लगा जैसे की ज़रुर अभिषेकजी और दीदी कहीं एक दूसरे से प्यार तो नहीं करते ! ये सब जानने की बजाय उसे अपनी दीदी को ढूँढना ज़्यादा ज़रुरी लगा। 

राघव : ( अभिषेक का हाथ पकड़कर उसे रोकते हुए ) 

        मैं भी आपके साथ आऊँगा। आपका  तो पता नहीं मगर मेरी तो वो दीदी है, प्लीज मुझे आपके साथ आने दीजिऐ।  

अभिषेक : ( अभिषेक राघव की भोली सूरत देख उसे मना नहीं कर पाया। )

 ठीक है तो चलो, तुम्हारी टिकट का इंतेज़ाम मैं कर लूंँगा। 

      अभिषेक और राघव दोनों साथ कलकत्ता पहुँच जाते है। अभिषेक ने पहले से ही मोहन को स्टेशन पे बुला लिया था, ताकि इशिका को ढूंँढने में ज़्यादा वक़्त बर्बाद ना हो । 

अभिषेक : ( जल्दी जल्दी में, मोहन को अपने सामने देखते ही खुश होते हुए अभिषेक ) 

      अरे मोहन, कैसा है मेरे यार तू ? घर पे सब कैसे है ? 

( गले लगते हुए ) बहुत दिनों के बाद मिलना हुआ। तुझे देख के बड़ा अच्छा लगा। पहले मुझे यह बता, की कुछ पता चला क्या इशिका के बारे में ? 

मोहन : अरे ! रुक जा मेरे यार, साँस तो लेले ज़रा। एक साथ इतने सारे सवाल ? बताता हूँ, सब बताता हूँ, मैं तो पहले की तरह देख ले एकदम बढ़िया हूँ, हटाकटा 

        ( अपने बाज़ुओ को दिखाते हुए ) मुझे क्या हुआ ? और घर पे भी सब ठीक है। कभी-कभी माँ तुझे बहुत याद करती है। बाद में मिलाता हुँ  उनसे। चल पहले कुछ नास्ता भी कर लेते है, फ़िर आराम से बाते करेंगे। 

        ( मोहन ने आँखों के इशारे से अभिषेक के पास खड़े राघव को देखते हुए कहा, कि ये तेरे साथ कौन है ? अभिषेक राघव को मिलाते हुए )


अभिषेक : ये इशिका का भाई है, इस ने कहा मुझे भी चलना है आपके साथ। मैं कैसे मना कर सकता था। 

मोहन : ठीक है, कोई बात नहीं।

    ( चाय नास्ता करते-करते बाते करते है।)

मोहन : यार अभिषेक, मैंने तुझे उस आदमी के बारे में फ़ोन पे बताया था ना, तो उस से मेरी बात हुई, उसने बताया की, एक नई लड़की किसी गाँव से कलकत्ता के बाजार में आई तो है, कलकत्ता का बाजार मतलब तू जानता तो है ना ! ( मोहन ने इशारे से उसे  समझाया। अभिषेक और राघव के पाव निचे से तो ज़मीन ही सरक गई । ) 

राघव : ( थोड़ी देर बाद राघव कुछ याद करते हुए )

 हाँ... अभी कल ही मेरे बाबा किसी रसीला बाई के बारे में फ़ोन पे बात कर रहे थे और उनसे ओर पैसे भी मांँग रहे थे। 

मोहन : ओह्ह ! तो ये बात है। मैं अभी उस सुखीलाल को यहाँ बुला लेता हूँ, वो ज़रूर जानता होगा रसीला बाई को। क्योंकि  उन गलियों में उसका रोज़ का आना-जाना लगा रहता है। 

अभिषेक : अच्छा ठीक है, उसे जल्दी बुला लो। जितना हो सके उतना जल्दी हमें इशिका को अब ढूँढना होगा। 

( मोहन उस सुखीलाल को फ़ोन लगाकर बुला लेता है। )

सुखी लाल  :  (  मुँह में पान चबाते हुए और अपनी लम्बी मुछो पर ताव देते हुए थोड़ी ही देर में आ जाता है ) जी आपने हमें याद किया ?


मोहन : हांँ... सुनो मैंने तुम को एक लड़की के बारे में बताया था, ये उसके रिश्तेदार  है। 

सुखी लाल : ह ह म म....  वो तो ठिक् है मगर दो दिन से मेरी बोतल ख़तम हो गइ है। ( इशारा करते हुए ) 

मोहन : ( उसे साइड में ले जाते हुए ) अरे यार, तू भी ना !वो सब तो मैं समझ गया। तू पैसो की चिंता मत करो, तुम को तुम्हारा पैसा मिल जाएगा। 

सुखी लाल  : पहले दाम फ़िर काम। करना है तो बोलो वरना में चला। 

     ( मोहन सुखीलाल को रोकते हुए )

मोहन : तुम भी समजते नहीं हो, अच्छा ठीक है, 

 ( मोहन अभिषेक को साइड में ले जाकर पैसो  के बारे में बात करता है, अभिषेक तुरंत थोड़े पैसे निकालकर मोहन को दे देता है। राघव दूर से ये सब देख लेता है। मोहन सुखी लाल को पैसे देते हुए ) आधा पैसा अभी देते है, आधा काम होने के बाद। ठीक है ? मगर काम पूरा होने से पेहले मुकर मत जाना।  

सुखीलाल : ये सुखीलाल की ज़ुबान है, कट सकती है मगर मुकर नहीं सकती । आप अब फ़िक्र मत करो, आप बस पैसो का इंतज़ाम करो।

        ( पैसा गिनते हुए खुश होता है। अपनी मुछो पर ताव लगाते हुए ) समजो आपका काम हो गया। 

मोहन : हाँ...  लेकिन कब ? 

सुखीलाल : लड़की की कोई फोटो ? 

राघव : ( फ़ोन में अपनी दीदी की फोटो दिखाते हुए ) 

     ये है मेरी दीदी। 

सुखी लाल : ( फोटो देखते हुए ) ह ह म म म.... इस लड़की को तो मैंने आज कल में ही कही देखा है मगर याद नहीं आ रहा की कहाँ ? 

मोहन :  ( चिढ़ते हुए )  ज़रा अपने दिमाग पे भी ज़ोर लगाओ, याद करो कहाँ देखा था इसे। 

सुखीलाल : ( अपने हाथ खूजाते हुए ) 

       याद तो आ रहा है लेकिन...  

मोहन : ( उसके हाथो में थोड़े ओर पैसे रखते हुए ) 

 तू नहीं सुधर ने वाला। अब कुछ याद आया क्या ?

सुखीलाल  : ( पैसो को देखते ही  ) 

हांँ... शायद अब कुछ याद आ रहा है जैसे ( फोटो को फ़िर से गौर से देखते हुए ) शायद इसे मैंने कल रसीला बाई के कोठे पे देखा था। बहुत अच्छा नाच रही थी। 

मोहन : ह ह ह म म मम.... ( उसको चुप करते हुए )  

सुखीलाल : मेरा मतलब है, कि जहाँ तक में जानता हुँ, रसीला बाई के कोठे से आज तक कोई लड़की  तो क्या कोई एक पत्ता तक नहीं लेके जा सकता। इतनी पाबन्दी है वहाँ।   

अभिषेक : वो सब हम देख लेंगे। तू सिर्फ हम को उधर लेके चल। 

सुखीलाल : हाँ... मगर बाजार रात को खुलता है ना, इस वक़्त कोई नहीं मिलेगा आपको। रात को चलते है ना, तब तक आराम करो आप। मगर भेस बदलकर आना होगा तभी आप मिल पाएंँगे लड़की से। समज गए ना !

       तो दोस्तों, क्या अभिषेक और राघव इशिका को रसीला बाई के चंगुल से छुड़ा पाएंँगे ?   

           जानने के लिए पढ़ते रहिए 

                       भाग - 7 

           तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, कि राघव और अभिषेक इशिका को ढूंँढने कलकत्ता चले जाते है, वहांँ अभिषेक का दोस्त मोहन स्टेशन पे ही उसे मिल जाता है, सब साथ में चाय नास्ते के लिए नजदीकी होटल में जाते है, मोहन ने वही पे सुखीलाल को बुला लिया था, जो इशिका को ढूंँढने में मदद करनेवाला था। इशिका की फोटो देख सुखीलाल उसे पहचान जाता है और कहता है, कि रसीला बाई के कोठे पे रात को भेष बदलकर ले जाऐगा। अब आगे... 

         अभिषेक और राघव को इशिका की बड़ी फ़िक्र हो रही थी। दोनों रात होने के इंतज़ार में थे। शाम होते ही दोनों ने अपना भेस बदल लिया। सुखी लाल और मोहन दोनों सामने से आ ही रहे थे।  

सुखीलाला : चलो तैयार हो ?

दोनों साथ में : हाँ, हाँ, चलो चलो। 

सुखीलाल : लेकिन एक बात मेरी गौर से सुन लो, आप में से कोई भी रसीला बाई से कुछ बात नहीं करेगा, लड़की के बारे में बात में ही करुँगा। क्योंकि रसीला बाई बहुत चालक है, वो अपनी पारखी  नज़रो से सबको पहचान लेती है, अगर उसने तुम सब को पहचान लिया की तुम किस वजह से वहाँ आए हो, तो बात बनने की जगह बिगड़ भी सकती है। समज गए ना तुम ? 

मोहन : हाँ, समज गए सब, चलो चलो अब !

          टैक्सी बुलाकर सब साथ में कोठे पे पहुँचते है, कोठा आते-आते रास्ते में से ही दिखाई दे रही थी वहाँ की रोशनी, जैसे वहाँ का माहौल कुछ ऐसा था की, " रात, रात ना होकर रोशनी से ज़गमगाता आसमान हो, चारों और रोशनी ही रोशनी थी। यहाँ पे तो बिजली और फूलों से सारे कोठे सजे हुए थे, सब लड़कियांँ भी सजसवर कर कोठे के बाहर या तो खिड़की पे खड़ी थी और अपने खरीदार को जैसे अपने पास बुला रही थी।" 

       अभिषेक और राघव के लिए ये सब कुछ बिलकुल नया था। उन्होंने ऐसी गलियांँ पहले कभी नहीं देखी थी।  

       सुखीलाल ने राघव को समजाते हुए कोठे के बाहर ही रुकने को कहा, क्योंकि राघव उम्र में भी थोड़ा छोटा था।  

अभिषेक : ( ने भी उसे बाहर रुके रहने को समजाया, ) की तुम फ़िक्र मत करो, हम लोग तुम्हारी  दीदी  को छुड़ा लेंगे यहाँ से। 

        राघव कोठे के थोड़े दूर ही रुक गया और अभिषेक, मोहन और सुखी लाल तीनो कोठे के अंदर जाते है। कोठे के अंदर का माहौल तो उससे भी रंगीन था। " कमरे के चारों और रोशनी और फूलों की सजावट थी। सब के बैठने के लिए आरामदायक गद्दे और तकिये बिछा रखे थे। कुछ लोग भी आने शूरु हो गए थे। सब के बिचोबीच एक बड़ी कुर्सी पे एक औरत सजधज़ कर अपने मुँह में पान चबाते हुए बड़े ठाठ-माठ से बैठी थी। उसका रुआब बड़ा ही आशिकाना था। " सुखीलाल रसीलाबाई के पास जाते हुए, 

सुखीलाल : इस नाचीज़ का सलाम कबूल कीजिए, रसीला बाई। आज तो आप क्या गजब ढा रही हो, माशा अल्लाह, किसी की बुरी नज़र ना लगे आपको। 

( कहते हुए सुखीलाल रसीला बाई के सामने ज़ुकता है। )

 रसीला बाई : क्या बात है सुखीलाल ? आज कुछ ज़्यादा ही तारीफ कर रहे हो हमारी ? कही कुछ हमसे छुपा तो नहीं रहे हो ना ! 

सुखीलाल : ( हस्ते हुए ) अरे, नहीं नहीं ! आपसे भला क्या छुपाना ? उल्टा आज तो मैं आपके लिए नए मेहमान लाया हूँ, उसे आप ज़रा खुश कर दो तो मेहरबानी, 

       ( सुखीलाला अपनी मुछो  पर ताव देते हुए )

        रकम भी अच्छी खासी  मिलेगी आपको । 

 रसीला बाई : अच्छा ये बात है तो, मगर ये दोनों पहले तो कभी दिखे नहीं यहाँ पर, कहीं  कुछ दाल में काला तो नहीं सुखीलाल। 

सुखीलाल : अरे, नहीं नहीं ! कैसी बात कर रही है आप। मेंने आज तक ऐसा कभी आपके साथ किया है क्या ? ये तो मेरे एक पुराने दोस्त के रिश्तेदार है जो दो दिन के लिए कलकत्ता घूमने आए है, तो मैंने सोचा रसीला बाई से एक बार मिला देते है, और तो क्या ?

