समझौता अपने आप से या ज़िंदगी से भाग 6



*Episode 6: `मौत की भविष्यवाणी`* - 

शर्मिला की डायरी का वो पन्ना सुषमा की आँखों के सामने बार-बार आ रहा था। _"अगर मुझे कुछ हो जाए तो सुमीत, तुम दूसरी शादी कर लेना..."_ एक्सीडेंट से ठीक एक हफ्ते पहले लिखा हुआ। क्या ये इत्तेफाक था? या शर्मिला जानती थी कि उसके साथ कुछ बुरा होने वाला है?

सुमीत ने सुषमा को स्टडी रूम के दरवाजे पर देख लिया था। दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी। डायरी अब भी मेज पर खुली थी। सुमीत की आँखें लाल थीं, पर अब उनमें सिर्फ दर्द नहीं, गुस्सा भी था। खुद पर गुस्सा।

"तुम यहाँ क्या कर रही हो?" सुमीत की आवाज सपाट थी, पर उसमें एक कंपन था।

"पानी पीने आई थी। रोशनी देखी तो..." सुषमा ने नजरें झुका लीं। "मैंने वो पढ़ लिया सुमीत जी। डायरी का वो पन्ना।"

सुमीत ने एक झटके से डायरी बंद कर दी। "तुम्हें कोई हक नहीं था मेरी इजाज़त के बिना इसे पढ़ने का। ये शर्मिला की निजी चीज है।"

"और मेरी जिंदगी?" सुषमा अब चुप नहीं रही। वो दो कदम अंदर आ गई। "मेरी जिंदगी के बारे में फैसला करने का हक आपको किसने दिया सुमीत जी? शर्मिला ने? या आपने खुद ही मान लिया कि मैं सिर्फ एक समझौता हूँ?"

सुमीत कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। "सुषमा, तुम समझ नहीं रही। ये बात इतनी आसान नहीं है।"

"तो समझाइए न!" सुषमा की आवाज तेज हो गई। "बताइए कि एक्सीडेंट से एक हफ्ते पहले आपकी पत्नी ने अपनी मौत की भविष्यवाणी क्यों लिखी? क्यों लिखा कि आप दूसरी शादी कर लेना? क्या उसे पता था कि उसका एक्सीडेंट होगा?"

कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। सुमीत खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। उसकी पीठ सुषमा की तरफ थी।

"मैंने भी यही सवाल खुद से हजार बार पूछा है सुषमा।" सुमीत की आवाज बहुत धीमी थी। "उस दिन के बाद से एक पल चैन से नहीं सोया। पुलिस ने इसे एक आम सड़क हादसा बताया। ट्रक ड्राइवर नशे में था, उसे जेल हो गई। केस बंद। पर..."

सुमीत पलटा। उसकी आँखों में पहली बार सुषमा ने खौफ देखा। "पर शर्मिला पिछले एक महीने से डरी हुई थी। कहती थी कोई उसका पीछा कर रहा है। ऑफिस से घर आते वक्त, मार्केट में, यहाँ तक कि स्वीटू के स्कूल के बाहर भी। मैंने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। मैंने सोचा काम का तनाव है। मैं... मैं एक बुरा पति था।"

सुषमा के पैर लड़खड़ा गए। उसने पास रखी कुर्सी का सहारा लिया। तो ये एक्सीडेंट नहीं था? "आपने पुलिस को बताया?"

"बताया था।" सुमीत कड़वाहट से हँसा। "पर कोई सबूत नहीं था। शर्मिला ने किसी का नाम नहीं लिया था। बस इतना कहा था कि 'परछाई' उसका पीछा करती है। पुलिस ने कहा मैडम शायद वहम का शिकार हैं। और फिर एक्सीडेंट के बाद... सब खत्म। मैंने केस फिर से खुलवाने की कोशिश की, पर मेरे ससुराल वालों ने मना कर दिया। कहा बेटी तो चली गई, अब उसकी यादों को कचहरी में मत घसीटो।"

सुषमा अब समझ रही थी सुमीत के पत्थर बन जाने की वजह। गुनाहबोध। वो खुद को शर्मिला की मौत का जिम्मेदार मानता था।

"ये डायरी..." सुषमा ने कांपते हुए हाथ से डायरी को छुआ। "क्या इसमें और भी कुछ लिखा है? उस 'परछाई' के बारे में?"

सुमीत ने ना में सिर हिलाया। "मैंने हिम्मत नहीं की पूरी पढ़ने की। जिस दिन हादसा हुआ, उसी दिन सुबह उसने ये डायरी अलमारी में रखी थी। जाते-जाते मुझसे कहा था, 'अगर मैं न रहूँ तो इसे पढ़ लेना।' मैं समझा मजाक कर रही है।" सुमीत की आवाज भर्रा गई।

सुषमा ने डायरी उठा ली। "तो अब पढ़ते हैं। साथ में। शायद शर्मिला हमें कुछ बताना चाहती थी। शायद वो चाहती थी कि सच सामने आए।"

सुमीत ने रोकना चाहा, पर सुषमा की आँखों में जो दृढ़ता थी, उसके सामने वो हार गया। दोनों स्टडी टेबल पर आमने-सामने बैठ गए। सुषमा ने डायरी खोली। 

शुरुआत के पन्नों पर रोजमर्रा की बातें थीं। स्वीटू की शरारतें, सुमीत के लिए बनाई नई रेसिपी, सास-बहू की छोटी-छोटी नोक-झोंक। शर्मिला की हैंडराइटिंग में एक जिंदादिली थी।