रसीला बाई : अच्छा ठीक है, ठीक है। दोनों को अंदर गद्दे पे बैठा दो। मैं कुछ इंतेज़ाम करती हूँ इनका। 

सुखीलाल : जो आपका हुकुम।

          कहते हुए, झुकते हुए सुखीलाल अभिषेक और मोहन को अंदर बैठा देता है और इशारे से सब देखते रेहने को कहा। थोड़ी ही देर में तीन, चार लड़कियांँ आने लगी और अपना नाच दिखाने लगी। सब वाह,, वाह,, की आवाज़ लगाते हुए उन सब पे पैसा उड़ा रहे थे, उन लड़कियों में  इशिका भी थी, जिसे अभिषेक पहचान गया था, मगर रसीला बाई को शक ना हो इसलिए वो भी चुप बैठा रहा और इशारे से सुखीलाल को बता दिया की यही इशिका है।  सुखीलाल समज गया। सुखीलाल और मोहन भी लड़कियों पे पैसा उड़ाने लगे, ताकि रसीला बाई को शक ना हो की वे लोग यहाँ क्यों आए है।  सुखीलाल ने एक तरकीब लगाई। वो नाचते नाचते रसीला बाई के पास गया और 

 सुखीलाल : ( रसीला बाई को इशारे से बताते हुए )

         हमारे शेठ को वो लड़की पसंद आ गई है, वो उसको अपने साथ लेके जाना चाहते है, और उसकी मुँह मांँगी किम्मत भी देने को तैयार है, आप बोलो तो में हाँ कर दूँ ? सोने से तोल देंगे वो आपको। 

रसीला बाई : इतना आसान होता अगर रसीला बाई के कोठे से किसी लड़की को लेके जाना तो आज मेरा ये कोठा खाली हो चूका होता, मेरे पास एक से एक हूर परी जो है और जिसकी आप बात कर रहे है ना, वो तो अभी कच्ची कली है, अभी तो इससे मुझे बहुत कुछ वसूल करना है, इशिका तो हमारे कोठे का कोहिनूर हिरा है, उसे कैसे भला में एक ही बार में किसी को देदूँ ? कुछ सोच समझकर बोल। 

( सुखीलाल की इतनी कोशिश के बाद भी बात नहीं बनी, तो )

सुखीलाल : अरे, आप नाराज़ क्यों हो रही हो, भला। ऐसी बात है तो चलो जाने दो, मगर सरकार उससे अकेले में मिलना चाहते है, अभी आप इतना तो कर ही सकती है ना ! ( बोलते हुए सुखीलाल ने पैसो का बंडल रसीला बाई के हाथों में थमा दिया। ) शायद कल इस से ज़्यादा भी मिल जाए, आप बस आम खाने से मतलब रखिऐ अब पेड़ गिनने से क्या फ़ायदा ?

रसीला बाई : अच्छा, अगर ऐसी बात है तो, सिर्फ़ तेरे भरोसे पे उसे मिलने देती हूँ, मगर सिर्फ़  एक ही घंटा, ज़्यादा नहीं, मेरे आदमी नज़र रखेगे इस पे, समज गए ना !

सुखीलाल : ( खुश होते हुए ) आपकी बहुत-बहुत महेरबानी। ( सुखीलाल अभिषेक और मोहन के पास गया और बताया की ) आप कुछ देर के लिए इशिका से मिल सकते है, मैंने रसीला बाई को मना लिया है। आज आप उनसे बात कर लो, कल देख लेंगे क्या कर सकते है ? 

अभिषेक : जी बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। 

   लड़कियों का नाच ख़तम होने के बाद सारी लड़कियाँ अपने-अपने कमरे में चली गई, इशिका भी उनके साथ अपने कमरे में चली गई। रसीला बाई ने सुखीलाल को इशारा कीया, कि अब आप मिलने जा सकते हो। अभिषेक इशिका के कमरे में जाता है, रसीलाबाई ने कमरे के बाहर अपने आदमी को खड़ा रखा, ताकि कोई गड़बड़ न हो। इशिका आइने में देख अपने बाल बना रही थी। इशिका को लगा की कमरे में कोई आ रहा है,  तुरंत ही वो बोली, " वही पे रुक जाना," अभिषेक वही दरवाजे के पास रुक जाता है। बाहर से रसीला बाई के आदमी ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

 इशिका : आज मेरे लिए क्या तोहफा लेकर आए हो ? मैं  भी तो देखु ज़रा, वरना ये चाँद सा चेहरा आपको देखने नहीं मिलेगा।

 ( अभिषेक उसकी बाते सुनता ही रेह गया। )

     अब ऐसे ही गुमसुम खड़े रहोगे या कुछ  बोलोगे भी। ( इशिका काे लगा, कि जैसे वो रोज़ जो उसे परेशान करने आता था वही होगा। )

अभिषेक : अअअअ... वो मैं... 

       ( इशिका को उसकी आवाज़ कुछ बदली-बदली सी लगी, तो उसने फौरन मुड  के देखा तो... कोई ओर ही था।   

         तो दोस्तों, क्या आप बता सकते हो, कि  इशिका का अंदाज़ क्यों बदला बदला सा है ? 

          जानने के लिए पढ़ते रहिए 

                      भाग - 8

          तो दोस्तों, अब तक आप सबने पढ़ा, कि सुखीलाल अभिषेक, मोहन और राघव को लेकर रात होते ही रसीलाबाई के कोठे तक जाता है। सुखिलालने राघव को कोठे पे आने से मना किया, क्योंकि वो उम्र में छोटा भी था। अभिषेक ने कोठे पे जाके देखा तो वहांँ इशिका भी थी। सुखीलाल ने जैसे-तैसे करके रसीला बाई को मना  लिया, अभिषेक को इशिका से मिलने के लिए। अभिषेक इशिका को मिलने अकेले कमरे में जाता है, वहांँ जाके देखा तो, इशिका का अंदाज़ ही कुछ बदला-बदला सा था अब आगे... 

   एक अज़नबी को अपने कमरे में देख,

 इशिका :  तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे ? मैंने  रसीला बाई को कितनी बार बताया, की मेरी इजाज़त के बिना किसी एरेगेरे को मेरे कमरे में ना आने दे।

     ( बोलते  हुए इशिका रसीला बाई को आवाज़ लगाने लगी। अभिषेक ने उसका मुँह दबा दिया और चुप रहने को इशारा किया। अभिषेक ने अपनी दाढ़ी, मूंछ और नकली बाल चेहरे से हटाए, इशिका उसे देख चौक गई, और पहचान भी गई । कुछ देर दोनों एकदूसरे की आँखों में देख जैसे बाते कर रहे हो। थोड़ी देर बाद इशिकाने कहा,

इशिका : आप यहाँ कैसे ? ( और फ़िर पलट कर ) यहाँ क्यों आए हो ? ( उसका अंदाज़ ही जैसे बदल गया। )

अभिषेक : इशिका मैं तुम्हें यहाँ से ले जाने आया हूँ,  तुम्हारा भाई राघव भी  निचे ही खड़ा है। उस दिन तुम मेरे पास नौकरी के लिए आई थी, मगर उस दिन ना ही तुम ने अपना नाम बताया और ना ही अपना पता।  उस दिन के बाद मैंने तुम्हें बहुत ढूंँढा, मगर तुम्हारा कोई अतापता नहीं था। फ़िर  तुम्हारे भाई से पता चला की तुम्हारे बाबाने तुमको  यहाँ कलकत्ता भेज दिया है, तो मेरे एक दोस्त मोहन की मदद से मैं तुमको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते यहाँ तक आ पहुँचा। तुम किसी भी बहाने से कल सुबह १० बजे  कोठे के बाहर निकल जाना, फ़िर  हम लोग यहाँ से चले जाएँगे। मैं वहाँ सामने खड़ा रहूँगा। 


इशिका : जब मुझे किसी की सच में ज़रूरत थी, तब तो मेरा साथ किसी ने नहीं दिया,  बाबा को पैसो की ज़रुरत थी, मुझे बेच के उसे पैसे मिल गए, यहाँ आई तो मेरी वजह से रसीला बाई को पैसे मिल रहे है, मेरी वजह से कोई तो खुश है, वैसे भी रसीला बाई मेरा यहाँ बहुत ख़याल रखती है, मुझे किसी भी बात की कोई कमी नहीं, इन  बदनाम गलियों में आकर अब यहाँ से वापस जाना मेरे लिए मुश्किल है, आप भूल जाओ मुझे, यही आप के लिए अच्छा होगा, राघव को  भी आप समजा दें की मैं यहाँ खुश हूँ। 

     ( इशिका ने बातो-बातो में खिड़की पे जाकर देख लिया, कि  वहाँ  सामने थोड़ी दूर उसका भाई राघव भी खड़ा था। ) 

अभिषेक : ( ने इशिका का हाथ अपने सिर पे रख दिया ) तो फिर खाओ मेरी कसम की तुम यहाँ से  सच में निकलना नहीं  चाहती। 

इशिका : हमें अब कोई कसम या किसी वादे पे भरोसा नहीं रहा, आप ज़िद्द छोड़ दीजिए और यहाँ से चले जाइए। फ़िर कभी ज़रूरत नहीं है यहाँ आने की। यहाँ आपको बदनामी के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला। 

    ( बहार से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई,  )

पहरेदार : आप का मिलने का वक़्त ख़तम हुआ, अब आप जल्दी से बाहर आ जाइए, रसीला बाई आपको याद कर रही है।  

अभिषेक : कल तुम तैयार रेहना मैं तुम्हें  यहाँ से लेकर ही जाऊंँगा। मैं तुम्हें इन बदनाम गलियों में यूँ रहने नहीं दे सकता। कहते  हुए अभिषेक अपनी नकली दाढ़ी,  मुछ और बाल लगाकर बाहर चला जाता है।

      ( रसीला बाई से इजाज़त लेकर अभिषेक, मोहन और सुखीलाल वहाँ से चले जाते है। अभिषेक राघव और मोहन को सारी बातें बताता है, अभिषेक की बातें  सुन राघव और मोहन को भी बड़ा अजीब लगा की कोई लड़की इतना कैसे बदल सकती है। अभिषेक राघव और मोहन से )

अभिषेक : चाहे कुछ भी हो जाए में रसीला बाई के चुंगल से इशिका को छुड़ा कर ही रहूँगा। 

सुखीलाल : सुबह होनेवाली है, मैं चलता हूँ,  कल रात को फ़िर से यहाँ आना हो तो मुझे बता देना, और पैसो का भी इंतेज़ाम करके रखना। कह कर सुखीलाल वहाँ से चला जाता है।

 मोहन : ( बहुत ठक चूका था, ) कल मिलते है, अपना ख्याल रखना।  (कह कर चला जाता है। )

         अभिषेक और राघव भी सोने लगे, मगर उनकी आँखों में अब नींद कहाँ ? वो पूरी रात  सोचता ही रहा इशिका इतनी कैसे बदल गई ? उसे अब कैसे वहाँ से निकाले ?   

       दूसरे दिन फ़िर से अभिषेक शाम होने के इंतज़ार में था, अब तो शाम होने को थी। अभिषेक ने मोहन और सुखीलाल को वापस कोठे पे जाने के लिए  बुला लिया। अपना भेस बदलकर सब कोठे की ओर चले, मगर ये क्या आज रसीला बाई के कोठे के बाहर बड़ी भीड़ जमी हुई थी। कोठे से रोशनी भी बहुत कम आ रही थी। गाने बजाने की आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही थी।  एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था। 

सुखीलाल : आप लोग यही रुको में ज़रा देख के आता हूँ,  की आखिर बात क्या है ?

        कोठे के बाहर भीड़ जमी हुई थी। लोग अंदर ही अंदर कुछ बाते कर रहे थे। सुखीलाल को कुछ समज नहीं आया। सुखीलाल कोठे के अंदर जाके देखता है, वो अंदर का दृश्य देखकर चौक जाता है, उसके सामने सफ़ेद चद्दर में एक लाश पड़ी हुई  थी, 


          वो कुछ समज नहीं पाया,  उसने अगलबगल में सारी लड़कियों को देखा तो वहाँ  इशिका नहीं दिखाइ दी, उसका शक यकींन में बदल गया और वो लाश के पास गया और उसने लाश के मुँह से ज़रा सा कपड़ा  हटा के देखा तो, वो दंग रेह गया, वो  इशिका  की ही लाश थी। सुखीलाल थोड़ा सा गभरा गया, बाहर अभिषेक को भी कुछ सही नहीं  लग रहा था, उसे लगा ज़रूर कुछ ना कुछ किसी के साथ हुआ है,  राघव और मोहन भी देखने के लिए सुखीलाल के पीछे भागे। इशिका की लाश देख अभिषेक को तो जैसे अपनी आँखों पे यक़ीन ही नहीं हो रहा था। रसीला बाई उसके पास ही बैठी रोने का नाटक कर रही थी। उसका पैसे देनेवाला कोहिनूर हीरा  जो चला गया था। सुखीलाल अभिषेक को लेकर चुपचाप वहाँ से बाहर निकल गया। सब के मन में बहुत सारे सवाल चल रहे थे, ये सब कब और कैसे हुआ ? तभी एक लड़की दौड़ती हुई अभिषेक के पास आई और उसे एक चिठ्ठी देकर चली गई। अभिषेक चिठ्ठी खोलकर पढ़ने लगा,



       चिठ्ठी इशिका ने लिखी थी, चिठ्ठी में लिखा था, कि   "मेरा एक सवाल है, ऐसा क्यूँ  होता है, की जिनसे हम बेपनाह महोब्बत करते है, उसी से हमें दूर होना पड़ता है। ज़िंदगी हमें एक ऐसे मुक़ाम पर लेकर आई थी, कि जहाँ से वापस जाना मुमकिन ही नहीं बल्कि नामुमकिन है, कल आप की बातें सुनकर मुझे पता लग गया की आप भी मुझसे उतना ही प्यार करते है, जितना की मैं आप को, बस फर्क सिर्फ़ इतना है की हम दोनों कभी दिल की बात ज़ुबाँ पर नहीं ला सके। इन बदनाम गलियों ने आपकी इशिका को भी इशिका बाई बना दिया है, यहाँ लोग मुझे इशिका बाई के नाम से ही पुकारते है और इशिका बाई नाम सुनते ही मेरा कलेजा फट जाता है, जी करता है की अपने साथ-साथ इस रसीला बाई के कोठे को भी जला दुँ, मगर बिना वजह किसी का दिल तोडना या किसी की जान लेना मेरी फितरत  मे नहीं। मेरे जैसी एक नहीं कई लड़कियाँ है यहाँ, जो ऐसे ही घुट घुट के जीती है, अगर रसीला बाई जैसी औरत ही औरत का दर्द नहीं समज सकती, तो और भला कौन समज सकेगा ? यहाँ आनेवाले हर मर्द की नज़र जैसे हम को अभी चीड़ फाड् के खा जायेंगे, ऐसा लगता है, जी करता है, की उन सब की आँखें ही नोच लू, कौन सी औरत ऐसी बदनाम गलियों में रेहना पसंद करेगी भला ? मगर आप जानते नहीं ये कोठे की दीवारे, दीवारे नहीं हमारे लिए एक पिंजरा है, जहाँ से रसीला बाई की मर्ज़ी के बिना कोई बाहर नहीं जा सकता और  जाने की कोशिश की तो उसके पंख ही काट दिए जाते है, ताकि वो कभी उड़ने के काबिल ही ना रहे। मैंने भी भागने  कोशिश  की थी मगर, पकड़ी गई,  इनाम के तौर पे उस रात मेरे पैरो को खोलते हुए पानी में डालकर जलाया गया था, उस के बाद कुछ दिन ठीक से चल भी नहीं पा रही थी,  तब मैंने मान लिया की अब यही मेरा जीवन है, तो क्यों न खुशी से  इसे भी जी लूँ, जो होगा देखा जाएगा। मगर फ़िर आप मेरे ज़ख्मो को कुरेदने आ गए, जो ज़िंदगी मैं पीछे छोड़ चुकी थी। उसी को फ़िर से क्यूँ दोहराना चाहते है आप ? कल आपकी आँखों में मैंने मेरे लिए जुनून देख लिया था, मगर  आप जैसा चाहते है, वो नामुमकिन है, क्योंकि  अब मैं अच्छी तरह से जान चुकी हूँ, जैसे-तैसे कर के अगर आप मुझे यहाँ से भगा कर ले भी गए, तब भी रसिला बाई हम में से किसी को नहीं छोड़ेगी, मेरे साथ-साथ वो आप को और राघव को भी मार डालेगी और मेरी वजह से आप सब की जान को खतरा हो ये मैं  नहीं चाहती, इसीलिए मैं जा रही हूँ, इस जनम में ना सही अगले जनम में हम ज़रुर  मिलेंगे, ये मेरा वादा है आप से, बस प्यार का इज़हार करने में देर ना हो जाऐ  कही, इतना याद रखना। मेरे भाई का ख्याल रखना और उस से केहना तुम्हारी दीदी  तुमसे बहुत प्यार करती है, और मेरा आशीर्वाद सदा उसके साथ रहेगा, 
     "  तेरी मेरी कहानी जो शुरु होने से पेहले ही ख़तम हो गई। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना और मुझे भूल जाना,  
इशिका बाई, 
जो कभी आप की ना बन सकी। "

       " अभिषेक के हाथ से चिठ्ठी राघव और मोहन ने लेकर पढी। सबको बड़ा झटका लगा, ये सब क्या हो गया। सुखीलाल सबको वहाँ से लेकर चला गया। क्योंकि अगर रसीला बाई को इसकी थोड़ी सी भी भनक हो गई ना तो वो हम सब को ज़िंदा यहाँ ही गाड़ देगी, खून की नदियाँ  बहने लगेगी। सुखीलाल को पता था, की कोठे के  चारों ओर भी रसीला बाई के आदमी भेस बदलकर पहरा देते है। सब आते-जाते लोगों पे इनकी कड़ी नज़र रहती है, बाहर की सब बातें रसीला बाई तक ये लोग पहुँचाते रहते है।  जो शायद ही किसी को पता होगा। सब मायूस होकर घर की ओर चले। आज की रात मोहन अभिषेक के पास ही सो गया। सुबह होते ही अभिषेक और राघव स्टेशन की ओर चले। 

 मोहन  : ( अभिषेक को गले मिलते हुए ) बस इतना ही कहा की अपना खयाल रखना मेरे दोस्त, घर पहुँचकर मुझे एक बार फ़ोन  कर देना।  

अभिषेक : अच्छा तो मैं अब चलता हूँ,  तू भी अपना ख्याल रखना मेरे दोस्त, पता नहीं अब फ़िर कब मिलना होगा तुमसे। 

     ( अभिषेक और राघव दोनों  घर आ गए  और अभिषेक ने  राघव को अपने पास ही रोक लिया।)

 अभिषेक  : ( राघव से ) आज से तुम यही रहोगे मेरे पास, तुम्हें  कही भी जाने की कोई ज़रूरत नहीं। 

     ( राघव को भी अभिषेक के साथ अच्छा लगता था, उसने अपनी पढाई ख़तम कर ली और वही अभिषेक के काम में हाथ बटाने लगा था। अभिषेक रोज़ एक बार इशिका के हाथो लिखी चिठ्ठी पढ़ा करता था,  

      " तेरी मेरी कहानी जो शुरु होने से पेहले ही ख़तम हो गई। " हो सके तो मुझे माफ़ कर देना और मुझे भूल  जाना। " 

         मगर दोस्तों, प्यार ऐसे कभी भुलाए नहीं भुलाया जाता। वैसे ही शायद अभिषेक इशिका और उसके प्यार और बलिदान को कभी भुला नहीं पाएगा। 

 "Not every story has an end happily ever after"

                   समाप्त।

Bela...


                अनचाहा रिश्ता भाग-१ 

     एक दिन की बात है। रात का वक़्त था, निशांत के पास अपने घर की एक चाबी हंमेशा से रहती ही थी, तो नियति को सरप्राइज देने के चक्कर में निशांत दबे पाँव घर का दरवाज़ा खोल घर में आ जाता है, निशांत का 5 साल का बेटा मुन्ना अपने कमरे में आराम से सो रहा होता है और निशांत के कमरें से किसी के धीरे से बात करने की और हँसने की आवाज़ आ रही थी, निशांत को बड़ा ताजुब हुआ, वह अपनी पत्नी नियति और अपने बेटे मुन्ने को सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए बिना नियति को बताए, निशांत अचानक से दिल्ली से घर आ जाता है और उसी दिन.... भावेश और नियति का प्यार भी पहली बार सारी सिमाएंँ तोड़ ने जा रहा था। नियति ने अपनी आँखें बंद कर दी थी, शायद नियति को उस बात का होश नहीं था, कि वह आज जिसके साथ है, वह उसका पति निशांत नहीं बल्कि उसका करीबी दोस्त भावेश था। बारिश का मौसम था, खिड़की में से ठंडी हवा के साथ-साथ बारिश की बुँदे खिड़की के पर्दो को भीगाती हुई खिड़की के पास खड़े नियति और भावेश दोनों के बदन और मन को भी भीगा रही थी। नियति और भावेश के होठों से होंठ टकराने ही वाले थे, दोनों के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी थी, भावेश ने नियति की पतली कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़ के रखा था, नियति ने भी भावेश को अपनी बाँहों में कस के पकड़ के रखा था,  जैसे कि आज सच में कोई अनहोनी होने वाली थी, दोनों को लग रहा था, कि जैसे ये वक़्त, ये लम्हा बस यहीं थम जाए और हम दोनों एक दूसरे में समां जाए, वह दोनों एक दूसरे में ऐसे लीन हो गए थे, कि उस पल नियति और भावेश दोनों को एक दूसरे के अलावा और कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था, दोनों को जैसे होश ही नहीं था, दोनों कहाँ है और क्या कर रहे है, ये दोनों को खुद को पता नहीं था, कि ये सब क्या हो रहा है और कैसे ?   

     उस वक़्त नियति के कमरें का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था, इसलिए निशांत कमरें के अंदर का दृश्य देखकर हैरान हो जाता है, नियति और भावेश आधी रात को उसके ही घर में उसी के कमरें में... नियति ने निशांत को ये तो बताया था, कि " योगा क्लास में उसका एक दोस्त भी है मगर उस दोस्त के साथ दोस्ती इतनी गहरी होगी, ये तो निशांत को नहीं पता था। "

      निशांत कुछ समझ पाए, उस से पहले ही भावेश को लगा, कि कमरें के बाहर कोई तो है, भावेश ने फट से नियति को इशारा किया, कि बाहर कोई तो है और नियति को धक्का देते हुए अपनी शर्ट का एक बटन बंद करने लगा, जो नियति के खींचने पर गलती से खुल गया था, नियति ने भी जल्दी में अपना नाईट गाउन ठीक कर लिया और अपने बिखरे हुए बाल भी ठिक कर लिए। 

     तब तक निशांत सीढ़ियों से नीचे उतर कर अपनी पानी की बोतल से पानी पीने लगा, तब तक भावेश और नियति भी साथ में ही घर में कौन आया है, ये चेक करने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरते है, सामने निशांत को देखकर पहले तो दोनों के होश ही उड जाते है। फ़िर कुछ देर बाद बात को सँभालने के लिए भावेश ने सामने से निशांत की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, कि " मेरा नाम भावेश, शायद हम पहली बार मिले है, मैं नियति का दोस्त हूँ, उसने आपको ये बताया ही होगा। मुन्ने की तबियत कुछ ठिक नहीं थी, इसलिए उसे अस्पताल ले गए थे, नियति को अकेले में डर लग रहा था, इसलिए हम कुछ देर बातें कर रहे थे। "

     नियति ने भी ज़रा डरते हुए, बात को सँभालते हुए निशांत से कहा, कि " आप यहाँ अचानक कैसे ? आप ने आने की खबर क्यों नहीं दी ? "

     निशांत एक पल के लिए तो नियति और भावेश दोनों का सामना नहीं कर सका, इसलिए निशांत दिवार की ओर मुँह करते हुए बोला, कि " आने की खबर, देता तो मुझे आज यहाँ जो मेरी गैरमौजूदगी में हो रहा है, उसके बारे में पता कैसे चलता ? "

     नियति ने कहा, " आप ये सब क्या कह रहे हो ? मैं और भावेश सिर्फ दोस्त ही है और मैंने आप से ये बात बताई भी थी। "

     निशांत ने कहा, " हांँ, बताया तो था, मगर ये नहीं बताया था, कि आधी रात को भी तुम दोनों साथ रहते हो, वह भी मेरे घर में और मेरे ही कमरें में। "

       नियति निशांत की बात सुनकर एक पल के लिए डर गई और निशांत को समझाते हुए कहाँ, "  आप जैसा सोच रहे हो, वैसा कुछ भी नहीं। आज सच में मुन्ना बहुत बीमार था, हम दोनों उसे अस्पताल लेकर गए थे और घर आकर दवाई और खाना खिलाकार जैसे-तैसे उसको सुलाया है। आपकी गैरमौजूदगी में भावेश ने हमारी बहुत मदद की है। हम दोनों सिर्फ अच्छे दोस्त है और बातें करते है, आप तो काम के बहाने से दिल्ही जाकर बस गए, मगर हमारा क्या ? मुन्ने को भी पूरा दिन मैं ही संँभालती हूँ, उसके सवाल अब मुझे परेशान करने लगे है, पापा कब आएँगे, कब आएँगे ? " 

     निशांत की नज़र अब भावेश के चेहरे पे आकर रुक गई। भावेश ने भी हिम्मत कर के कह दिया, कि " आज तक हम ने ऐसा कोई गलत काम नहीं किया, जिस से आप को या नियति के नाम पे कोई दाग लगे। "

      निशांत ने कहा, " अच्छा, मेरी गैरमौजूदगी में तुम दोनों ने मेरे घर में और मेरे ही कमरें में ना जाने कितनी रातें साथ में बिताई होगी, नियति मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी, मैं तुम से बहुत-बहुत प्यार करता हूँ या करता था, आज ये सब देखने के बाद...           