फिर तारीख आई - मौत से ठीक 20 दिन पहले।

_"आज फिर वही हुआ। लाल रंग की मारुति वैन। शीशे काले। स्कूल के गेट पर खड़ी थी। मैं जैसे ही स्वीटू को लेकर निकली, वो धीरे-धीरे मेरे पीछे चलने लगी। मैंने स्पीड बढ़ाई तो उसने भी बढ़ा दी। घर की गली में आकर वो रुक गई। मैं बहुत डर गई हूँ सुमीत। तुमसे कहती हूँ तो तुम हँस देते हो। पर मेरा दिल कहता है कुछ गलत है।"_

सुषमा और सुमीत ने एक-दूसरे को देखा। सुमीत का चेहरा सफेद पड़ गया था।

अगला पन्ना। मौत से 15 दिन पहले।

_"आज ऑफिस में मेरे केबिन के बाहर एक गुलदस्ता रखा था। काले गुलाब का। कोई कार्ड नहीं। रिसेप्शनिस्ट ने कहा कोई कोरियर वाला दे गया। पर मैंने ऑफिस में पता किया, कोई कोरियर नहीं आया था। सुमीत, मुझे सच में डर लग रहा है। क्या मुझे पुलिस में रिपोर्ट करनी चाहिए? पर क्या कहूँगी? कि मुझे डर लग रहा है? सब मुझे पागल समझेंगे।"_

सुषमा ने सुमीत का हाथ कस कर पकड़ लिया। सुमीत का हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

मौत से 10 दिन पहले।

_"आज मैंने उसकी झलक देख ली। वो आदमी। लंबा, साँवला। उसने टोपी पहन रखी थी और काला चश्मा। वो स्वीटू के स्कूल के सामने खड़ा था। मुझे देखते ही वो मुड़ा और भीड़ में गायब हो गया। हे भगवान, ये कौन है? क्या चाहता है मुझसे? सुमीत को बताऊँगी तो वो चिंता में पागल हो जाएगा। प्रोजेक्ट की डेडलाइन है उसकी। नहीं, मैं खुद हैंडल करूँगी।"_

सुषमा की साँस रुक गई। "सुमीत जी... ये तो..."

"श्श्श।" सुमीत ने होठों पर उंगली रख दी। "आगे पढ़ो।"

मौत से 7 दिन पहले। वही पन्ना जो सुषमा ने पहले देखा था।

_"अगर मुझे कुछ हो जाए तो सुमीत, तुम दूसरी शादी कर लेना। पर किसी ऐसी लड़की से जो स्वीटू को अपनी बेटी माने। मैं नहीं चाहती मेरी बच्ची माँ के प्यार के लिए तरसे। सुमीत, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। हमेशा करती रहूँगी। पर मेरी आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब स्वीटू खुश रहेगी। मुझे माफ कर देना।"_ 

इसके बाद का पन्ना खाली था। शायद लिखने का मौका ही नहीं मिला।

सुमीत ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। उसके कंधे हिल रहे थे। पाँच साल बाद वो पहली बार टूटकर रो रहा था। एक आदमी का रुदन, जो अपनी पत्नी को बचा नहीं पाया।

सुषमा उठी और सुमीत के पास गई। उसने बिना कुछ कहे सुमीत के सिर पर हाथ रख दिया। जैसे कोई माँ अपने बेटे को दिलासा देती है। सुमीत ने चौंक कर सिर उठाया। सुषमा की आँखों में हमदर्दी थी, कोई सवाल नहीं, कोई इल्ज़ाम नहीं।

"इसमें आपकी कोई गलती नहीं थी सुमीत जी।" सुषमा बहुत धीरे से बोली। "शर्मिला ने आपको इसलिए नहीं बताया क्योंकि वो आपसे प्यार करती थी। वो आपको परेशान नहीं करना चाहती थी।"

सुमीत कुछ बोल नहीं पाया। बस सुषमा को देखता रहा।

"और अब हम क्या करेंगे?" सुषमा ने डायरी बंद करते हुए पूछा। "क्या हम पुलिस के पास जाएँगे? 5 साल पुराना केस... क्या खुलेगा?"

सुमीत ने आँसू पोंछे। उसकी आँखों में अब दर्द की जगह एक नई चमक थी। इंतकाम की। इंसाफ की। "पता नहीं खुलेगा या नहीं। पर मैं कोशिश जरूर करूँगा। शर्मिला के लिए। स्वीटू के लिए। और..." उसने पहली बार सुषमा को उसके नाम से बुलाया, "और सुषमा, तुम्हारे लिए। क्योंकि तुमने आज मुझे पाँच साल बाद इंसान जैसा महसूस कराया है।"

तभी नीचे से किसी के चीखने की आवाज आई। माजी की आवाज थी। "चोर! चोर! पकड़ो!"

सुमीत और सुषमा भागकर नीचे आए। हॉल में माजी जमीन पर गिरी पड़ी थीं। उनका गला पकड़ा हुआ था। और सामने खुली खिड़की से एक साया फुर्ती से कूदकर अंधेरे में गायब हो रहा था।

उसके हाथ में माजी के कमरे की तिजोरी से निकाला हुआ एक छोटा सा लकड़ी का डिब्बा था। वही डिब्बा जिसमें शर्मिला अपनी सबसे कीमती चीज रखती थी।

_तो दोस्तों, कौन था वो साया जो 5 साल बाद फिर लौटा? लकड़ी के डिब्बे में शर्मिला का कौन सा राज़ बंद था? और क्या शर्मिला की मौत का राज़ उसी डिब्बे में छुपा है? जानने के लिए सुनिए Episode 7... Follow बटन दबाना मत भूलना, वरना मर्डर मिस्ट्री का सबसे बड़ा ट्विस्ट मिस हो जाएगा!_

Bela...




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