       नियति ने निशांत को समझाते हुए कहा, " निशांत आप बिलकुल गलत समझ रहे हो, भावेश आज पहली बार हमारे घर आया है, उसने जो भी कहा, वह सब सच ही है, अब मैं तुम्हें ये सब कैसे समजाऊँ, कि हम दोनों के बीच अभी तक कुछ भी नहीं हुआ।   

        निशांत ने कहा, " चलो मान भी लूँ, कि अब तक कुछ भी नहीं हुआ, मगर होने जा तो रहा ही था, " शायद " इतनी भी भोली मत बनो, तुम दोनों कोई छोटे बच्चे नहीं, जो तुमको ये सब क्या हो रहा है, वह पता नहीं हो। " 

      भावेश समझदार था, उसने बात को सँभालते हुए कहा, कि " जो भी हुआ उस में मेरी और सिर्फ मेरी ही गलती थी, नियति को आप कुछ ना कहिए तो अच्छा होगा, इस वक़्त आप गुस्से में है, बहुत दूर से आए है, हम इस बारें में आज नहीं कल बात करेंगे, मैं अभी जा रहा हूँ। " 

     नियति सिर्फ भावेश को जाता हुआ देखती रही, इस तरफ़ निशांत गुस्से में अपने मुन्ने के पास जाकर सोने की कोशिश करने लगा, नियति वहीं सोफे पे बैठ गई। उस तरफ़ भावेश अपने घर जाकर अपने बैडरूम की खिड़की के आगे खड़ा रह गया और आसमान की ओर देखते हुए कुछ सोचे जा रहा था। नियति, निशांत और भावेश तीनो के अंदर एक तूफान सा चल रहा था, अब आगे क्या होगा ? अब आगे... 

        शायद हर एक के जीवन में शादी के बाद भी कुछ ना कुछ बजह से ऐसा दिन ज़रूर आता होगा, जब दिल के आगे लोग सब कुछ हार जाते है, औरत को सिर्फ प्यार चाहिए, उसे अपने पति का साथ चाहिए, तो वह दुनिया में आए हर तूफ़ान से भी लड़ जाए, मगर जब उसे वह प्यार ही ना मिले तब उसका मन उस प्यार को हर इंसान में ढूंँढने लगता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, प्यार तो आख़िर प्यार ही होता है। मगर बस यही प्यार उसे एक दिन ऐसे चौराहें पर लाके खड़ा कर देता है, जहाँ से उसे अब कोई रास्ता नज़र ही नहीं आता, बीच मझधार में जाकर वह कुछ पल के लिए रुक जाते है, जैसे ज़िंदगी, कुछ पल के लिए रुक सी गई हो, साँसे कुछ पल के लिए जैसे रुक सी गई हो। दोनों तरफ उसे बस डूबना ही है। चाहे निशांत कितना भी अच्छा हो, मगर बात ये है, कि वह उसके पास नहीं था, उसके साथ नहीं था। अब आगे...  

     शादी के वक़्त नियति का पति निशांत वही अलहाबाद में ही जॉब करता था लेकिन, शादी के एक साल बाद उसका तबादला सीधे दिल्ली शहर में हो गया और दिल्ली शहर में रहना इतना आसान नहीं। निशांत की कंपनी में से उसे घर तो दिया था, लेकिन एक घर में तीन  लोग साथ में रहते थे, ऐसे में वह अपनी पत्नी नियति को कैसे बुलाए, उसने नियति से कहा, कि " कुछ वक़्त ऐसे ही रहना पड़ेगा, मैं तुम से मिलने घर कभी-कभी बीच में आता-जाता रहूँगा, कुछ वक़्त के बाद मैं यहाँ अपना घर ले लूंँगा, तब तुमको यहाँ बुला लूँगा।" 

    नियति क्या कहती, काम है, तो जाना तो पड़ेगा ही, ऐसा सोच उसने हांँ कह दी। दिन बीतते गए, नियति के महीने चढ़े, निशांत कभी-कभी उसे मिलने आ जाया करता, फ़ोन पे भी रोज़ बातें हो जाती, नियति को लड़का हुआ। निशांत तब छुट्टी लेकर कुछ दिनों के लिए नियति और अपने बेटे के साथ रहा, फिर १५ दिन के बाद निशांत फिर से दिल्ही चला गया, छोटे बच्चे के साथ नियति फ़िर से अकेली पड जाती। वक़्त बीतता गया, नियति का लड़का ३ साल का हो गया, अब वह स्कूल जाने लगा, तो अब नियति घर में काम निपटा के योगा क्लास जाना शुरू कर दिया। मुन्ने के आने के बाद उसका वज़न काफी बढ़ भी गया था, इसलिए निशांत ने ही कहा, कि " योगा क्लास जाना शुरू कर दो,  इस से तुम्हारा वक़्त भी कट जाएगा, बाहर जाओगी, दूसरे लोगो से मिलोगी, नए दोस्त हो जाएँगे, तो तुम्हें अच्छा भी लगेगा, मैं भी तो यहाँ जिम जाता ही हूँ ना ! वैसे भी तुम्हें डॉक्टर ने भी तो वजन कम करने को भी तो कहा है। "

      नियति को भी निशांत की बात सही लगी, वह मुन्ने को स्कूल छोड़ने के बाद रोज़ २ घंटे योगा क्लास जाने लगी। घर में नियति बोर हो जाती थी, तो उसने जॉब भी शुरू कर दी। अब नियति के पास निशांत के बारे में सोचने के लिए वक़्त ही नहीं रहता, पहले दोनों में रोज़ बातें हो जाती, अब हफ्ते में दो दिन ही बातें करते।   

     उस तरफ़ निशांत भी जिम जाता, उसने भी वहांँ नए दोस्त बना लिए थे, इसलिए कभी-कभी पार्टी में भी जाने लगा, दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त रहने लगे।             योगा क्लास में नियति के साथ एक भावेश नाम का लड़का भी आता था, जो शायद उस से उम्र में छोटा था, बातें करते-करते भावेश और नियति के बीच दोस्ती हो गई और दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को पता ही नहीं चला, वक़्त मिलते ही दोनों अब योगा क्लास के अलावा मूवी देखने जाते, शॉपिंग करने जाते। मुन्ने को भी भावेश से काफी लगाव हो गया था। आखिर नियति भी तो एक इंसान ही तो है, उसे भी प्यार की, अपनेपन की ज़रूरत है, हर औरत को दो पल किसी के साथ अपने मन की बातें करना अच्छा लगता, जो उसे सुने, उसे और उसकी बातों को समझे और ऐसे में अगर बस कोई दो मीठे बोल बोल दे, तो वह उसकी ओर खींची चली जाती है, कभी-कभी औरत पैसे और गहनों के अलावा प्यार की भी भूखी होती है, बस नियति अपने प्यार को ही ढूँढ रही थी, जो प्यार जो एहसास उसे भावेश के साथ रहते हुए महसूस किया, वह कभी उसने निशांत के साथ महसूस नहीं किया। निशांत से वह प्यार तो करती थी, मगर वह उसके पास, उसके साथ हो तब ना ! भावेश के साथ रहते हुए नियति अपने सपनो की दुनिया में चली जाती, उसे ऐसा लगता, कि उसका सपना सच हो रहा है, भावेश के साथ बातें कर के नियति को बड़ा अच्छा लगता, उसके मन का बोझ जैसे उतर जाता, वह जानती थी, कि वह जो महसूस कर रही है, वह गलत है, मगर दिल तो आखिर दिल ही है, कब, कहाँ, किस पे आ जाए कुछ भी कह नहीं सकते। अब आगे... 

         निशांत नियति को इस बार खुशख़बरी देने आया था, कि अब उसने दिल्ली में अपना खुद का घर ले लिया है और अब वह सब साथ में रहेंगे, निशांत, नियति और अपने मुन्ने को साथ ले जाने के लिए ही आया था। मगर अब यहाँ के हालात कुछ और ही थे, निशांत ने आने में थोड़ी देर कर दी, ऐसा उसे लगा। 

      तो दोस्तों, अब बारी निशांत की आती है, क्या वो अपनी बीवी के इस रिश्ते को स्वीकार कर पाएगा ? क्या निशांत नियति और भावेश के रिश्तें को समझ सकेगा ? अब निशांत नियति को अपने साथ दिल्ली ले जाएगा ? उन दोनों को अब क्या करना चाहिए ? 

                    आगे क्रमशः। 

                                               अनचाहा रिश्ता  ( भाग-२ )

        तो दोस्तों अब तक आप सब ने पढ़ा, कि निशांत अपनी पत्नी नियति को सरप्राइज देना चाहता था, मगर निशांत ने घर आकर नियति और भावेश को एक साथ अपने ही घर में, अपने ही कमरें में देखकर वह खुद ही सरप्राइज हो गया। नियति और भावेश ने निशांत को बहुत समझाने की कोशिश की, कि " उन दोनों के बीच अब तक कुछ नहीं हुआ है, लेकिन अब निशांत का भरोसा नियति पे से उठ गया था। " अब आगे... 

        आज की रात मान लो जैसे इम्तहान की रात थी, नियति, निशांत और भावेश तीनों विचारशून्य हो गए थे, अचानक से ये सब क्या हो गया, किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, अब आगे क्या ? बस यही सवाल तीनों को सताए जा रहा था। खास तौर पर निशांत को अपनी आँखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था, क्योंकि  " नियति पहले से ही इतनी सीधी-साधी लड़की थी, कि वह ऐसा कुछ करेगी, ये निशांत कभी सोच भी नहीं सकता था। नियति एक बड़े संस्कारी घर की और संस्कारी माँ-पापा की लड़की थी, जो पूजा पाठ किया करती, हर तीज-त्यौहार पर वह मंदिर जाया करती, व्रत-उपवास रखा करती, पति-व्रता औरत आज अपने पति को भूलकर, अपना पति-व्रता व्रत तोड़कर, किसी और के साथ ? ऐसा हो ही नहीं सकता। मेरे बारे में एक बार सोचुँ, तो हाँ, ये बात सच है, कि मेरा भी दिल किसी पे आ गया था, मगर मैंने अपने आप को सँभाल लिया था, तो फ़िर नियति अपने आप को क्यों नहीं सँभाल सकी ? इतने सालों में जो नहीं हुआ, वह आज कैसे हो गया ? या तो उस लड़के भावेश ने उसको अपनी बातों में लाके उसे फसाया है, या तो कुछ और बात ? मुझे सही बात का पता करना ही होगा। मैं नियति और मुन्ने को ऐसे नहीं जाने दे सकता। कुछ ना कुछ तो सोचना पड़ेगा। "

        उस तरफ भावेश भी सोच में डूबा हुआ था, कि " ये मुझ से क्या हो गया ? नियति तो मुझ से बड़ी है, फ़िर मैंने उनके बारे में ऐसा क्यों सोचा ? प्यार था, लेकिन वह दोस्ती वाला प्यार था, मैं ऐसे नियति और निशांत के बीच में नहीं आ सकता, क्योंकि जहाँ तक मुझे याद है, वहांँ तक मेरी ओर नियति की जब दोस्ती हुई थी, तब शुरू-शुरू में नियति ने मुझ से कहा था, कि " वह अपने पति निशांत और मुन्ने से बहुत-बहुत प्यार करती है, निशांत की तारिफ़ भी किया करती थी। फ़िर मैं उनकी दुनिया में तूफ़ान लेकर क्यों आ गया ? कल रात को जो कुछ भी हुआ, वह ना तो मैं ऐसा कुछ चाहता था और नाहीं नियति। मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है। नियति कितनी अच्छी है, ऐसी औरत की ज़िंदगी में मैंने आकर एक सब से बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया, अब इस उलझी हुई बात को मुझे ही सुलझाना होगा, नहीं, मैं ऐसे नियति और निशांत दोनों के बीच नहीं आ सकता। " बस यहीं सब सोचते हुए भावेश भी अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। 

          एक ओर नियति अपने दोनों पैरों के बीच अपना सिर छुपाए बस रोए जा रही थी, कभी नियति भावेश के बारे में सोचती तो कभी अपने पति निशांत के बारे में। निशांत एकदम से चुप-चाप रहनेवाला, फ़ोन पे भी सिर्फ कुछ काम की ही बातें करते, किताबें पढ़ने वाला, अपनी ही दुनिया में रहनेवाला, सब पे भरोसा करने वाला, नाहीं किसी से लड़ना-झगड़ना, बस अपनी ही दुनिया में मस्त रहनेवाला। मगर भावेश निशांत से एकदम अलग था, हंमेशा सब के साथ खुश रहने वाला, सब को हँसाने वाला, बातें तो उसकी कभी ख़तम ही नहीं होती, घूमना, फिरना, नाचना-गाना, सब कुछ उसे पसंद था, फ़िर क्यों किसी का दिल उस पे ना आ जाता ? "

      बस इन्हीं सब उलझनो में रात बित गई। सुबह हो गई, अब तो निशांत और नियति एकदूसरे से नज़र कैसे मिलाए, यह भी एक प्रश्न हो गया। मुन्ने को आज भी बुखार था, तो नियति मुन्ने के लिए दवाई और नास्ता लेकर उसके कमरें में जाती है, मुन्ना माँ-माँ कहता हुआ नियती को पुकार रहा था, अपने पापा को इतनी महीनों बाद अपने पास देखकर मुन्ना निशांत के गले लगा हुआ था, निशांत भी अपने मुन्ने को गले लगाकर उस से प्यार कर रहा था।            

          कमरें में नियति को आता देख कर निशांत ने जैसे नज़रें चूरा ली, नियति को निशांत की आँखों में बहुत सारे सवाल नज़र आ गए। मगर आज नियति निशांत से नज़रें नहीं मिला पा रही थी, इसलिए नियति ने पहले मुन्ने से बात करना शुरू किया, " चलो मुन्ना, आपकी दवाई और नास्ते का वक़्त हो गया है, आप पहले उठकर ब्रश कर लो, बाद में दवाई के साथ नास्ता कर लो। "

     मुन्ने ने कहा, " नहीं माँ आज नहीं, आज कुछ भी मन नहीं है और ये दवाई भी बहुत कड़वी है, उस मूँछ वाले डॉक्टर अंकल की तरह। "

    नियति ने कहा, " ऐसा नहीं कहते, देखो तुम्हारे लिए आज मैंने तुम्हारे मन-पसंद आलू के पराठे जो बनाए है, वह क्या पापा को दे दूँ ? "

    निशांत ने कहा, " वाह, आलू के पराठे, वह भी तुम्हारी मम्मी के हाथ के, मुझे देदो, मुझे भी बड़ी भूख लगी है, कल रात को भी कुछ नहीं खाया था। "

     ये सुनकर नियति ने एक नज़र निशांत की ओर देखते हुए सोचा, कि " अरे, कल रात को उस चक्कर में निशांत ने भी कुछ नहीं खाया। "

    तभी मुन्ना फटाक से उठ कर बोला, " नहीं, आलू के पराठे तो मैं ही खाऊँगा। "

    मुन्ने की बात सुनकर एक पल के लिए नियति और निशांत दोनों के चेहरे पे हँसी आ गई। 

     मुन्ने ने कहा, " मैं अभी ब्रश कर के आता हूँ, पापा आप मेरे पराठे को हाथ भी मत लगाना, मुझे भूख लगी है। " कहते हुए मुन्ना, वॉशरूम की ओर भागता हुआ चला जाता है।  

     नियति ने मौके का फायदा उठाते हुए निशांत से कहाँ, कि " आपने कल रात को भी शायद कुछ नहीं खाया होगा, मैं अभी आपके लिए भी पराठे बना कर लाती हूँ।" कहते हुए नियति कमरें से बाहर किचन की ओर जाने लगी, तभी पीछे से निशांत ने सख्ती से कहा, कि " रुको, मुझे अब तुम्हारे हाथ से कुछ नहीं खाना और मुझे भूख भी नहीं है, वह तो मैंने मुन्ने को मनाने के लिए कह दिया था।  तुम जाओ, मुन्ने को मैं नास्ता करा दूंँगा, तुम जाकर अपने पराठे खाओ। "

     निशांत की बात सुनकर नियति की आँखें भर आई। तभी मुन्ना पापा-पापा करता हुआ वॉश रूम में से बाहर आता है और अपने पापा की गोद में बैठते हुए कहता है, कि " आप कब आए पापा ? आप को पता है, मैं आपको कितना याद करता था, फिर भावेश अंकल कल घर आए थे, हमने साथ में टॉम एंड जेरी वाला कार्टून देखा, बड़ा मज़ा आया था।  म्मा, भावेश अंकल कहाँ है ? वह चले गए क्या ? कल रात के लिए मुझे उनको थैंक यू कहना था, अगर वह अस्पताल में हमारे साथ नहीं आते, तो मैं वह मूँछ वाले डॉक्टर से इंजेक्शन कभी नहीं लगवाता। मुझे उस डॉक्टर को देख कर ही डर लगता है, पापा आप को पता है, वह डॉक्टर के काले घुंगराले बाल, लम्बी दाढ़ी और लम्बी मूँछें थी और बार-बार खाँसे जा रहे थे, फ़िर भावेश अंकल ने मुझे कस के गले लगा लिया था और मुझे बातों में लगाए रखा, डॉक्टर अंकल ने कब इंजेक्शन लगा लिया, मुझे पता ही नहीं चला, ममा ने भी डर के मारे आँखें बंद कर दी थी। तीन दिन से स्कूल भी नहीं गया, अब आज आप आ गए है, तो देखो, मैं अब बिलकुल ठिक हो गया हूँ, yeee..... पापा आ गए, पापा आ गए.... " कहते हुए मुन्ना निशांत के गले लग जाता है। 

     निशांत फीर से एक बार नियति की ओर देखता है। नियति ने सामने से ही कह दिया कि आप परेशान हो जाएँगे यहीं सोचकर मैंने आपको मुन्ने की बीमारी के बारे में नहीं बताया। " फिर आँखों से जैसे नियति कह रही हो, कि " मुन्ने ने जो कहा, वह सब सच ही है। जैसे आपके बिना सच में हमारी दुनिया अधूरी थी। "

     निशांत ने मुन्ने को कहा, " चलो अब तुम पहले नास्ता कर लो और साथ में दवाई भी खालो, हम बाद में बातें करेंगे, मुझे कुछ काम से बाहर भी जाना है। "

     मुन्ना निशांत के फीर से गले लग जाता है और कहता है, कि " नहीं पापा, अब मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंँगा। आपके बिना हमें कुछ अच्छा नहीं लगता, वो तो अच्चा है, कि भावेश अंकल के साथ कभी-कभी हम बाहर चले जाते थे, वार्ना हमारा क्या होता ? मेरे सारे दोस्त अपने पापा-मम्मी के साथ बाहर जाते है, मगर आप तो यहाँ होते ही नहीं हो। "

    निशांत मुन्ने को समझाते हुए कहता है, " अरे, मैं कहीं नहीं जा रहा, मैं यहीं हूँ, बस कुछ काम है, अभी आया। "

     मुन्ने ने कहा " प्रॉमिस ?"

     निशांत ने कहा, " पक्का वाला प्रॉमिस। "

     निशांत कहते हुए मुन्ने के कमरें से बाहर चला जाता है, नियति भावेश को जाता हुआ देखती रह जाती है। नियति की समझ में इतना तो आ ही गया था, कि " निशांत उस से बहुत नाराज़ है। " 

      निशांत अपने कमरें में फ्रेश होने के लिए जाता है, मगर कमरें में जाते ही उसे कल रात को जो भावेश और नियति को साथ में देखा था, वही नज़र आने लगा, इसलिए निशांत अपने कमरें में भी नहीं गया और कार की चाबी लेकर बिना कुछ कहे बाहर चला जाता है। 

     तो दोस्तों, निशांत को पता है, कि नियति ऐसा जान-बुझकर कुछ नहीं कर सकती और मुन्ने की बात सुनकर लगा, कि कल सच में वह अस्पताल मुन्ने को लेकर गए थे। मगर फ़िर भी....  

      और एक तरफ भावेश खुद विचारशून्य हो गया है, वह नियति और निशांत के बीच नहीं आना चाहता था, इसलिए उसे अपने किए पे पछतावा हो रहा है, तो क्या आप बता सकते हो, कि मेरे अगले भाग में निशांत और भावेश क्या करेंगे ? 

                            आगे क्रमशः। 

                     भाग - 3

                         अनचाहा रिश्ता भाग -३ 

         तो दोस्तों, अब तक आप सब ने पढ़ा, कि मुन्ने ने बड़ी आसानी से अपने पापा निशांत को भावेश अंकल के बारे में सब बताया, कि वह कैसे हमारे इतने अच्छे दोस्त बने और  हमारी मदद करते रहे। निशांत को भी लगने लगा, कि नियति इतनी अच्छी है, उसने आज तक किसी लड़के को आँख उठाकर भी नहीं देखा और अचानक किसी और के साथ, कुछ समझ नहीं आ रहा। अब आगे... 

        दो दिन दिन बाद निशांत कॉफ़ी शॉप में बैठा हुआ था, तब वहां निशांत से मिलने एक लड़की आई, जिसका नाम मोना था, दिखने में बोल्ड एंड ब्यूटीफुल थी, नए ज़माने की लग रही थी, छोटा मिनी स्कर्ट और टॉप पहना था और पैर में बड़ा सा सैंडल, हाथ में एक पर्स और महंगा वाला मोबाइल भी था। निशांत ने उसके ऊपर ध्यान न देते हुए कहाँ, कि " सॉरी, मगर मैं आपको पहचानता नहीं हूँ, क्या हम पहले भी कहीं मिले है ? " 

     मोना ने कहाँ, " जी नहीं, आप सही कह रहे है, हम पहले कभी कहीं नहीं मिले, मगर मैं आपको अच्छे से पहचानती हूँ, वैसे मैं नियति की योगा क्लास की दोस्त हूँ और काफी वक़्त से हम दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई थी, इसलिए उसने मुझे आपके बारे में सब बताया था।"

      निशांत ने कहाँ, " ओह्ह! ऐसी बात है, तो नियति ने मेरे बारे में आप को क्या बताया ? "

       मोना ने कहा, " बहुत कुछ, जो शायद आप, अपने बारे में भी नहीं जानते। "

      निशांत ने मोना की और देखते हुए कहा, " अच्छा ! हांँ, तो अब मुझे अपने बारे में आप बताएगी, मगर पहले मुझे ये जानना है, कि " आप मुझ से मिलने क्यों आई हो ? और आप को मुझ से क्या चाहिए ? "

      मोना ने कहा, " मुझे आप से कुछ नहीं चाहिए, मैं यहाँ सिर्फ और सिर्फ आपकी और नियति के बीच जो भी ग़लतफ़हमी चल रही है, बस उसी को दूर करने आई हूँ।"

     निशांत ने कहाँ, " ओह्ह, तो नियति ने आप को शायद सब सच बता दिया, भावेश के बारे में। मुझे उन दोनों के बारे में कोई बात करनी भी नहीं और सुननी भी नहीं है, इसलिए अब आप जा सकती हो। "

      मोना ने कहा, " ज़िंदगी में एक मौका हर किसी को देना चाहिए, खासतौर पर अपनी शादी सुदा ज़िंदगी को बचाने के लिए तो ज़रूर। क्योंकि फिर कुछ सालों बाद जब वक़्त हाथ से निकल जाता है, तब पछताने के अलावा ज़िंदगी में ओर कुछ भी रह नहीं जाता, ये मैं अपने तजुर्बे से ही बता रही हूँ। इसलिए अपने लिए ना सही. लेकिन अपने मुन्ने के लिए अपने आप को और नियति को एक मौका दे दीजिए । 

       निशांत ने कहा, " ओह्ह, तो आप मुझे समझाने आई हो, कि मैं नियति को माफ़ कर दूँ और उसकी गलतियांँ भूलकर उसके साथ एक नई ज़िंदगी शुरू कर दूँ, ये जानने के बावजूद भी की वह अब पहले जैसी नियति नहीं रही, अब वह बदल गई है।   

     मोना ने कहा, " आप मेरी बात समझ नहीं रहे है, मेरे कहने का मतलब ये नहीं, कि उसकी गलती नहीं, गलती है, नियति से गलती हुई है और अब वह अपनी उस गलती पे पछता भी रही है, मगर एक और बात सच कहुँ तो गलती नियति के साथ-साथ मेरी भी है, क्योंकि जहाँ तक मैं नियति को जानती हूँ, वहांँ तक नियति बहुत ही सीधी-साधी लड़की है, उसका मन बहुत ही साफ है, नाहीं कहीं आना-जाना, नाहीं किसी से ज़्यादा बातें करना, बस अपने काम से काम ऱखना, पता है वह ऐसा क्यों करती थी ? क्योंकि वह एक शादी सुदा औरत थी, जिसका पति ज़्यादातर बाहर रहता था, उसे अपनी मर्यादा में रहना था, अपना पति-व्रता धर्म निभाना था, अगर वह किसी से बात करेगी तो कोई क्या कहेगा, उसके बारे में क्या सोचेगा, बस वही सब.. दूसरों के बारे में सोचकर नियति ने अपने आप को एक पिंजरे में बांध के जैसे रख दिया था। नियति आप से बहुत-बहुत प्यार करती थी और आज भी आप से ही वह प्यार करती है, बस गलती मेरी थी, वह मेरी बातों में बहक गई, मैंने ही नियति को भावेश से दोस्ती आगे बढ़ाने को कहा था और मैंने ही उसकी आँखों में सपने दिए, मैंने ही उसे आसमान में उड़ने के लिए पंख दिए, बस गलती उसकी इतनी थी, कि वह आसमान में उड़ते वक़्त नीचे देख नहीं पाई और बादलों के पास इतने करीब चली गई, कि उसे इस बात का पता ही नहीं चला। बस जो भी था, वह सच कहुँ तो सिर्फ एक पागलपन था, एक जुनून था, जो नियति इतने सालो से आप में ढूँढ रही थी, जो उसे भावेश में दिख गया। माना की उसके लिए आप परफेक्ट हो, मगर उसकी सोच के हिसाब से उसकी ज़िंदगी जीने के तरीके से, उसके सपनों का राज कुमार आप नहीं बल्कि भावेश था। ऐसा नियति ने सिर्फ और सिर्फ महसूस किया। नियति को वह प्यार, या कहूँ तो वह एहसास कुछ पल के लिए नसीब हुआ, जो शायद ज़िंदगी में किसी-किसी लड़की को ही, वह प्यार, वह एहसास, वह लगाव, वह अपनापन मिला हो। वह अधूरी सी  बातें, यादें, फरियादें, जो भी था, वह प्यार नहीं समझ लो सिर्फ एक एहसास था और उस एहसास की उसे इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, यह उसे पता भी नहीं था। नियति अब आप से तो क्या अपने आप से भी नज़रें नहीं मिला पा रही, उसे ये लगता है, कि उसने बहुत बड़ी गलती की है, मैं मानती हूँ, कि गलती हुई है, एक शादी सुदा औरत को वह भी एक बच्चे की माँ को ये सब शोभा नहीं देता। एक तरफ़ दिमाग हर पल कहता है, कि ये गलत है, मगर दिल है, कि मानता नहीं। वह तो कुछ और ही सोच रहा होता है। आप भी तो इतने साल नियति से दूर रहे हो, तब आप को भी तो वहांँ कोई ना कोई मिला होगा, जिसके साथ आप को बात करना अच्छा लगे, जिसके साथ वक़्त बिताना आपको अच्छा लगा हो, जिसका इंतज़ार करना आपको अच्छा लगा हो , शायद... कोई ना कोई, कहीं तो, इस ज़िंदगी में, कभी ना कभी, कुछ तो हुआ होगा, ज़रा याद कीजिए और हाँ, नियति आज भी पहले की तरह पवित्र है, आप मानो या ना मानो, ये आप पर निर्भर करता है और उसे आज सिर्फ और सिर्फ आप की ज़रूरत है, वार्ना वह ज़िंदगी भर अपने आप को इस गलती के लिए कोसती रहेगी और अपने आप को दोषी ठहराती रहेगी, इसलिए उसे एक बार माफ़ कर दो, उसे अपने पास बुला लो, उसे इतना प्यार दो, कि फिर कभी कोई भावेश की उसकी ज़िंदगी में आने की जगह या बजह ना रहे।  क्योंकि जहाँ तक मैं जानती हूँ, वहांँ तक औरत सिर्फ और सिर्फ प्यार की भूखी है, जिसके लिए वह कभी-कभी अपने आप को भूल जाती है, हर सीमा, हर बंधन को तोड़ जाती है। बस उसे अपने पास और अपने साथ रख लो। "  

     निशांत मोना की बात सुनकर एक पल के लिए सोच में पड़ गया, जैसे निशांत को एक पल के लिए कुछ याद आ गया हो, फिर निशांत ने अपने आप को सँभालते हुए कहाँ, " ओह्ह, ये सब बात को टालने के बहाने है, अब आप को जो कहना था, कह दिया, मैंने सुन लिया, अब मुझे जो करना है, वह मैं करूंँगा, आप जा सकते हो। " 

     मोना ने कहा, " हाँ, मैं जा रही हूँ, मुझे जो कहना था, मैंने कह दिया, अब आप को सोचना है, पंछी को खुले आसमान में उड़ने देना है या उसे पिंजरे में बंद कर के रखना है। " कहते हुए मोना वहां से चली जाती है। 

      तो दोस्तों,  निशांत का क्या फैसला होगा ? वह उसे माफ़ कर पाएगा या नहीं ? आप के जवाब का मुझे इंतज़ार रहेगा। 

                         अब आगे क्रमशः। 

                     भाग - 4 

                             अनचाहा रिश्ता भाग - ४ 

          तो दोस्तों, अब तक आप सब ने पढ़ा, कि निशांत से मिलने मोना आई थी और मोना ने निशांत की गैरमौजूदगी में भावेश और नियति के बीच जो भी था, या जो भी हुआ, क्यों और कैसे हुआ ? वह सब उसे जो भी पता था, वह बता दिया। अब मोना की कही बात पर यकींन करने की बारी निशांत की है, क्या अब निशांत मोना की कही बात पर यकींन करेगा या नहीं ? अब आगे...

         मोना की बात सुनकर निशांत फ़िर से सोच में पड़ जाता है, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, कि क्या सच और क्या झूठ। इसलिए निशांत कुछ देर बाद घर जल्दी चला जाता है।  घर जाकर निशांत ने  देखा, कि घर का दरवाज़ा खुला ही था और नियति सोफे पर अपने दोनों पैरों के बीच में अपना मुँह छुपाए बैठी हुई है। निशांत को उसके धीरे से रोने की आहत भी सुनाई दी, निशांत नियति को रोते हुए कभी भी नहीं देख सकता, लेकिन फिर भी इस बार ना जाने क्यों निशांत को नियति के पास जाकर उसे चुप कराने का मन नहीं किया, वह उसे वहीं रोता छोड़ अपने मुन्ने के कमरें में चला गया। मुन्ना कमरें में नहीं था और  साथ में उसकी स्कूल बैग और यूनिफार्म भी नहीं थे, इसलिए निशांत समझ गया,  मुन्ना इस वक़्त स्कूल गया होगा। मुन्ने के कमरें में बस ऐसे ही निशांत ने दो तीन चक्कर लगाए, जैसे की वह खुद एक बहुत बड़ी उलझन में फस गया हो। नियति का सामना करना भी अब निशांत को अच्छा नहीं लगता था। निशांत अब नियति से जितना हो सके दूर ही रहने लगा। तभी कमरें के बाहर से किसी के आने की आहत हुई, निशांत ने सोचा, अब कोन आया होगा ? ये सोचते हुए निशांत कमरें से बाहर आता है, तो बाहर भावेश अपने एक हाथ में बड़ी सी बैग लिए, अपने कंधे पर दूसरी बैग लटकाए, हुए ब्लू जीन्स और वाइट टी-शर्ट, हाथों में स्पोर्ट्स वॉच, आँखों पे नीले रंग का गॉगल्स और बहुत ही महंगे वाले वाइट शूज पहने वह खड़ा था। एक नज़र में भावेश की पर्सनालिटी को देखकर किसी का भी मन उस पे आ जाए ऐसा उसका व्यक्तित्व था। निशांत को याद आया, कि उसने भी गलती से घर का दरवाज़ा खुला छोड़ रखा था, इसलिए भावेश को दरवाज़ा खटखटाने की ज़रूरत नहीं हुई। लेकिन यूँ अचानक भावेश को अपने घर में अपने सामने देख ताजुब हुआ। 

      फिर भी बात को आगे बढ़ाते हुए, ज़रा अकड़ से निशांत ने कहा, " तुम यहाँ कैसे ? तुम दोनों ने साथ में ज़िंदगी जीने का फैसला कर लिया है और अगर तुम नियति को अपने साथ ले जाने आए हो तो, ख़ुशी से जा सकते हो, मेरी परवानगी की तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं।  जब साथ घूमे-फिरे अपनी मर्ज़ी से तो अब आगे की ज़िंदगी जीने का हक़ और फैसला भी मैं तुम दोनों पर ही छोड़ता हूँ, तुम को जो ठीक लगे वह करो, लेकिन मेरे सामने और मेरे घर में तो बिलकुल भी नहीं और हाँ, मुन्ना मेरा है और वह मेरे साथ ही रहेगा, जिसको जाना है जा सकता है। " कहते हुए निशांत एक नज़र रोती हुई नियति पर डालता है तो दूसरी नज़र भावेश पर और अपनी बात ख़तम कर मुड़ते हुए वापस मुन्ने के कमरें की ओर आगे बढ़ता है। निशांत अपने कमरें की ओर आगे बढे उस से पहले ही भावेश अपनी बैग और अपने कण्ठे की बैग निकाल कर भागते हुए जैसे निशांत की ओर बढ़ता है और निशांत को जैसे रोकते हुए उस के पैर पकड़कर अपने दोनों घुटनों के सहारे ज़मीन पर सिर झुकाए बैठ जाता है। 

        भावेश निशांत से कहता है, " आप गलत समझ रहे है सर, जैसा आप समझ रहे है, वैसा कुछ भी नहीं, बस एक बार हमारी बात सुन लीजिए, फिर आपका जो भी फैसला होगा, मुझे मंज़ूर होगा। "

      निशांत अपने पैरों को छुड़ाते हुए बिना मुड़े ही कहता है, कि " मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है, तुम दोनों को जो ठीक लगे वह करो, मुझे अकेला छोड़ दो। "

       भावेश और निशांत की बातों को नियति सुन रही थी।

    भावेश ने फिर से request करते हुए कहा, कि " प्लीज सर, एक बार बात सुन लीजिए, मेरे लिए ना सही, नियति और मुन्ने के लिए, उनके प्यार के वास्ते। "

       अब निशांत के पास उसकी बात सुनने के अलावा और कोई रास्ता बचा नहीं था। इसलिए थोड़ा अकड़ कर अपने दोनों हाथों को अपनी पीठ पीछे कर के हाथों की बंद मुठ्ठी बनाते हुए भावेश की बात सुनने के लिए रुक जाता है और कहता है, कि "अच्छा, जो भी कहना है, जल्दी से कह दो, मुझे ज़रूरी  काम से बाहर भी जाना है।" अपनी बात बताने के लिए मैं तुमको सिर्फ १० मिनिट देता हूँ , जो भी कहना चाहते हो, कह दो। " 

       ये सुनते ही भावेश जो कब से अपने घुटनों के बल अपना सिर झुकाए बैठा हुआ था, खड़ा हो गया और निशांत का हाथ पकड़कर उसे नियति के बगल में बैठा  देता है, एक पल के लिए जैसे छोटा बच्चा ज़िद्द कर रहा हो, ऐसा निशांत को लगा। वह इस बार बिना किसी शिकायत के नियति के बगल में बैठ जाता है, मगर सच में निशांत और नियति दोनों अब भी एकदूसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे, एक दूसरे से जैसे नज़रें चुरा रहे थे, ऐसा भावेश को लगा। निशांत और नियति दोनों ही कभी ज़मीन तो कभी आसमान की और देखे जा रहे था। 

       तभी भावेश ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, कि " सर आप को ये जानने का पूरा हक़ है, कि मेरे और नियति के बीच इतने दिनों से क्या था, क्यों और कैसे ?" सब से पहली बात तो हम दोनों सिर्फ और सिर्फ एक अच्छे दोस्त थे, मगर अब से मान लो कुछ भी नहीं, हम दोनों अब से एकदूसरे के लिए अजनबी है, उसके अलावा और कुछ भी नहीं। आप को पता है, जब भी मैं नियति से और मुन्ने से मिलता, तब-तब नियति ने सिर्फ और सिर्फ आप की ही बातें की है, कि निशांत ऐसे है, निशांत वैसे है, निशांत को पिज़्ज़ा बहुत पसंद है और मीठा खाने के तो वह दीवाने है। बारिश में सब पकोड़े और चाय मांँगते है तो मेरा निशांत आइस क्रीम खाता है, सर्दियों में लोग चद्दर ओढ़ के सो जाते है, तो निशांत बिना स्वेटर के लॉन्ग ड्राइव करने ले जाते है और मैं उन्हें ज़ोर से पकड़ कर बैठी रहती हूँ। निशांत ये, निशांत वो, निशांत के अलावा और कुछ नहीं कहा, कि उसे क्या पसंद है, वह क्या चाहती है, आपकी इतनी दीवानी है, कि उसे अपने आप का भी होश नहीं। आपकी गैरमौजूदगी में वह आप को बहुत याद करती रहती थी, अकेले में रोया करती, लोगों की खरी खोटी भी सुननी पड़ती, मुन्ने के अटपटे सवालों का जवाब देना। वह साँसें लेती, तो भी आपके नाम से, उसकी सुबह और शाम आपकी तस्वीर देखकर ही होती थी और आज भी होती है। आप चाहे तो अब भी उसके मोबाइल में तस्वीर को देख सकते है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए भावेश कहता है, कि उस रात सिर्फ उस रात ये सच है, कि मैं और नियति एक दूसरे के इतने करीब आए, जब आपने हम को देखा। मगर उस पल भी नियति मेरे साथ नहीं बल्कि जैसे, कि वह आप के साथ ही थी, नियति अपनी आँखें बंद कर निशांत-निशांत-निशांत, बस आपका ही नाम ले रही थी, मैं उसको रोकता उस से पहले ही आप वहांँ आ गए और अगर आप ना आते, तब भी मैं वह होने नहीं देता, जो आप सोच रहे है। क्योंकि मैं नियति जी से प्यार नहीं, बल्कि उनकी बहुत इज़्ज़त करता हूँ। और हाँ, आखिर में मैं अब आप दोनों की ज़िंदगी से बहुत-बहुत दूर जा रहा हूँ, मुझे सिंगापुर से एक बड़ी कंपनी से जॉब का ऑफर आया है और जिस के लिए में २ साल से इंतज़ार में था, अब वक़्त आ गया है, मेरे जाने का। आप और नियति साथ थे और साथ रहेंगे, मैं ना ही कभी था और ना ही कभी आप दोनों के बीच आऊंँगा, हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा, समझ लेना, एक हवा का झोका दरवाज़े से आया और खिड़की से चला गया। मैं अगर चाहता तो बिना आप से बात किए, बिना नियति से मिले चला जाता मगर मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि ये चोरी हो जाती और जो गुनाह हम ने किया ही नहीं, वह सच कहलाता, इसलिए आपकी गैरसमझ को दूर कर सकूँ इसीलिए मैं आप से बात करने आया हूँ। मैं सिर्फ और सिर्फ आप दोनों की ख़ुशी चाहता हूँ, मुझे पता है, यह अब इतना पहले की तरह आसान नहीं, मगर एक ना एक दिन मेरे जाने के बाद पहले सा सब ठीक हो जाएगा। "  

     कहते हुए भावेश निशांत के हाथों में नियति का हाथ थमा देता है, नियति उसकी और एक नज़र देखती रह गई, उसकी आँखें जैसे उसे पूछ रही थी, कि " तुम इतने अच्छे क्यों हो ? और अगर इतने अच्छे हो तो जा क्यों रहे हो ? तुम को मुझ से प्यार है, तो एक बार कह दो, जो आज तक ना कहा, ऐसे ही दिल में इतना दर्द लेकर कैसे ज़िंदगी जी पाओगे ? उस रात तुम कुछ कहने वाले थे, एक बात अधूरी रह गई, हम दोनों के बीच एक कहानी अधूरी रह गई, एक तरफ से देखा जाए तो हम दोनों के बीच कुछ ना होकर भी सब कुछ हो गया, कोई रिश्ता ना होकर भी एक अनचाहा सा रिश्ता जुड़ गया, सच में एक हवा का झोका, जो बस एक बार मुझे और मेरे दिल को जैसे छू के दूर चला गया हो। " कमरें में एक अन-सुनी सी ख़ामोशी छा गई थी, सब के होठ सील गए थे। 

      निशांत को एक पल के लिए भावेश की बातों पर यकींन करने को मन किया, एक नज़र नियति की ओर देखा, जिसकी आँखों में कई तरह के सवाल, कई उलझनें, कई आँसू छुपे नज़र आ रहे थे। चार दिन बाद आज निशांत ने नियति को एक नज़र देखा, दोनों की आँखें जैसे एक दूसरे से बातें कर रही थी, नियति की आँखें एक मौका और एक माफ़ी चाहती थी। 

     तभी निशांत ने कहा, कि " पहले भी मैंने कहा और अब भी यही कहता हूँ, कि तुम दोनों को जो ठीक लगे वह करो, मेरी मर्ज़ी ना मर्ज़ी की कोई बात नहीं। " 

    कहते हुए रूठते हुए फिर से निशांत वहां से खड़ा होकर मुन्ने के कमरें में चला जाता है और अंदर से दरवाज़ा बंद कर देता है। बाहर भावेश और नियति की नज़रें एक दूसरे से टकराती है, भावेश ने झुक कर नियति से कहा, " आप की ज़िंदगी में इतना बड़ा तूफान लाकर हवा के झोकों की तरह चले जाने के लिए मुझे माफ़ कर देना। मैं बस एक पल के लिए भूल गया था, कि आप किसी और की अमानत हो, मेरी नहीं, हाँ, लेकिन इतना ज़रूर  कि आप से मैंने दोस्ती भी दिल से की, इसलिए आपकी ख़ुशी के लिए मैं यहाँ से आज, अभी और इसी वक़्त जा रहा हूँ, दूर बहुत दूर, हो सके तो मुझे भूल जाइएगा और आप की ज़िंदगी में इतना बड़ा तूफान लेन के लिए मुझे माफ़ कर दीजिएगा।"

     कहते हुए भावेश वहांँ से खड़ा होकर अपनी बैग लेकर बिना नियति का जवाब या बात सुने वहांँ से चला जाता है, नियति के पास भी इस वक़्त भावेश को कहने या रोकने की कोई बात या बजह नहीं थी, वह एक तरफ उसे जाता हुआ देख रही थी और दूसरी तरफ उस कमरें का दरवाज़ा, जिस में निशांत रूठ के बैठा हुआ था।  

        तो दोस्तों, अब निशांत को नियति कैसे मनाएगी और क्या निशांत नियति को माफ़ कर के उस के साथ ज़िंदगी शुरू करेगा या नहीं ? मुझे आप के जवाब का इंतज़ार रहेगा। 

                        अब आगे क्रमशः। 

                      भाग - ५

                        अनचाहा रिश्ता भाग -५ 

          तो दोस्तों, अब तक आप सब ने पढ़ा, कि निशांत जब घर आता है, तब नियति चुपके से सोफे पर बैठ के जैसे रो रही थी, मुन्ने के कमरें में जाकर देखा, तो मुन्ना कमरें में नहीं था, वह स्कूल गया हुआ था, थोड़ी देर बाद कमरें के बाहर से किसी के आने की आहत सुनाई देती है और बाहर देखा तो भावेश कुछ सामान लेकर घर के अंदर आ चूका है, क्योंकि घर का दरवाज़ा पहले से ही खुला हुआ था, भावेश निशांत के पास बैठकर निशांत को मनाने की कोशिश करता है ये कह कर चला जाता है, कि अब वह लौट के वापस कभी नहीं आएगा, वह तुम दोनों की ज़िंदगी से बहुत-बहुत-बहुत दूर जा रहा है। नियति एक तरफ भावेश को जाता हुआ देख रही और दूसरी  तरफ वह कमरें का दरवाज़ा जिस में उसका निशांत रूठ के बैठा हुआ था, अब आगे... 

       नियति के लिए अब निशांत को मनाना, ये एक चुनौती जैसा था, वह निशांत, जो नियति की हर बात आसानी से मान लेता था, जिसकी सुबह और शाम नियति का चेहरा देख कर होती थी, नियति के साथ बातें करना, रूठना, मनाना, लड़ना, झगड़ना, प्यार करना, प्यार का इकरार करना, सब कुछ जैसे एक पल में निशांत जैसे भूल गया था। सच कहूंँ तो निशांत की जगह ओर कोई भी होता, तो वह भी ऐसा ही करता, शायद इस से भी बुरा, कि नियति को घर से निकाल ही दे। निशांत को अब सिर्फ और सिर्फ नियति की गलती नज़र आती थी, वह खुद उस से जैसे नज़रें चुरा रहा था, निशांत और नियति एक ही घर में रहते हुए एक दूसरे से दूर जा रहे थे, नियति से अब बात कर पाना अब निशांत के लिए आसान नहीं था, ऊपर से दिन-रात रो-रो कर, दिन-ब-दिन नियति का हाल-बेहाल हो रहा था, नियति निशांत से बात करने जाती तो, निशांत कुछ ज़रूरी काम है, कहते हुए चला जाता, चाय लेकर आती तो आज मन नहीं ऐसा कह देता, उसकी किसी भी बात का सीधे मुँह जवाब नहीं मिलता, नियति निशांत का मन-पसंद खाना बनाती, तब भी निशांत खाना खाकर आया, कहते हुए भूखे पेट सो जाता, दोनों के गले से निवाला नहीं उतरता था, मुन्ना भी अब समझ रहा था, तो वह भी निशांत से पूछ लेता, कि " पापा आज कल ममा बार-बार अकेले में क्यों रोती रहती है, आप से उसकी फाइट हुई क्या ? " तब निशांत उसको झूठ कहते हुए मना लेता या तो हँसा कर बात को भुला देता। रात को भी बिस्तर के एक तरफ़ निशांत तो बिस्तर के दूसरी तरफ़ नियति मुँह पलटकर सो जाती। 

     एक दिन नियति से रहा नहीं गया, नियति ने जबरदस्ती से निशांत का हाथ पकड़कर उस को अपने पास बिठाया, और कहने लगी, कि " मुझे कुछ कहना है और आपको आज मेरी हर बात सुननी ही पड़ेगी। आज मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंँगी, फिर भी निशांत वहां से खड़ा होकर चलने लगा, तब नियति निशांत के पाँव पकड़कर अपने घुटनों के बल वही ज़मीन पर बैठ जाती है, जैसे भावेश ने किया था, और अपने एक हाथ से ज़ोर लगा कर नियति ने निशांत को फिर से सोफे पर बैठा दिया। निशांत ने जब नियति की आँखों में देखा, तो उसके आँखों से आँसू ओ की धारा बह रही थी, एक पल के लिए निशांत का दिल ये देख पिगल गया, फिर भी वह चुप रहा, तब आँखें बंद रखकर ही नियति ने अपनी बात कहना शुरू किया, निशांत मुझे खुद को ही पता नहीं, मुझे क्या हो गया था ? मगर ये बात भी सच है, कि मैं आप से बहुत-बहुत प्यार करती थी और आज भी करती हूँ, आप की ये नाराज़गी अब मुझ से बर्दास्त नहीं हो रही, आज चाहे कुछ भी हो जाए मुझे जो कहना है, वह आप को सुनना ही पडेगा। जब आप मुझे अकेला छोड़ के चले गए थे, तब मैं बहुत अकेली पड़ गई थी, लेकिन फिर भी मैंने हौसला कभी नहीं हारा, लोगों की खरी-खोटी भी सुनी, कई आदमी की बुरी नज़रों से भी अपने आप को बचाए रखी, कई मर्द की बिस्तर पे अपने साथ सोने की ऑफर को भी मैंने अनदेखा और अनसुना कर दिया, ये बात मैंने आप को सिर्फ और सिर्फ इसलिए ना बताई, कि कहीं आप को इस बात से तकलीफ ना हो, आप अपने काम पे ध्यान दे सको, या कहूंँ, तो कभी हिम्मत भी नहीं हुई। डर लगता था, कि आप क्या सोचेंगे, आप अपने उसूलों के बड़े पक्के हो, ये जानते हुए आप के कहे मुताबिक ज़िंदगी जीने की कोशिश करती रही, या कहूंँ तो अपने आप को आप की नज़रों से देखने लगी, दिन-ब-दिन मुझे आप की याद इतनी सताने लगी, कि मैं दिन रात बस आप के ही बारे में सोचा करती, ना रात को नींद और ना दिन को चैन। नाहीं कहीं जाने का मन करता और नाहीं घर में मन लगता, तभी आपने मुझे योग क्लास जाने को कहा, अपने मन की कुछ कर लूँ, तो दोस्त भी बनेंगे और मन भी लगा रहेगा, लेकिन उलझनें और भी बढ़ने लगी, दोस्त बने दोस्ती हुई, बातें हुई, मन को अच्छा लगने लगा, वक़्त भी कट जाता, मगर आप के बिना जैसे सब कुछ अधूरा सा था, मैं कोई बहाना नहीं बना रही और नाहीं अपनी गलती पे पर्दा डालने की कोशिश कर रही हूँ। मैं और भावेश कभी अकेले में नहीं मिले थे, वह पहली बार हुआ था और आखरी बार उसके बाद मैंने उस से कभी बातें नहीं की। आप मेरे दिल के सरताज हो, अब भी मेरी सुबह आपके नाम से होती है और शाम आपके नाम से। मेरी धड़कनों में आप के नाम का संगीत आज भी बजता है, आपकी जगह जो मेरे दिल में है, वह ओर कोई कभी भी नहीं ले सकता, वह एक एहसास था, हवा का झोका था, जो आकर चला गया, उस हवा के झोकों को नाही मैं पकड़ के रख सकती हूँ और नाही आप। जो चला गया, उसे भूला देने में ही हम दोनों का अच्छा है। आप हम से रूठे हुए रहते है, तो मुझे लगता है, कि मेरी साँसे रुक सी गई हो, मैं हर पल घुटन महसूस कर रही हूँ और इस घुटन के साथ मेरा जीना और भी मुश्किल हो रहा है। या तो आप मेरे साथ लड़िए, मुझ पे जितना गुस्सा करना हो कर लीजिए, मुझे अगर मारने का मन करे तो वह भी कर लीजिए, फरियाद कीजिए, मगर यूँ चुप ना रहिए, मुझ से अब आपकी ये ख़ामोशी बर्दास्त नहीं हो रही। ऐसा कर के आप अपने आप को भी सज़ा दे रहे हो और मुझे भी। क्योंकि मुझे पता है, आप भी मुझ से उतना ही प्यार करते है, जितना मैं आप से, आप मुझ से खफा रह सकते हो, मगर मुझ से दूर नहीं। ज़िंदगी को अब और मुश्किल ना कीजिए, जो भी आप के दिल में है, वह आज बता ही दीजिए। हो सके तो मुझे मेरी गलती के लिए माफ़ कर दीजिएगा, मगर अब मुझ से यूँ नाराज़ ना रहिएगा। " 

    कहते हुए नियति वहां से निशांत का हाथ छुड़ाते हुए खड़े होकर जाने लगती है, लेकिन निशांत ने उसका हाथ नहीं छोड़ा, निशांत ने रोती हुई नियति को अपनी ओर खिंच लिया, ना कुछ कहे सुने नियति को अपने गले लगा लिया। नियति को गले लगाकर निशांत भी रो पड़ा, निशांत और नियति ने एक दूसरे को बड़े ज़ोरो से गले लगा लिया, ऐसे जैसे कई सालों से बिछड़े हुए दो प्रेमी आज मिले हो, जैसे की धरती और आसमान का मिलन आज हुआ हो, दोनों एक दूसरे के गले मिलकर बहुत देर तक रोते रहे, कई दिनों की दूरियांँ मिट गई। दो बिछड़े दिल फिर से एक होने लगे, हवाओं में से जैसे संगीत बजने लगा, " बाँहों से बाहें मिली उसके बाद होठों से होठ टकरा गए, नियति की बंद आँखों से आंँसू की धारा अब भी बेह रही है।  

    आखिर निशांत ने नियति को माफ़ कर ही दिया, लेकिन कुछ वक़्त तक दोनों के बीच हिचकिचाहट तो रह ही जाती है, लेकिन कुछ वक़्त बाद धीरे-धीरे सब पहला सा ठीक हो जाता है, निशांत, नियति और मुन्ना अब सब साथ में दिल्ली में ही रहते है और बहुत खुश भी है, लेकिन कभी-कभी एक अनचाहा सा रिश्ता जो, नियति और भावेश के बीच आ गया था, वह पल दो पल के लिए, कभी-कभी नियति को आसामन में देखने पर या तेज़ हवा के झोंके जब नियति को छू के जाते है, तब उसे याद आ जाता है, लेकिन नियति उस पल को फीर से अपने अंदर समेत कर फिर से अपने काम में लग जाती है। 

         तो दोस्तों, शायद ऐसा ही अनचाहा सा रिश्ता हर एक की ज़िंदगी में आता होगा, जिसे शायद हर कोई अपने अंदर छुपाए रखता है और उस अनचाहे रिश्ते के एहसास के साथ अपनी ज़िंदगी कुछ यादों के सहारे गुज़ार लेता है।   

                      समाप्त ।

Bela 


                                गलियाँ ( Part-1 )

       आज भी हमें याद है, वो गलियाँ, जहाँ पहली बार दीदार हुआ था उनका, उनकी  " वो झुकी हुई सी पलकें, वो रेशमी, मुलायम काले घने लहराते हुए बाल, वो पीला दुपट्टा, वो मद-भरी मुस्कान और भी मदहोश कीए जाती थी हम को, उनकी वो कातिल अदाएँ, क्यों ना  हो जाए दीवाना कोई ?" लगता था, जैसे खुदा ने बड़ी फुरसत से बनाया था  उनको।  

       वो गलियांँ जिसे हम छोड़ आऐ थे पीछे, उसे देखते ही वक्त थम सा जाता था, सांँसें एक पल के लिए रुक सी जाती थी। जहांँ सांँसें बसती थी हमारी, जहांँ जान रहती थी हमारी, ये वही तो वो गलियांँ है, जहांँ से गुज़र ने को हम कई बहाने बनाया करते थे। उनके एक बार दीदार करने को कई बार किसी न किसी बहाने से जाया करते थे। दोस्त भी हमारा मज़ाक उड़ाया  करते थे, पर हमें परवाह कहा थी किसी की, जब वो आती थी झरोखे से बाहर तो चुपके से हम उनका दीदार किया करते थे, माली से वह  जब फूल लिया करती थी तब जैसे सारी गलियांँ फूलों की खुशबू से महक जाती थी। कभी पास से गुजर जाए तो हमारी  सांँसें पल दो पल के लिए थम सी जाती थी, उनका वो पिला दुपट्टा हमें यूँ एक बार छुके गया, ठंडी हवा का हो झोका जैसे, वक्त का था हमें होश कहा। उनकी एक झलक देखने सुबह के इंतज़ार में सारी-सारी रात जगा करते थे, सबसे पहले जाकर बैठ जाते उस चोराहें पे जहांँ से वो गुज़रने वाली होती थी। 

       " प्यार उनको भी था, प्यार हम को भी था, बस भूल हुई इतनी हमसे, कभी दिल की बात ला ना सके इन लबों पे। " ऐसा भी क्या था उनमें की उनको  देखकर एक चुपी सी छा जाती थी इन लबों पे, बस उनको देखते ही रह जाते थे, उनका वो चुपके से हम को देखना और नजरें चुराना आज भी हमें  याद है। 


     आँखों ही आँखों में बातें करते रहे, वक़्त बीतता चला गया, एक दिन सोचा आज तो इज़हारे महोब्बत करना ही है, चाहे आऐ आँधी या तूफ़ान। आज तो दिल की बात बताके ही रहेंगे उनसे, बहुत हुआ अब तो आंँखों ही आँखों में बातें करना, अब नहीं तो कब बताएंँ दिल की बात? आँखों में थे कई सपने और दिल में कई अरमान। ना कुछ सोचा ना कुछ समझा। चल दिए बस उनकी ओर, हमको लगा कि आज जैसे सारी कायनात हमको उससे मिलाने के लिए तैयार थी, हम मानो पहुँच ही गए थे, अपने दिल की बात बताने उनकी गलियों तक। मगर हम ने देखा कि " उनकी गलियांँ जहाँ वह रहती थी, वह गलियांँ आज फूलों से महक रही थी, चारों और ढोल तासे बज रहे थे, कानों में जैसे शहनाईयाँ बज रही थी, दिल की धड़कने और भी तेज़ होती जा रही थी।" उतने में हम ने देखा, कि हमारी हुसन-ए-सबाब डोली में बैठकर किसी और की होने जा रही थी। 
     हम ने अपने आप से कहाँ, " चार दिन क्या गए हम इस शहर से दूर, यहांँ तो हवाओंने अपना रुख ही बदल डाला। एक और दिन हमारा इंतज़ार न किया ज़ालिम ने, हमको सपने देकर वो चल दिए किसी और के संग ! " 


         उसने डोली में से एक नज़र हमको देखा, उस पल हम को लगा जैसे  उनकी निगाहें कर रही थी एक सवाल, " अगर प्यार करते थे हमसे इतना, तो ज़रा सी हिम्मत करके, हमको बताया होता सिर्फ एक बार, हमको भी था इंतजार इज़हार-ए-इश्क़ का, हम दौड के तेरी बाहों में चले आते, तोड देते सारे बंधन, अगर तूने एक बार बताया होता। प्यार हमको भी था प्यार तुमको भी था, फिर क्यों हो गए इतने फासले, क्यों तुम हमको बता ना सके ? वक्त को क्या यही मंजूर था ? "

      " सपना टूटा, दिल टूट गया। " उनको किसी ओर का होता देखते रह गए, अब आहें भर ने से क्या फायदा जब वक्त को भी ये मंजूर नहीं था। दिल से अब तो सिर्फ यही दुआ निकलेगी, " तू जहाँ भी रहे, खुश रहे, आबाद रहे तू, तेरी झोली हंमेशा खुशीयों से भरी रहे, हमारा क्या है हम तो तेरी यादों के सहारे जी लेंगे, मगर इन गलियों से ना गुज़रेंगे कभी, जहाँ देखे थे इन आँखों ने सपने कई। "

     दिन बदले, मौसम बदले पर हम ना बदले।

     आज भी आंँखें बंद करु, तो वही मुस्कुराता चेहरा नज़र आता है। वो झुकी  हुई पलकें, वो मदहोश कर देनेवाली निगाहें, वो हवा में लहराते रेशमी बाल और भी बहुत कुछ, बस इन्हीं यादों के सहारे जी रहे हैं हम। और आज भी दिल से आवाज़ यही निकले, तू जहाँ भी रहे खुश रहे, आबाद रहे।

     मगर उस आशिक़ को क्या पता था ? कि आज भी उसकी मेहबूबा उसका इंतज़ार कर रही है उन्ही गलियों मैं। 

      तो दोस्तो, कैसे मिलेंगे दो बिछड़े दिल, जानने के लिए अंश २ का इंतज़ार कीजिए। 
                                                                                                                                                    Bela...

                   

                                             


                     

        

         











                                      

                                                            

                                                                     

                                                                 

          

      

                                                                


                    



                                                                      

                                         

   

 


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